Woman and Child Development, Govt of Haryana

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30/08/2022

जींद, 3० अगस्त महिला एवं बाल विकास विभाग की जिला बाल संरक्षण इकाई द्वारा किशोर न्याय एवं पोक्सो एक्ट पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन लघु सचिवालय के न्यू भवन में किया गया। इस कार्यशाला की अध्यक्षता हरियाणा किशोर न्याय बोर्ड के सदस्य एवं मास्टर ट्रेनर एडवोकेट अरविंद खुरानिया ने की। इस अवसर पर जिला बाल संरक्षण अधिकारी सुजाता, जिला बाल कल्याण समिति के चेयर पर्सन व कि शोर बोर्ड के सदस्य नरेन्द्र अत्री, विशेष किशोर पुलिस इकाई के सदस्य,किशोर बोर्ड के सदस्य,चाईल्ड लाईन के सदस्य, कार्यप्रणाली से जुडे स्पेशल अध्यापक,डीपीओ कार्यालय के कर्मियों ने शिरकत की।
किशोर बोर्ड के सदस्य ने बताया कि किशोर न्याय बोर्ड एक न्यायिक निकाय है, जिसमें अपराध के आरोपी बच्चों को लाया जाता है। यह किशोरों के लिए एक अलग अदालत होती है। किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों के तहत जिला बाल कल्याण समिति के पास बच्चों के संरक्षण, पुनर्वास के लिए मामलों को निपटाने की शक्ति होती है। उन्होंने पोक्सो एक्ट के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि नाबालिग बच्चों को सेक्सुअल असॉल्ट, सेक्सुअल हैरेसमेंट और पोर्नोग्राफी जैसे अपराधों से प्रोटेक्ट किया गया है। एक्ट में बने कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है। उन्होंने बताया कि अधिनियम के तहत न्यायालय द्वारा वर्तमान में जो कानून बनाए गए है उन्हेे हर हाल में पढ़ लेना चाहिए। पोक्स एक्ट लाने का उद्देश्य बच्चों को यौन उत्पीडऩ और शोषण से बचाना और बच्चे के सर्वोत्तम हित को सुरक्षित करना है। कई बार बच्चे अपराध करने से लंबे अरसे तक आघात में रहते है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस बच्चे का मानसिक मानस कमजोर है, उसकी भलाई पर सर्वोपरि विचार किया जाना चाहिए। यह सर्वविदित है कि नाबालिक बच्चों द्वारा झेली गई आघात लंबे समय तक चलती है और एक बच्चे को उस आघात से बाहर आने में वर्षों लग जाते हैं। यह आघात बच्चे के विकास में बाधा डालता है और विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी बच्चे के विकास पर बुरा प्रभाव डालती है।
उन्होंने बताया कि जब बच्चा किसी अपराधिक गतिविधियों में संल्पित होता है तो उस वक्त पुलिस का अहम रोल होता है। पुलिस द्वारा नाजायज रूप से की गई कार्यवाही बच्चे के शारिरीक मानसिक विकास में बाधा उत्पन कर सकती है। जिसके कारण बच्चा दौबारा कु संगती में पड़ सकता है।
उन्होने बताया कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को पुलिस द्वारा पकडऩे पर उसक ा खाना,पीना , डॉक्टरी इलाज,काउंसलर , वकील उपलब्ध करवाना यहंा तक की वस्त्र न होने पर उनकी भी उपलब्धता तथा जिम्मेदारी जिला बाल संरक्षण इकाई की होती है। पुलिस को चाहिए कि ऐसे मामलों में सबसे पहले डीएलएसए तथा जिला बाल सरंक्षण इकाई को इसकी सूचना दें।
उन्होंने बताया कि हर कोई चाहता है कि उसके घर में बच्चे हों, जिससे घर में खुशियां बनी रहे। वहीं, कई सारे कपल्स ऐसे होते हैं जो आमतौर पर बच्चा गोद लेने की योजना बनाते हैं। चाइल्ड अडॉप्शन को लेकर हर देश का अपना अलग कायदा कानून होता है, जिसके तहत लोग किसी भी बच्चे को गोद ले सकते हैं। भारत में भी बच्चा गोद लेने के लिए एक कानूनी प्रक्रिया के जरिए गुजरना पड़ता है। बच्चा गोद लेने वाला व्यक्ति नियम व शर्तों को स्वीकार करने के बाद ही बच्चे के अभिभावक बन सकता हैं। उन्होंने बताया कि कोई भी थर्ड जेंडर किसी भी थर्ड जेंडर बच्चे को जबरन उठा कर नही ले जा सकता। इसके लिए कानूनी प्रावधान बनाए गए है।

Celebration by Women and child development department, District child protection unit,Jind
06/01/2021

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