12/06/2026
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का संकट
भारत की विदेश नीति की सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित अवधारणा रही है–रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy)। यह विचार स्वतंत्र भारत की उस ऐतिहासिक आकांक्षा से जन्मा है जिसमें वह किसी भी महाशक्ति के अधीन हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखना चाहता है। नेहरूवादी गुटनिरपेक्षता से लेकर आज की बहुध्रुवीय दुनिया में सक्रिय भागीदारी तक, भारत ने बार-बार यह दावा किया है कि वह किसी भी शक्ति-गुट का उपग्रह नहीं बनेगा। किंतु 21वीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश करते हुए यह प्रश्न अत्यंत तीव्र हो गया है कि क्या भारत वास्तव में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने में सफल हो पा रहा है या वह धीरे-धीरे एक जटिल वैश्विक शक्ति-संरचना में सीमित विकल्पों के बीच फँसता जा रहा है।
रणनीतिक स्वायत्तता का ऐतिहासिक
आधार और उसका क्षरण
स्वतंत्रता के बाद भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि वह शीत युद्ध की द्विध्रुवीय दुनिया में किसी भी खेमे का हिस्सा नहीं बनेगा। यह नीति केवल कूटनीतिक संतुलन नहीं थी, बल्कि एक नैतिक-राजनीतिक घोषणा थी–उपनिवेशवाद के अनुभव से निकला हुआ आत्मनिर्णय का सिद्धांत।
किन्तु 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत की विदेश नीति और रणनीतिक प्राथमिकताएँ बदलने लगीं। वैश्वीकरण ने भारत को विश्व बाजारों, पूँजी और तकनीक पर अधिक निर्भर बना दिया। इसके साथ ही रणनीतिक स्वायत्तता का आधार धीरे-धीरे कमजोर होने लगा, क्योंकि आर्थिक निर्भरता हमेशा राजनीतिक विकल्पों को सीमित करती है।
अमेरिका-भारत संबंध
और रणनीतिक पुनर्संरेखण
आज भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) के संबंध गहरे रणनीतिक सहयोग में बदल चुके हैं। QUAD (Quadrilateral Security Dialogue) में भारत की सक्रियता, रक्षा समझौते जैसे LEMOA, COMCASA और BECA तथा इंडो-पैसिफिक रणनीति में भागीदारी यह संकेत देती है कि भारत अब अमेरिका की चीन-नीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक बन चुका है।
हालाँकि यह सहयोग भारत को तकनीक, रक्षा और निवेश के क्षेत्र में लाभ देता है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि भारत की नीति-स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न भी लगते हैं। चीन को नियंत्रित करने की अमेरिकी रणनीति में भारत की भूमिका बढ़ना एक अवसर भी है और एक सीमा भी। प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी स्वतंत्र चीन नीति बना रहा है या वह अमेरिकी रणनीतिक ढाँचे के भीतर कार्य कर रहा है?
चीन का उभार और
भारत की सुरक्षा दुविधा
चीन का तीव्र आर्थिक और सैन्य उभार भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के सामने सबसे बड़ा संरचनात्मक दबाव है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंधों में जो तनाव उत्पन्न हुआ, उसने भारत को रक्षा और कूटनीतिक स्तर पर अधिक सक्रिय और सतर्क बना दिया।
चीन न केवल सीमा विवाद का प्रश्न है, बल्कि वह एशिया में शक्ति-संतुलन का केंद्रीय तत्व है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI), पाकिस्तान के साथ उसकी गहरी साझेदारी, और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी उपस्थिति भारत के लिए एक दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
इस स्थिति में भारत की नीति अक्सर प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है, न कि पूर्णतः स्वायत्त और दीर्घकालिक रूप से नियोजित। रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ केवल किसी से न जुड़ना नहीं, बल्कि अपने हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेना है और यहीं भारत की सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है।
रूस के साथ पारंपरिक
संबंध और नई सीमाएँ
भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक रूप से रक्षा और रणनीतिक सहयोग पर आधारित रहे हैं। सोवियत संघ के समय से ही भारत को हथियारों और कूटनीतिक समर्थन में रूस की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आज भी भारत के रक्षा उपकरणों का एक बड़ा हिस्सा रूस से आता है। किन्तु यूक्रेन युद्ध के बाद रूस वैश्विक प्रतिबंधों और चीन पर बढ़ती निर्भरता के कारण एक सीमित शक्ति बनता जा रहा है। भारत के लिए यह स्थिति जटिल है–एक ओर उसे रूस से अपने रक्षा हितों को बनाए रखना है, दूसरी ओर पश्चिमी देशों के साथ संबंध भी संतुलित रखने हैं।
इस त्रिकोणीय दबाव ने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को और अधिक जटिल बना दिया है। यह स्पष्ट संकेत है कि रणनीतिक स्वायत्तता अब पहले जैसी सरल अवधारणा नहीं रही।
बहुध्रुवीयता का भ्रम
और वास्तविकता
भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि विश्व एक बहुध्रुवीय व्यवस्था (multipolar world order) की ओर बढ़ रहा है, जहाँ किसी एक महाशक्ति का वर्चस्व नहीं होगा। BRICS (Brazil, Russia, India, China, South Africa) और हाल के विस्तार ने इस विचार को और बल दिया है।
किन्तु वास्तविकता यह है कि वैश्विक आर्थिक और तकनीकी शक्ति अभी भी सीमित केंद्रों में ही संकेंद्रित है। अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी युद्ध, सेमीकंडक्टर नियंत्रण, एआई प्रतिस्पर्धा और मुद्रा व्यवस्था में प्रभुत्व की लड़ाई इस बात का प्रमाण है कि दुनिया अभी भी एक संक्रमणकालीन अवस्था में है, न कि पूर्ण बहुध्रुवीयता में।
भारत इस संक्रमणकाल में एक “स्विंग पावर” की भूमिका निभा रहा है, लेकिन स्विंग पावर होना और स्वायत्त शक्ति होना दो अलग बातें हैं।
आर्थिक निर्भरता और
रणनीतिक सीमाएँ
रणनीतिक स्वायत्तता केवल सैन्य या कूटनीतिक स्वतंत्रता नहीं होती, बल्कि उसका आधार आर्थिक आत्मनिर्भरता भी है। भारत आज वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, विदेशी निवेश और तकनीकी आयात पर अत्यधिक निर्भर है।
सेमीकंडक्टर, उच्च तकनीक, रक्षा उत्पादन और ऊर्जा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत अभी भी आयात पर आधारित है। यह निर्भरता उसकी विदेश नीति को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।
यदि कोई देश आर्थिक रूप से असंतुलित रूप से निर्भर हो, तो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता स्वाभाविक रूप से सीमित हो जाती है। यही कारण है कि भारत के नीति-निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती “मेक इन इंडिया” को वास्तविक तकनीकी संप्रभुता में बदलने की है, न कि केवल असेंबली आधारित उत्पादन तक सीमित रखने की।
हिंद-प्रशांत रणनीति और
सैन्यीकरण का खतरा
आज भारत का सबसे सक्रिय भू-रणनीतिक क्षेत्र हिंद-प्रशांत है। यहाँ भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर एक सुरक्षा संरचना का हिस्सा बन रहा है।
हालाँकि यह चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने का प्रयास है, लेकिन इससे क्षेत्रीय सैन्यीकरण की प्रक्रिया भी तेज हो रही है। रणनीतिक स्वायत्तता का संकट तब गहरा होता है जब किसी देश की सुरक्षा नीति धीरे-धीरे गठबंधन आधारित संरचना में बदलने लगती है।
भारत अभी औपचारिक सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है, लेकिन उसकी नीति-निर्माण प्रक्रिया में गठबंधन-तर्क की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। घरेलू राजनीति और विदेश नीति का अंतर्संबंध
रणनीतिक स्वायत्तता केवल बाहरी कारकों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि आंतरिक राजनीतिक संरचना भी इसे प्रभावित करती है। विदेश नीति यदि घरेलू राजनीतिक लोकप्रियता या वैचारिक ध्रुवीकरण का उपकरण बन जाए, तो उसकी दीर्घकालिक स्थिरता प्रभावित होती है।
आज भारत की विदेश नीति अधिक दृश्यमान मीडिया-उन्मुख और व्यक्तिकेंद्रित होती जा रही है। इससे कूटनीतिक लचीलापन प्रभावित हो सकता है।
विकल्पों की संकुचन प्रक्रिया
भारत के सामने आज सबसे बड़ी समस्या विकल्पों के संकुचन की है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा में “बीच का रास्ता” बनाए रखना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है।
यदि भारत अमेरिका की ओर अधिक झुकता है तो रूस और ईरान जैसे साझेदार कमजोर पड़ते हैं; यदि वह संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है तो पश्चिमी दबाव बढ़ता है। यह स्थिति रणनीतिक स्वायत्तता को एक “संतुलनकारी कला” बना देती है, न कि एक स्थिर नीति सिद्धांत।
स्वायत्तता का पुनर्परिभाषण आवश्यक
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता समाप्त नहीं हुई है, लेकिन वह एक गंभीर परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। आज इसकी परिभाषा बदल रही है–यह अब पूर्ण स्वतंत्रता की बजाय “सशर्त स्वतंत्रता” बनती जा रही है।
भारत को यह समझना होगा कि 21वीं सदी में स्वायत्तता का अर्थ अलग-थलग रहना नहीं, बल्कि बहुस्तरीय निर्भरताओं के बीच अधिकतम नीति-स्वतंत्रता हासिल करना है। इसके लिए आवश्यक है:
आर्थिक तकनीकी आत्मनिर्भरता का गहन विस्तार
रक्षा उत्पादन में वास्तविक स्वदेशीकरण
बहुपक्षीय कूटनीति का संतुलित उपयोग
और किसी भी एक शक्ति-गुट पर अत्यधिक निर्भरता से बचाव
अंततः, रणनीतिक स्वायत्तता कोई स्थिर स्थिति नहीं बल्कि एक सतत प्रक्रिया है–एक ऐसा गतिशील संतुलन जिसमें राष्ट्र अपने हितों को बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच पुनः परिभाषित करता रहता है।
भारत के लिए चुनौती यह नहीं है कि वह किसी गुट में है या नहीं, बल्कि यह है कि वह कितनी स्वतंत्रता से निर्णय ले पा रहा है। यही प्रश्न आने वाले समय में भारतीय विदेश नीति की असली परीक्षा होगी।
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