27/06/2026
हाईवे का ढाबा
मैं उस रात लगातार आठ घंटे गाड़ी चला चुका था। हाईवे लगभग खाली था। घड़ी में ठीक दो बजे थे और आँखें इतनी भारी हो चुकी थीं कि हर कुछ सेकंड में झपकी आने लगी। तभी दूर अंधेरे में एक टिमटिमाती पीली रोशनी दिखाई दी। मुझे लगा शायद कोई ढाबा होगा। अजीब बात यह थी कि इस रास्ते पर मैं पहले भी कई बार आ चुका था, लेकिन उस जगह कभी कोई ढाबा नहीं देखा था।
जैसे-जैसे मैं करीब पहुँचा, एक पुराना लकड़ी का बोर्ड दिखा जिस पर धुंधले अक्षरों में लिखा था—"रात के मुसाफ़िरों का स्वागत है।" बोर्ड के नीचे कोई नाम नहीं था। बस वही एक लाइन। ढाबे के बाहर तीन-चार ट्रक खड़े थे, लेकिन उनमें से किसी का इंजन चालू नहीं था। पूरा माहौल इतना शांत था कि अपनी साँसों की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
मैंने गाड़ी पार्क की और अंदर चला गया। मिट्टी का फर्श, लकड़ी की पुरानी मेज़ें, पीले बल्ब की हल्की रोशनी और चूल्हे पर चढ़ी चाय की केतली। सब कुछ किसी पुराने ज़माने जैसा लग रहा था। एक बूढ़ा आदमी बिना मेरी तरफ देखे बोला, "बहुत लंबा सफ़र करके आए हो... पहले चाय पी लो।"
मैं चौंक गया। मैंने तो उससे कुछ कहा भी नहीं था।
मैंने बैठकर चारों तरफ नज़र दौड़ाई। बाकी लोग चुपचाप खाना खा रहे थे। किसी के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे सब किसी गहरी सोच में डूबे हों। मैंने पास बैठे एक आदमी से पूछा, "भाई साहब, यह जगह कौन-सी है?"
उसने धीरे से मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों के नीचे काले गहरे निशान थे। वह बस मुस्कुराया और बोला, "जहाँ रास्ता खत्म नहीं होता... वहाँ यह ढाबा शुरू होता है।"
उसका जवाब सुनकर मेरे शरीर में हल्की-सी सिहरन दौड़ गई।
चाय आई। उसकी खुशबू अजीब तरह से परिचित थी। पहला घूंट लेते ही ऐसा लगा जैसे सारी थकान गायब हो गई हो। आँखें पूरी तरह खुल गईं। लेकिन उसी पल मुझे महसूस हुआ कि ढाबे के अंदर लगी पुरानी घड़ी की सुइयाँ बिल्कुल नहीं चल रही थीं। समय दो बजकर पाँच मिनट पर ही रुका हुआ था।
मैंने बूढ़े मालिक से पूछा, "आपकी घड़ी बंद है क्या?"
वह हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, "यहाँ आने वालों के लिए समय थोड़ी देर रुक जाता है।"
मैंने बात को मज़ाक समझकर हँसने की कोशिश की, लेकिन न जाने क्यों आवाज़ गले में ही अटक गई।
तभी मेरी नज़र दीवार पर टंगी दर्जनों पुरानी तस्वीरों पर पड़ी। अलग-अलग सालों की तस्वीरें थीं। हर तस्वीर में वही ढाबा दिखाई दे रहा था। वही मेज़ें... वही चूल्हा... वही बूढ़ा आदमी। लेकिन तस्वीरों की तारीखें पच्चीस-तीस साल पुरानी थीं।
मैं और करीब गया। अचानक एक तस्वीर देखकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उस तस्वीर में मैं खड़ा था।
वही कपड़े... वही चेहरा... वही कार पीछे पार्क थी।
लेकिन तस्वीर के नीचे लिखा था...
"रात — 17 जुलाई 1999"
मैंने काँपते हाथों से अपनी जेब से मोबाइल निकाला। नेटवर्क बिल्कुल नहीं था। कैमरा खोला और तस्वीर की फोटो लेने लगा। जैसे ही स्क्रीन पर तस्वीर आई... उसमें मैं अकेला नहीं था। मेरे ठीक पीछे कोई लंबी काली परछाई खड़ी थी।
मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
उसी समय ढाबे का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला। एक नया मुसाफ़िर अंदर आया। उसका चेहरा थका हुआ था... बिल्कुल मेरी तरह। उसने भी वही सवाल पूछा, "भाई, यहाँ चाय मिलेगी?"
लेकिन इस बार मुझे सबसे अजीब बात समझ आई।
ढाबे में बैठे किसी भी आदमी ने उसकी तरफ देखा तक नहीं।
जैसे वे सब पहले से जानते हों कि वह आने वाला है।
मैं जल्दी से बिल चुकाकर बाहर निकलने लगा। बूढ़े ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ उम्मीद से कहीं ज़्यादा मज़बूत थी।
वह धीरे से बोला, "सूरज निकलने से पहले निकल जाओ... वरना अगली सुबह तुम्हें भी कोई ढूँढ़ नहीं पाएगा।"
मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई। मैं बिना कुछ बोले भागकर कार में बैठा और पूरी रफ्तार से हाईवे पर निकल गया।
कुछ देर बाद पीछे देखने की हिम्मत हुई।
ढाबे की रोशनी धीरे-धीरे धुंध में गायब हो रही थी।
करीब आधे घंटे बाद मुझे एक पेट्रोल पंप मिला। मैंने वहाँ रुककर पूरी घटना बताई। बूढ़े कर्मचारी ने मेरी बात ध्यान से सुनी। फिर बिना कुछ कहे अंदर गया और एक पुरानी अख़बार की कतरन लेकर आया।
उसमें लिखा था कि कई साल पहले इसी हाईवे पर एक भीषण सड़क दुर्घटना हुई थी। कई ट्रक और कारें आपस में टकरा गई थीं। दर्जनों लोग लापता हो गए थे। उनकी गाड़ियाँ मिली थीं... लेकिन लोग कभी नहीं मिले।
मैंने उससे पूछा, "क्या यहाँ आसपास कोई ढाबा है?"
उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा।
"इस सड़क पर? नहीं साहब... पिछले बीस साल से यहाँ कोई ढाबा नहीं है।"
मेरे हाथ से चाय का कप गिर गया।
सुबह होने पर मैं उसी जगह वापस गया जहाँ रात को ढाबा देखा था।
वहाँ सिर्फ़ खाली मैदान था।
न कोई बोर्ड।
न चूल्हा।
न ट्रक।
कुछ भी नहीं।
लेकिन मिट्टी पर ताज़े टायरों के निशान थे... जैसे रात में दर्जनों गाड़ियाँ वहाँ रुकी हों।
मैंने आख़िरी बार पीछे मुड़कर देखा।
दूर हवा में एक पल के लिए वही पीली रोशनी टिमटिमाई... और मुझे साफ़ सुनाई दिया—
"अगली लंबी यात्रा में... फिर मिलेंगे।"
उस दिन के बाद मैंने कभी रात दो बजे उस हाईवे पर सफ़र नहीं किया। लेकिन आज भी, जब कोई ट्रक ड्राइवर उस रास्ते का ज़िक्र करते हुए कहता है कि उसने आधी रात के बाद एक पुराने ढाबे में चाय पी थी... तो मैं उसे कभी झूठा नहीं कहता। क्योंकि कुछ रास्ते नक्शों पर नहीं होते... और कुछ ढाबे सिर्फ़ उन लोगों का इंतज़ार करते हैं जो थकान और अंधेरे के बीच उम्मीद की आख़िरी रोशनी तलाश रहे होते हैं।
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