Janwadi Lekhak Sangh, West Bengal

Janwadi Lekhak Sangh, West Bengal जनवादी लेखक संघ (जलेस) पश्चिम बंगाल, भारत के हिंदी और उर्दू लेखकों का एक बडा संगठन है।

मैक्रो अर्थशास्त्र का अंध-बिंदु और मुख्यधारा मीडिया की चुप्पीआर्थिक विकास के चमकदार आंकड़ों के पीछे छिपता युवा संकट अब स...
14/08/2026

मैक्रो अर्थशास्त्र का अंध-बिंदु
और मुख्यधारा मीडिया की चुप्पी
आर्थिक विकास के चमकदार आंकड़ों के पीछे छिपता युवा संकट अब स्पष्ट हो चुका है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सड़क पर उतरता हुआ युवा केवल राजनीतिक असंतोष का संकेत नहीं होता। वह अर्थव्यवस्था की उस परत को भी सामने लाता है, जिसे सरकारी आंकड़ों, कॉर्पोरेट प्रस्तुतियों और मुख्यधारा मीडिया की बहसों में अक्सर पर्याप्त जगह नहीं मिलती। जब बड़ी संख्या में शिक्षित युवा रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में देरी, बेरोजगारी और भविष्य की अनिश्चितता के सवालों पर आंदोलन करते हैं, तो इसे केवल प्रशासनिक अव्यवस्था या राजनीतिक लामबंदी के रूप में देखना समस्या की जड़ से बचना है।
आज भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में सार्वजनिक विमर्श में एक विचित्र विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP की ऊँची विकास दर, शेयर बाजार की नई ऊँचाइयाँ, बड़े कॉर्पोरेट निवेश, लग्जरी कारों की बिक्री, प्रीमियम आवासीय परियोजनाओं की मांग और अंतरराष्ट्रीय यात्राओं में वृद्धि जैसे संकेतकों को आर्थिक समृद्धि के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। दूसरी ओर लाखों शिक्षित युवा सरकारी नौकरी की कुछ हजार या कुछ लाख सीटों के लिए वर्षों तक तैयारी करते रहते हैं। भर्ती परीक्षाओं में अनियमितता या पेपर लीक की खबरें उनके लिए केवल परीक्षा-प्रणाली की समस्या नहीं, बल्कि जीवन के कई वर्षों के टूट जाने का संकट बन जाती हैं। यही वह बिंदु है जहाँ मैक्रो-अर्थशास्त्र और सामाजिक वास्तविकता के बीच की दूरी स्पष्ट होती है।
विकास के आंकड़े बनाम विकास का अनुभव
GDP आर्थिक गतिविधियों का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है, लेकिन GDP स्वयं यह नहीं बताता कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के किन वर्गों तक पहुँचा। यदि अर्थव्यवस्था 6 या 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, तो यह निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन इस वृद्धि का वितरण कैसा है? इससे कितने नए और गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा हुए? वास्तविक मजदूरी कितनी बढ़ी? युवा स्नातकों की आय और रोजगार की संभावनाएँ कितनी बेहतर हुईं? छोटे व्यवसायों और निम्न-मध्यवर्ग की क्रय-शक्ति में कितना सुधार हुआ? इन सवालों के उत्तर के बिना केवल GDP के आधार पर आर्थिक स्वास्थ्य का निष्कर्ष निकालना अधूरा होगा।
अर्थव्यवस्था के शीर्ष हिस्से में तेज वृद्धि और समाज के बड़े हिस्से में आर्थिक असुरक्षा एक साथ मौजूद हो सकती है। यही आज के आर्थिक विमर्श की सबसे बड़ी चुनौती है।
शहरों के चुनिंदा इलाकों में महँगी कारों की बिक्री बढ़ सकती है, लक्जरी आवास की मांग मजबूत हो सकती है और शेयर बाजार में पूँजीकरण नए रिकॉर्ड बना सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक परिवार की आय और आर्थिक सुरक्षा उसी अनुपात में बढ़ी है। संभव है कि अर्थव्यवस्था का ऊपरी हिस्सा तेज गति से आगे बढ़ रहा हो, जबकि निचले और मध्य हिस्से अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ रहे हों या स्थिरता तथा असुरक्षा से जूझ रहे हों। इसीलिए आज के भारत की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए केवल औसत विकास दर पर्याप्त नहीं है। हमें वितरण, रोजगार, मजदूरी, उपभोग और आर्थिक सुरक्षा के प्रश्नों को भी उसी गंभीरता से देखना होगा।
K-आकार की अर्थव्यवस्था का प्रश्न
आर्थिक विश्लेषण में "K-shaped recovery" या K-आकार की पुनर्बहाली की अवधारणा इस विरोधाभास को समझने में मदद करती है। इसमें अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्से तेजी से ऊपर जाते हैं, जबकि दूसरे हिस्से नीचे या स्थिर दिशा में बने रहते हैं।
भारत के संदर्भ में यह बहस विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। उच्च आय वाले परिवारों की खपत, वित्तीय परिसंपत्तियों में निवेश, प्रीमियम उत्पादों की मांग और उच्चस्तरीय सेवाओं का विस्तार आर्थिक गतिविधि की तस्वीर को काफी सकारात्मक बना सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर निम्न और निम्न-मध्य आय वाले परिवारों के लिए भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, परिवहन और बच्चों की पढ़ाई का खर्च लगातार बड़ी चिंता हो सकता है।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठता है–क्या बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की उपलब्धता को ही व्यापक आर्थिक समृद्धि का प्रमाण मान लिया जाए?
यदि एक शहर में करोड़ों रुपये के फ्लैट बिक रहे हैं, तो उससे यह सिद्ध नहीं होता कि औसत युवा के लिए घर खरीदना आसान हो गया है। यदि लग्जरी कारों की बिक्री बढ़ रही है, तो इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि औसत परिवार की परिवहन-संबंधी आर्थिक क्षमता भी उसी अनुपात में बढ़ी है। यदि शेयर बाजार में पूँजीकरण बढ़ रहा है, तो इसका लाभ उन लोगों को अधिक मिलेगा जिनके पास पहले से पर्याप्त वित्तीय संपत्ति है।
आज जब युवा भर्ती परीक्षाओं, रोजगार और पेपर लीक के खिलाफ सड़क पर उतरता है, तो मीडिया की एक बड़ी प्रवृत्ति इसे "कानून-व्यवस्था" की समस्या में सीमित कर देती है। कितने पुलिसकर्मी तैनात हुए, कितने प्रदर्शनकारी हिरासत में लिए गए, किस राजनीतिक दल ने प्रदर्शन का समर्थन किया, किस नेता ने क्या बयान दिया–ये सभी खबरें महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन ये मूल प्रश्न का उत्तर नहीं देतीं। मूल प्रश्न है–सरकारी नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा इतनी असाधारण रूप से तीखी क्यों हो गई है?
यदि किसी भर्ती परीक्षा में कुछ हजार पदों के लिए लाखों उम्मीदवार आवेदन कर रहे हैं, तो केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि परीक्षा व्यवस्था में सुधार किया जाए। परीक्षा व्यवस्था में सुधार निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन उसके पीछे छिपे आर्थिक संकट को समझना उससे भी अधिक आवश्यक है।
सरकारी नौकरी का आकर्षण केवल नौकरी की स्थिरता तक सीमित नहीं है। भारत के अनेक परिवारों के लिए यह सामाजिक सम्मान, नियमित आय, भविष्य की सुरक्षा, पेंशन या सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी उम्मीद, परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार और विवाह तथा सामाजिक प्रतिष्ठा जैसे अनेक पहलुओं से जुड़ा हुआ है।
जब निजी क्षेत्र में शिक्षित युवाओं को अस्थायी, कम वेतन वाली, अनुबंध आधारित या असुरक्षित नौकरियाँ मिलती हैं, तब सरकारी नौकरी का महत्त्व कई गुना बढ़ जाता है।
इसलिए भर्ती परीक्षा केवल परीक्षा नहीं रह जाती। वह लाखों परिवारों के लिए सामाजिक गतिशीलता का सबसे महत्त्वपूर्ण दरवाजा बन जाती है।
निजी क्षेत्र की रोजगार-सृजन क्षमता पर सवाल
युवा संकट की जड़ में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न निजी क्षेत्र के रोजगार की गुणवत्ता और मात्रा का भी है। आर्थिक विकास का एक बड़ा उद्देश्य उत्पादक और सम्मानजनक रोजगार पैदा करना होना चाहिए। यदि उत्पादन बढ़ता है लेकिन रोजगार का विस्तार उसी अनुपात में नहीं होता, तो विकास का सामाजिक प्रभाव सीमित हो सकता है।
विशेष चिंता शिक्षित युवाओं के संदर्भ में है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से हर वर्ष बड़ी संख्या में स्नातक निकलते हैं। इनमें से अनेक युवा तकनीकी, प्रबंधन, सामाजिक विज्ञान, मानविकी और अन्य विषयों में शिक्षा प्राप्त करते हैं। लेकिन डिग्री और रोजगार के बीच की दूरी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।
अक्सर युवाओं से कहा जाता है कि वे अधिक कौशल सीखें, डिजिटल दक्षता हासिल करें, अंग्रेजी सुधारें, AI सीखें, उद्यमी बनें और बाजार की जरूरत के अनुरूप स्वयं को बदलें। यह सलाह कुछ परिस्थितियों में उपयोगी हो सकती है, लेकिन इससे एक बड़ा संरचनात्मक सवाल अनुत्तरित रह जाता है–यदि सभी युवा अधिक कौशल हासिल कर लें, तो क्या अर्थव्यवस्था उनके लिए पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करेगी? रोजगार केवल व्यक्ति की योग्यता का प्रश्न नहीं है। वह अर्थव्यवस्था की संरचना का भी प्रश्न है।
AI और रोजगार का नया विरोधाभास
तकनीकी परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI आज आर्थिक विकास की नई कहानी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। AI उत्पादकता बढ़ा सकता है, लागत कम कर सकता है, प्रक्रियाओं को तेज कर सकता है और कंपनियों को अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि तकनीकी प्रगति के अनेक सकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं।
जब किसी कंपनी का परिचालन खर्च कम होता है और मुनाफा बढ़ता है, तो निवेशक इसे सफलता के रूप में देखते हैं। लेकिन यदि लागत में कमी का एक हिस्सा नए कर्मचारियों की भर्ती रोकने, प्रवेश-स्तर के पदों को कम करने या कर्मचारियों की संख्या घटाने से आता है, तो उस सामाजिक लागत का हिसाब कौन रखेगा?
विशेष रूप से फ्रेश ग्रेजुएट्स के लिए यह चिंता महत्त्वपूर्ण है। रोजगार बाजार में प्रवेश करने का पहला अवसर ही यदि सीमित हो जाए, तो युवा केवल वर्तमान नौकरी नहीं खोता; वह अनुभव प्राप्त करने का अवसर भी खो देता है।
AI और ऑटोमेशन के दौर में इसलिए यह बहस केवल "तकनीक रोजगार छीनेगी या नहीं" तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हमें पूछना होगा कि तकनीकी उत्पादकता से पैदा होने वाले लाभ का वितरण कैसे होगा।
यदि तकनीक से उत्पादकता बढ़ती है, तो क्या उसका लाभ केवल शेयरधारकों और शीर्ष प्रबंधन तक सीमित रहेगा? या उससे काम के घंटे कम होंगे, मजदूरी बढ़ेगी, नए रोजगार पैदा होंगे और सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी?
तकनीक स्वयं समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब तकनीकी प्रगति का लाभ निजी मुनाफे में बदल जाता है, जबकि उसके संक्रमण की सामाजिक लागत समाज और श्रमिकों पर डाल दी जाती है।
मुख्यधारा मीडिया का विश्लेषणात्मक संकट
मुख्यधारा मीडिया की भूमिका यहाँ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। मीडिया लोकतंत्र में केवल घटनाओं की सूचना देने वाला माध्यम नहीं है; वह यह भी तय करता है कि समाज किन सवालों पर गंभीरता से चर्चा करेगा।
यदि युवा सड़क पर उतरता है और मीडिया केवल यह बताता है कि "कितने लोग गिरफ्तार हुए", "कहाँ पुलिस तैनात हुई", "किस नेता ने प्रदर्शन का समर्थन किया", तो खबर घटना तक सीमित रह जाती है। लेकिन पत्रकारिता का अधिक महत्त्वपूर्ण काम घटना के पीछे की संरचना को समझना है।
युवा बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं की असाधारण प्रतिस्पर्धा, निजी क्षेत्र में शुरुआती वेतन, रोजगार की असुरक्षा, शिक्षा की लागत और परिवारों पर बढ़ते आर्थिक दबाव–इन विषयों को एक साथ रखकर देखना जरूरी है।
लेकिन टेलीविजन की बहसों में अक्सर आर्थिक संरचना की जटिलता के बजाय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अधिक आसानी से बिकते हैं। इससे जनता को यह समझने में कठिनाई होती है कि सामाजिक असंतोष का वास्तविक स्रोत क्या है। यहाँ मीडिया की एक और समस्या है–आर्थिक सफलता की दृश्यात्मकता।
एक नया एक्सप्रेसवे, ऊँची इमारतें, चमकते मॉल, लक्जरी कारें और शेयर बाजार के रिकॉर्ड कैमरे के लिए बहुत आकर्षक दृश्य हैं। लेकिन बेरोजगार स्नातक, परीक्षा की तैयारी करते युवाओं का कमरा, वर्षों से कोचिंग कर रहा विद्यार्थी, कम वेतन पर काम करता कर्मचारी और छोटे शहर में रोजगार की तलाश करता युवा उतने आकर्षक दृश्य नहीं बनते। परंतु लोकतांत्रिक पत्रकारिता का मूल्य दृश्यात्मक चमक से तय नहीं होना चाहिए।
सरकारी नौकरी का मिथक नहीं, आर्थिक सुरक्षा का संकट
यह कहना भी गलत होगा कि सभी युवा केवल सरकारी नौकरी चाहते हैं या उनमें उद्यमिता की इच्छा नहीं है। वास्तव में भारत का युवा विविध आकांक्षाओं से भरा हुआ है। लेकिन सरकारी नौकरी की ओर बढ़ती भीड़ को केवल "सरकारी नौकरी का मोह" कहकर खारिज करना सामाजिक वास्तविकता को नकारना होगा।
एक सुरक्षित नौकरी की मांग अपने आप में अस्वाभाविक नहीं है। जब निजी क्षेत्र में नौकरी की स्थिरता कम हो, वेतन और महँगाई का अंतर बढ़े, सामाजिक सुरक्षा कमजोर हो और नौकरी खोने का जोखिम अधिक हो, तब सरकारी रोजगार की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी।

मुजफ्फर अहमद : भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के वैचारिक आधार-स्तंभभारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व ...
06/08/2026

मुजफ्फर अहमद : भारतीय कम्युनिस्ट
आंदोलन के वैचारिक आधार-स्तंभ

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनका योगदान राजनीतिक घटनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने देश की वैचारिक दिशा को भी गहराई से प्रभावित किया। मुजफ्फर अहमद उन्हीं विरल व्यक्तित्वों में अग्रगण्य हैं। उन्हें केवल भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के संस्थापक नेताओं में गिनना पर्याप्त नहीं है; वे उस वैचारिक परंपरा के निर्माताओं में थे जिसने भारत में वर्ग-संघर्ष, सामाजिक न्याय, श्रमिक अधिकार और सांप्रदायिक सौहार्द को एक साझा राजनीतिक परियोजना के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।
आज, जब राजनीति में विचारधाराओं की जगह तात्कालिक लाभ, व्यक्तिपूजा और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण प्रमुख होते जा रहे हैं, तब मुजफ्फर अहमद की जयंती केवल एक स्मृति-दिवस नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र के वैचारिक विवेक की पुनर्समीक्षा का अवसर है। उनका जीवन इस तथ्य का प्रमाण है कि राजनीतिक संघर्ष केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के वंचित वर्गों को इतिहास का सक्रिय भागीदार बनाने की प्रक्रिया भी है।
मुजफ्फर अहमद ने बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में भारतीय समाज की आर्थिक और सामाजिक विषमताओं का गंभीर अध्ययन किया। उन्होंने मार्क्सवादी चिंतन को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप समझने और विकसित करने का प्रयास किया। उनके लिए साम्यवाद कोई आयातित विचार नहीं था, बल्कि देश के मजदूरों, किसानों और शोषित समुदायों की वास्तविक समस्याओं का वैज्ञानिक विश्लेषण था। इसी कारण उन्होंने मजदूर आंदोलनों, ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह भी उल्लेखनीय है कि वे स्वतंत्रता संग्राम को केवल औपनिवेशिक शासन से मुक्ति तक सीमित नहीं मानते थे। उनके अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव है जब आर्थिक शोषण, वर्गीय असमानता और सामाजिक अन्याय का अंत हो। इस दृष्टि से उनका चिंतन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर एक वैकल्पिक सामाजिक दृष्टि प्रस्तुत करता है।
मुजफ्फर अहमद का जीवन लगातार दमन, कारावास और मुकदमों से भरा रहा। कानपुर षड्यंत्र केस और मेरठ षड्यंत्र केस जैसे मुकदमों में उन्हें कठोर यातनाएँ झेलनी पड़ीं, किंतु उन्होंने अपने वैचारिक विश्वासों से समझौता नहीं किया। यह प्रतिबद्धता आज के राजनीतिक वातावरण में और अधिक प्रासंगिक हो जाती है, जहाँ वैचारिक दृढ़ता की अपेक्षा अवसरवाद अधिक दिखाई देता है।
हालाँकि, मुजफ्फर अहमद के योगदान का मूल्यांकन केवल श्रद्धा के भाव से नहीं किया जाना चाहिए। भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन स्वयं अनेक वैचारिक अंतर्विरोधों, रणनीतिक भूलों और संगठनात्मक विभाजनों का इतिहास भी रहा है। कई अवसरों पर यह आंदोलन भारतीय समाज की जातीय, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय जटिलताओं को पर्याप्त रूप से समझने में असफल रहा। इस आलोचना से मुजफ्फर अहमद की विरासत भी पूरी तरह अछूती नहीं है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि उन्होंने निरंतर आत्मालोचना और वैचारिक बहस की संस्कृति को प्रोत्साहित किया, जो किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की अनिवार्य शर्त होती है।
आज जब आर्थिक असमानता लगातार बढ़ रही है, श्रम कानूनों में परिवर्तन हो रहे हैं, असंगठित श्रमिकों की समस्याएँ गंभीर होती जा रही हैं और सामाजिक विषमता नए रूपों में सामने आ रही है, तब मुजफ्फर अहमद का वर्गीय विश्लेषण पुनः प्रासंगिक प्रतीत होता है। भले ही उनके सभी निष्कर्षों से सहमति न हो, परंतु शोषण और असमानता के विरुद्ध उनका नैतिक आग्रह आज भी लोकतांत्रिक विमर्श को दिशा देता है।
उनकी सबसे बड़ी विरासत सांप्रदायिक सद्भाव के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता है। उन्होंने धर्म के आधार पर समाज को विभाजित करने की राजनीति का निरंतर विरोध किया और वर्गीय एकता को राष्ट्रीय एकता का आधार माना। वर्तमान समय में, जब सामाजिक ध्रुवीकरण लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती बनता जा रहा है, तब उनका यह संदेश और अधिक अर्थपूर्ण हो उठता है।
मुजफ्फर अहमद का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि किसी भी वैचारिक आंदोलन की शक्ति उसके सिद्धांतों के साथ-साथ उसके नैतिक चरित्र में निहित होती है। सादगी, बौद्धिक ईमानदारी, संगठनात्मक अनुशासन और जनता के प्रति प्रतिबद्धता उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ थीं। यही कारण है कि वे केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि भारतीय वामपंथ की वैचारिक चेतना के आधार-स्तंभ माने जाते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मुजफ्फर अहमद को केवल औपचारिक श्रद्धांजलियों तक सीमित न रखा जाए। उनके विचारों का आलोचनात्मक अध्ययन किया जाए, उनकी उपलब्धियों और सीमाओं दोनों का निष्पक्ष मूल्यांकन हो, और उनसे वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियों के समाधान के सूत्र खोजे जाएँ। किसी भी लोकतंत्र की शक्ति उसके विचार-विमर्श में होती है, और मुजफ्फर अहमद का जीवन इसी वैचारिक संवाद की एक महत्त्वपूर्ण विरासत है।
उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करने का सबसे सार्थक तरीका यही होगा कि हम लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, श्रमिक अधिकार, धर्मनिरपेक्षता और वैचारिक स्वतंत्रता के उन मूल्यों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करें, जिनके लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
उल्लेखनीय है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक सत्ता-परिवर्तन का इतिहास नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और वैचारिक मुक्ति के लिए चले बहुआयामी संघर्षों का भी इतिहास है। इस व्यापक संघर्ष में अनेक ऐसे व्यक्तित्व हुए, जिनके योगदान को मुख्यधारा के इतिहास-लेखन में अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया। मुजफ्फर अहमद ऐसे ही एक क्रांतिकारी चिंतक, संगठनकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित न रखकर उसे श्रमिकों, किसानों और वंचित वर्गों की मुक्ति से जोड़ा।
मुजफ्फर अहमद का जीवन इस तथ्य का प्रमाण है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल कांग्रेस अथवा सशस्त्र क्रांतिकारियों तक सीमित नहीं था। उन्होंने भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के आर्थिक एवं सामाजिक शोषण के विरुद्ध वैज्ञानिक समाजवादी दृष्टि विकसित की। उनका मानना था कि यदि स्वतंत्रता केवल सत्ता के हस्तांतरण तक सीमित रह जाए और समाज में आर्थिक असमानता, वर्गीय शोषण तथा सामाजिक अन्याय कायम रहे, तो ऐसी स्वतंत्रता अधूरी होगी।
ब्रिटिश सरकार ने उनके विचारों और गतिविधियों को अपने शासन के लिए गंभीर चुनौती माना। कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मुकदमा और मेरठ षड्यंत्र मुकदमा जैसे मामलों में उन्हें बार-बार जेल भेजा गया। लंबा कारावास, सरकारी दमन और निरंतर निगरानी भी उनके विचारों को कमजोर नहीं कर सके। इसके विपरीत, जेल उनके लिए वैचारिक चिंतन और संगठनात्मक रणनीति का केंद्र बन गई।
मुजफ्फर अहमद का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय श्रमिक आंदोलन और समाजवादी विचारधारा से जोड़ा। उन्होंने मजदूर संगठनों, किसान आंदोलनों और प्रगतिशील सांस्कृतिक धारा को राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का अभिन्न अंग बनाया। उनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ केवल विदेशी शासन का अंत नहीं था, बल्कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना भी था जिसमें श्रम को सम्मान, समान अवसर और सामाजिक न्याय प्राप्त हो।
फिर भी यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास-लेखन में मुजफ्फर अहमद जैसे नेताओं को अपेक्षित स्थान क्यों नहीं मिला। इसका एक कारण स्वतंत्रता आंदोलन की एकांगी व्याख्या रही, जिसमें वामपंथी, श्रमिक और किसान आंदोलनों के योगदान को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया। वैचारिक मतभेदों के कारण भी अनेक क्रांतिकारी व्यक्तित्व इतिहास के हाशिए पर चले गए। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी उनके योगदान से पर्याप्त रूप से परिचित नहीं हो सकी।
आलोचनात्मक दृष्टि से यह भी स्वीकार करना होगा कि मुजफ्फर अहमद की राजनीतिक विचारधारा और रणनीतियों पर समय-समय पर बहस होती रही है। भारतीय परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन के प्रभाव, राष्ट्रीय आंदोलन के साथ उनके संबंध तथा तत्कालीन राजनीतिक निर्णयों पर विभिन्न मत रहे हैं। किंतु इन मतभेदों के बावजूद यह निर्विवाद है कि उन्होंने औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध संघर्ष को व्यापक सामाजिक और आर्थिक विमर्श से जोड़ा तथा भारतीय लोकतांत्रिक चेतना के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज जब आर्थिक असमानता, श्रमिक अधिकारों का संकट और सामाजिक विषमता जैसे प्रश्न पुनः राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं, तब मुजफ्फर अहमद के विचार नई प्रासंगिकता प्राप्त करते हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है जब उसके साथ सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों का विस्तार भी सुनिश्चित हो।
मुजफ्फर अहमद की जयंती केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व को स्मरण करने का अवसर नहीं है, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बहुलतावादी परंपरा को पुनः समझने का भी अवसर है। इतिहास के उन अध्यायों को सामने लाना आज की बौद्धिक और नैतिक आवश्यकता है, जिन्हें लंबे समय तक उपेक्षित रखा गया। स्वतंत्रता आंदोलन के इस महान क्रांतिकारी का पुनर्मूल्यांकन न केवल इतिहास के प्रति न्याय होगा, बल्कि वर्तमान और भविष्य की लोकतांत्रिक चेतना को भी अधिक समृद्ध करेगा।

परीक्षा संकट, युवाओं का प्रतिरोधऔर शिक्षा सुधार की वास्तविक चुनौतियाँभारत में परीक्षा प्रणाली एक गहरे संकट के दौर से गुज...
03/08/2026

परीक्षा संकट, युवाओं का प्रतिरोध
और शिक्षा सुधार की वास्तविक चुनौतियाँ
भारत में परीक्षा प्रणाली एक गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं–नीट, यूजीसी-नेट, एसएससी, रेलवे, पुलिस भर्ती, शिक्षक नियुक्ति तथा राज्य लोक सेवा आयोगों के प्रश्नपत्र लीक होने, परीक्षाओं के रद्द होने, परिणामों में अनियमितताओं और नियुक्तियों में भ्रष्टाचार ने युवाओं के बीच व्यापक असंतोष पैदा किया है। यह असंतोष केवल प्रशासनिक विफलता के विरुद्ध नहीं है, बल्कि उस सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के विरुद्ध भी है, जिसने शिक्षा को सार्वजनिक अधिकार के बजाय बाज़ार की वस्तु में बदल दिया है। इसलिए परीक्षा संकट को केवल तकनीकी समस्या मानना वास्तविकता से आँख मूँदना होगा। यह संकट पूँजीवादी विकास मॉडल, नवउदारवादी शिक्षा नीतियों और राज्य की बदलती भूमिका से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा किसी समाज में केवल ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं होती; वह उत्पादन संबंधों, वर्गीय हितों और वैचारिक प्रभुत्व (Ideological Hegemony) को बनाए रखने का उपकरण भी होती है। कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने स्पष्ट किया था कि प्रत्येक युग में शासक वर्ग के विचार ही समाज के प्रमुख विचार बन जाते हैं। शिक्षा प्रणाली भी इन्हीं विचारों को पुनरुत्पादित करती है। आधुनिक पूँजीवादी समाज में परीक्षा प्रणाली उस चयन-प्रक्रिया का हिस्सा बन जाती है जिसके माध्यम से श्रम-बाज़ार के लिए आवश्यक मानव संसाधन तैयार किया जाता है तथा सीमित अवसरों के लिए व्यापक प्रतिस्पर्धा पैदा की जाती है।
भारत में बेरोज़गारी की गंभीर समस्या ने परीक्षा को जीवन-मरण के प्रश्न में बदल दिया है। लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा कोचिंग संस्थानों पर खर्च करते हैं और पूरा सामाजिक जीवन परीक्षा-केंद्रित हो जाता है। जब प्रश्नपत्र लीक होता है या परीक्षा रद्द होती है, तब केवल एक परीक्षा नहीं टूटती, बल्कि युवाओं का भविष्य, आत्मविश्वास और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास भी टूटता है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में युवाओं के आंदोलन केवल रोजगार की मांग तक सीमित नहीं रहे; वे पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था और सामाजिक न्याय की भी मांग कर रहे हैं।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि परीक्षा माफिया का उदय कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था की उपज है जिसमें शिक्षा और रोजगार दोनों का व्यापक निजीकरण हुआ है। नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने सरकारी नौकरियों की संख्या कम की, संविदा और आउटसोर्सिंग को बढ़ावा दिया तथा शिक्षा के क्षेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप प्रतियोगिता अत्यधिक तीव्र हुई और परीक्षा स्वयं एक विशाल उद्योग में बदल गई। कोचिंग संस्थान, निजी विश्वविद्यालय, ऑनलाइन टेस्ट प्लेटफ़ॉर्म और परीक्षा एजेंसियाँ एक ऐसे शिक्षा-बाज़ार का निर्माण करती हैं जिसमें सफलता खरीदने योग्य वस्तु प्रतीत होने लगती है। प्रश्नपत्र लीक इसी बाज़ारवादी संस्कृति की चरम अभिव्यक्ति है।
मार्क्सवादी विश्लेषण यह बताता है कि पूँजीवाद प्रत्येक संकट को लाभ कमाने के अवसर में बदल देता है। परीक्षा संकट भी इसका अपवाद नहीं है। एक ओर सरकारें तकनीकी सुधारों, डिजिटल निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित परीक्षा प्रणालियों की घोषणा करती हैं; दूसरी ओर निजी तकनीकी कंपनियों को नए अनुबंध और बाज़ार उपलब्ध होते हैं। किंतु यदि भ्रष्टाचार की सामाजिक-आर्थिक जड़ों को नहीं बदला जाएगा, तो केवल तकनीकी समाधान स्थायी नहीं होंगे। प्रश्नपत्र डिजिटल हो या कागज़ी, यदि व्यवस्था के भीतर वर्गीय हित, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक भ्रष्टाचार कायम रहेंगे, तो संकट नए रूप में लौटेगा।
युवाओं का प्रतिरोध इस संदर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। लोकतांत्रिक समाज में युवा केवल भविष्य के नागरिक नहीं, बल्कि वर्तमान के सक्रिय राजनीतिक-सामाजिक अभिनेता हैं। जब वे सड़कों पर उतरकर परीक्षा रद्द होने, भर्ती घोटालों या शिक्षा के निजीकरण का विरोध करते हैं, तब वे केवल व्यक्तिगत अवसरों की रक्षा नहीं कर रहे होते, बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की भी मांग कर रहे होते हैं। यह प्रतिरोध हमें फ्रांसीसी दार्शनिक लुई अल्थूसर की उस अवधारणा की याद दिलाता है कि राज्य के वैचारिक उपकरणों के विरुद्ध जनता का संघर्ष सामाजिक परिवर्तन की संभावना उत्पन्न करता है।
हालाँकि यह भी सच है कि युवाओं के आंदोलनों को अक्सर राजनीतिक दलों के तात्कालिक हितों तक सीमित कर दिया जाता है। परीक्षा संकट के मूल कारणों–बेरोज़गारी, सार्वजनिक निवेश में कमी, शिक्षा के निजीकरण और श्रम बाज़ार की असमानताओं पर व्यापक राष्ट्रीय बहस कम ही होती है। मीडिया भी अनेक बार परीक्षा लीक की घटना को सनसनीखेज समाचार तक सीमित रखता है, जबकि उसके सामाजिक-आर्थिक कारणों पर गंभीर विमर्श नहीं करता। परिणामस्वरूप समस्या का संरचनात्मक विश्लेषण सार्वजनिक चर्चा से बाहर रह जाता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षा में बहु-विषयकता, कौशल विकास और तकनीकी नवाचार की बात करती है। ये उद्देश्य स्वागतयोग्य हो सकते हैं, किंतु वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा का लोकतंत्रीकरण हो रहा है या उसका बाज़ारीकरण? यदि गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा और समान अवसर सुनिश्चित नहीं किए जाते, तो नई शिक्षा नीति भी सामाजिक असमानताओं को कम करने के बजाय उन्हें और गहरा कर सकती है। मार्क्सवादी दृष्टि से शिक्षा का उद्देश्य केवल बाज़ार के लिए कुशल श्रमिक तैयार करना नहीं, बल्कि आलोचनात्मक चेतना से लैस नागरिक तैयार करना होना चाहिए।
आज भारत में परीक्षा की तैयारी स्वयं एक वर्गीय प्रश्न बन चुकी है। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार महँगे कोचिंग संस्थानों, डिजिटल संसाधनों और बेहतर अध्ययन वातावरण का लाभ उठा सकते हैं, जबकि गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थी अनेक संरचनात्मक बाधाओं से जूझते हैं। इस प्रकार परीक्षा की समानता केवल औपचारिक समानता रह जाती है; वास्तविक समान अवसर अनुपस्थित रहते हैं। मार्क्सवादी सिद्धांत इसे वर्गीय पुनरुत्पादन की प्रक्रिया के रूप में देखता है, जहाँ शिक्षा सामाजिक असमानताओं को समाप्त करने के बजाय कई बार उन्हें वैधता प्रदान करती है।
परीक्षा संकट का एक मनोवैज्ञानिक आयाम भी है। लगातार असफलता, परीक्षा स्थगन और अनिश्चितता के कारण अनेक युवा अवसाद, निराशा और आत्महत्या जैसी दुखद स्थितियों तक पहुँच जाते हैं। यह केवल व्यक्तिगत मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न है। जब राज्य युवाओं को सम्मानजनक रोजगार और निष्पक्ष अवसर उपलब्ध नहीं करा पाता, तब उसकी लोकतांत्रिक वैधता भी प्रश्नों के घेरे में आती है।
समाधान केवल कठोर दंड, डिजिटल निगरानी या परीक्षा एजेंसियों के पुनर्गठन तक सीमित नहीं हो सकता। आवश्यकता है कि शिक्षा और रोजगार को सार्वजनिक उत्तरदायित्व के रूप में पुनर्स्थापित किया जाए। सरकारी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में निवेश बढ़ाया जाए, स्थायी रोजगार के अवसर सृजित किए जाएँ, रिक्त पदों पर समयबद्ध नियुक्तियाँ हों, परीक्षा एजेंसियों को पूर्ण स्वायत्तता और संसदीय जवाबदेही के दायरे में लाया जाए तथा प्रश्नपत्र लीक जैसे अपराधों के विरुद्ध त्वरित और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए। इससे भी अधिक आवश्यक यह है कि शिक्षा को लाभ कमाने के उद्योग के बजाय सामाजिक अधिकार के रूप में देखा जाए।
मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य हमें यह भी सिखाता है कि किसी भी सुधार का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे समाज के सबसे वंचित वर्गों को कितना लाभ मिलता है। यदि शिक्षा सुधार केवल तकनीकी दक्षता, डिजिटल परीक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा तक सीमित रहेंगे, तो वे वास्तविक लोकतंत्रीकरण नहीं ला सकेंगे। शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक समानता, वैज्ञानिक चेतना, आलोचनात्मक विवेक और मानवीय गरिमा का विकास होना चाहिए।
आज का परीक्षा संकट वस्तुतः भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा भी है। यदि लाखों युवाओं का विश्वास बार-बार टूटता रहेगा, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता भी कमजोर होगी। युवाओं का प्रतिरोध इसीलिए केवल विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी बनाने का प्रयास है। इस प्रतिरोध को दमन या राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय सामाजिक परिवर्तन की ऊर्जा के रूप में समझने की आवश्यकता है।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि परीक्षा संकट का समाधान शिक्षा व्यवस्था के भीतर सीमित सुधारों से संभव नहीं है। इसके लिए व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन आवश्यक हैं–ऐसी व्यवस्था जिसमें शिक्षा सार्वजनिक अधिकार हो, रोजगार राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी हो, और विकास का केंद्र मुनाफा नहीं बल्कि मनुष्य हो। मार्क्सवादी दृष्टिकोण इसी बुनियादी परिवर्तन की मांग करता है। जब तक शिक्षा पर बाज़ार का वर्चस्व, रोजगार में असमानता और वर्गीय विषमता बनी रहेगी, तब तक परीक्षा संकट विभिन्न रूपों में लौटता रहेगा।
आज आवश्यकता केवल "लीक-प्रूफ परीक्षा" की नहीं, बल्कि "न्यायपूर्ण शिक्षा व्यवस्था" की है। शिक्षा सुधार का वास्तविक अर्थ तकनीकी सुरक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और सार्वजनिक शिक्षा की पुनर्स्थापना है। यदि भारत अपने युवाओं की आकांक्षाओं का सम्मान करना चाहता है, तो उसे परीक्षा व्यवस्था को ही नहीं, उस समूची सामाजिक-आर्थिक संरचना को बदलना होगा जो शिक्षा को प्रतिस्पर्धा का युद्धक्षेत्र और युवाओं को अनिश्चित भविष्य का बंदी बना देती है। तभी परीक्षा संकट का स्थायी समाधान संभव होगा और शिक्षा वास्तव में सामाजिक मुक्ति का माध्यम बन सकेगी।

24/07/2026
लोकतंत्र पर लाठी का प्रहार असहमति के दमन से लोकतंत्र नहीं, भयतंत्र जन्म लेता हैलोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है। वह ...
23/07/2026

लोकतंत्र पर लाठी का प्रहार
असहमति के दमन से लोकतंत्र नहीं, भयतंत्र जन्म लेता है
लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है। वह नागरिकों की भागीदारी, असहमति के सम्मान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर आधारित एक जीवंत राजनीतिक व्यवस्था है। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने, संगठित होने और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज करने का अधिकार दिया है। इसलिए जब किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन का उत्तर लाठीचार्ज, आँसू गैस, बल प्रयोग अथवा दमनात्मक कार्रवाई से दिया जाता है, तब यह केवल कुछ प्रदर्शनकारियों पर किया गया प्रहार नहीं होता, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर भी आघात होता है।
हाल के वर्षों में देश में अनेक अवसरों पर यह प्रवृत्ति दिखाई दी है कि जनता की असहमति को संवाद के माध्यम से सुनने के बजाय प्रशासनिक शक्ति से नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। चाहे किसान आंदोलन हो, युवाओं के रोजगार संबंधी आंदोलन, महिलाओं के विरोध प्रदर्शन हों अथवा विभिन्न सामाजिक संगठनों के धरने—कई बार राज्य का पहला उत्तर बातचीत नहीं बल्कि पुलिस बल रहा है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती।
लोकतांत्रिक शासन में सरकार और जनता के बीच संबंध शासक और शासित का नहीं, बल्कि प्रतिनिधि और नागरिक का होता है। जनता सरकार को सत्ता सौंपती है ताकि वह जनहित में निर्णय ले सके। लेकिन जब वही सरकार नागरिकों की आवाज़ सुनने के बजाय उन्हें बलपूर्वक चुप कराने का प्रयास करती है, तब लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है; यदि वही टूट जाए तो संस्थाएँ केवल औपचारिक ढाँचा बनकर रह जाती हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा करने और संगठन बनाने का अधिकार प्रदान करते हैं। निश्चित रूप से इन अधिकारों पर सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के हित में युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, किंतु "युक्तिसंगत प्रतिबंध" और "अनावश्यक दमन" में मूलभूत अंतर है। यदि हर विरोध को कानून-व्यवस्था की समस्या मान लिया जाए, तो संवैधानिक अधिकार केवल कागज़ी अधिकार बनकर रह जाएंगे।
लोकतंत्र में असहमति शत्रुता नहीं होती। वह शासन को अधिक उत्तरदायी और संवेदनशील बनाने का माध्यम होती है। संसद में विपक्ष की भूमिका हो या सड़क पर जनता का विरोध–दोनों लोकतांत्रिक विमर्श के आवश्यक अंग हैं। इतिहास साक्षी है कि भारत की स्वतंत्रता स्वयं जन आंदोलनों और शांतिपूर्ण प्रतिरोध की देन है। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसक आंदोलन के माध्यम से यह सिद्ध किया कि जनमत की शक्ति किसी भी दमनकारी सत्ता से अधिक प्रभावशाली होती है। विडंबना यह है कि जिस देश ने दुनिया को अहिंसक प्रतिरोध का मार्ग दिखाया, वहीं आज शांतिपूर्ण विरोध पर लाठियाँ चलने की घटनाएँ चिंता का विषय बनती जा रही हैं।
राज्य के पास वैध शक्ति का अधिकार होता है, किंतु उसका प्रयोग अंतिम उपाय होना चाहिए, पहला नहीं। लोकतांत्रिक प्रशासन का दायित्व है कि वह तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी संयम, धैर्य और संवाद का मार्ग अपनाए। पुलिस का कार्य नागरिकों की सुरक्षा करना है, उन्हें भयभीत करना नहीं। यदि पुलिस की छवि एक दमनकारी संस्था के रूप में बनने लगे तो जनता और राज्य के बीच विश्वास का संकट गहरा जाता है।
बल प्रयोग का एक और गंभीर परिणाम यह है कि इससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ता है। जब किसी वर्ग, समुदाय या संगठन को यह महसूस होने लगे कि उसकी बात सुनी नहीं जाएगी, तब निराशा और आक्रोश बढ़ता है। लोकतंत्र में संवाद के सभी द्वार खुले रहने चाहिए, क्योंकि जहाँ संवाद समाप्त होता है, वहाँ टकराव आरंभ होता है। लाठी व्यवस्था को कुछ समय के लिए नियंत्रित कर सकती है, किंतु समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती।
लोकतांत्रिक शासन का मूल्यांकन केवल आर्थिक विकास, आधारभूत संरचना या चुनावी सफलता से नहीं किया जाता। उसकी वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने आलोचकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जो सरकार केवल समर्थकों की बात सुनती है और आलोचना को राष्ट्रविरोध या व्यवस्था-विरोध के रूप में देखने लगती है, वह लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करती है। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
यह भी स्वीकार करना होगा कि हर प्रदर्शन पूर्णतः शांतिपूर्ण नहीं रहता। कहीं-कहीं हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति अथवा कानून-व्यवस्था की चुनौती भी उत्पन्न होती है। ऐसे मामलों में प्रशासन को आवश्यक कार्रवाई का अधिकार है। किंतु यह कार्रवाई परिस्थितियों के अनुरूप, न्यूनतम बल के सिद्धांत पर आधारित और पूरी तरह जवाबदेह होनी चाहिए। यदि कुछ लोगों की हिंसा के कारण पूरे आंदोलन को अपराधी मान लिया जाए, तो न्याय और प्रशासन दोनों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने के नाते उसका दायित्व है कि वह केवल सरकारी पक्ष या केवल आंदोलनकारियों के पक्ष को प्रस्तुत न करे, बल्कि तथ्यों के आधार पर संतुलित रिपोर्टिंग करे। यदि मीडिया विरोध को केवल कानून-व्यवस्था का संकट या राजनीतिक षड्यंत्र बताकर प्रस्तुत करता है, तो जनता का वास्तविक पक्ष दब जाता है। इसी प्रकार यदि मीडिया हिंसा को नज़रअंदाज़ कर केवल भावनात्मक चित्र प्रस्तुत करे, तो वह भी लोकतांत्रिक विमर्श के साथ न्याय नहीं करता।
न्यायपालिका लोकतंत्र की अंतिम आशा है। अनेक अवसरों पर उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लोकतंत्र का अभिन्न अंग माना है। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य को नागरिक स्वतंत्रताओं और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना होगा। यह संतुलन ही संवैधानिक शासन की पहचान है।
आज आवश्यकता केवल पुलिस सुधारों की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति के पुनर्निर्माण की भी है। सरकारों को यह समझना होगा कि विरोध लोकतंत्र का संकट नहीं, बल्कि लोकतंत्र का स्वाभाविक गुण है। जनता यदि अपनी समस्याएँ लेकर सड़कों पर उतर रही है, तो यह शासन के लिए आत्ममंथन का अवसर होना चाहिए, न कि शक्ति प्रदर्शन का।
राजनीतिक दलों की भूमिका भी आत्मालोचन की मांग करती है। विपक्ष में रहते हुए जो दल विरोध और धरने को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हैं, सत्ता में आने के बाद कई बार वही आंदोलनकारियों के प्रति कठोर रुख अपनाते हैं। यह दोहरा मापदंड लोकतांत्रिक नैतिकता को कमजोर करता है। लोकतंत्र का अर्थ सत्ता परिवर्तन मात्र नहीं, बल्कि शासन की लोकतांत्रिक शैली का निरंतर पालन भी है।
लोकतंत्र की सफलता नागरिकों की जिम्मेदारी पर भी निर्भर करती है। आंदोलनों को शांतिपूर्ण, अनुशासित और संविधानसम्मत बनाए रखना आंदोलनकारियों का दायित्व है। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा, हिंसा से दूरी और संवाद के लिए खुलेपन से ही जन आंदोलनों की नैतिक शक्ति बनी रहती है। इसी प्रकार प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बल प्रयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में और विधिसम्मत तरीके से हो।
भारत आज स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है। यह गौरव केवल जनसंख्या या चुनावों के कारण नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के कारण है। यदि नागरिक अपने ही लोकतंत्र में भय, दमन और असुरक्षा का अनुभव करने लगें, तो यह दावा कमजोर पड़ जाता है। लोकतंत्र की वास्तविक प्रतिष्ठा तब होती है जब सबसे कमजोर नागरिक भी बिना भय के अपनी बात कह सके।
लाठी शासन का उपकरण हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र का आधार नहीं। लोकतंत्र का आधार विश्वास, संवाद, संवेदनशीलता और संविधान है। इतिहास बताता है कि विचारों को बलपूर्वक दबाया जा सकता है, समाप्त नहीं किया जा सकता। दमन अस्थायी शांति देता है, जबकि संवाद स्थायी समाधान का मार्ग खोलता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शासन और समाज दोनों लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सम्मान करें। सरकारें नागरिकों की आवाज़ सुनें, पुलिस संवैधानिक दायित्वों का पालन करे, मीडिया निष्पक्ष रहे, न्यायपालिका नागरिक अधिकारों की रक्षा करे और नागरिक भी लोकतांत्रिक आचरण का पालन करें। तभी लोकतंत्र की आत्मा सुरक्षित रह सकेगी।
अंततः यह स्मरण रखना होगा कि किसी भी लोकतंत्र की पहचान उसकी सड़कों पर होती है, जहाँ नागरिक निर्भय होकर अपनी बात कह सकें। यदि उन सड़कों पर संवाद की जगह लाठी का शासन स्थापित हो जाए, तो लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर होने लगता है। इसलिए लोकतंत्र पर लाठी का प्रत्येक प्रहार केवल तत्कालीन आंदोलनकारियों पर नहीं, बल्कि संविधान, नागरिक स्वतंत्रता और भारत की लोकतांत्रिक परंपरा पर भी प्रहार है। एक परिपक्व लोकतंत्र का उत्तर लाठी नहीं, संवाद; दमन नहीं, संवेदना; और भय नहीं, विश्वास होना चाहिए।

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