21/05/2026
विक्रमाजीत सिंह सनातन धर्म कॉलेज के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) द्वारा दिनांक 20 मई 2026 को “संस्थागत विकास एवं गुणवत्ता संवर्धन” विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन कॉन्फ्रेंस हॉल-2 में किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य उच्च शिक्षा में गुणवत्ता सुधार, संस्थागत विकास तथा शैक्षणिक उत्कृष्टता के प्रति जागरूकता बढ़ाना था।
कार्यक्रम महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. नीरू टंडन के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में बाह्य विशेषज्ञ के रूप में प्रो. सी.एल. मौर्य, अध्यक्ष, कृषि महाविद्यालय, सीएसए विश्वविद्यालय, कानपुर उपस्थित रहे। उन्होंने गुणवत्ता आश्वासन, मान्यता प्रक्रिया तथा संस्थागत उन्नयन से संबंधित महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए।
अपने संबोधन में प्रो. सी.एल. मौर्य ने कहा कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान की प्रगति उसके गुणवत्ता मानकों, अनुशासन एवं नवाचार पर निर्भर करती है। उन्होंने शिक्षकों को शोध, नवाचार एवं छात्र-केंद्रित शिक्षण पद्धति अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने सुझाव दिया कि संस्थानों को नियमित अकादमिक ऑडिट, कौशल विकास कार्यक्रम, डिजिटल शिक्षण संसाधनों के उपयोग तथा उद्योग–शिक्षा समन्वय पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि IQAC की सक्रिय भूमिका संस्थान को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण होती है।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. पी.एस. डोबल, IQAC Coordinator द्वारा किया गया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो. इन्द्र मणि द्वारा प्रस्तुत किया गया। कार्यशाला में प्रो. आनंद शुक्ला, प्रो. मंजरी श्रीवास्तव, डॉ. अनुराधा तिवारी, डॉ. फातिमा आशना तथा प्रो. आर.के. पाण्डेय सहित अनेक शिक्षक एवं शिक्षिकाएँ उपस्थित रहे। सभी प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए गुणवत्ता शिक्षा एवं संस्थागत विकास पर विचार-विमर्श किया।
अंत में सभी अतिथियों, आयोजकों एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कार्यक्रम का सफल समापन हुआ।
19/05/2026
Don’t miss this insightful workshop on Institutional Development & Quality Enhancement.
Join us on 20 May at 11:30 AM in Conference Hall-2.
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18/05/2026
18 मई/जन्म-दिवस
परिवार के मुखिया बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में संघचालक की भूमिका परिवार के मुखिया की होती है। बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह ने उत्तर प्रदेश में इस भूमिका को जीवन भर निभाया। उनका जन्म 18 मई, 1911 को कानपुर के प्रख्यात समाजसेवी रायबहादुर श्री विक्रमाजीत सिंह के घर में हुआ था। शिक्षाप्रेमी होने के कारण इस परिवार की ओर से कानुपर में कई शिक्षा संस्थाएं स्थापित की गयीं।
नरेन्द्र जी की शिक्षा स्वदेश व विदेश में भी हुई। लंदन से कानून की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे बैरिस्टर बने। वे न्यायालय में हिन्दी में बहस करते थे। उन्होंने प्रसिद्ध लेखकों के उपन्यास पढ़कर अपनी हिन्दी को सुधारा। कम्पनी लाॅ के वे विशेषज्ञ थे, उनकी बहस सुनने दूर-दूर से वकील आते थे।
1935 में उनका विवाह जम्मू-कश्मीर राज्य के दीवान बद्रीनाथ जी की पुत्री सुशीला जी से हुआ। 1944 में वे पहली बार एक सायं शाखा के मकर संक्रांति उत्सव में मुख्य अतिथि बनकर आये। 1945 में वे विभाग संघचालक बनाये गये। 1947 में श्री गुरुजी ने उन्हें प्रांत संघचालक घोषित किया।
नरेन्द्र जी का परिवार अत्यधिक सम्पन्न था; पर शिविर आदि में वे सामान्य स्वयंसेवक की तरह सब काम स्वयं करते थे। उन्होंने अपने बच्चों को संघ से जोड़ा और एक पुत्र को तीन वर्ष के लिए प्रचारक भी बनाया। 1948 ई0 के प्रतिबंध के समय उन्हें कानपुर जेल में बंद कर दिया गया। कांग्रेसी गुंडों ने उनके घर पर हमला किया। शासन चाहता था कि वे झुक जाएं; पर उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि संघ का काम राष्ट्रीय कार्य है और वह इसे नहीं छोड़ेंगे।
उनके बड़े भाई ने संदेश भेजा कि अब पिताजी नहीं है। अतः परिवार का प्रमुख होने के नाते मैं आदेश देता हूं कि तुम जेल मत जाओ; पर बैरिस्टर साहब ने कहा कि इस अन्याय के विरोध में परिवार को भी समर्पित करना पड़े, तो वह कम है। वे जेल में सबके साथ सामान्य भोजन करते और भूमि पर ही सोते थे। 1975 में आपातकाल में भी वे जेल में रहे। जेल में मिलने आते समय उनके परिजन फल व मिष्ठान आदि लाते थे। वे उसे सबके साथ बांटकर ही खाते थे।
बैरिस्टर साहब के पूर्वज पंजाब के मूल निवासी थे। वे वहां से ही सनातन धर्म सभा से जुड़े थे। 1921 में उनके पिता श्री विक्रमाजीत सिंह ने कानपुर में ‘सनातन धर्म वाणिज्य महाविद्यालय’ की स्थापना की। इसके बाद तो इस परिवार ने सनातन धर्म विद्यालयों की शृंखला ही खड़ी कर दी।
बैरिस्टर साहब एवं उनकी पत्नी (बूजी) का दीनदयाल जी से बहुत प्रेम था। उनकी हत्या के बाद कानपुर में हुई श्रद्धांजलि सभा में बूजी ने उनकी स्मृति में एक विद्यालय खोलने की घोषणा की। उनके परिवार द्वारा चलाये जा रहे सभी विद्यालयों की पूरे प्रदेश में धाक है। विद्यालयों से उन्हें इतना प्रेम था कि उनके निर्माण में धन कम पड़ने पर वे अपने पुश्तैनी गहने तक बेच देते थे। मेधावी छात्रों से वे बहुत प्रेम करते थे। जब भी कोई निर्धन छात्र अपनी समस्या लेकर उनके पास आता था, तो वे उसका निदान अवश्य करते थे।
वे बहुत सिद्धांतप्रिय थे। एक बार उनके घर पर चीनी समाप्त हो गयी। बाजार में भी चीनी उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने अपने विद्यालय के छात्रावास से कुछ चीनी मंगायी; पर साथ ही उसका मूल्य भी भेज दिया। उनका मत था कि राजनीति में चमक-दमक तो बहुत है; पर उसके माध्यम से जितनी समाज सेवा हो सकती है, उससे अधिक बाहर रहकर की जा सकती है।
बैरिस्टर साहब देश तथा प्रदेश की अनेक धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारी थे। जब तक स्वस्थ रहे, तब तक प्रत्येक काम में वे सहयोग देते रहे। 31 अक्तूबर, 1993 को उनका शरीरांत हुआ। उन्होंने अपने व्यवहार से प्रमाणित कर दिखाया कि परिवार के मुखिया को कैसा होना चाहिए।
18/05/2026
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18/05/2026
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15/05/2026
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14/05/2026
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