21/12/2025
नमस्कार दोस्तों! अपनी रचना के साथ आज पुनः उपस्थित हूं ।
क्या हुआ ऐ मन !
क्यों तेज है धड़कन
शिशिर के भी मौसम में क्यों
तेरी आंखों में सावन
कुछ खो गया है क्या
बता कुछ हो गया है क्या
खिलखिलाहट तेरी खामोश क्यों--
अल्फ़ाज़ में कैसी उलझन
सर्द हवाएंँ यादों की
खुश्क करती हैं फिजाएं
तारीख गुजर रहे बेमेल सा क्यों
हालात में ये कैसी जकड़न
बोलो , कुछ तो बोलो
अपनी उदासी का भेद खोलो
ऐ मन ! सिले सिले से तेरे होंठ क्यों
ढीले पड़ गए कैसे बंधन
अपनेपन का एहसास
करीब होने का आभास
वक़्त की आँच में जल रहे क्यों
भाव में ये कैसी सिकुड़न
कवि ! बेबसी क्या बता पाऊंगा
नियति कैसे बदल पाऊंगा
महफ़िल में सूनापन है पसरा
हँसी में बिखरा फीकापन
तो कहो कवि ! तुम ही कहो
चुपचाप हैं सब्र, दशा है मौन
हर ओर से हो रही है टूटन
ये किस हाल का जीवन !
------- कवि रंजित तिवारी
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