31/03/2026
20 नवंबर 1750 में कर्नाटक के देवनाहल्ली में जन्मे टीपू का पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान साहब था। उनके पिता का नाम #हैदर_अली और माँ का #फकरुन्निसाँ था। उनके पिता मैसूर साम्राज्य के एक सैनिक थे लेकिन अपनी ताकत के बल पर वो 1761 में मैसूर के शासक बने। टीपू सुल्तान को इतिहास न केवल एक योग्य शासक और योद्धा के तौर पर देखता है बल्कि वो विद्वान भी था।
उनकी वीरता से प्रभवित होकर उनके पिता हैदर अली ने ही उन्हें शेर-ए-मैसूर के खिताब से नवाजा था। अंग्रेजों से मुकाबला करते हुए श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए 4 मई 1799 को टीपू सुल्तान की मौत हो गई।
टीपू सुल्तान को दुनिया का पहला मिसाइल मैन माना जाता है. बीबीसी की एक खबर के मुताबिक, लंदन के मशहूर साइंस म्यूजियम में टीपू सुल्तान के रॉकेट रखे हुए हैं। इन रॉकेटों को 18वीं सदी के अंत में अंग्रेज अपने साथ ले गए थे।
#टीपू_सुल्तान द्वारा कई युद्धों में हारने के बाद मराठों एवं निजाम ने अंग्रेजों से संधि कर ली थी। ऐसी स्थिति में टीपू ने भी अंग्रेजों से संधि का प्रस्ताव दिया। वैसे अंग्रेजों को भी टीपू की शक्ति का अहसास हो चुका था इसलिए छिपे मन से वे भी संधि चाहते थे। दोनों पक्षों में वार्ता मार्च, 1784 में हुई और इसी के फलस्वरूप 'मंगलौर की संधि' सम्पन्न हुई।
हिंदुस्तान में जब तक टीपू सुल्तान जबतक जिंदा रहे अंग्रेजों को लगा वो पूरे हिंदुस्तान पर कब्ज़ा नही कर सकते ना ही उसे अकेले हरा सकते है। इसलिए अंग्रेजों ने मराठो और हैदराबाद के निजाम को अपने साथ मिला और तय कर लिया मैसूर को तीनों बराबर हिस्से में बाट लेंगे। इसके बाद भी अंग्रेजों को टिपू सुल्तान से हारने का डर था इसलिए अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान के सेनापति को भी लालच देकर अपनी तरफ मिला लिया।
टीपु सुल्तान तन्हा रह गया लेकिन ना तो झुका और ना ही डरा अपने आखरी वक़्त में कहा शेर की एक दिन की ज़िंदगी गीदड़ की सौ साल से बेहतर है और लड़ते लड़ते शहीद हो गया
आज टीपू सुल्तान का इतिहास स्कूली पाठ्यक्रमों से हटाया जा रहा है उन्हे शायद पता नहीं है की इतिहास लोहे की तख्ती पर लिखा जाता है उसे कभी मिटाया नहीं जा सकता...
टीपू सुल्तान धर्म निरपेक्ष थे उन्होंने अपनी जागीर के मन्दिरों को 34 दान के सनद जारी किए।
'पालक्काड किला', 'टीपू का किला' नाम से भी प्रसिद्ध है। यह पालक्काड टाउन के मध्य भाग में स्थित है। इसका निर्माण 1766 में किया गया था। यह किला भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के अंतर्गत संरक्षित स्मारक है।
❤️🇮🇳❤️
#मैसूर
29/03/2026
#महेश_दास ( #बीरबल)(1528 - 16 फरवरी 1586) जो बीरबल के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं, इनका जन्म सीधी जिले के घोघरा नामक स्थान पर हुआ था, #मुगल_बादशाह_अकबर के दरबार में प्रमुख वज़ीर और अकबर के परिषद के नौ सलाहकारों (नवरत्नों) में से एक थे। उनका जन्म कायस्थ परिवार में हुआ था वह बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे। उनका नाम महेश दास था। उनकी बुद्धिमानी के हजारों किस्से हैं जो बच्चों को सुनाए जाते हैं।
स्वात घाटी के एक अफ़ग़ान कबीले यूसफ़ज़ाई ने मुग़लो के खिलाफ बगावत कर दी जिसे अपने नियंत्रण में लेने के लिए अक़बर ने अपने कमांडर जैन खान कोका को भेजा जहां उसकी सेना बुरी तरह फंस गई जैन खान ने अक़बर से सैन्य मदद मांगी।
जैन खान की मदद के लिए अकबर ने अपने सबसे होनहार मंत्री बीरबल को भेजा। बीरबल एक रणनीतिक थे लेकिन उन्हें सैन्य बल का ज़्यादा तजुर्बा नही था और वो अफगान कबीलों से भी वाकिफ़ नही थे।
जैन खान कोका उस क़बीले से अच्छी तरह वाकिफ थे आगे रास्ता बहुत संकरा और खराब था आगे बढ़ना मुनासिब नही था उन्होंने बीरबल से थोड़ा इंतेज़ार करने के लिए बोला वो हमले के लिए तैयार नही थे। लेकिन बीरबल ने उनकी बात नही मानी बीरबल उनसे सीनियर और अक़बर के खास मंत्री और दोस्त भी थे तो जैन खान उनकी बात को इनकार नही कर सके।
फिर वही हुआ जिसका जैन खान को डर था। उस रास्ते पर घात लगाए अफ़ग़ानियों ने हथियार और पत्थरों से ऐसा ज़ोर का चौतरफ़ा हमला बोला कि पता नहीं चला कि हाथी कहां हैं, घोड़े कहां और कहां इंसान.. इस जंग में राजा बीरबल ऐसे घिरे कि उनकी और उनके पूरे आर्मी की लाश तक नहीं मिली। किसी की मौत पर भी बादशाह सलामत को इतना ग़म नहीं हुआ था, जितना बीरबल की मौत पर हुआ था इस ग़म में कई दिनों तक अकबर दरबार मे नही गए मातम छाया रहा।
मुग़ल बादशाह अक़बर के सलाहकार और मंत्री बीरबल का क़त्ल आज ही के दिन 25 फरवरी 1586 को इंदुस स्वात घाटी के यूसफ़ज़ाई कबीले में हुआ था
#बीरबल
28/03/2026
शेर अली ने 1860 के दशक में पंजाब माउंट पुलिस में ब्रिटिश प्रशासन के लिए काम किया था।
उन्होंने 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान रोहिलखंड और औध में प्रेसीडेंसी सेनाओं में सेवा की। उन्होंने पेशावर में एक घुड़सवार सैनिक के रूप में मेजर ह्यूज जेम्स के तहत काम किया और रेनेल टेलर के लिए व्यवस्थित रूप से घुड़सवार के
रूप में काम किया, जिन्होंने घोड़े, पिस्तौल और प्रमाण पत्र के साथ शेर अली से सम्मानित किया।
#लॉर्ड_मेयो की हत्या
1869 से भारत के वाइसराय मेयो के 6 वें अर्ल रिचर्ड बोके फरवरी 1872 में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में जा रहे थे। द्वीप समूह को फिर अपराधियों और राजनीतिक कैदियों दोनों के भारत के अभियुक्तों के लिए ब्रिटिश दंड कॉलोनी के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
लॉर्ड मेयो द्वीप ब्लायर, द्वीपों के प्रमुख शहर के नियमों को तैयार करने में शामिल था। 8 फरवरी को, जब वाइसराय ने लगभग अपना निरीक्षण पूरा कर लिया था और 7:00 बजे अपनी नाव पर लौट रहा था, जहां लेडी मेयो भी इंतजार कर रहा था, #शेर_अली_आफ़रीदी को अंधेरे मे मायो दिखाई दिया और
उसको मौत के घाट उतार दिया। शेर अली को बारह सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत गिरफ्तार कर लिया था। लॉर्ड मेयो का खून ज्यादा बह गया और जल्द ही उस की मृत्यु हो गई।
इस घटना, जिसने द्वीप समूह पर अधिक ध्यान आकर्षित किया, माउंट हैरियेट के दौर में हुआ।
ब्रिटिश क्राउन द्वारा नियुक्त भारत के सर्वोच्च अधिकारी वाइसराय की हत्या ने पूरे ब्रिटेन और
ब्रिटिश भारत में एक सदमे की लहरें पैदा कर दी।
शेर अली अफरीदी को मौत की निंदा की गई और 11 मार्च 1873 को वाइपर द्वीप जेल में फांसी दी गई थी।
04/03/2026
दुनिया फ़तह करने का इरादा रखने वाला ज़िद्दी सुल्तान #अलाउद्दीन_खिलज़ी 19 जुलाई 1296 को अपने चाचा #जलालुद्दीन_ख़िलजी को गद्दी से हटाकर खुद दिल्ली सल्तनत का बादशाह बना। उसका मानना था कि" अल्लाह की बनाई हर नायाब चीज़ पर सिर्फ अलाउद्दीन का हक़ है"
अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा दिल्ली में कराए गए प्रमुख निर्माण कार्य:
#अलाई_दरवाजा (1311 ई.): यह कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के दक्षिण में बना एक शानदार प्रवेश द्वार है।
#सीरी_का_किला (सीरी टाउन): मंगोल आक्रमणों से दिल्ली की रक्षा के लिए अलाउद्दीन ने सीरी को अपनी राजधानी बनाया और वहां एक मजबूत किला बनवाया।
#हौज_ए_खास (अलाई जलाशय): दिल्ली में पानी की कमी दूर करने के लिए उसने 'हौज-ए-अलाई' या हौज-ए-खास का निर्माण करवाया, जो पत्थर की दीवारों से घिरा एक बड़ा जलाशय था।
#जमात_खाना_मस्जिद: यह दिल्ली की सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक है, जो पूरी तरह से इस्लामिक शैली में बनी है।
#अलाई_मीनार: अलाउद्दीन कुतुब मीनार से दोगुनी ऊँची मीनार बनवाना चाहता था, लेकिन उसके असामयिक निधन के कारण यह काम अधूरा रह गया, जिसका केवल पहला तल ही बन पाया था।
#हौज_ए_शम्सी की मरम्मत: 1311 ई. में उसने #इल्तुतमिश द्वारा बनवाए गए हौज-ए-शम्सी (जलाशय) की मरम्मत और सौंदर्यीकरण करवाया।
इन्होंने अपने साम्राज्य को सुदृढ़ और शक्तिशाली बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुधार किए ।
अमीरों पर अंकुश: विद्रोही गतिविधियों को रोकने के लिए सामाजिक समारोहों, दावतों और वैवाहिक संबंधों पर प्रतिबंध लगाया।
गुप्तचर प्रणाली: एक मजबूत जासूसी प्रणाली (बरीद ए मुमालिक) का गठन किया ताकि रईसों और प्रांतीय शासकों पर नज़र रखी जा सके।
धर्म का राजनीति से अलगाव: उलेमाओं (धार्मिक नेताओं) को प्रशासन में हस्तक्षेप करने से रोका।
नशाबंदी: दिल्ली में शराब और मादक पदार्थों की बिक्री और सेवन पर प्रतिबंध लगाया।
प्रत्यक्ष नियंत्रण: बिचौलियों को हटाकर सीधे किसानों से राजस्व (लगान) एकत्र करने की नीति अपनाई।
उच्च कर: कृषि उपज का 50% (आधा) तक कर (खराज) लिया जाता था।
मुस्तखराज: राजस्व संग्रह के लिए #दीवान_ए_मुस्तखराज' नामक विशेष अधिकारी नियुक्त किए।
शाहना-ए-मंडी: बाजारों पर नियंत्रण के लिए ' #दीवान_ए_रियासत' और ' #शहना_ए_मंडी' नामक अधिकारी नियुक्त किए।
स्थायी सेना: दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान जिसने एक बड़ी और स्थायी केंद्रीय सेना (स्थायी सेना) रखी।
नकद वेतन: सैनिकों को जागीर के बजाय नकद वेतन देने की शुरुआत की।
दाग और हुलिया: घोड़ों पर निशान लगाने की प्रणाली (दाग) और सैनिकों का रिकॉर्ड (हुलिया/चेहरा) रखने की प्रणाली शुरू की।
बादशाह बनते ही अलाउद्दीन खिलज़ी ने अपने विद्रोहियों को ख़त्म करना शुरू किया उस वक़्त उनके सबसे बड़े विद्रोही तुर्की थे जिन्हें हराकर खिलजियों ने सत्ता हासिल की थी। दिल्ली के हाजी मौला, गुजरात के नवी मुसलमान, उनके भतीजे अक़्त खां, उनका भांजा मंगू ख़ां, ने भी विद्रोह किया लेकिन अलाउद्दीन खिलज़ी ने सारे विद्रोहियों को खत्म कर दिया।
और फिर दिल्ली छोड़ पूरा हिंदुस्तान फ़तह करने निकल पड़ा। पहले अभियान 1298 में #राजा_कर्णदेव_वाघेला को हराकर गुजरात फ़तह किया राजा वाघेला ने हारने के बाद देवगिरि के राजा रामचन्द्र के यहां शरण ली।
दूसरा अभियान 1299 में सिर्फ ख़िलजी के सेना के घोड़े जब्त कर लेने की वजह से हुआ जैसलमेर के राजा दृदा के सहयोगियों ने अलाउद्दीन खिलज़ी की सेना के घोड़े जब्त कर लिए थे। क्रोधित अलाउद्दीन खिलज़ी ने जैसलमेर पर हमला कर राजा दृदा और उनके सहयोगियों को खत्म कर जैसलमेर फ़तह कर लिया।
तीसरा अभियान रणथम्भौर के राजा हम्मीरदेव ने अलाउद्दीन ख़िलजी के दुश्मन मंगोल सेनापति मुहम्मद शाह और कहब को अपने यहां शरण दे रखी थी। इसलिए खिलज़ी ने रणथम्भौर पर हमला कर के मंगोलों को भगाया और रणथम्भौर का किला फ़तह कर लिया इसमे अलाउद्दीन ख़िलजी के सेनापति #नुसरत_खां और #राजा_हम्मीरदेव मारे गए।
चौथे अभियान 1303 में चित्तौड़ और मेवाड़ पर हमला किया यह किला राजनीतिक दृष्टि से सबसे सुरक्षित था जिसे अलाउद्दीन खिलजी ने #राजा_रतनसिंह को हराकर जीत लिया। इस हमले को मलिक मोहम्मद जायसी की कहानी पद्मावती से जोड़कर भी देखा जाता है !
और इसके बाद 1304 में जालोर के राजा कान्हड़देव, 1305 में मालवा के राजा महलकदेव को हराकर अफ़ग़ानिस्तान से लेकर पूरा उत्तर भारत जीत लिया ।
अगला हमला देवगिरि पर किया गया #राजा_रामचन्द्र को हराकर उन्हें दिल्ली ख़िलजी के सामने पेश किया गया। लेकिन खिलजी ने रामचन्द्र को उनकी रियासत वापस कर उन्हें 1 लाख सोना टका देकर वापस भेज दिया।
इसके बाद 1309 में खिलज़ी की सेनापति #मलिक_काफूर ने तेलांगना पर हमला किया। वहां के #राजा_रुद्रदेव ने आत्मसमर्पण कर दिया बदले में मलिक काफूर को ढेर सारा सोना बेशक़ीमती हीरा #कोहिनूर दिया। तब इस हीरे का नाम कोहिनूर नही था। यह नाम अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा "कोह-ए नूर" (रोशनी का पहाड़) दिया गया था।
इस तरह खिलज़ी ने इतने कम वक्त में दक्षिण के कुछ हिस्से छोड़कर पूरे भारत पर खिलजियों का परचम बुलन्द कर दिया था। अलाउद्दीन ख़िलजी अपने जिंदगी में कभी कोई जंग नही हारा।
💗🇮🇳💗
13/02/2026
केरल के त्रिशूर जिले के कोडुंगल्लूर तालुक में स्थित चेरामन जुमा मस्जिद को भारत की पहली मस्जिद और दुनिया की सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक माना जाता है, जिसकी स्थापना 629 ईस्वी में हुई थी। #पैगंबर_मुहम्मद_साहब के सहाबी #मालिक_बिन_दीनार द्वारा निर्मित इस मस्जिद का नाम चेरा राजा #चेरामन_पेरुमल के नाम पर रखा गया था उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था।
मालिक बिन दिनार इस मस्जिद के क़ाज़ी बने रहें, बाद में हबीब बिन मालिक इस मस्जिद के काजी बने !
ये मस्जिद आज भी मौजूद हैं !! हजरत मालिक बिन दिनार रज़ि० ने भारत में दूसरी मस्जिद तकरीबन 642 C.E में थालेनगन रेलवे स्टेशन रोड कसरगोड़ केरला में तामीर किया
स्थापना की किंवदंती: परंपरा के अनुसार, चेरा राजा चेरामन पेरुमल पैगंबर मुहम्मद से मिलने के लिए अरब गए और इस्लाम धर्म अपना लिया, और अपने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उनकी वापसी पर मस्जिद का निर्माण करें।
मुख्य विशेषताएं: मस्जिद के अंदर एक प्राचीन दीपक जलता रहता है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसे मस्जिद की स्थापना के समय जलाया गया था।
यह मस्जिद अपनी पारंपरिक केरल शैली की वास्तुकला से निर्मित किया गया है
यह मस्जिद धार्मिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में खड़ी है, और इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण अक्सर लोग यहां दर्शन करने आते हैं।
मालिक बिन दिनार की आमद का वाकिया और सबूत से ये मालूम होता हैं कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दौर में ही इस्लाम भारत में मालिक बिन दिनार के ज़रिए आ चुका था
अल्लाह के प्यारे नबी हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात 632 C.E में हुवी और मालिक बिन दिनार रज़ि० 629 C.E में आये और इस्लाम की दावत आम की, मस्जिदें तामीर की !
ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का विलादत 1142 में और ख्वाजा साहब की वफात 1236 में हुई थी! दीन ए इस्लाम तो उनसे 600 साल पहले आ चुका था !!
629 में बनी #चेरामन_जुमा_मस्जिद इस बात की गवाह हैं !!
❤️🇮🇳❤️
#राजा_रामा_वर्मन_कुलशेखरा
#चेरामन_जुमा_मस्जिद #केरल
24/01/2026
खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म पेशावर, पाकिस्तान में हुआ था। उनके परदादा आबेदुल्ला खान सत्यवादी होने के साथ ही साथ लड़ाकू स्वभाव के थे। इसी प्रकार बादशाह खाँ के दादा सैफुल्ला खान भी लड़ाकू स्वभाव के थे। उन्होंने सारी जिंदगी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
#ख़ान_अब्दुल_ग़फ़्फ़ार_ख़ान एक पख्तून थे जो #महात्मा_गांधी जी के अहिंसक सिद्धान्तों के बहुत बड़े प्रशंसक थे। वे काँग्रेस को सीमान्त क्षेत्र में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध अपनी शिकायतों पर बल देने का एक रास्ता मानते थे। उनके अनुयायी भी अहिंसा के प्रति बचनबद्ध थे।
स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में अपने कार्य और निष्ठा के कारण "सरहदी गांधी" (सीमान्त गांधी), "बच्चा खाँ" तथा "बादशाह खान" के नाम से पुकारे जाने लगे। वे भारतीय उपमहाद्वीप में अंग्रेज शासन के विरुद्ध अहिंसा के प्रयोग के लिए जाने जाते है। एक समय उनका लक्ष्य संयुक्त, स्वतन्त्र और धर्मनिरपेक्ष भारत था। इसके लिये उन्होने 1930 में खुदाई खिदमतगार नाम के संग्ठन की स्थापना की। यह संगठन "सुर्ख पोश" (या लाल कुर्ती दल) के नाम से भी जाने जाता है।
लाल कुर्ती आन्दोलन भारत में पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थन में ख़ुदाई ख़िदमतगार के नाम से चलाया गया एक ऐतिहासिक आन्दोलन था। "ख़ुदाई ख़िदमतगार" एक पश्तो शब्द है जिसका हिन्दी में अर्थ होता है "ईश्वर की बनाई हुई विश्व के सेवक"।
1930 के दशक के उत्तरार्द्ध तक ग़फ़्फ़ार ख़ां महात्मा गांधी जी के निकटस्थ सलाहकारों में से एक हो गए और 1947 में भारत का विभाजन होने तक ख़ुदाई ख़िदमतगार ने सक्रिय रूप से
कांग्रेस पार्टी का साथ दिया। इनके भाई डॉक्टर ख़ां साहब
(1858-1958) भी गांधी जी के क़रीबी और कांग्रेसी आंदोलन
के सहयोगी थे। सन 1931 ई. के #गाँधी_इरविन समझौते के
बाद अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को छोड़ा गया और वे सामाजिक
कार्यों में लग गए।
सन 1988 में पाक़िस्तान सरकार ने उन्हें पेशावर में उनके घर में नज़रबंद कर दिया गया। 20 जनवरी 1988 को उनकी मृत्यु हो गयी और उनकी अंतिम इच्छानुसार उन्हें जलालाबाद अफ़ग़ानिस्तान में दफ़नाया गया। उन्होंने अपनी आधी से ज़्यादा ज़िंदगी जेल में गुज़ार दी। शायद ही कोई इतने लम्बे वक़्त जेल में रहा हो।
ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान को हमारी युवा पीढ़ी भूल गई है। इतिहास की पुस्तकों से इनसे संबंधित पाठ को हटा दिया गया है। इस देश में उनकी निशानी को देखें तो दिल्ली में उनके बड़े भाई के नाम पर खान मॉर्केट और सीमांत गांधी के नाम पर ग़फ़्फ़ार मॉर्केट मौजूद है। वे इकलौते पाकिस्तानी नागरिक हैं जिन्हें वर्ष 1987 को भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
♥️🇮🇳♥️
22/01/2026
ख़ानज़ादा बेगम (1478-1545) तैमूरवंशी राजकुमारी थीं और फ़रग़ना के अमीर ेख़_मिर्जा द्वितीय की सबसे बड़ी बेटी थीं। वह मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक #बादशाह_बाबर की बड़ी बहन भी थीं।
#ख़ानज़ादा_बेगम का जन्म मध्य एशिया के फ़रग़ना में हुआ था। वह एक उच्च शिक्षित महिला थीं, और उन्हें अपने सौंदर्य, बुद्धि और राजनीतिक सूझबूझ के लिए जाना जाता था।
साल 1501 में एक संघर्ष में #शैबानी_खान ने बादशाह बाबर को समरकंद के किले में कैद कर लिया
समरकंद छोड़ने की बाबर की स्वतंत्रता इस खानजादा बेगम से विवाह पर निर्भर थी। यह विवाह बाबर द्वारा मुग़लों और उज़्बेकियों के बीच गठबंधन बनाने के प्रयास के तहत किया गया था।
उस समय, खानज़ादा बेगम ने अपने भाई की जान बचाने के लिए सबसे बड़ा बलिदान दिया। वह शैबानी खान से शादी करने के लिए तैयार हो गईं। समरकंद और बादशाह बाबर की जान बच गई बाद में खानज़ादा बेगम को एक छोटी सी बात पर, शैबानी खान ने तलाक़ दे दिया और उसे उज़्बेक सुल्तान के एक नौकर से शादी करने के लिए मजबूर किया।
आखिरकार, 1510 में किस्मत उन पर मेहरबान हुई। ईरान के शाह, #शाह_इस्माइल द्वारा उज़्बेकों के खिलाफ़ लड़ी गई एक खूनी लड़ाई में शैबानी खान और उनके सगे संबंधी मारे गए। और फिर शाह इस्माइल ने खानज़ादा बेगम को पूरे सम्मान के साथ उनके भाई बाबर के पास पहुँचाया।
बाबर के वृत्तांत " #बाबरनामा" बताते हैं कि शाह इस्माइल ने शैबानी खान का सिर काट दिया और उसकी खोपड़ी को रत्नजड़ित खोपड़ी के प्याले में बदल दिया जिसका उपयोग मेहमानों के मनोरंजन के दौरान पेय पीने के लिए किया जाता था।
बाद में उन्होंने सद्भावना के प्रतीक के रूप में वह प्याला बाबर को भेज दिया। शैबानी के शरीर के शेष अंगों को या तो साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शन के लिए भेज दिया गया
या समरकंद के मुख्य द्वार पर एक कील पर लटका दिया गया।
मुगल इतिहासकार #मिर्ज़ा_हैदर अपनी रचना #तारीख_ए_रशीदी में लिखते है।
बाबर जब तक ज़िंदा रहा, खानज़ादा बेगम का बहुत सम्मान करता था और उन्हें बहुत प्यार करता था।
1530 में, बाबर की मृत्यु हो गई, और उनके बेटे #हुमायूं उनके उत्तराधिकारी बने। ख़ानज़ादा ने अपने भतीजे की एक विश्वसनीय सलाहकार के रूप में सेवा करना जारी रखा।
उसकी मृत्यु के बाद, हुमायूँ ने उन्हें " #पादशाह_बेगम" की उपाधि दी। अपने भाई(बाबर) के न होने पर भी, खानज़ादा बेगम तिमूरिद राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण बनी रहीं।
ख़ानज़ादा का निधन 1545 में 67 वर्ष की आयु में हुआ। उन्हें उनके गृहनगर अंदिजान में दफनाया गया।
♥️🇮🇳♥️
17/01/2026
#ईसा_खां_नियाज़ी के मकबरे का निर्माण 1547-48 में शेरशाह सूरी के दरबार के एक प्रभावशाली व्यक्ति ईसा खां नियाज़ी ने अपने ही जीवनकाल में करवाया था।
मुगलों के विरुद्ध लड़ने वाला सूर वंश के शासक #शेरशाह_सूरी के दरबार का एक अफ़्गान नवाब था। ईसा खां का मक़बरा #हुमायुं_का_मकबरा परिसर में उसके जीवनकाल में ही बना था और यह मुगल वास्तुकला से पहले का एक बेहतरीन उदाहरण है, जो लाल बलुआ पत्थर और टाइलों से बना है और इसके परिसर में एक मस्जिद और चारबाग शैली का बगीचा भी है।
यह एक अष्टकोणीय आकार का मकबरा है
मकबरे के अंदर छह कब्रें हैं, जिनमें से एक ईसा खां की है, और अन्य उनके परिवार के सदस्यों की हैं.
यह मुगल वास्तुकला से पहले की संरचनाओं का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है।