Janwadi Lekhak Sangh, West Bengal

Janwadi Lekhak Sangh, West Bengal

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जनवादी लेखक संघ (जलेस) पश्चिम बंगाल, भारत के हिंदी और उर्दू लेखकों का एक बडा संगठन है।

12/06/2026

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का संकट
भारत की विदेश नीति की सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित अवधारणा रही है–रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy)। यह विचार स्वतंत्र भारत की उस ऐतिहासिक आकांक्षा से जन्मा है जिसमें वह किसी भी महाशक्ति के अधीन हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखना चाहता है। नेहरूवादी गुटनिरपेक्षता से लेकर आज की बहुध्रुवीय दुनिया में सक्रिय भागीदारी तक, भारत ने बार-बार यह दावा किया है कि वह किसी भी शक्ति-गुट का उपग्रह नहीं बनेगा। किंतु 21वीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश करते हुए यह प्रश्न अत्यंत तीव्र हो गया है कि क्या भारत वास्तव में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने में सफल हो पा रहा है या वह धीरे-धीरे एक जटिल वैश्विक शक्ति-संरचना में सीमित विकल्पों के बीच फँसता जा रहा है।
रणनीतिक स्वायत्तता का ऐतिहासिक
आधार और उसका क्षरण
स्वतंत्रता के बाद भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि वह शीत युद्ध की द्विध्रुवीय दुनिया में किसी भी खेमे का हिस्सा नहीं बनेगा। यह नीति केवल कूटनीतिक संतुलन नहीं थी, बल्कि एक नैतिक-राजनीतिक घोषणा थी–उपनिवेशवाद के अनुभव से निकला हुआ आत्मनिर्णय का सिद्धांत।
किन्तु 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत की विदेश नीति और रणनीतिक प्राथमिकताएँ बदलने लगीं। वैश्वीकरण ने भारत को विश्व बाजारों, पूँजी और तकनीक पर अधिक निर्भर बना दिया। इसके साथ ही रणनीतिक स्वायत्तता का आधार धीरे-धीरे कमजोर होने लगा, क्योंकि आर्थिक निर्भरता हमेशा राजनीतिक विकल्पों को सीमित करती है।
अमेरिका-भारत संबंध
और रणनीतिक पुनर्संरेखण
आज भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) के संबंध गहरे रणनीतिक सहयोग में बदल चुके हैं। QUAD (Quadrilateral Security Dialogue) में भारत की सक्रियता, रक्षा समझौते जैसे LEMOA, COMCASA और BECA तथा इंडो-पैसिफिक रणनीति में भागीदारी यह संकेत देती है कि भारत अब अमेरिका की चीन-नीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक बन चुका है।
हालाँकि यह सहयोग भारत को तकनीक, रक्षा और निवेश के क्षेत्र में लाभ देता है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि भारत की नीति-स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न भी लगते हैं। चीन को नियंत्रित करने की अमेरिकी रणनीति में भारत की भूमिका बढ़ना एक अवसर भी है और एक सीमा भी। प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी स्वतंत्र चीन नीति बना रहा है या वह अमेरिकी रणनीतिक ढाँचे के भीतर कार्य कर रहा है?
चीन का उभार और
भारत की सुरक्षा दुविधा
चीन का तीव्र आर्थिक और सैन्य उभार भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के सामने सबसे बड़ा संरचनात्मक दबाव है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंधों में जो तनाव उत्पन्न हुआ, उसने भारत को रक्षा और कूटनीतिक स्तर पर अधिक सक्रिय और सतर्क बना दिया।
चीन न केवल सीमा विवाद का प्रश्न है, बल्कि वह एशिया में शक्ति-संतुलन का केंद्रीय तत्व है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI), पाकिस्तान के साथ उसकी गहरी साझेदारी, और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी उपस्थिति भारत के लिए एक दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
इस स्थिति में भारत की नीति अक्सर प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है, न कि पूर्णतः स्वायत्त और दीर्घकालिक रूप से नियोजित। रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ केवल किसी से न जुड़ना नहीं, बल्कि अपने हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेना है और यहीं भारत की सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है।
रूस के साथ पारंपरिक
संबंध और नई सीमाएँ
भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक रूप से रक्षा और रणनीतिक सहयोग पर आधारित रहे हैं। सोवियत संघ के समय से ही भारत को हथियारों और कूटनीतिक समर्थन में रूस की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आज भी भारत के रक्षा उपकरणों का एक बड़ा हिस्सा रूस से आता है। किन्तु यूक्रेन युद्ध के बाद रूस वैश्विक प्रतिबंधों और चीन पर बढ़ती निर्भरता के कारण एक सीमित शक्ति बनता जा रहा है। भारत के लिए यह स्थिति जटिल है–एक ओर उसे रूस से अपने रक्षा हितों को बनाए रखना है, दूसरी ओर पश्चिमी देशों के साथ संबंध भी संतुलित रखने हैं।
इस त्रिकोणीय दबाव ने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को और अधिक जटिल बना दिया है। यह स्पष्ट संकेत है कि रणनीतिक स्वायत्तता अब पहले जैसी सरल अवधारणा नहीं रही।
बहुध्रुवीयता का भ्रम
और वास्तविकता
भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि विश्व एक बहुध्रुवीय व्यवस्था (multipolar world order) की ओर बढ़ रहा है, जहाँ किसी एक महाशक्ति का वर्चस्व नहीं होगा। BRICS (Brazil, Russia, India, China, South Africa) और हाल के विस्तार ने इस विचार को और बल दिया है।
किन्तु वास्तविकता यह है कि वैश्विक आर्थिक और तकनीकी शक्ति अभी भी सीमित केंद्रों में ही संकेंद्रित है। अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी युद्ध, सेमीकंडक्टर नियंत्रण, एआई प्रतिस्पर्धा और मुद्रा व्यवस्था में प्रभुत्व की लड़ाई इस बात का प्रमाण है कि दुनिया अभी भी एक संक्रमणकालीन अवस्था में है, न कि पूर्ण बहुध्रुवीयता में।
भारत इस संक्रमणकाल में एक “स्विंग पावर” की भूमिका निभा रहा है, लेकिन स्विंग पावर होना और स्वायत्त शक्ति होना दो अलग बातें हैं।
आर्थिक निर्भरता और
रणनीतिक सीमाएँ
रणनीतिक स्वायत्तता केवल सैन्य या कूटनीतिक स्वतंत्रता नहीं होती, बल्कि उसका आधार आर्थिक आत्मनिर्भरता भी है। भारत आज वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, विदेशी निवेश और तकनीकी आयात पर अत्यधिक निर्भर है।
सेमीकंडक्टर, उच्च तकनीक, रक्षा उत्पादन और ऊर्जा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत अभी भी आयात पर आधारित है। यह निर्भरता उसकी विदेश नीति को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।
यदि कोई देश आर्थिक रूप से असंतुलित रूप से निर्भर हो, तो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता स्वाभाविक रूप से सीमित हो जाती है। यही कारण है कि भारत के नीति-निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती “मेक इन इंडिया” को वास्तविक तकनीकी संप्रभुता में बदलने की है, न कि केवल असेंबली आधारित उत्पादन तक सीमित रखने की।
हिंद-प्रशांत रणनीति और
सैन्यीकरण का खतरा
आज भारत का सबसे सक्रिय भू-रणनीतिक क्षेत्र हिंद-प्रशांत है। यहाँ भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर एक सुरक्षा संरचना का हिस्सा बन रहा है।
हालाँकि यह चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने का प्रयास है, लेकिन इससे क्षेत्रीय सैन्यीकरण की प्रक्रिया भी तेज हो रही है। रणनीतिक स्वायत्तता का संकट तब गहरा होता है जब किसी देश की सुरक्षा नीति धीरे-धीरे गठबंधन आधारित संरचना में बदलने लगती है।
भारत अभी औपचारिक सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है, लेकिन उसकी नीति-निर्माण प्रक्रिया में गठबंधन-तर्क की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। घरेलू राजनीति और विदेश नीति का अंतर्संबंध
रणनीतिक स्वायत्तता केवल बाहरी कारकों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि आंतरिक राजनीतिक संरचना भी इसे प्रभावित करती है। विदेश नीति यदि घरेलू राजनीतिक लोकप्रियता या वैचारिक ध्रुवीकरण का उपकरण बन जाए, तो उसकी दीर्घकालिक स्थिरता प्रभावित होती है।
आज भारत की विदेश नीति अधिक दृश्यमान मीडिया-उन्मुख और व्यक्तिकेंद्रित होती जा रही है। इससे कूटनीतिक लचीलापन प्रभावित हो सकता है।
विकल्पों की संकुचन प्रक्रिया
भारत के सामने आज सबसे बड़ी समस्या विकल्पों के संकुचन की है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा में “बीच का रास्ता” बनाए रखना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है।
यदि भारत अमेरिका की ओर अधिक झुकता है तो रूस और ईरान जैसे साझेदार कमजोर पड़ते हैं; यदि वह संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है तो पश्चिमी दबाव बढ़ता है। यह स्थिति रणनीतिक स्वायत्तता को एक “संतुलनकारी कला” बना देती है, न कि एक स्थिर नीति सिद्धांत।
स्वायत्तता का पुनर्परिभाषण आवश्यक
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता समाप्त नहीं हुई है, लेकिन वह एक गंभीर परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। आज इसकी परिभाषा बदल रही है–यह अब पूर्ण स्वतंत्रता की बजाय “सशर्त स्वतंत्रता” बनती जा रही है।
भारत को यह समझना होगा कि 21वीं सदी में स्वायत्तता का अर्थ अलग-थलग रहना नहीं, बल्कि बहुस्तरीय निर्भरताओं के बीच अधिकतम नीति-स्वतंत्रता हासिल करना है। इसके लिए आवश्यक है:
आर्थिक तकनीकी आत्मनिर्भरता का गहन विस्तार
रक्षा उत्पादन में वास्तविक स्वदेशीकरण
बहुपक्षीय कूटनीति का संतुलित उपयोग
और किसी भी एक शक्ति-गुट पर अत्यधिक निर्भरता से बचाव
अंततः, रणनीतिक स्वायत्तता कोई स्थिर स्थिति नहीं बल्कि एक सतत प्रक्रिया है–एक ऐसा गतिशील संतुलन जिसमें राष्ट्र अपने हितों को बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच पुनः परिभाषित करता रहता है।
भारत के लिए चुनौती यह नहीं है कि वह किसी गुट में है या नहीं, बल्कि यह है कि वह कितनी स्वतंत्रता से निर्णय ले पा रहा है। यही प्रश्न आने वाले समय में भारतीय विदेश नीति की असली परीक्षा होगी।

04/06/2026

पूंजीवादी विकास मॉडल और पर्यावरण विनाश

आधुनिक विश्व में विकास की प्रचलित अवधारणा मुख्यतः पूंजीवादी आर्थिक मॉडल पर आधारित है। इस मॉडल का मूल उद्देश्य उत्पादन, उपभोग और लाभ को निरंतर बढ़ाना है। औद्योगिक क्रांति के बाद से पूंजीवाद ने मानव समाज को अभूतपूर्व तकनीकी उन्नति, उत्पादन क्षमता और आर्थिक विस्तार प्रदान किया है। किंतु इस विकास मॉडल का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जो पर्यावरणीय संकट, प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और पारिस्थितिक असंतुलन के रूप में सामने आया है। आज जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता का ह्रास, वनों की कटाई, जल एवं वायु प्रदूषण जैसी समस्याएँ पूंजीवादी विकास मॉडल की सीमाओं और अंतर्विरोधों को उजागर कर रही हैं।
पूंजीवाद का मूल सिद्धांत अधिकतम लाभ अर्जित करना है। इस व्यवस्था में प्रकृति को एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र के रूप में नहीं, बल्कि उत्पादन के लिए उपलब्ध संसाधनों के भंडार के रूप में देखा जाता है। जंगल, नदियाँ, पर्वत, खनिज और जलस्रोत बाजार की आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन बन जाते हैं। परिणामस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और बड़े औद्योगिक समूह उत्पादन बढ़ाने के लिए पर्यावरणीय सीमाओं की अनदेखी करते हैं। विकास की यह प्रक्रिया प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के बजाय उसके शोषण पर आधारित है।
भूमंडलीकरण के दौर में पूंजीवादी विकास मॉडल और अधिक आक्रामक रूप में सामने आया है। विकासशील देशों में खनन, औद्योगिक परियोजनाओं, बांधों और शहरी विस्तार के नाम पर लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट किए गए हैं। आदिवासी समुदायों और स्थानीय निवासियों को उनके पारंपरिक आवासों से विस्थापित होना पड़ा है। आर्थिक विकास के लाभ सीमित वर्गों तक पहुँचते हैं, जबकि पर्यावरणीय क्षति का भार गरीब और वंचित समुदायों को उठाना पड़ता है। इस प्रकार पर्यावरणीय संकट केवल पारिस्थितिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और असमानता का भी प्रश्न है।
जलवायु परिवर्तन इसका सबसे गंभीर उदाहरण है। औद्योगिक उत्पादन, जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग और उपभोक्तावादी संस्कृति ने वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप वैश्विक तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और समुद्री स्तर में बढ़ोतरी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। विडंबना यह है कि इन संकटों के लिए मुख्य रूप से विकसित औद्योगिक राष्ट्र जिम्मेदार हैं, जबकि इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब देशों और कमजोर समुदायों पर पड़ रहा है।
पूंजीवादी व्यवस्था उपभोग को विकास का प्रमुख सूचक मानती है। विज्ञापन और बाजार व्यवस्था लोगों में निरंतर नई वस्तुओं की मांग पैदा करती है। इससे "उपभोक्तावाद" एक सांस्कृतिक मूल्य बन जाता है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन और उपभोग न केवल संसाधनों पर दबाव बढ़ाते हैं, बल्कि अपशिष्ट और प्रदूषण की मात्रा में भी वृद्धि करते हैं। प्लास्टिक प्रदूषण, ई-कचरा और औद्योगिक अपशिष्ट आज वैश्विक पर्यावरणीय संकट का रूप ले चुके हैं। इस संदर्भ में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या असीमित आर्थिक वृद्धि सीमित प्राकृतिक संसाधनों वाले ग्रह पर संभव है?
मार्क्सवादी चिंतक लंबे समय से पूंजीवाद और पर्यावरण के बीच के अंतर्विरोधों की ओर संकेत करते रहे हैं। कार्ल मार्क्स ने "मेटाबोलिक रिफ्ट" की अवधारणा के माध्यम से बताया था कि पूंजीवादी उत्पादन मनुष्य और प्रकृति के बीच के जैविक संबंध को तोड़ देता है। आधुनिक पर्यावरणविद भी मानते हैं कि वर्तमान संकट केवल तकनीकी या प्रशासनिक विफलता का परिणाम नहीं है, बल्कि विकास की उस अवधारणा का परिणाम है जो प्रकृति को बाजार के अधीन मानती है।
हालाँकि पूंजीवाद के समर्थक यह तर्क देते हैं कि हरित प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा और सतत विकास की अवधारणा के माध्यम से पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान संभव है। किंतु आलोचक मानते हैं कि जब तक विकास का लक्ष्य अनंत लाभ और निरंतर आर्थिक वृद्धि रहेगा, तब तक पर्यावरण संरक्षण के प्रयास सीमित प्रभाव ही डाल सकेंगे। "ग्रीन कैपिटलिज्म" कई बार केवल पर्यावरणीय संकट को बाजार के नए अवसर में बदलने का माध्यम बन जाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास की अवधारणा का पुनर्मूल्यांकन किया जाए। विकास का अर्थ केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि नहीं होना चाहिए, बल्कि मानव कल्याण, सामाजिक न्याय और पारिस्थितिक संतुलन को भी उसका अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। महात्मा गांधी का यह विचार आज भी प्रासंगिक है कि पृथ्वी प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा कर सकती है, किंतु किसी एक के लालच को नहीं। इसी प्रकार पर्यावरणीय लोकतंत्र, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण पर आधारित विकास मॉडल की आवश्यकता है।
यह कहा जा सकता है कि पूंजीवादी विकास मॉडल ने आर्थिक प्रगति को गति दी है, लेकिन इसके साथ ही पर्यावरणीय विनाश को भी अभूतपूर्व स्तर तक पहुँचाया है। वर्तमान जलवायु संकट और पारिस्थितिक असंतुलन इस बात का प्रमाण हैं कि विकास और पर्यावरण को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक रूप में देखने की आवश्यकता है। यदि मानवता को एक सुरक्षित और टिकाऊ भविष्य चाहिए, तो उसे लाभ-केंद्रित विकास की सीमाओं से आगे बढ़कर प्रकृति-सम्मत, न्यायपूर्ण और सतत विकास के वैकल्पिक मार्गों की तलाश करनी होगी। यही हमारे समय की सबसे बड़ी नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौती है।
उल्लेखनीय है कि इक्कीसवीं सदी का भारत एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक महत्त्वाकांक्षाओं के साथ-साथ पर्यावरणीय संकट भी अभूतपूर्व रूप से गहराता जा रहा है। एक ओर भारत कागज पर विश्व की सबसे तीव्र गति से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, वहीं दूसरी ओर वायु प्रदूषण, जल संकट, वनों की कटाई, जैव विविधता का क्षरण, जलवायु परिवर्तन और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी समस्याएँ नागरिक जीवन, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सतत विकास के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न कर रही हैं। पर्यावरण का प्रश्न अब केवल प्रकृति संरक्षण का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का भी प्रश्न बन चुका है।
भारत में पर्यावरणीय संकट का सबसे प्रत्यक्ष रूप वायु प्रदूषण के रूप में दिखाई देता है। विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित नगरों की सूची में अनेक भारतीय शहर नियमित रूप से शामिल होते रहे हैं। महानगरों से लेकर छोटे नगरों तक प्रदूषित हवा लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। अस्थमा, फेफड़ों के रोग, हृदय संबंधी समस्याएँ तथा समयपूर्व मृत्यु जैसी घटनाओं में वृद्धि का एक प्रमुख कारण वायु प्रदूषण है। औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों की बढ़ती संख्या, निर्माण गतिविधियाँ, कोयला आधारित ऊर्जा उत्पादन तथा कृषि अवशेषों का दहन इस संकट को और गंभीर बना रहे हैं। विडंबना यह है कि पर्यावरणीय नियमों और मानकों की उपस्थिति के बावजूद उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
जल संकट भारत के पर्यावरणीय संकट का दूसरा महत्त्वपूर्ण आयाम है। देश के अनेक भागों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। नदियाँ औद्योगिक कचरे, सीवेज और रासायनिक अपशिष्टों से प्रदूषित हो रही हैं। गंगा, यमुना, साबरमती, गोदावरी और अन्य प्रमुख नदियों के संरक्षण हेतु अनेक योजनाएँ संचालित की गई हैं, किन्तु अपेक्षित परिणाम अभी तक प्राप्त नहीं हो सके हैं। जल की उपलब्धता और गुणवत्ता दोनों ही प्रश्न गंभीर होते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के स्वरूप में आ रहे बदलाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। कहीं अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की समस्या है तो कहीं सूखा और जलाभाव। यह असंतुलन कृषि, उद्योग और घरेलू जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।
वनों की कटाई और जैव विविधता का क्षरण भी चिंता का विषय है। विकास परियोजनाओं, खनन गतिविधियों, सड़क निर्माण और शहरी विस्तार के नाम पर बड़ी मात्रा में वन क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं। वन केवल वृक्षों का समूह नहीं होते, बल्कि वे पारिस्थितिक संतुलन के आधार स्तंभ हैं। वे जलवायु नियंत्रण, जल संरक्षण, मृदा संरक्षण तथा जैव विविधता के संवर्धन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वनों के विनाश से अनेक वन्य प्रजातियाँ संकटग्रस्त हो रही हैं और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यह स्थिति इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
जलवायु परिवर्तन आज भारत सहित पूरे विश्व के लिए अस्तित्वगत चुनौती बन चुका है। तापमान में वृद्धि, अनियमित मानसून, समुद्र-स्तर में वृद्धि, हिमालयी हिमनदों का पिघलना तथा चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति इसके प्रत्यक्ष संकेत हैं। भारत की विशाल जनसंख्या, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था तथा लंबी समुद्री तटरेखा इसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है। किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों की उपलब्धता तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य पर इसके गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं। यद्यपि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जलवायु न्याय और समान उत्तरदायित्व की वकालत की है तथा नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति भी की है, फिर भी घरेलू स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने और हरित विकास मॉडल को अपनाने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना शेष है।
पर्यावरणीय संकट का एक महत्त्वपूर्ण पहलू ठोस अपशिष्ट और प्लास्टिक प्रदूषण भी है। शहरीकरण और उपभोक्तावाद के विस्तार के साथ कचरे की मात्रा निरंतर बढ़ रही है। नगर निकायों के पास अक्सर पर्याप्त संसाधनों और तकनीकी क्षमताओं का अभाव होता है, जिसके कारण कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं हो पाता। एकल-उपयोग प्लास्टिक ने समस्या को और जटिल बना दिया है। प्लास्टिक अपशिष्ट नदियों, झीलों और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। यद्यपि सरकार ने प्लास्टिक प्रतिबंध और स्वच्छता अभियानों की शुरुआत की है, लेकिन जनसहभागिता और प्रभावी निगरानी के अभाव में इन प्रयासों की सीमाएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं।
पर्यावरणीय प्रश्नों को केवल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इनका संबंध सामाजिक असमानता और पर्यावरणीय न्याय से भी है। प्रदूषण, जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं का सबसे अधिक प्रभाव गरीब, दलित, आदिवासी तथा हाशिए पर स्थित समुदायों पर पड़ता है। विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापन का दंश भी प्रायः इन्हीं समुदायों को झेलना पड़ता है। पर्यावरणीय नीति निर्माण में उनकी भागीदारी सीमित रहती है। परिणामस्वरूप पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के बीच एक कृत्रिम विभाजन उत्पन्न हो जाता है। वस्तुतः दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और किसी भी सतत विकास मॉडल में इनका समन्वय आवश्यक है।
भारत की पर्यावरणीय नीतियों और कानूनों का मूल्यांकन करने पर मिश्रित तस्वीर सामने आती है। देश में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम, जैव विविधता अधिनियम तथा विभिन्न नियामक संस्थाएँ मौजूद हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी अनेक मामलों में महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। इसके बावजूद पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता, निगरानी और उत्तरदायित्व के प्रश्न बार-बार उठते रहे हैं। कई बार आर्थिक विकास को प्राथमिकता देने के नाम पर पर्यावरणीय मानकों को शिथिल करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह दृष्टिकोण अल्पकालिक लाभ तो दे सकता है, किंतु दीर्घकाल में पर्यावरणीय और आर्थिक दोनों दृष्टियों से हानिकारक सिद्ध हो सकता है।
पर्यावरण शिक्षा और जनजागरुकता का अभाव भी एक गंभीर समस्या है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण अध्ययन को अक्सर औपचारिक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है, किंतु व्यवहारिक स्तर पर पर्यावरणीय चेतना विकसित करने के प्रयास सीमित हैं। जब तक नागरिक स्वयं जल संरक्षण, ऊर्जा बचत, वृक्षारोपण, कचरा पृथक्करण और टिकाऊ उपभोग की आदतें नहीं अपनाएँगे, तब तक केवल सरकारी नीतियों से अपेक्षित परिवर्तन संभव नहीं होगा। पर्यावरण संरक्षण को जनांदोलन का स्वरूप देना समय की आवश्यकता है।
यह भी स्वीकार करना होगा कि पर्यावरणीय संकट का समाधान विकास-विरोधी दृष्टिकोण में नहीं, बल्कि वैकल्पिक और सतत विकास मॉडल में निहित है। हरित ऊर्जा, सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार, सार्वजनिक परिवहन का सुदृढ़ीकरण, ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण, जैविक कृषि और परिपत्र अर्थव्यवस्था जैसे उपाय इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं के अंतर्गत नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यदि इन लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए तो पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पर्यावरण को नीति निर्माण के केंद्र में रखा जाए, न कि उसे विकास के मार्ग में बाधा के रूप में देखा जाए। पर्यावरणीय संकट केवल वैज्ञानिकों या नीति-निर्माताओं का विषय नहीं है; यह प्रत्येक नागरिक के जीवन और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। यदि वर्तमान पीढ़ी प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और पर्यावरणीय विनाश को रोकने में असफल रहती है, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
अंततः कहा जा सकता है कि भारत का पर्यावरणीय संकट केवल संसाधनों के प्रबंधन का संकट नहीं, बल्कि विकास की वर्तमान अवधारणा की सीमाओं का भी संकेत है। आर्थिक वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। यह संतुलन तभी संभव होगा जब सरकार, उद्योग, नागरिक समाज और आम नागरिक साझा उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ें। सतत विकास का मार्ग कठिन अवश्य है, किंतु यही वह मार्ग है जो भारत को एक समृद्ध, न्यायपूर्ण और पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित भविष्य की ओर ले जा सकता है। पर्यावरण का प्रश्न वस्तुतः मानव सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न है, और इस प्रश्न की उपेक्षा अब किसी भी रूप में संभव नहीं है।

01/06/2026

केंद्रीय कमेटी का वक्तव्य : भारतीय लोकतंत्र,
वर्ग-संघर्ष और प्रतिरोध की नई रूपरेखा
भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर में जब लोकतांत्रिक संस्थाएँ निरंतर संकटग्रस्त दिखाई दे रही हैं, तब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की केंद्रीय कमेटी द्वारा 25 मई 2026 को जारी विज्ञप्ति केवल एक राजनीतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि समकालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक परिस्थितियों का व्यापक आलोचनात्मक प्रतिवेदन प्रतीत होती है। नई दिल्ली स्थित सुरजीत भवन में आयोजित बैठक में प्रस्तुत यह वक्तव्य भारतीय लोकतंत्र के समक्ष उपस्थित खतरों, संघीय ढाँचे पर बढ़ते दबाव, श्रमिक-विरोधी नीतियों, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और नवउदारवादी आर्थिक संकटों का बहुआयामी विश्लेषण करता है।
यह विज्ञप्ति ऐसे समय में आई है जब भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद और कॉरपोरेट पूँजी का गठजोड़ लोकतांत्रिक विमर्श पर वर्चस्व स्थापित कर चुका है। इस संदर्भ में सीपीआई(एम) का यह वक्तव्य प्रतिरोध की वैकल्पिक राजनीति को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास भी है।
सबसे पहले, केंद्रीय कमेटी ने हालिया विधानसभा चुनावों की समीक्षा करते हुए यह स्वीकार किया कि पार्टी को कई राज्यों में राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। विशेषतः केरल, पश्चिम बंगाल और असम के संदर्भ में पार्टी ने आत्मालोचनात्मक दृष्टि अपनाई है। भारतीय वाम राजनीति में यह विशेषता रही है कि वह चुनावी पराजय को केवल बाहरी षड्यंत्र या तकनीकी कारणों तक सीमित नहीं करती, बल्कि वैचारिक, संगठनात्मक और जनाधार संबंधी कमजोरियों की भी समीक्षा करती है। यह लोकतांत्रिक आत्मालोचना वर्तमान भारतीय राजनीति में दुर्लभ होती जा रही है, जहाँ अधिकांश दल व्यक्तिपूजा और प्रचार-तंत्र पर निर्भर हैं।
पश्चिम बंगाल में भाजपा की विजय को केंद्रीय कमेटी ने केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि “हिंदुत्व सांप्रदायिक शक्तियों के सामाजिक सुदृढ़ीकरण” के रूप में देखा है। यह टिप्पणी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बंगाल लंबे समय तक धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील राजनीति का गढ़ माना जाता रहा है। भाजपा का उभार इस तथ्य को रेखांकित करता है कि सांप्रदायिक राजनीति अब केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने सांस्कृतिक विविधता वाले क्षेत्रों में भी अपनी वैचारिक जड़ें मजबूत कर ली हैं।
सीपीआई(एम) ने इस वक्तव्य में आर एस एस - भाजपा गठजोड़ को “हिंदुत्व-कॉरपोरेट आक्रमण” कहा है। यह शब्दावली भारतीय पूँजीवाद और सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के अंतर्संबंध को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। नवउदारवादी नीतियों के तहत राज्य की भूमिका कल्याणकारी से हटकर कॉरपोरेट हितों की संरक्षक बनती जा रही है, जबकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जनता का ध्यान आर्थिक संकटों से हटाने का औजार बनता है।
विज्ञप्ति का एक महत्त्वपूर्ण पहलू निर्वाचन आयोग और मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर व्यक्त की गई चिंता है। सीपीआई(एम) का आरोप है कि लाखों मतदाताओं को “तार्किक विसंगतियां” जैसे अस्पष्ट आधारों पर मताधिकार से वंचित किया गया। यह मुद्दा भारतीय लोकतंत्र के मूलाधार से जुड़ा हुआ है। मताधिकार केवल संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतंत्र की आत्मा है। यदि राज्य संस्थाएँ ही चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न उत्पन्न करें, तो लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है।
विशेष रूप से बिहार और बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को सरकारी कल्याण योजनाओं से जोड़ना अत्यंत चिंताजनक है। यह प्रवृत्ति नागरिकता को सशर्त बनाने की ओर संकेत करती है। लोकतांत्रिक राज्य में नागरिक अधिकार किसी राजनीतिक निष्ठा या प्रशासनिक प्रक्रिया पर निर्भर नहीं हो सकते। इस दृष्टि से सीपीआई(एम) की आलोचना केवल विपक्षी राजनीति नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का प्रश्न बन जाती है।
आर्थिक मोर्चे पर केंद्रीय कमेटी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की गहरी असमानताओं और संकटों को रेखांकित किया है। सरकार द्वारा प्रचारित “विकास” के दावों के विपरीत बेरोजगारी, महँगाई, कृषि संकट और एमएसएमई क्षेत्र की बदहाली को प्रमुख मुद्दा बनाया गया है। यह उल्लेखनीय है कि विज्ञप्ति में आर्थिक संकट को केवल सांख्यिकीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
भारत को “विश्व का सबसे असमान देश” बताने का तात्पर्य यह है कि आर्थिक विकास का लाभ सीमित कॉरपोरेट वर्ग तक केंद्रित हो गया है। नवउदारवादी मॉडल में उत्पादन की वृद्धि तो होती है, परंतु संपत्ति का वितरण अत्यंत असमान हो जाता है। परिणामस्वरूप मजदूरों की वास्तविक आय घटती है, ग्रामीण संकट गहराता है और सामाजिक असुरक्षा बढ़ती है।
ईंधन की कीमतों में लगातार वृद्धि और “मितव्ययिता संबंधी” का उल्लेख इस तथ्य को उजागर करता है कि युद्ध और वैश्विक संकटों का भार अंततः आम जनता पर डाला जा रहा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि केवल परिवहन लागत नहीं बढ़ाती, बल्कि खाद्यान्न, कृषि और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों को भी प्रभावित करती है। इस प्रकार महँगाई एक व्यापक वर्गीय संकट का रूप ले लेती है।
कृषि क्षेत्र पर टिप्पणी भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उर्वरकों की कमी और बढ़ती लागत भारतीय किसानों की समस्याओं को और गंभीर बना रही है। हरित क्रांति के बाद भारतीय कृषि पहले ही बाजार-निर्भर हो चुकी है; ऐसे में उर्वरकों की उपलब्धता में बाधा सीधे उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करती है। सीपीआई(एम) द्वारा किसानों और कृषि मजदूरों के संघर्षों के समर्थन की घोषणा वर्गीय राजनीति की निरंतरता को दर्शाती है।
ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को समाप्त कर वीबी-जी आर ए एम जी अधिनियम लागू करने के प्रस्ताव की आलोचना भी महत्त्वपूर्ण है। मनरेगा भारत के ग्रामीण गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा का आधार रही है। डिजिटल प्रणाली पर अत्यधिक निर्भरता ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं की उपेक्षा करती है, जहाँ इंटरनेट और तकनीकी ढाँचा अभी भी सीमित है। यह नवउदारवादी प्रशासनिक मॉडल का उदाहरण है, जिसमें तकनीक को जनहित से ऊपर रखा जाता है।
श्रमिक आंदोलनों पर केंद्रीय कमेटी का रुख स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष की राजनीति को पुनर्जीवित करता है। उत्तर प्रदेश में मजदूर आंदोलनों पर दमन, न्यूनतम मजदूरी के प्रश्न और श्रम संहिताओं के विरोध को पार्टी ने व्यापक राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बताया है। श्रम संहिताओं का मुद्दा केवल कानूनी संशोधन नहीं, बल्कि श्रमिक अधिकारों के ऐतिहासिक क्षरण का संकेत है। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में श्रम कानूनों का लचीला बनना अक्सर कॉरपोरेट मुनाफे को बढ़ाने का माध्यम बनता है।
सांप्रदायिक प्रश्न पर विज्ञप्ति विशेष रूप से गंभीर है। भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय की आलोचना करते हुए पार्टी ने पूजा स्थलों अधिनियम, 1991 की रक्षा की आवश्यकता पर बल दिया है। यह प्रश्न केवल एक धार्मिक स्थल का नहीं, बल्कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता के भविष्य का है। यदि ऐतिहासिक धार्मिक विवादों को लगातार पुनर्जीवित किया जाएगा, तो सामाजिक ध्रुवीकरण और हिंसा की संभावनाएँ बढ़ेंगी।
महिलाओं, दलितों और आदिवासियों पर बढ़ते अत्याचारों का उल्लेख भारतीय समाज में सामाजिक न्याय की विफलताओं को सामने लाता है। दिल्ली में चलती बस में सामूहिक बलात्कार की घटना का संदर्भ केवल अपराध का विवरण नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक और मनुवादी संरचनाओं की आलोचना है। केंद्रीय समिति ने यह संकेत दिया है कि सांप्रदायिक और जातिवादी राजनीति सामाजिक हिंसा को वैचारिक संरक्षण प्रदान करती है।
शिक्षा व्यवस्था पर टिप्पणी भी महत्त्वपूर्ण है। NEET परीक्षा-पत्र लीक और National Testing Agency की आलोचना यह दर्शाती है कि केंद्रीकरण और निजीकरण की नीतियाँ शिक्षा प्रणाली को अस्थिर बना रही हैं। परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर संकट युवा पीढ़ी के भविष्य से जुड़ा हुआ है। इसी प्रकार CBSE मूल्यांकन प्रक्रिया की डिजिटल अव्यवस्था शिक्षा के मानवीय पक्ष की उपेक्षा को उजागर करती है।
विज्ञप्ति का एक रोचक हिस्सा “कॉकरोज जनता पार्टी” और उसके निर्माता अभिजीत दीपके पर कार्रवाई की आलोचना है। यह डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यंग्य की राजनीति के महत्त्व को रेखांकित करता है। लोकतंत्र में व्यंग्य सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रभावी माध्यम रहा है। यदि राज्य व्यंग्य और असहमति को भी राष्ट्र-विरोधी करार देने लगे, तो यह अधिनायकवाद की ओर बढ़ने का संकेत है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में क्यूबा, ईरान, फिलिस्तीन और वेनेज़ुएला के समर्थन में चलाए जाने वाले “विरोधी साम्राज्यवादी अभियान” की घोषणा भारतीय वाम राजनीति की अंतरराष्ट्रीयतावादी परंपरा को पुनर्स्मरण कराती है। विशेषतः क्यूबा के संदर्भ में अमेरिकी हस्तक्षेप की आलोचना शीतयुद्धकालीन साम्राज्यवाद-विरोधी विमर्श की निरंतरता को दर्शाती है। हालाँकि आज की वैश्विक राजनीति में इन मुद्दों पर भारतीय जनता की सीमित रुचि भी वामपंथ के लिए चुनौती है।
महिला आरक्षण के कार्यान्वयन और मतदान के अधिकार की रक्षा के लिए व्यापक अभियान चलाने की घोषणा यह स्पष्ट करती है कि पार्टी संसदीय लोकतंत्र और जनांदोलनों को परस्पर पूरक मानती है। यह भारतीय वाम की उस परंपरा का हिस्सा है जिसमें लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा को वर्ग-संघर्ष से अलग नहीं माना जाता।
फिर भी, इस वक्तव्य की आलोचनात्मक समीक्षा आवश्यक है। यद्यपि सीपीआई(एम) ने भाजपा और कॉरपोरेट पूँजीवाद की आलोचना प्रभावशाली ढंग से की है, परंतु यह भी सत्य है कि स्वयं वामपंथी राजनीति जनाधार के संकट से गुजर रही है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में लंबे शासनकाल के बावजूद वामपंथ जनता के एक बड़े हिस्से से वैचारिक संवाद बनाए रखने में विफल रहा। केवल भाजपा की आलोचना पर्याप्त नहीं; वामपंथ को नई सामाजिक शक्तियों, युवाओं और डिजिटल पीढ़ी के साथ नए राजनीतिक विमर्श का निर्माण करना होगा।
इसके अतिरिक्त, इंडिया गठबंधन के संदर्भ में कांग्रेस की आलोचना करते हुए भी सीपीआई(एम) को यह स्पष्ट करना होगा कि धर्मनिरपेक्ष विपक्ष की एकता किस वैचारिक आधार पर संभव होगी। केवल चुनावी गठबंधन पर्याप्त नहीं; साझा आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रम की आवश्यकता है।
समग्रतः, केंद्रीय कमेटी की यह विज्ञप्ति भारतीय लोकतंत्र के समक्ष उपस्थित संकटों का गंभीर राजनीतिक दस्तावेज है। इसमें लोकतांत्रिक अधिकारों, श्रमिक संघर्षों, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और साम्राज्यवाद-विरोधी राजनीति का व्यापक परिप्रेक्ष्य उपस्थित किया गया है। यह वक्तव्य भारतीय राजनीति में वैकल्पिक विमर्श की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
आज जब लोकतांत्रिक संस्थाएँ कॉरपोरेट और सांप्रदायिक दबावों से जूझ रही हैं, तब ऐसे दस्तावेज केवल पार्टी घोषणाएँ नहीं रहते, बल्कि वे संविधान, नागरिकता और सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर राष्ट्रीय बहस का आधार बन जाते हैं। सीपीआई(एम) के सामने चुनौती यह है कि वह इन वैचारिक प्रतिरोधों को जनांदोलनों और सामाजिक हस्तक्षेपों में कितनी प्रभावशीलता से बदल पाती है। भारतीय लोकतंत्र का भविष्य इसी संघर्ष की दिशा पर बहुत हद तक निर्भर करेगा।

23/05/2026

देश की असुरक्षित संरचना
तूफान का इंतजार करना कहां तक उचित है, यह एक गंभीर सवाल है। मौसमीय आपदाओं ने राज्य की विफलताओं को उजागर करते हुए भारत की असुरक्षित संरचना को प्रकट किया है। भारत में प्राकृतिक आपदाएँ अब केवल प्रकृति की आकस्मिक घटनाएँ नहीं रह गई हैं; वे राज्य, समाज और विकास मॉडल की अंतर्विरोधी संरचनाओं का दर्पण बन चुकी हैं। उत्तर प्रदेश में मई 2026 के मध्य में आए विनाशकारी आंधी-तूफानों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि मौसमीय घटनाओं की वैज्ञानिक भविष्यवाणी संभव होने के बावजूद भारत का विशाल जनसमुदाय अब भी असुरक्षित और असहाय है। 111 लोगों की मृत्यु और दर्जनों लोगों के घायल होने की घटना केवल एक मौसमी दुर्घटना नहीं, बल्कि शासन, अवसंरचना, पर्यावरणीय नीति और सामाजिक असमानता की संयुक्त विफलता का परिणाम है। यह प्रश्न अत्यंत गंभीर है कि जब मौसम विभाग पहले से चेतावनी जारी कर चुका था, जब करोड़ों अलर्ट संदेश प्रसारित किए जा चुके थे, तब भी इतनी बड़ी जनहानि क्यों हुई? यह प्रश्न केवल प्रशासनिक अक्षमता का नहीं, बल्कि उस विकास-दृष्टि का भी है जिसमें मानव जीवन की सुरक्षा को लाभ और प्रदर्शन की राजनीति के नीचे रख दिया गया है।
उत्तर भारत में प्री-मानसून तूफान कोई नई घटना नहीं है। मई और जून के महीनों में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल के कई हिस्सों में गरज, बिजली, तेज हवाएँ और धूल भरी आंधियाँ नियमित रूप से आती रही हैं। किंतु पिछले कुछ वर्षों में इनकी तीव्रता, अनिश्चितता और विनाशकारी प्रभाव बढ़े हैं। इसके पीछे जलवायु परिवर्तन की निर्णायक भूमिका है। वैश्विक तापवृद्धि ने वातावरण की ऊर्जा संरचना को अस्थिर किया है। थार मरुस्थल की गर्म और शुष्क हवाएँ जब बंगाल की खाड़ी से आने वाली आर्द्र हवाओं से टकराती हैं, तब संवहनीय गतिविधियाँ तीव्र रूप धारण कर लेती हैं। पश्चिमी विक्षोभों की आवृत्ति और चरित्र में आए बदलाव भी इस अस्थिरता को बढ़ा रहे हैं। लेकिन प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ सामाजिक कारणों की उपेक्षा इस आपदा को और घातक बनाती है।
भारत में आपदा प्रबंधन की पूरी संरचना प्रायः ‘प्रतिक्रिया’ पर आधारित है, ‘रोकथाम’ पर नहीं। सरकारें मृत्यु के बाद मुआवजे की घोषणा तो शीघ्र करती हैं, किंतु उन संरचनात्मक कारणों को बदलने की गंभीर पहल नहीं करतीं जो जनहानि को जन्म देते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विभिन्न फसलों और क्षति के आधार पर राहत पैकेज की घोषणा इस बात का प्रमाण है कि प्रशासन को संभावित नुकसान का पूर्वानुमान था। यदि जोखिम ज्ञात था, तो फिर ऐसी व्यवस्थाएँ क्यों नहीं थीं जो मौतों को रोक सकतीं? यही वह बिंदु है जहाँ राज्य की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी प्रश्नों के घेरे में आती है।
वास्तव में, किसी भी प्राकृतिक आपदा को ‘आपदा’ बनाने में सामाजिक संरचनाओं की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है। गरीब, ग्रामीण और हाशिए के समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, क्योंकि उनके पास सुरक्षित आवास, मजबूत सार्वजनिक अवसंरचना और आपदा से निपटने के संसाधन नहीं होते। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग कच्चे या कमजोर घरों में रहते हैं। टीन, एस्बेस्टस या अस्थायी छतों वाले मकान तेज हवाओं और बिजली के सामने टिक नहीं पाते। अनेक मौतें पेड़ों के गिरने, बिजली के तार टूटने और अवैज्ञानिक ढंग से लगाए गए होर्डिंग्स के कारण हुईं। यह केवल मौसम की हिंसा नहीं थी; यह प्रशासनिक लापरवाही की भी हिंसा थी।
आज भारत में शहरीकरण और अवसंरचनात्मक विकास जिस ढंग से हो रहा है, वह प्रकृति के साथ संघर्ष को और तीखा बना रहा है। शहरों और कस्बों में अनियोजित निर्माण, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, जल निकासी तंत्र की दुर्दशा तथा सार्वजनिक सुरक्षा मानकों की अवहेलना ने प्राकृतिक घटनाओं को अधिक घातक बना दिया है। विकास के नाम पर विशाल विज्ञापन होर्डिंग्स, कमजोर बिजली ढाँचे और बिना मानक के निर्माण कार्य आम हो चुके हैं। जब तेज हवाएँ चलती हैं, तो यही संरचनाएँ मृत्यु के हथियार बन जाती हैं। विडंबना यह है कि जिन संस्थाओं पर नागरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वही संस्थाएँ अक्सर पूँजी और ठेकेदारी के दबाव में सुरक्षा मानकों की अनदेखी करती हैं।
इस घटना ने मौसमीय चेतावनी प्रणाली की सीमाओं को भी उजागर किया है। सरकार और प्रशासन ने करोड़ों अलर्ट संदेश भेजे, लेकिन क्या चेतावनी केवल संदेश भेज देने से प्रभावी हो जाती है? आपदा प्रबंधन का वास्तविक अर्थ केवल सूचना प्रसारण नहीं, बल्कि सामुदायिक तैयारी और व्यवहारिक निर्देशों का निर्माण है। यदि किसी ग्रामीण मजदूर, किसान या दिहाड़ी श्रमिक को यह न बताया जाए कि चेतावनी मिलने पर उसे कहाँ जाना है, किन स्थानों से बचना है और कौन-सी सार्वजनिक व्यवस्था उसके लिए उपलब्ध है, तो मोबाइल संदेश एक औपचारिकता भर रह जाता है। भारत में डिजिटल संचार की सफलता का अत्यधिक प्रचार किया जाता है, किंतु यह भूल जाता है कि तकनीक तभी प्रभावी होती है जब उसके साथ सामाजिक संरचना और संस्थागत तैयारी जुड़ी हो।
यह भी महत्त्वपूर्ण है कि मौसम संबंधी चेतावनियों की भाषा और पहुँच कैसी है। बड़ी संख्या में ग्रामीण नागरिक तकनीकी शब्दावली को समझ नहीं पाते। कई क्षेत्रों में इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क की सीमाएँ हैं। महिलाओं, बुजुर्गों और गरीब तबकों तक सूचना समान रूप से नहीं पहुँचती। अतः केवल ‘रेड अलर्ट’ और ‘ऑरेंज अलर्ट’ जारी करना पर्याप्त नहीं है। चेतावनी प्रणाली को स्थानीय भाषाओं, ग्राम पंचायतों, स्कूलों, सामुदायिक रेडियो और स्थानीय स्वयंसेवी तंत्र के माध्यम से जमीनी स्तर तक ले जाना होगा। आपदा-पूर्व अभ्यास, सुरक्षित आश्रय स्थल और स्थानीय प्रशिक्षण अनिवार्य होने चाहिए।
भारत की आपदा नीति में एक गहरी वर्गीय असमानता भी दिखाई देती है। जब महानगरों में बाढ़ या तूफान आता है, तो मीडिया और सरकारें उसे राष्ट्रीय संकट के रूप में प्रस्तुत करती हैं; किंतु ग्रामीण इलाकों में होने वाली मौतें अक्सर आंकड़ों तक सीमित रह जाती हैं। उत्तर प्रदेश के गरीब जिलों में हुई इस त्रासदी को भी उसी संवेदनहीनता के साथ देखा गया। मीडिया विमर्श का केंद्र जल्दी ही राजनीतिक बयानबाजियों और राहत घोषणाओं पर आ गया, जबकि यह प्रश्न पीछे छूट गया कि आखिर हर वर्ष गरीब ही क्यों मरते हैं? प्राकृतिक आपदाएँ वर्गीय चरित्र ग्रहण कर चुकी हैं। जिनके पास मजबूत घर, बीमा, निजी स्वास्थ्य सेवाएँ और सुरक्षित परिवहन हैं, वे अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते हैं; जबकि गरीब नागरिक प्रकृति और राज्य दोनों की मार झेलते हैं।
जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में यह संकट और गंभीर हो जाता है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि दक्षिण एशिया में चरम मौसमीय घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ेगी। अत्यधिक गर्मी, अनियमित मानसून, अचानक वर्षा, बिजली गिरने की घटनाएँ और चक्रवात अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की वास्तविकता हैं। लेकिन भारत की विकास नीतियाँ अब भी जीवाश्म ईंधन आधारित औद्योगिक विस्तार, जंगलों की कटाई और अनियंत्रित खनन पर निर्भर हैं। पर्यावरणीय विनाश और जलवायु संकट को केवल वैश्विक समस्या बताकर केंद्र और राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। उत्तर प्रदेश की घटना ने ग्रामीण आवास नीति की कमजोरियों को भी उजागर किया है। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बावजूद लाखों लोग अब भी असुरक्षित घरों में रहने को मजबूर हैं। अनेक गरीब परिवारों को अधूरे मकान, निम्न गुणवत्ता की सामग्री या भ्रष्टाचार से ग्रस्त निर्माण प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है। जलवायु-उपयुक्त और आपदा-रोधी आवास निर्माण को अभी तक नीति का केंद्रीय तत्व नहीं बनाया गया है। यदि सरकार वास्तव में जनसुरक्षा के प्रति गंभीर है, तो उसे ग्रामीण आवास को केवल कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि आपदा-निवारण रणनीति के रूप में देखना होगा।
इसके अतिरिक्त, स्थानीय निकायों और पंचायतों को पर्याप्त अधिकार और संसाधन नहीं दिए गए हैं। यदि ग्राम स्तर पर आपदा प्रबंधन समितियाँ सक्रिय हों, यदि स्कूलों और पंचायत भवनों को सुरक्षित आश्रय केंद्र बनाया जाए, यदि बिजली और निर्माण संबंधी मानकों का कठोर पालन हो, तो जनहानि को काफी हद तक कम किया जा सकता है। लेकिन नवउदारवादी शासन मॉडल में सार्वजनिक निवेश लगातार घटाया गया है। स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय प्रशासन की तरह आपदा प्रबंधन भी केंद्रीकृत घोषणाओं और निजीकरण की प्रवृत्ति से प्रभावित हुआ है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में मौसम विज्ञान और जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने पिछले वर्षों में पूर्वानुमान क्षमता में सुधार किया है। उपग्रह तकनीक, डॉप्लर रडार और डेटा मॉडलिंग ने मौसम की जानकारी को अधिक सटीक बनाया है। लेकिन विज्ञान तभी प्रभावी होता है जब शासन उसकी सामाजिक उपयोगिता सुनिश्चित करे। वैज्ञानिक चेतावनी और सामाजिक सुरक्षा के बीच जो खाई है, वही भारत की सबसे बड़ी कमजोरी है। यदि चेतावनी के बावजूद लोग मर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि समस्या विज्ञान में नहीं, शासन और सामाजिक संरचना में है।
इस त्रासदी ने यह भी दिखाया कि भारत में आपदाओं के प्रति सार्वजनिक चेतना अभी पर्याप्त विकसित नहीं हुई है। स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक संस्थानों में आपदा-शिक्षा को गंभीरता से शामिल नहीं किया गया। लोग अक्सर बिजली गिरने, खुले स्थानों में रहने या कमजोर ढाँचों के नीचे शरण लेने के जोखिमों से पूरी तरह अवगत नहीं होते। आपदा प्रबंधन को केवल सरकारी विभागों तक सीमित नहीं रखा जा सकता; इसे सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनाना होगा।
अंततः, उत्तर प्रदेश के तूफान हमें यह याद दिलाते हैं कि जलवायु संकट के युग में ‘सामान्य’ मौसम जैसी कोई चीज अब नहीं रही। आने वाले वर्षों में भारत को और अधिक चरम मौसमीय घटनाओं का सामना करना पड़ेगा। प्रश्न यह नहीं कि अगला तूफान कब आएगा; प्रश्न यह है कि क्या हमारा समाज और राज्य उससे निपटने के लिए तैयार हैं। यदि विकास का वर्तमान मॉडल जारी रहता है, यदि सार्वजनिक अवसंरचना और सामाजिक सुरक्षा की उपेक्षा होती रहती है, यदि गरीबों को असुरक्षित परिस्थितियों में जीने के लिए छोड़ दिया जाता है, तो हर वर्ष ऐसी त्रासदियाँ दोहराई जाएँगी।
आज आवश्यकता केवल राहत पैकेजों या सांत्वना संदेशों की नहीं, बल्कि व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन की है। जलवायु-न्याय आधारित विकास नीति, आपदा-रोधी सार्वजनिक अवसंरचना, वैज्ञानिक चेतावनी प्रणाली का लोकतांत्रिक विस्तार, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पर्यावरणीय संतुलन की रक्षा–ये सब अब विकल्प नहीं, अनिवार्य शर्तें हैं। अन्यथा भारत का विशाल गरीब जनसमुदाय हर मौसम में एक नए तूफान का इंतजार करता रहेगा, और राज्य हर बार मृत्यु के बाद मुआवजे की घोषणा करके अपनी जिम्मेदारी से बचता रहेगा।

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