कन्हैया

कन्हैया

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HARE KRISHANA HARE RAMA HARE KRISHNA HARE RAMA ✬jαί sняεε ӄяίsниα..

18/10/2025
02/09/2025

थोड़ा सा
दिल
रख लिया करो…!
हम तुम्हें
दिल में
रखे बैठे हैं…!!🌹❤️

20/08/2025

खास होने का भ्रम ना पाले आपको पाकर लोग
आपसे बेहतर की तलाश में रहते हैं..!
जय श्री कृष्ण 🙏

22/12/2024

भगवान के डाकू

श्री द्वारकापुरी के समीप ही डाकोर नाम का एक गाँव है, वहा श्री रामदासजी नाम के भक्त रहते थे।

वे प्रति एकादशीको द्वारका जाकर श्री रणछोड़ जी के मंदिर में जागरण कीर्तन करते थे।

जब इनका शरीर वृद्ध हो गया, तब भगवन ने आज्ञा दी, की अब एकादशी की रात का जागरण घर पर ही कर लिया करो। पर इन्होने ठाकुरजी की यह बात नहीं मानी।

भक्तका दृढ़ नियम देखकर भाव में भरकर भगवन बोले... अब तुम्हारे यहाँ आने का कष्ट मुझसे सहन नहीं होता है, इसलिए अब मै ही तुम्हारे घर चलूँगा।

अगली एकादशी को गाड़ी ले आना और उसे मंदिर के पीछे खिड़की की ओर खड़ा कर देना। मैं खिड़की खोल दूंगा, तुम मुझे गोद में भरकर उठा ले जाना और गाड़ी में पधराकर शीघ्र ही चल देना।

भक्त रामदासजी ने वैसा ही किया.. जागरण करने के लिए गाड़ी पर चढ़कर आये।

सभी लोगो ने समझा की भक्त जी अब वृद्ध हो गए है। अतः गाड़ी पर चढ़कर आये है।

एकादशी की रात को जागरण हुआ, द्वादशी की आधी रात को वे खिड़की के मार्ग से मंदिर मे गए।

श्री ठाकुरजी के श्रीविग्रह पर से सभी आभूषण उतारकर वही मंदिर मे रख दिए। इनको तो भगवान से सच्चा प्रेम था, आभूषणों से क्या प्रयोजन?

श्री रणछोड जी को गाड़ी में पधराकर चल दिए।

प्रातः काल जब पुजारियों ने देखा तो मंदिर सूना उजड़ा पड़ा है। लोग समझ गए की श्री रामदासजी गाड़ी लाये थे, वही ले गए।

पुजारियोंने पीछा किया। उन्हें आते देखकर श्री रामदासजी ने कहा की अब कौन उपाय करना चाहिए?

भगवान ने कहा.. मुझे बावली में पधरा दो। भक्त ने ऐसा ही किया और सुखपूर्वक गाड़ी हांक दी।

पुजारियों ने रामदासजी को पकड़ा और खूब मार लगायी। इनके शरीर मे बहुत-से-घाव हो गए।

भक्तजी को मार-पीटकर पुजारी लोगों ने गाड़ी में तथा गाड़ी के चारो ओर भगवान को ढूँढने लगे, पर वे कही नहीं मिले।

तब सब पछताकर बोले की इस भक्तको हमने बेकार ही मारा।

इसी बीच उनमे से एक बोल उठा.. मैंने इस रामदास को इस ओर से आते देखा, इस ओर यह गया था। चलो वहां देखे।

सभी लोगो ने जाकर बावली में देखा तो भगवान मिल गए। उसका जल खून से लाल हो गया था।

भगवन ने कहा.. तुम लोगो ने जो मेरे भक्तको मारा है।

उस चोट को मैंने अपने शरीर पर लिया है, इसी से मेरे शरीर से खून बह रहा है, अब मै तुम लोगों के साथ कदापि नहीं जाऊंगा।

यह कहकर श्री ठाकुरजी ने उन्हें दूसरी मूर्ति एक स्थान मे थी, सो बता दी और कहा की उसे ले जाकर मंदिर मे पधराओ..

अपनी जीविका के लिए इस मूर्ति के बराबर सोना ले लो और वापस जाओ।

पुजारी लोभवश राजी हो गए और बोले.. तौल दीजिये।

रामदासजी के घर पर आकर भगवान ने कहा.. रामदास, तराजू बांधकर तौल दो।

रामदासजी की पत्नी के कान मे एक सोने की बाली थी, उसी में उन्होंने भगवान को तौल दिया और पुजारियों को दे दिया।

पुजारी अत्यंत लज्जित होकर अपने घर को चल दिए।

श्री रणछोडजी रामदासजी के घर में ही विराजे..

इस प्रसंग मे भक्ति का प्रकट प्रताप कहा गया है। भक्त के शरीर पर पड़ी चोट प्रभु ने अपने उपर ले लिया, तब उनका ‘आयुध-क्षत’ नाम हुआ।

भगवान् ने भक्त् से अपनी एकरूपता दिखाने के लिए ही चोट सही, अन्यथा उन्हें भला कौन मार सकता है?

भगवान को ही डाकू की तरह लूट लाने से उस गाँव का नाम डाकौर हुआ, भक्त रामदास के वंशज स्वयं को भगवान के डाकू कहलाने में अपना गौरव मानते है।

आज भी श्री रणछोड़ भगवान को पट्टी बाँधी जाती है। धन्य है भक्त श्री रामदासजी।

जय हो रणछोड़ भगवान की

14/12/2024

भगवान से अनन्य प्रेम एक ऐसी अमूल्य निधि है, जिसे पाकर संसार की अपार सम्पत्ति, उच्चाधिकार, विशाल वैभव और उच्च-कुल में जन्म–सब कुछ पीछे छूट जाता है, रह जाती है सिर्फ दीवानगी । प्रेमरस में छकी मीरा नाचती और गाती—

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई ।
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई ।।

मीरा की सखियां कहतीं–‘अरी बाबरी ! तू तो बेसुध होकर गा रही है । पर वह तेरा सांवरा कितना निष्ठुर है, जो कभी तेरे पास आता नहीं ।’

तब मीरा सखियों से कहती–‘मेरे गोपाल तो मेरे साथ ही नाचते हैं’—‘सखी री मेरे संग संग नाचे गोपाल ।’

जब भक्त भगवान के लिए व्याकुल हो जाता है, तब भगवान भी उससे मिलने के लिए वैसे ही व्याकुल हो उठते हैं । भक्त भगवान को बाध्य कर देता है । मीरा के निकट भगवान को बाध्य होकर आना पड़ा । मीरा को नृत्यावस्था में उन्मत्त देख भगवान रणछोड़राय जी ने अपनी हृदयेश्वरी को अपने हृदय में विराजमान कर लिया । मीरा सदेह उनके श्रीविग्रह में विलीन हो गई—

गिरधर के तन से मिल्यो, ललित चूनरी छोर ।
काहू कोनहिं लखि परयो मीरा गई किस ओर ।।

लोग ठगे से अवाक् रह गए । मीरा की चुनरी और भगवान के पीताम्बर का अमिट गठजोड़ हो गया । कौन किससे मिला, यह कहना कठिन है । भक्तों को ऐसे दिव्य मिलन की याद दिलाने के लिए मीरा की मतवाली चूनर का छोर लहराता रहा ।भगवान से एकाकार होने का एक और बहुत सुंदर उदाहरण देवी आण्डाल का है, जिंन्हें ‘दक्षिण भारत की मीरा’ कहा जाता है । भगवान में प्रेम की लगन जब लग जाती है, तब उसका माधुर्य इतना हृदयस्पर्शी होता है कि उसका अनुभव सिर्फ प्रेमी-भक्त ही कर सकता है । भगवान रंगनाथ के प्रेम में मतवाली होकर देवी आण्डाल ने मन्दिर में प्रवेश किया और भगवान की शेषशय्या पर चढ़ गयीं । चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया और लोगों के देखते-ही-देखते आण्डाल सबके सामने भगवान रंगनाथ में विलीन हो गयी । प्रेमी और प्रेमास्पद एक हो गए और आण्डाल अब ‘रंगनायकी’ बन गयी ।

जय हो भक्तवत्सल प्रभु की🙏🙏
जय जय श्रीराधे

26/08/2024

Janasthmi ki badhai

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