17/07/2026
स्क्रीन टाइम टू एक्टिविटी टाइम : समय की आवश्यकता
मानव ने तकनीक का सृजन अपने जीवन को सरल, सहज और समृद्ध बनाने के लिए किया था, किंतु विडंबना यह है कि आज वही तकनीक धीरे-धीरे हमारे जीवन को अधिक जटिल, अधिक व्यस्त और अधिक एकाकी बनाती जा रही है, जिस उपकरण का उद्देश्य समय बचाना था, वही आज हमारे समय का सबसे बड़ा उपभोक्ता बन बैठा है
ब्रिटेन जैसे विकसित राष्ट्र का किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर रात्रिकालीन प्रतिबंध लगाने पर विचार करना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक चेतावनी ह, यह संकेत है कि यदि समय रहते डिजिटल अनुशासन नहीं अपनाया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ तकनीक का उपयोग नहीं करेंगी, बल्कि तकनीक ही उनका उपयोग करने लगेगी।
भारत विश्व का सबसे बड़ा इंटरनेट और मोबाइल उपयोगकर्ता देश है, इस विशाल डिजिटल संसार का सबसे बड़ा भाग हमारी युवा शक्ति है, वही युवा, जिसके कंधों पर विकसित भारत का स्वप्न टिका है, किंतु जब चिंतन की जगह स्क्रॉलिंग, मनन की जगह नोटिफिकेशन, पठन-पाठन की जगह रील्स और खेल के मैदानों की जगह मोबाइल स्क्रीन ले लेती है, तब यह केवल व्यक्तिगत आदत नहीं रहती, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती है
स्क्रीन की चमक धीरे-धीरे संबंधों की ऊष्मा को मद्धिम कर रही है, संवाद का स्थान संदेशों ने, पुस्तक का स्थान स्क्रीन ने, खेल का स्थान गेम ने और आत्मचिंतन का स्थान अंतहीन डिजिटल शोर ने ले लिया है, परिणामस्वरूप एकाकीपन, मानसिक तनाव, असहिष्णुता और शारीरिक निष्क्रियता हमारे समाज में मौन महामारी की तरह फैल रही है
विषय तकनीक के विरोध करने का नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण उपयोग का है, तकनीक साधन बने, साध्य नहीं, सुविधा बने, स्वामी नहीं, मनुष्य का नियंत्रण तकनीक पर रहे, तकनीक का नियंत्रण मनुष्य पर नहीं
युवाओं के हाथों में केवल मोबाइल नहीं, पुस्तक भी हो, केवल की-बोर्ड नहीं, खेल का मैदान भी हो, केवल आभासी मित्र नहीं, वास्तविक संबंध भी हों, केवल स्क्रीन की रोशनी नहीं, प्रकृति का प्रकाश भी हो।
जीवन का वास्तविक स्पर्श किसी स्क्रीन पर नहीं, समाज, प्रकृति, परिवार और कर्म के बीच मिलता है।
इस समय का नारा होना चाहिय
स्क्रीन टाइम टू एक्टिविटी टाइम