गरीबी की मार इंसान को भीतर तक तोड़ देती है, लेकिन जब बात एक माँ की हो, तो वही गरीबी उसे एक ऐसे सांचे में ढाल देती है जहाँ भावनाएं पत्थर बन जाती हैं और ममता सिर्फ जिंदा रहने की जद्दोजहद। सुमित्रा की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। रामनगर की एक तंग और बदबूदार गली के आखिरी कोने में उसकी एक छोटी सी झोपड़ी थी, जिसकी छत हर बरसात में रोती थी और दीवारें ठंड में कांपती थीं। सुमित्रा के पति की मौत एक सड़क हादसे में तब हो गई थी जब उसका बेटा, गोलू, सिर्फ तीन साल का था। उस दिन के बाद से सुमित्रा की जिंदगी का एक ही मकसद था—गोलू को पालना और उसे इस दलदल से बाहर निकालना।
शुरुआती दिनों में सुमित्रा के भीतर एक आम माँ जैसी कोमलता थी। वह गोलू को गोद में लेकर लोरियां गाती थी, उसके गालों को चूमती थी और छोटी-मोटी ख्वाहिशें पूरी करने की कोशिश करती थी। लेकिन वक्त बीतने के साथ गरीबी ने अपना असली रूप दिखाना शुरू कर दिया। राशन की दुकान के चक्कर, मकान मालिक की गालियां और कर्जदारों के ताने ने सुमित्रा के भीतर की कोमल महिला को धीरे-धीरे मारना शुरू कर दिया। पेट की भूख जब चौखट पर आकर चिल्लाती है, तो इंसान के पास रोने का वक्त भी नहीं बचता। गरीबी ने सुमित्रा को एक मशीन बना दिया था, जो सुबह चार बजे उठती और रात के बारह बजे तक बिना रुके चलती रहती थी।
वह सुबह उठकर सबसे पहले चार घरों में झाड़ू-पोछा और बर्तन साफ करने जाती। वहाँ से जो रूखा-सूखा मिलता, उसे लेकर वह सीधे एक कंस्ट्रक्शन साइट पर पहुँचती, जहाँ दोपहर की कड़कती धूप में उसे अपने सिर पर सीमेंट और ईंटों के तसले ढोने होते थे। धूप से उसकी चमड़ी झुलस चुकी थी, चेहरे की झुर्रियां वक्त से बीस साल पहले ही उभर आई थीं और जिन हाथों से वह कभी गोलू को सहलाती थी, वे अब ईंटें उठा-उठाकर इतने सख्त हो चुके थे कि जैसे कोई पत्थर हों। गरीबी ने उसकी कोमलता छीनकर उसे एक 'मजदूर' बना दिया था।
एक दिन की बात है, गोलू स्कूल से लौटा तो उसे तेज बुखार था। वह झोपड़ी के कोने में फटे कंबल में लिपटा कांप रहा था। सुमित्रा जब शाम को काम से लौटी, तो उसने गोलू के माथे पर हाथ रखा। उसका बदन तवे की तरह जल रहा था। गोलू ने रोते हुए कहा, "माँ, बहुत दर्द हो रहा है, मुझे डॉक्टर के पास ले चलो।" सुमित्रा की जेब में उस वक्त सिर्फ बीस रुपये थे। डॉक्टर की फीस और दवाई के लिए कम से कम दो सौ रुपयों की जरूरत थी। सुमित्रा ने उस वक्त रोने या अपनी किस्मत को कोसने में एक सेकंड भी बर्बाद नहीं किया। गरीबी ने उसे इतना व्यावहारिक और सख्त बना दिया था कि उसकी आँखों के आँसू भी जैसे सूख चुके थे।
वह तुरंत ठेकेदार के घर भागी और घुटने टेककर अडवांस पैसे मांगने लगी। ठेकेदार ने मना कर दिया और उसे भगा दिया। सुमित्रा हारी नहीं, वह उस रईस के घर गई जहाँ वह बर्तन मांजती थी। मालकिन ने पैसे देने के बदले में शर्त रखी कि उसे अगले एक महीने तक बिना एक भी छुट्टी किए, दुगना काम करना होगा। सुमित्रा ने बिना सोचे-समझे हाँ कह दिया। उसने स्वाभिमान, थकान और अपनी बीमारी को एक तरफ रख दिया। गरीबी ने उसके आत्मसम्मान को कुचलकर उसे सिर्फ एक 'याचक' बना दिया था, जो अपने बच्चे की जान के लिए किसी के भी सामने हाथ फैला सकती थी।
पैसा लेकर वह डॉक्टर के पास गई और दवाइयाँ खरीदीं। रात को जब वह गोलू को दवा खिला रही थी, तो गोलू ने उसका हाथ पकड़ लिया। गोलू ने देखा कि माँ की उंगलियों से खून बह रहा था, शायद कंस्ट्रक्शन साइट पर कोई नुकीली ईंट लग गई थी। गोलू की आँखों में आँसू आ गए, उसने कहा, "माँ, तुम्हें दर्द नहीं होता क्या? तुम कभी रोती क्यों नहीं हो?" सुमित्रा ने एक सूखी मुस्कान के साथ उसका सिर सहलाया। वह गोलू को कैसे बताती कि गरीबी ने उसके आंसुओं की कीमत इतनी सस्ती कर दी थी कि अब रोने से उसका पेट नहीं भरता था। गरीबी ने उसे एक ऐसी 'चट्टान' बना दिया था, जिस पर दुखों की कितनी भी बौछार हो, वह टूटती नहीं थी।
वक्त गुजरता गया और गोलू बड़ा होने लगा। वह देखता था कि उसकी माँ कभी त्योहारों पर नए कपड़े नहीं पहनती थी, कभी अच्छी साड़ी की मांग नहीं करती थी और खाने के नाम पर हमेशा वही बचा-कुचा खाती थी जो अमीर घरों से मिलता था। कई बार तो सुमित्रा सिर्फ पानी पीकर सो जाती थी और गोलू से कहती थी कि उसका पेट खराब है। गरीबी ने माँ को एक 'झूठा' भी बना दिया था—एक ऐसा झूठा जो हर रोज अपने बच्चे के सामने मुस्कुराकर कहता था, "मैं ठीक हूँ, मुझे भूख नहीं है।" यह झूठ दुनिया के हर सच से ज्यादा पवित्र था।
गरीबी ने सुमित्रा से उसकी हंसी छीन ली, उसकी जवानी छीन ली, उसकी ख्वाहिशें छीन लीं और उसकी कोमलता छीन ली। उसने सुमित्रा को एक सख्त, बेजान और दिन-रात काम करने वाली कटपुतली जैसा बना दिया, जिसके चेहरे पर कभी कोई शिकन या डर नहीं दिखता था। लेकिन इस सब के बावजूद, गरीबी एक चीज को कभी नहीं छू सकी—और वह थी सुमित्रा के भीतर की 'ममता'। गरीबी ने माँ को बाहर से भले ही एक पत्थर की मूरत बना दिया हो, लेकिन उस पत्थर के भीतर जो दिल धड़कता था, वह विशुद्ध सोने का था। माँ ने गरीबी के सामने घुटने नहीं टेके, बल्कि अपनी ममता की ढाल बनाकर गरीबी को हर रोज हराया।
NM Mishra
“अगर गिरकर उठना सीख लिया, तो कोई तुम्हें हरा नहीं सकता।”🙏🙏 support me
इसके सिर्फ एक कदम से पूरी दुनिया का मौसम बदल जाता है😱
रात के सन्नाटे को चीरती हुई लखनऊ की ठंडी हवाएं जब गोमती नगर की उस आलीशान कोठी की खिड़कियों से टकरा रही थीं, तो भीतर से सिसकियों की एक ऐसी आवाज आ रही थी जिसे सुनने वाला कोई नहीं था। चारों तरफ सजे महंगे झूमर और मखमली सोफे उस दर्द को नहीं छुपा पा रहे थे, जो उस घर के एक अंधेरे कोने में दम तोड़ रहा था। सत्तर साल की सावित्री देवी, जिनके पैर ठंड के मारे पत्थर हो चुके थे, फर्श पर बैठी अपनी फटी हुई एल्युमिनियम की थाली को देख रही थीं, जिसमें सिर्फ दो सूखी रोटियां और पानी जैसी पतली दाल पड़ी थी। यह किसी अनाथ की दास्तान नहीं, बल्कि उस माँ की कहानी थी जिसका बेटा शहर का बहुत बड़ा अफसर था।
विकास और उसकी पत्नी मीनाक्षी की दुनिया सिर्फ पार्टियों, पैसों और दिखावे के इर्द-गिर्द घूमती थी। मीनाक्षी के लिए उसकी बूढ़ी सास घर का वह पुराना और बेकार सामान थी, जिसे वह न तो फेंक सकती थी और न ही किसी के सामने ला सकती थी। इसलिए उसने सावित्री देवी को घर के सबसे पिछले हिस्से में बने एक सीलन भरे स्टोर रूम में शिफ्ट कर दिया था। विकास सब कुछ जानता था, लेकिन मीनाक्षी के तीखे तेवरों के आगे उसका बेटा होना जैसे घुटने टेक चुका था।
एक दिन, जब लखनऊ का तापमान गिरकर पाँच डिग्री तक पहुँच गया था, सावित्री देवी को तेज खाँसी के साथ छाती में भयंकर दर्द उठा। भूख के मारे उनका पेट पीठ से लग गया था क्योंकि सुबह से उन्हें चाय का एक घूंट भी नसीब नहीं हुआ था। वे अपनी लाठी के सहारे लड़खड़ाती हुई रसोई की तरफ बढ़ीं, जहाँ से ताजे गाजर के हलवे की खुशबू आ रही थी।
मीनाक्षी अपनी किटी पार्टी की तैयारियों में मशगूल थी। सावित्री देवी ने दरवाजे की ओट से कांपती आवाज में कहा, "बहू... बहुत तेज भूख लगी है, बदन भी टूट रहा है। थोड़ा सा गर्म पानी और एक रोटी मिल जाती तो..."
मीनाक्षी ने गुस्से से लाल आँखें घुमाईं और चिल्लाई, "आपको चैन नहीं है क्या? जब देखो अपनी यह बीमारी का रोना लेकर आ जाती हो। जाओ अपने कमरे में, मेरे मेहमान आने वाले हैं।"
सावित्री देवी ने हाथ जोड़ दिए, "बहू, बस एक कप गर्म पानी दे दे, मेरी छाती का दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा।"
क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए, मीनाक्षी ने स्टोव पर उबलते हुए पानी के बर्तन को उठाया और सावित्री देवी के पैरों की तरफ फेंक दिया। खौलते पानी के छीटें पड़ते ही बूढ़ी माँ चीख उठीं। मीनाक्षी ने उन्हें जोर से धक्का दिया, जिससे सावित्री देवी का सिर सीधे कंक्रीट के पिलर से जा टकराया। खून की एक पतली धार उनके सफेद बालों से होती हुई फर्श पर बहने लगी। वह दर्द और बेबसी से वहीं गिर पड़ीं, लेकिन उनकी आँखें अपनी बहू को कोस नहीं रही थीं, उनमें सिर्फ एक माँ की लाचारी थी।
उसी वक्त विकास दफ्तर से लौटा। रसोई का यह खौफनाक मंजर देखकर उसके हाथ से सूटकेस छूट गया। फर्श पर उसकी माँ खून और पानी के बीच तड़प रही थी। विकास का जमीर उस दिन चीख उठा। वह घुटने टेककर माँ के पास बैठा और उन्हें अपनी गोदी में उठा लिया। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थे, "माँ! मुझे माफ कर दो, मैं अपनी आँखों पर पट्टी बांधे रहा।"
वह तुरंत माँ को लेकर अस्पताल भागा। डॉक्टर ने पट्टी करने के बाद कहा, "अगर थोड़ी देर और हो जाती, तो इस उम्र में यह सदमा और चोट इनकी जान ले लेती।"
अस्पताल के आईसीयू (ICU) बेड पर जब सावित्री देवी ने अपनी भारी आँखें खोलीं, तो देखा कि विकास उनके पैरों को पकड़कर रो रहा था और कह रहा था, "माँ, मैं आज ही मीनाक्षी से सारे रिश्ते तोड़ दूंगा। उसने जो किया, उसकी कोई माफी नहीं है।"
लेकिन, एक माँ का दिल तो माँ का ही होता है। सावित्री देवी ने अपने कांपते हाथों से विकास के आँसू पोंछे और बेहद धीमी आवाज में कहा, "नहीं बेटा... ऐसा मत कर। वह नासमझ है। अगर तू उसे छोड़ देगा तो घर उजड़ जाएगा, और एक माँ अपने बच्चे का घर उजड़ते नहीं देख सकती। बस... मुझे लखनऊ के किसी वृद्ध आश्रम में छोड़ आ। वहाँ कम से कम मुझे वक्त पर सूखी रोटी मिल जाएगी और तेरी गृहस्थी भी बची रहेगी।"
माँ की यह बात सुनकर कमरे में मौजूद डॉक्टर और नर्स की आँखें भी छलक आईं। जिस माँ को उसकी बहू ने मौत के मुंह में धकेलने की कोशिश की, वह आज भी उसी बहू का सुहाग और घर बचाने के लिए खुद को कुर्बान करने को तैयार थी। विकास ने माँ का हाथ चूम लिया और समझ गया कि दुनिया में सब कुछ खरीदा जा सकता है, लेकिन एक माँ की निस्वार्थ ममता की कोई कीमत नहीं लगा सकता।
# # एक निवाले की कीमत
रामू की आँखों में नींद थी, लेकिन पेट में चूहे कूद रहे थे। रात के ग्यारह बज चुके थे। वह अपनी फटी हुई चटाई पर लेटा अपनी माँ, सुमित्रा, की राह देख रहा था।
सुमित्रा लोगों के घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू-पोछा करने का काम करती थी। गरीबी ने उसके हाथों की चूड़ियाँ बहुत पहले ही छीन ली थीं और उनकी जगह दे दी थी काम की गिट्टियाँ और फटी हुई बिवाइयाँ। आज उसे एक रईस के घर में किसी शादी का काम मिला था, इसलिए वह देर रात तक रुकी हुई थी।
---
# # # इंतज़ार का अंत
तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। रामू झटपट उठा और उसने किवाड़ खोल दिए। सामने माँ खड़ी थी। सुमित्रा के चेहरे पर दिनभर की थकान साफ दिख रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
> "रामू बेटा, तू अभी तक सोया नहीं?" सुमित्रा ने थके हुए स्वर में पूछा।
> "भूख लगी थी माँ... और तुम्हारी याद भी आ रही थी," रामू ने मासूमियत से कहा।
सुमित्रा ने मुस्कुराते हुए अपनी पल्लू की गाँठ खोली। उसमें से स्टील का एक छोटा सा टिफिन निकला। वह उस रईस की शादी से रामू के लिए पनीर की सब्जी और दो पूरियाँ बचाकर लाई थी।
---
# # # माँ का झूठ
रामू की आँखें खुशी से चमक उठीं। वह तुरंत खाने बैठ गया। जैसे ही उसने पहला निवाला मुँह में डाला, उसे याद आया:
"माँ, तुमने खाया?"
सुमित्रा ने अपनी सूखी हुई जीभ पर थूक घोंटा। दोपहर से उसने अन्न का एक दाना भी नहीं चखा था, क्योंकि मालिक ने खाना सिर्फ घर ले जाने के लिए दिया था, वहाँ खाने के लिए नहीं। लेकिन वह माँ थी।
* **वह झूठ जो हर माँ बोलती है:** "हाँ बेटा, मैं तो वहीं पेट भरकर खाकर आई हूँ। तू आराम से खा।"
* **सच्चाई:** सुमित्रा ने सिर्फ कुएं का ठंडा पानी पीकर अपनी भूख को शांत किया था।
---
# # # गरीबी हार गई, ममता जीत गई
रामू मजे से खा रहा था और सुमित्रा उसे देखकर अपनी सारी थकान भूल चुकी थी। गरीबी ने भले ही सुमित्रा को एक-एक पैसे के लिए मोहताज कर दिया था, उसकी कमर झुका दी थी और उसे 'मजदूर' बना दिया था...
..लेकिन वह सुमित्रा के भीतर की 'माँ' को नहीं बदल सकी थी। आज भी, उस झोपड़ी में, एक माँ की ममता के सामने दुनिया की सबसे बड़ी गरीबी घुटने टेक चुकी थी।
What happened to his hair? 😲 Watch till the end‼️
**इंतजार की दहलीज**
ड्रॉइंग रूम की बड़ी खिड़की के पास खड़ी सविता मेहरा लगातार बाहर सड़क की ओर देख रही थी। शाम के सात बज चुके थे और आसमान पर अंधेरा पूरी तरह अपनी चादर फैला चुका था। सड़क पर गाड़ियां अपनी हेडलाइट्स जलाए तेजी से गुजर रही थीं। हर बार जब कोई सफेद रंग की गाड़ी उनकी लेन की तरफ मुड़ती, सविता के दिल की धड़कन तेज हो जाती। लेकिन जैसे ही वह गाड़ी आगे निकल जाती, उनकी आंखों में छाई उम्मीद की चमक फिर से फीकी पड़ जाती।
सविता जी की उम्र करीब पैंसठ वर्ष थी। उनके चेहरे की झुर्रियों में जिंदगी का लंबा तजुर्बा और आंखों में एक गहरा अकेलापन साफ झलकता था। उनके पति, कर्नल मेहरा, को गुजरे हुए तीन साल हो चुके थे। तब से वह इस बड़े से आलीशान बंगले में बिल्कुल अकेली रहती थीं। उनका इकलौता बेटा, निशांत, अपनी पत्नी और बच्चे के साथ अमेरिका में रहता था। निशांत का काम ऐसा था कि उसे फोन करने की भी फुरसत मुश्किल से मिलती थी। लेकिन आज का दिन बेहद खास था। पूरे दो साल बाद निशांत अपनी फैमिली के साथ इंडिया आ रहा था, और वह भी पूरे एक महीने के लिए।
सुबह से ही सविता जी के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। उन्होंने पूरे घर को अपने हाथों से सजाया था। निशांत के पसंदीदा काजू के कतली और बहू की पसंद के खीर खुद रसोई में खड़े होकर बनाए थे। उनके घुटनों में तकलीफ रहती थी, लेकिन आज जैसे सारा दर्द गायब हो गया था। नौकर रामू ने कई बार कहा, "माजी, आप बैठ जाइए, बाकी काम मैं कर दूंगा।" पर सविता जी कहां मानने वाली थीं। मां का दिल तो बस अपने बच्चे को अपनी बाहों में भरने के लिए बेताब था।
साढ़े सात बज गए। सविता जी ने खिड़की से नजर हटाकर दीवार घड़ी की तरफ देखा। निशांत की फ्लाइट दोपहर तीन बजे दिल्ली लैंड होने वाली थी। वहां से उनके शहर आने में चार से पांच घंटे का वक्त लगना था। ट्रैफिक को ध्यान में रखें तो भी उन्हें अब तक पहुंच जाना चाहिए था। सविता जी ने अपना मोबाइल उठाया और निशांत का नंबर डायल किया। फोन बंद आ रहा था। उन्होंने बहू के नंबर पर ट्राई किया, वह भी नॉट रीचेबल था। एक अजीब सी घबराहट उनके सीने में सिर उठाने लगी।
वह ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठ गईं, लेकिन दो मिनट भी बैठना भारी लगा। वह फिर से उठकर खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गईं। हवा के झोंके से बाहर लगे नीम के पेड़ की पत्तियां सरसरा रही थीं, जिससे सड़क पर बन रही परछाइयां और डरावनी लग रही थीं। सविता जी का दिमाग अनहोनी की आशंकाओं से घिरने लगा। 'कहीं कोई एक्सीडेंट तो नहीं हो गया? आजकल की गाड़ियां इतनी तेज चलती हैं। या फिर फ्लाइट लेट हो गई होगी?' उन्होंने भगवान के सामने हाथ जोड़ लिए और मन ही मन हनुमान चालीसा का पाठ करने लगीं।
तभी रामू कमरे में आया और बोला, "माजी, खाना ठंडा हो रहा है। आप कहो तो टेबल पर लगा दूँ? भैया लोग आते ही होंगे।" सविता जी ने बिना पीछे मुड़े कहा, "नहीं रामू, निशांत आ जाए, फिर सब साथ में ही खाएंगे। तू जाकर सो जा, मैं जाग रही हूँ।" रामू उदास चेहरे से चला गया। वह जानता था कि माजी पिछले कई दिनों से इसी दिन का इंतजार कर रही थीं।
रात के नौ बज चुके थे। खिड़की के कांच पर सविता जी की अपनी परछाई दिख रही थी—एक अकेली, थकी हुई मां की परछाई। तभी सड़क के कोने से एक गाड़ी मुड़ी और सीधे उनके बंगले के गेट के सामने आकर रुक गई। गाड़ी की हेडलाइट्स की रोशनी सीधे ड्राइंग रूम की खिड़की पर पड़ी। सविता जी की आंखें चौंधिया गईं, लेकिन उनके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान तैर गई। वह बिना चप्पल पहने ही दरवाजे की तरफ भागीं।
उन्होंने जैसे ही मुख्य दरवाजा खोला, देखा कि निशांत गाड़ी से नीचे उतर रहा था। उसके पीछे उसकी पत्नी अंजलि और छोटा बेटा आरव भी थे। निशांत ने जैसे ही अपनी मां को देखा, वह दौड़कर आया और उन्हें गले से लगा लिया। "सॉरी मां! रास्ते में बहुत भारी जाम था, और हमारे फोन की बैटरी भी डेड हो गई थी। आपको बहुत इंतजार करना पड़ा न?" निशांत ने फिक्र से कहा।
सविता जी की आंखों से आंसू बह निकले, लेकिन ये आंसू गम के नहीं, बल्कि सुकून के थे। उन्होंने निशांत के चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया और चूमा। उनकी दो साल की लंबी प्रतीक्षा, वह खिड़की के पास खड़े होकर बिताए गए दर्दनाक घंटे, सब कुछ उस एक गले मिलने से काफूर हो गए। घर का वह सन्नाटा जो शाम से उन्हें डरा रहा था, अब आरव की चीखों और निशांत की बातों से गूंज उठा था। सविता जी ने खिड़की को धीरे से बंद कर दिया, क्योंकि अब उन्हें बाहर देखने की जरूरत नहीं थी—उनका पूरा संसार अब घर के अंदर था।
**पटरियों की गूंज**
रेलवे लाइन के किनारे बनी झुग्गियों में उस दिन बहुत तेज़ हवा चल रही थी। प्लास्टिक की फटी हुई पन्नियां, जो छतों का काम कर रही थीं, हवा के थपेड़ों से लगातार फड़फड़ा रही थीं। धूल का एक बवंडर उठा और पूरी बस्ती को अपनी चपेट में ले गया। दस साल का छोटू अपनी झुग्गी के बाहर बैठा एक टूटी हुई प्लास्टिक की गाड़ी से खेल रहा था, लेकिन उसका ध्यान खेल में कम और सामने बिछी लोहे की पटरियों पर ज्यादा था। उसके लिए ये पटरियां सिर्फ लोहे के टुकड़े नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी खिड़की थीं जो हर रोज उसे एक नई दुनिया की झलक दिखाती थीं।
तभी दूर से एक तेज़ हॉर्न की आवाज सुनाई दी। पटरियों में एक हल्की सी कंपन होने लगी। छोटू तुरंत खड़ा हो गया और पटरी से सुरक्षित दूरी पर जाकर इंतजार करने लगा। कुछ ही सेकंडों में राजधानी एक्सप्रेस पूरी रफ्तार से वहां से गुजरी। ट्रेन की खिड़कियों से चमकते हुए चेहरे, साफ-सुथरे कपड़े पहने लोग और उनके हाथ में पकड़ी खाने-पीने की चीजें छोटू को साफ दिखाई दे रही थीं। ट्रेन के गुजरते ही हवा का एक और तेज झोंका आया, जिससे छोटू की आंखों में धूल भर गई। उसने अपनी फटी हुई आस्तीन से आंखें पोंछीं और वापस अपनी झुग्गी की तरफ देखने लगा, जहाँ उसकी मां शकुंतला कोयले के चूल्हे पर सूखी रोटियां सेक रही थी।
शकुंतला का चेहरा धुएं और उदासी से भरा हुआ था। वह हर रोज सुबह से शाम तक लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा करती थी, ताकि अपने बेटे को दो वक्त की रोटी दे सके और उसे किसी सरकारी स्कूल में पढ़ा सके। लेकिन इस बस्ती की जिंदगी अनिश्चितताओं से भरी थी। यहाँ न तो पानी का कोई पक्का इंतजाम था और न ही बिजली का। ऊपर से हर वक्त सिर पर एक तलवार लटकी रहती थी कि न जाने कब रेलवे वाले आएं और उनकी इन झुग्गियों को अवैध बताकर ढहा दें।
शाम ढलने लगी थी और हवा की रफ्तार और तेज हो गई थी। बस्ती के लोग अपनी-अपनी झुग्गियों को रस्सियों और पत्थरों से बांधने में जुटे थे ताकि रात के तूफान में उनके सिर की छत न उड़ जाए। इसी बीच बस्ती के कोने में एक भीड़ इकट्ठा होने लगी। छोटू और उसकी मां भी वहां पहुंचे। रेलवे के कुछ कर्मचारी पुलिस के साथ आए थे और उन्होंने एक नोटिस बोर्ड लगा दिया था। नोटिस पर लिखा था कि अगले सात दिनों के भीतर इस जमीन को खाली करना होगा, क्योंकि यहाँ पटरियों को चौड़ा करने का काम शुरू होने जा रहा था।
यह सुनते ही पूरी बस्ती में कोहराम मच गया। औरतें रोने लगीं और मर्द अधिकारियों के सामने हाथ जोड़ने लगे। शकुंतला का दिल भी बैठ गया। उसने बड़ी मुश्किल से पाई-पाई जोड़कर इस झुग्गी को थोड़ा रहने लायक बनाया था। अगर यह भी छिन गई, तो वह इस बड़े शहर में अपने बच्चे को लेकर कहाँ जाएगी? उस रात हवा की सरसराहट के बीच पूरी बस्ती में सिर्फ सिसकियों की आवाजें गूंज रही थीं। कोई सो नहीं पा रहा था।
अगले कुछ दिन बेहद तनाव में गुजरे। लोग अपना सामान समेटने की तैयारी करने लगे, लेकिन किसी को नहीं पता था कि उनका अगला ठिकाना कहाँ होगा। छोटू अपनी मां का उतरा हुआ चेहरा देखता और सोचता कि जो ट्रेनें लोगों को उनकी मंजिलों तक पहुंचाती हैं, वही ट्रेनें उनके आशियाने को क्यों उजाड़ रही हैं? क्या विकास की पटरी हमेशा गरीबों के घरों के ऊपर से ही गुजरती है?
सातवें दिन की सुबह बहुत ठंडी थी। हवा में एक अजीब सी खामोशी थी। बस्ती के लोग अपना सामान—फटे हुए गद्दे, कुछ बर्तन और बांस की बल्लियां—समेटकर पटरियों के दूसरी तरफ खड़े थे। कुछ ही देर में पीले रंग का एक बड़ा बुलडोजर वहां पहुंचा। लोहे के उस विशाल पंजे ने एक-एक करके सारी झुग्गियों को मलबे के ढेर में बदल दिया। छोटू ने देखा कि उसकी वह प्लास्टिक की टूटी हुई गाड़ी भी उस मलबे के नीचे दब गई थी।
जब सब कुछ खत्म हो गया, तो शकुंतला ने भारी मन से अपने सिर पर बर्तनों की बोरी रखी और छोटू का हाथ थाम लिया। वे दोनों पटरी के किनारे-किनारे आगे बढ़ने लगे, किसी नए ठिकाने की तलाश में। चलते-चलते छोटू ने एक बार पीछे मुड़कर देखा। जहाँ कभी उनकी बस्ती थी, वहां अब सिर्फ धूल और मलबा था। तभी पीछे से एक और मालगाड़ी गुजरी, जिसकी गूंज ने उसकी मां की सिसकियों को दबा दिया। छोटू ने अपनी मां का हाथ और कसकर पकड़ लिया। आशियाना टूट चुका था, लेकिन पटरियों के किनारे जिंदगी का सफर अभी भी जारी था।
**समझौतों की कतरनें**
हॉल में रखा पुराना लकड़ी का झूला धीरे-धीरे हिल रहा था। उस पर बैठी साठ वर्षीय गायत्री देवी अपनी पोती नियति को देख रही थीं, जो सोफे पर बैठी लैपटॉप पर अपनी उंगलियां तेजी से चला रही थी। नियति के चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था, वह किसी ऑफिस के प्रोजेक्ट को लेकर परेशान थी। तभी गायत्री देवी ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "नियति, बेटा! थोड़ी देर के लिए कंप्यूटर बंद कर दे। सुबह से आंखें गड़ाए बैठी है। जरा अपने होने वाले ससुराल वालों से बात कर ले, वे लोग शादी की तारीख पक्की करना चाहते हैं।"
नियति ने बिना स्क्रीन से नजरें हटाए चिढ़कर कहा, "दादी, प्लीज! अभी मैं बहुत जरूरी काम कर रही हूँ। और शादी की तारीख इतनी जल्दी कैसे पक्की कर लूं? मैंने उनसे साफ कहा है कि शादी के तुरंत बाद मेरा तीन महीने का ऑन-साइट प्रोजेक्ट है, मुझे विदेश जाना होगा। अगर वे इस बात पर राजी नहीं हैं, तो मुझे यह शादी नहीं करनी। मैं अपने करियर के साथ कोई समझौता नहीं कर सकती।"
गायत्री देवी ने एक फीकी मुस्कान के साथ अपना सिर हिलाया। उन्होंने अपनी गोद में रखी साड़ी की तह को सही करते हुए कहा, "आजकल की पीढ़ी को समझौता शब्द से ही नफरत है। तुम लोगों को लगता है कि अपनी मर्जी चलाना ही जिंदगी है।"
नियति ने इस बार लैपटॉप बंद किया और घूमकर अपनी दादी को देखा, "दादी, ऐसा नहीं है। लेकिन आप लोग क्या समझोगे? हमारी पीढ़ी पर करियर, पर्सनल स्पेस और खुद को साबित करने का कितना दबाव है। हर कदम पर हमें अपनी खुशियों और मानसिक शांति से समझौता करना पड़ता है। आप लोगों के जमाने में क्या था? घर के बड़ों ने जहां कह दिया, वहां शादी कर ली। बस घर संभाला और जिंदगी कट गई। असली समझौते तो हम लोग कर रहे हैं, जहां हमें हर रोज अपनी पहचान के लिए लड़ना पड़ता है।"
नियति की बातें सुनकर पास ही किचन में चाय बना रही उसकी मां, अलका, बाहर आ गईं। अलका के हाथ में चाय की ट्रे थी। उन्होंने कप टेबल पर रखते हुए कहा, "नियति, तुम कह रही हो कि हमारी पीढ़ी ने समझौते नहीं किए? जरा मेरी तरफ देखो। जब मेरी शादी तुम्हारे पापा से हुई थी, तो मैं अपने शहर की टॉपर थी। मुझे बैंक में नौकरी मिल रही थी, लेकिन तुम्हारे दादाजी रूढ़िवादी थे। उन्होंने साफ कह दिया कि बहू नौकरी नहीं करेगी। मैंने अपनी पूरी पढ़ाई, अपने सारे सपने एक पल में अलमारी में बंद कर दिए। सालों तक इस घर की रसोई और तुम बच्चों की परवरिश में अपनी जिंदगी खपा दी। कभी अपनी मर्जी से एक साड़ी तक नहीं खरीदी, हमेशा परिवार की पसंद को आगे रखा। मुझे तो लगता है कि सबसे ज्यादा समझौते हमारी पीढ़ी की औरतों ने किए हैं, जिन्होंने अपने वजूद को ही भुला दिया।"
कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। अलका की आंखों में अपनी अधूरी ख्वाहिशों का दर्द साफ झलक रहा था। नियति को अपनी मां की बात सही लगी, क्योंकि उसने बचपन से अपनी मां को सिर्फ दूसरों के लिए जीते देखा था। उसने महसूस किया कि शायद उसकी मां की पीढ़ी ने वाकई सबसे बड़ा बलिदान दिया था।
तभी झूले पर बैठी गायत्री देवी अपनी जगह से उठीं। उनके घुटनों में दर्द था, इसलिए वे धीरे-धीरे चलकर नियति और अलका के पास आईं। उन्होंने अलका के कंधे पर हाथ रखा और बेहद शांत आवाज में बोलीं, "अलका, तुमने अपनी नौकरी छोड़ी, यह तुम्हारा समझौता था। नियति, तुम अपने करियर और परिवार के बीच संतुलन बनाने के लिए जूझ रही हो, यह तुम्हारा समझौता है। लेकिन क्या तुम दोनों को लगता है कि मेरी पीढ़ी ने कोई समझौता नहीं किया? जब मेरी शादी हुई थी, तब मैं सिर्फ सोलह साल की थी। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि शादी का मतलब क्या होता है। घूंघट के पीछे से मैंने कभी अपने पति का चेहरा ठीक से नहीं देखा था जब तक कि हमारे दो बच्चे नहीं हो गए।"
गायत्री देवी की आवाज में बरसों पुराना इतिहास जीवंत हो उठा। उन्होंने आगे कहा, "मेरे समय में तो अपनी बात कहना या अपनी तकलीफ बताना भी पाप समझा जाता था। संयुक्त परिवार था, चालीस लोगों का खाना अकेले बनाना पड़ता था। बीमार होने पर भी आराम करने की इजाजत नहीं थी। अगर पति कभी गुस्सा करते, तो चुपचाप सहना पड़ता था क्योंकि मायके के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके होते थे। हमने अपनी पूरी जिंदगी, अपनी पूरी जवानी दूसरों की सेवा में और खुद को अदृश्य रखकर गुजार दी। हमें तो यह जानने का हक भी नहीं था कि हमारे अपने सपने क्या हैं।"
गायत्री देवी की बातें सुनकर अलका और नियति दोनों निशब्द रह गईं। उन्हें अहसास हुआ कि हर पीढ़ी का अपना एक अलग संघर्ष था और अपने अलग समझौते थे।
गायत्री देवी ने नियति का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, "बेटा, सच तो यह है कि हर पीढ़ी को लगता है कि उसने सबसे ज्यादा समझौते किए हैं। मेरी पीढ़ी ने अपने वजूद और अधिकारों का समझौता किया। अलका की पीढ़ी ने अपने सपनों और पहचान का समझौता किया। और तुम्हारी पीढ़ी अपनी शांति, अपने रिश्तों और वक्त का समझौता कर रही है। समय बदल जाता है, समझौतों का रूप बदल जाता है, लेकिन त्याग हर किसी को करना पड़ता है। बस फर्क यह है कि हम अपने समझौतों को अपनी किस्मत मानकर चुप रह गए, अलका ने उन्हें अपना कर्तव्य समझा, और तुम उन समझौतों के खिलाफ खुलकर लड़ रही हो।"
नियति ने अपनी दादी की आंखों में देखा, जहां बरसों का तजुर्बा और गहरा सुकून था। उसे समझ आ गया था कि जिंदगी कभी भी किसी के लिए पूरी तरह मुकम्मल नहीं होती। हर दौर की अपनी चुनौतियां होती हैं। उसने लैपटॉप को एक तरफ रख दिया और अपनी मां और दादी को गले से लगा लिया। उस दोपहर, उस पुराने घर की दीवारें तीन पीढ़ियों के अलग-अलग संघर्षों की गवाह बनीं, जहां अब किसी के पास इस बात की शिकायत नहीं थी कि किसने ज्यादा खोया और किसने ज्यादा पाया।
**अधूरे धागे**
रात के बारह बज रहे थे। कमरे की मद्धम रोशनी में नेहा दीवार घड़ी की टिक-टिक सुन रही थी। हर सेकंड के साथ उसके दिल का बोझ और भारी होता जा रहा था। वह बिस्तर के एक कोने में सिमटी बैठी थी, जबकि उसका पति समीर दूसरी तरफ पीठ फेरकर सो रहा था। कहने को तो वे एक ही कमरे में थे, एक ही छत के नीचे रहते थे, लेकिन उनके बीच की दूरी किसी मीलों लंबे समंदर जैसी थी। शादी के पांच साल बीत चुके थे, पर नेहा को अब इस घर में किसी साए की तरह महसूस होता था।
समीर बुरा इंसान नहीं था। वह न तो चिल्लाता था, न ही गाली-गलौज करता था। उसका जुल्म अलग था—उसका जुल्म था उसकी खामोशी। एक ऐसी खामोशी जो नेहा को अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाट रही थी। शुरुआत में सब कुछ बहुत खूबसूरत था। दोनों के बीच बातें होती थीं, हंसी-मजाक होता था। लेकिन धीरे-धीरे समीर अपनी नौकरी और अपनी दुनिया में ऐसा मसरूफ हुआ कि उसने नेहा की तरफ देखना ही बंद कर दिया। नेहा दिनभर घर के कामों में लगी रहती, समीर के पसंदीदा पकवान बनाती, इस उम्मीद में कि शाम को जब वह आएगा, तो दोनों बैठकर थोड़ी बात करेंगे। लेकिन समीर आता, खाना खाता, फोन चलाता और सो जाता।
जब नेहा कभी उससे बात करने की कोशिश करती या अपनी उदासी जाहिर करती, तो समीर का एक ही रटा-रटाया जवाब होता, "तुम्हें हर वक्त शिकायत करने की आदत हो गई है। मैं दिनभर ऑफिस में खून-पसीना बहाता हूँ ताकि तुम्हें एक अच्छी जिंदगी दे सकूं। अब घर आकर मैं ये फालतू के ड्रामे नहीं झेल सकता।" नेहा का दिल टूट जाता। वह सोचती कि क्या एक अच्छी जिंदगी का मतलब सिर्फ महंगे कपड़े, अच्छा खाना और एक आलीशान मकान है? क्या उस रिश्ते में भावनाओं की, एक दूसरे के साथ की कोई जगह नहीं थी?
नेहा की सहेलियां अक्सर उससे कहती थीं, "कम से कम तुम्हारा पति तुम पर हाथ तो नहीं उठाता, न ही उसका कोई बाहर चक्कर है। आज के जमाने में ऐसा सीधा लड़का मिलना मुश्किल है। छोटी-मोटी बातें तो हर शादी में होती हैं।" इन बातों को सुनकर नेहा चुप हो जाती। वह किसी को कैसे समझाती कि कभी-कभी बिना मारे भी इंसान लहूलुहान हो जाता है। जिस्म पर चोट लगे तो जख्म दिखते हैं, लोग हमदर्दी जताते हैं। लेकिन जब रूह पर चोट लगती है, तो कोई देखने वाला नहीं होता। यह रिश्ता टूट नहीं रहा था, लेकिन यह नेहा को अंदर से थोड़ा-थोड़ा खत्म जरूर कर रहा था।
एक दिन नेहा की तबीयत बहुत खराब हो गई। उसे तेज माइग्रेन का दर्द था, जिसकी वजह से वह उठ भी नहीं पा रही थी। शाम को जब समीर घर आया, तो उसने रसोई खाली देखी। वह सीधा कमरे में गया और नेहा को चादर ओढ़े लेटे देखा। उसने बिना यह पूछे कि नेहा कैसी है, रूखेपन से कहा, "आज खाना नहीं बना क्या? मुझे बहुत भूख लगी है।" नेहा ने आंखें खोलीं, उसकी आंखों में आंसू थे। उसने धीमी आवाज में कहा, "समीर, मेरा सिर फटा जा रहा है। क्या तुम आज बाहर से कुछ मंगा लोगे?" समीर ने एक गहरी सांस ली, चेहरे पर साफ चिढ़ दिखाई दे रही थी। उसने कहा, "तुम्हारे ये सिरदर्द के बहाने कभी खत्म नहीं होते। ठीक है, मंगा लेता हूँ।" उसने दवा की एक गोली टेबल पर पटक दी और कमरे से बाहर चला गया।
उस रात जब समीर सो गया, तो नेहा उठकर बालकनी में आ गई। ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन उसके अंदर एक तूफान उठा हुआ था। उसने आसमान की तरफ देखा और खुद से पूछा कि वह इस रिश्ते में क्यों बनी हुई है? क्या सिर्फ इसलिए कि समाज इसे एक 'सफल शादी' कहे? उसने महसूस किया कि वह हर दिन अपने आत्मसम्मान का गला घोंट रही थी। वह एक ऐसे इंसान के प्यार और तवज्जो के लिए भीख मांग रही थी, जिसे उसकी मौजूदगी से कोई फर्क ही नहीं पड़ता था। इस रिश्ते के धागे इतने मजबूत थे कि टूट नहीं रहे थे, लेकिन इन्हीं धागों ने उसका दम घोंट दिया था।
अगली सुबह, नेहा ने एक बड़ा फैसला लिया। जब समीर सोकर उठा, तो उसने देखा कि चाय की जगह टेबल पर एक लिफाफा रखा था। समीर ने उसे खोला, उसमें नेहा की तरफ से लिखा एक खत था। खत में लिखा था—"समीर, मैं यह घर छोड़कर जा रही हूँ। हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं है, न ही मुझे तुमसे कोई नफरत है। लेकिन मैं एक ऐसे रिश्ते में रहकर खुद को रोज मरते हुए नहीं देख सकती, जहाँ मेरी खामोशी और मेरी तकलीफ की कोई कीमत नहीं है। हमारे रिश्ते का वजूद तो है, लेकिन उस वजूद में मैं कहीं खो गई हूँ। मैं अपनी खोई हुई पहचान को वापस ढूंढने जा रही हूँ।"
समीर ने खत पढ़ा और कमरे के चारों तरफ देखा। अलमारी खुली थी, नेहा के कपड़े गायब थे। घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था—वही सन्नाटा जो नेहा पिछले पांच सालों से अकेले झेल रही थी। आज पहली बार समीर को उस सन्नाटे की चुभन का अहसास हुआ। नेहा जा चुकी थी, अपने हिस्से की जिंदगी जीने के लिए, क्योंकि उसने समझ लिया था कि जो रिश्ता आपको अंदर से खत्म करने लगे, उससे दूरी बना लेना ही खुद को बचाने का इकलौता रास्ता होता है।
रश्मि चुपचाप गर्दन झुकाए रसोई में वापस आ गई। उसकी आँखों में आँसू तैर रहे थे, लेकिन उसने उन्हें गिरने नहीं दिया। उसने सिंक की तरफ मुंह किया और बर्तनों को साफ करने लगी, ताकि पानी की आवाज में उसकी सिसकियां छिप सकें। यह कोई पहली बार नहीं था। पिछले दो सालों से, जब से उसकी शादी इस घर में हुई थी, वह हर दिन इसी तरह की कड़वाहट पी रही थी।
रश्मि पढ़ी-लिखी थी, उसने शादी से पहले एक अच्छी कंपनी में नौकरी भी की थी। लेकिन शादी के बाद जब कमला देवी ने कहा कि "हमारे घर की बहुएं बाहर काम नहीं करतीं," तो उसने अपने पति आकाश की खुशी के लिए हंसते-हंसते नौकरी छोड़ दी। उसने सोचा था कि वह इस घर को अपनी मर्जी से संवारेगी, सबको प्यार देगी, तो बदले में उसे भी सम्मान मिलेगा। पर यहाँ सम्मान तो दूर, उसकी पहचान ही खोती जा रही थी।
शाम को जब आकाश दफ्तर से लौटा, तो रश्मि को उम्मीद थी कि शायद अब उसे थोड़ी राहत मिलेगी। आकाश स्वभाव का बुरा नहीं था, लेकिन वह अपनी मां के सामने कभी कुछ नहीं बोलता था।
डाइनिंग टेबल पर खाना परोसते हुए कमला देवी ने फिर से अपना राग अलापना शुरू कर दिया, "आकाश, जरा अपनी बीवी को समझाओ। आज विमला आई थी, उसके सामने कैसा मुंह बनाकर खड़ी थी। कोई सलीका ही नहीं है। और खाना देखो, दाल में आज फिर नमक कम है।"
आकाश ने दाल का एक चम्मच मुंह में डाला। नमक बिल्कुल ठीक था, बल्कि सब्जी भी बहुत स्वादिष्ट बनी थी। लेकिन मां का मूड देखकर उसने धीरे से कहा, "हाँ रश्मि, थोड़ा ध्यान रखा करो।"
रश्मि ने आकाश की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक गुहार थी, एक उम्मीद थी कि आकाश कहेगा—'नहीं मां, खाना तो बहुत अच्छा बना है।' लेकिन आकाश ने अपनी नजरें चुरा लीं और चुपचाप खाना खाने लगा। उस पल रश्मि को लगा कि वह इस भरे-पूरे घर में बिल्कुल अकेली है। उसकी अच्छाइयां, उसका समर्पण, उसका समझौता—सब कुछ इस घर के सन्नाटे में दफन हो चुका था!
दिन बीतते गए, और कमला देवी के ताने बढ़ते गए। एक दिन रश्मि की तबीयत बहुत खराब थी। उसे तेज बुखार था, शरीर टूट रहा था। वह सुबह थोड़ी देर से उठी। जब वह रसोई में पहुंची, तो कमला देवी वहां खड़ी बड़बड़ा रही थीं।
"बड़ा साहिबजादी का घराना है! सूरज सिर पर आ गया है और महारानी अब सोकर उठी हैं। हमें तो इस उम्र में भी आराम नसीब नहीं है।"
रश्मि ने कांपती आवाज में कहा, "मम्मी जी, मुझे बहुत तेज बुखार है। रात भर सो नहीं पाई।"
"बुखार का तो बहाना है! काम से जी चुराने के सौ रास्ते हैं तुम जैसी लड़कियों के पास," कमला देवी ने रूखेपन से कहा।
तभी आकाश भी वहां आ गया। रश्मि ने उम्मीद से उसकी तरफ देखा, "आकाश, प्लीज मुझे डॉक्टर के पास ले चलो। मुझसे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा।"
आकाश ने अपनी मां की तरफ देखा। कमला देवी तुरंत बोलीं, "अरे कुछ नहीं हुआ है इसे। जरा सा सिर दर्द होगा, पन्नालाल की दुकान से एक गोली लाकर दे दो, ठीक हो जाएगी। इसके लिए डॉक्टर के पास जाकर पैसे फूंकने की क्या जरूरत है?"
आकाश ने जेब से पैसे निकाले और टेबल पर रख दिए, "रश्मि, मैं ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूं। तुम खुद जाकर दवाई ले आना।" और वह चला गया।
रश्मि वहीं फर्श पर बैठ गई। आज उसके सब्र का बांध टूट गया था। उसने महसूस किया कि अगर वह आज नहीं संभली, तो यह घर और इसके लोग उसे मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ देंगे। अपनी अच्छाई को कमजोरी बनते देखना अब असहनीय हो चुका था।
रश्मि उठी, उसने अपनी आँखों के आँसू पोंछे। वह डॉक्टर के पास गई, दवा ली और लौटकर सीधे अपने कमरे में आ गई। उसने आराम किया और शाम को जब वह उठी, तो उसके चेहरे पर एक अलग ही दृढ़ता थी।
शाम को जब कमला देवी ने आवाज लगाई, "रश्मि! चाय लाओ।"
रश्मि कमरे से बाहर आई, लेकिन उसके हाथ में चाय की ट्रे नहीं थी। वह सीधे सोफे पर जाकर बैठ गई। कमला देवी उसे देखकर हैरान रह गईं, "यह क्या तरीका है? चाय कहाँ है?"
"मम्मी जी, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए चाय नहीं बनी। और अब से, इस घर के काम वैसे नहीं होंगे जैसे होते आए हैं," रश्मि ने बिल्कुल शांत लेकिन गंभीर आवाज में कहा।
"तेरी यह हिम्मत! तू मुझसे जुबान लड़ा रही है? आने दे आकाश को आज," कमला देवी गुस्से से चिल्लाईं।
"आने दीजिए उन्हें। मैं भी चाहती हूँ कि बात आज साफ हो जाए," रश्मि ने बिना डरे कहा।
रात को जब आकाश घर आया, तो घर का माहौल बदला हुआ था। रसोई बंद थी और डाइनिंग टेबल खाली थी। कमला देवी ने आते ही आकाश कान भरने शुरू कर दिए, "देखो आकाश! आज तुम्हारी बीवी के पर निकल आए हैं। दिनभर बिस्तर पर पड़ी रही और अब मुझसे जुबान लड़ा रही है।"
आकाश गुस्से में रश्मि के पास गया, "यह क्या तमाशा है रश्मि? मां से इस तरह बर्ताव क्यों कर रही हो?"
रश्मि उठी, उसने अलमारी से एक फाइल निकाली और आकाश के हाथ में दे दी। यह उसका पुराना रिज्यूमे और एक नई कंपनी का ऑफर लेटर था, जिस पर उसने आज ही ऑनलाइन बात की थी।
"यह क्या है?" आकाश ने पूछा।
"यह मेरा आत्मसम्मान है, आकाश," रश्मि ने आँखों में आँखें डालकर कहा। "पिछले दो सालों से मैंने इस घर को अपना सब कुछ दिया। अपनी नौकरी छोड़ी, अपनी खुशियां छोड़ीं। लेकिन मुझे बदले में क्या मिला? सिर्फ कमियां, ताने और बेइज्जती। मम्मी जी बाहर वालों के सामने मुझे कामचोर कहती हैं, और तुम सब जानते हुए भी चुप रहते हो।"
कमला देवी बीच में बोलीं, "तो क्या गलत कहती हूँ? बहुओं का काम ही यही होता है।"
"नहीं मम्मी जी," रश्मि ने पलटकर कहा। "बहुओं का काम घर संभालना हो सकता है, लेकिन अपनी इज्जत गंवाना नहीं। आकाश, मैं कल से वापस नौकरी जॉइन कर रही हूँ। अब से घर के कामों के लिए एक मेड आएगी, जिसका आधा खर्च मैं दूंगी और आधा तुम। और हाँ, अगर मेरी अच्छाइयां इस घर में किसी को नहीं दिखतीं, तो आज से मैं अपनी कमियों के साथ ही जिऊंगी। अब मैं किसी को खुद को नीचा दिखाने का हक नहीं दूंगी।"
आकाश चुप रह गया। उसे पहली बार अहसास हुआ कि उसने और उसकी मां ने मिलकर एक हंसती-खेलती लड़की को कितना प्रताड़ित किया था। उसने रश्मि की आँखों में वो फैसला देखा जिसे अब बदला नहीं जा सकता था।
कमला देवी कुछ बोलने वाली थीं, लेकिन आकाश ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया। उसने रश्मि की तरफ देखा और कहा, "मुझे माफ कर दो रश्मि। मैं तुम्हारी खामोशी को तुम्हारी सहमति समझ बैठा। तुम कल से ऑफिस जाओ, मैं तुम्हारे फैसले में तुम्हारे साथ हूँ।"
रश्मि के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई। खिड़की से रात की ठंडी हवा अंदर आ रही थी, लेकिन आज रश्मि का दिल अकेला नहीं था। उसने अपने हक के लिए लड़ना सीख लिया था।
Click here to claim your Sponsored Listing.