06/11/2025
खूबसूरती होती यदि इज्जतदार वाहन से ले जाते या घर पर वोटिंग की व्यवस्था करते।
किसी नेता या एलीट वर्ग के परिवार के लोग ऐसे जाना पसंद करेंगे?
ex. IFS
06/11/2025
खूबसूरती होती यदि इज्जतदार वाहन से ले जाते या घर पर वोटिंग की व्यवस्था करते।
किसी नेता या एलीट वर्ग के परिवार के लोग ऐसे जाना पसंद करेंगे?
यह मेट्रो शहर तुम्हें कोई मतलब नहीं देगा-तुम्हें ही उसे गढ़ना होगा।
दिल्ली जैसे मेट्रो की समस्या यह है कि आप एक कीड़े से ज्यादा कुछ नहीं, कोई पहचान नहीं। सड़क भी पार करना है तो दौड़ो, मेट्रो के लिए दौड़ो, बिना मतलब दौड़ो.
यहाँ आदमी एक कीड़ा नहीं होता- वह कुछ नहीं होता। और यही उसकी सज़ा है... और उसका चयन भी। इस शहर में कोई तुम्हें परिभाषित नहीं करता, क्योंकि तुम खुद को परिभाषित करने के लिए अभिशप्त हो।
मेट्रो की भीड़ तुम्हें निगलती नहीं; तुम स्वयं उसमें घुलने का निर्णय करते हो, क्योंकि स्वतंत्रता से भागना सबसे आम विकल्प है। दौड़ना ही असल में उस बेतुकेपन (absurdity) के प्रति तुम्हारा उत्तर है।
अच्छा जातिगत जनगणना का विरोध अधिकांशत: सवर्ण ही क्यों कर रहे हैं?
आरक्षण का डर या कुछ और??
अगला संघर्ष इस बात के लिए होगा कि हमारी जाति का सही डाटा नहीं दिया गया.
हम जिस 'वर्तमान' को जीते हैं, वह वास्तव में बीते हुए अनुभवों की परछाईं है। हमारा मस्तिष्क हर क्षण को अतीत के अनुभवों, स्मृतियों, धारणाओं, और उम्मीदों के चश्मे से देखता है। इस कारण हम "शुद्ध वर्तमान" में नहीं होते, बल्कि उस पर "समय की परतें" चढ़ी होती हैं।
मनुष्य का मस्तिष्क एक प्रेडिक्टिव मशीन (predictive machine) की तरह काम करता है — वह हर नए अनुभव की व्याख्या पुराने डेटा के आधार पर करता है। इसलिए नया भी पुराना लगता है। यही कारण है कि हम "अब" में नहीं जी पाते, बल्कि "अब जैसा अतीत" जीते रहते हैं।
आइंस्टीन का भी यह कहना था कि समय एक मनोवैज्ञानिक अनुभव है। यानी समय का अनुभव केवल मस्तिष्क की प्रोसेसिंग है — जब हम अतीत की परतों से भरे होते हैं, तो वर्तमान हमें धीमा, विकृत या बोझिल लग सकता है। लेकिन जब मन खाली होता है, तो समय रुक सा जाता है — और वही होता है शुद्ध वर्तमान।
काफ़्का, प्रुस्त और हेडेगर जैसे दार्शनिकों ने स्मृति और वर्तमान के द्वंद्व को इंसानी अस्तित्व की सबसे बड़ी उलझन माना है।
जब तक हम अतीत की मनोवैज्ञानिक परतों को नहीं उतारते, तब तक हम न तो वर्तमान को ठीक से देख सकते हैं, न ही उसमें हो सकते हैं.
और जब तक हम वर्तमान में नहीं हैं, तब तक सचेत रहना — या होश में रहना — एक भ्रम है।
तमिलनाडु गवर्नर प्रकरण: गवर्नर के विवेकाधिकार और संस्थागत संतुलन का संकट
तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के बीच उत्पन्न विवाद अब केवल राजनीतिक टकराव नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ द्वारा दिया गया निर्णय, जिसमें गवर्नर को मंत्रिपरिषद की सलाह पर "अनिवार्य रूप से" कार्य करने वाला बताया गया, ने एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न खड़ा कर दिया है: क्या संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों को विवेक की कोई स्वतंत्रता नहीं है?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जो दृष्टिकोण अपनाया, वह गवर्नर की भूमिका को यंत्रवत बनाता है। यह व्याख्या भारत के संवैधानिक संघवाद की उस भावना के विपरीत जाती है, जिसमें राज्यपाल को न केवल केंद्र का प्रतिनिधि, बल्कि राज्य के संविधान संरक्षक की भूमिका भी दी गई है।
संविधान के अनुच्छेद 163(1) स्पष्ट रूप से कहता है कि कुछ विषयों पर राज्यपाल को अपने विवेक से निर्णय लेने का अधिकार है। यदि इस विवेक को पूरी तरह नकार दिया जाए, तो यह संविधान की मूल संरचना को चुनौती देना होगा।
राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल – ये सभी प्रतीकात्मक से अधिक संस्थागत विवेक के वाहक हैं।
न्यायालय का यह संकेत कि गवर्नर का कर्तव्य मंत्रिपरिषद की बात मानने तक सीमित है, इन पदों को "रबड़ स्टैम्प" बना देता है। यह न केवल लोकतंत्र में शक्ति संतुलन को कमजोर करता है, बल्कि न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जा सकता है।
न्यायिक व्यवस्था में यह तर्क देना कि "विवेक का प्रयोग संविधान में नहीं लिखा है, इसलिए नहीं होगा", तर्कसंगत नहीं। संविधान मौन है, निषेधात्मक नहीं।
भारत जैसे लोकतंत्र में, जहाँ संस्थाएं आपसी संतुलन और नियंत्रण (checks and balances) से चलती हैं, वहाँ किसी भी पदाधिकारी को यंत्रवत बना देना लोकतंत्र को कमजोर करता है।
गवर्नर का विवेक सीमित हो सकता है, लेकिन शून्य नहीं। संविधान की आत्मा न्यायिक विवेक और कार्यकारी विवेक – दोनों के बीच संतुलन की मांग करती है।
न्यायपालिका को संविधान पीठ के माध्यम से इस संवैधानिक भ्रम को सुलझाना चाहिए।
यह मामला केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र, पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव सामने आ चुके हैं। ऐसे में, गवर्नर की भूमिका को लेकर एक सुस्पष्ट और संतुलित मार्गदर्शन आवश्यक है, जो केवल संविधान पीठ द्वारा ही दिया जा सकता है।
ध्वनि प्रदूषण
पॉल्यूशन का वह प्रकार है, जिसे कोई प्रदूषण मानने को तैयार नहीं.
हर्ट अटैक आए तो उसे वैक्सीन का दुष्प्रभाव बता दो, भले ही DJ पर चढ़ जाओ.
अन्ना हजारे घी का पराठा खा रहे हैं कल से. अब कभी उपवास नहीं करने की घोषणा😀
जो 1990 में सस्ते प्लाट लेने से बच गए थे, वे अब ले लें क्योंकि 30-35 साल बाद उन्हें या उनकी अगली पीढ़ी को 2025 के रेट सस्ते लगेंगे.
यदि नहीं खरीद पा रहे तो समझ लें कि जो समस्या आपके साथ है वही 1990 वालों को थी.
जो IIT बाबा को ट्रोल करके खुश हो रहे हैं, वे समझ नहीं रहे हैं कि कोई अपना काम पूरा करके जा चुका है, जो चाहिए था प्राप्त हो गया. आप बस ट्रोलिंग में लगे रहो.
सच्ची मोटिवेशनल कहानी -
एक लड़का बहुत गरीब था, खीरी में गांजा बेचता था. एक दिन गांजे की पुड़िया चाटने के बाद उसे कागज में टॉपर के नोट्स दिखे.
बस यहीं से उसकी किस्मत बदल गई और उसने तैयारी शुरू कर दी.
आज वह होनोलुलु में कलक्टर है.
भारत की हर फेमिली में पूर्वजों के पास सोने की ईंटें हुआ करती थीं जिसे किसी रिश्तेदार ने धोखे से हड़प लिया होता है.
कुछ के खानदान में जमींदारी होती थी और हाँ, अवध के मुस्लिम हुए तो नवाबी.
बहुतों के चाचा, ताऊ या बड़े भाई को सरकारी जॉब भी मिलनी थी जो एक डाकिये के समय पर पोस्ट न पहुंचाने की वजह से नहीं मिली.
~ और कुछ नहीं, ये Ego satisfy करने के परंपरागत तरीके हैं बस.