04/03/2026
रंगों से किसे बैर हो सकता है?
रंग तो जीवन का उत्सव हैं, प्रकृति का संगीत हैं, भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं। जो रंगों से दूरी रखे, वह शायद जीवन की सहजता से भी दूर हो जाए। यह दुनिया स्वयं रंग–बिरंगी है, फिर हम रंगों से क्यों डरें?
लेकिन प्रश्न केवल रंगों का नहीं है। प्रश्न उस व्यवहार का है जो रंगों के नाम पर सामने आता है। आनंद, उमंग और उल्लास के बीच यदि हुड़दंग, अराजकता और असभ्यता भी घुल जाए तो उत्सव का स्वरूप बिगड़ जाता है। गली–मोहल्लों में ऐसी भीड़ निकलती है कि परिवार के साथ बाहर निकलना कठिन हो जाए, घर में बैठकर भी शोर सहना पड़े। फिर भी लोग चुप रहते हैं — कहीं कोई “धर्मद्रोही” न कह दे, कहीं अनावश्यक विवाद न खड़ा हो जाए। क्या यही धर्म है? क्या यही उत्सव की आत्मा है?
हर पर्व पर नैतिकता की दुहाई देने वाले लोग भी दिखाई देते हैं — कोई मांस की दुकानों को बंद करवाना चाहता है, कोई शराब पर रोक लगाना चाहता है। लेकिन वही समाज होली के दिन सब कुछ खुला रहने देता है। ईद पर जितना मांस नहीं बिकता, नववर्ष पर जितनी शराब नहीं बहती, शिवरात्रि पर जितनी भांग नहीं चढ़ती — उससे अधिक होली पर दिखाई देता है। यदि यह इस पर्व की पहचान है तो भी हमें यह समझना होगा कि पहचान और अराजकता में अंतर होता है।
धर्मग्रंथों और शास्त्रों का हवाला देने वाले अक्सर चुनिंदा बातों को ही दोहराते हैं। उदाहरण के लिए, पांडुरंग वामन काणे ने अपनी प्रसिद्ध कृति धर्मशास्त्र का इतिहास में प्राचीन सामाजिक व्यवस्थाओं और त्यौहारों के संदर्भों का विस्तार से उल्लेख किया है। इतिहास यह भी बताता है कि अलग-अलग कालखंडों में पर्वों को विभिन्न वर्गों से जोड़ा गया। पुराणों और स्मृतियों में वर्ण–व्यवस्था और आचार–विचार की कई व्याख्याएँ मिलती हैं, जिनमें “स्वपच” जैसे शब्द भी आते हैं। प्रश्न यह नहीं कि लिखा क्या गया; प्रश्न यह है कि आज हम उसे किस दृष्टि से समझते हैं।
यदि किसी ग्रंथ में एक ओर भेदभाव की रेखाएँ खींची जाएँ और दूसरी ओर उसी दिन स्पर्श से “पुण्य” मिलने की बात कही जाए, तो यह स्पष्ट करता है कि इतिहास जटिल रहा है। परंतु वर्तमान का समाज उन जटिलताओं को जस का तस ढोने के लिए बाध्य नहीं है।
इसीलिए मैं मानता हूँ — होलिका दहन करूँ या न करूँ, यह व्यक्तिगत आस्था का विषय है; पर रंगों का आनंद लेना जीवन का उत्सव है। रंग किसी एक वर्ग, एक विचार या एक पहचान के नहीं होते। आज समस्या रंगों से नहीं, उनके प्रतीकात्मक बंटवारे से है — भगवा, हरा, नीला, सफेद, लाल, पीला… हम हर रंग को किसी खांचे में बाँट देते हैं।
क्यों न एक दिन सब रंगों को एक ही बाल्टी में घोल दें? सब पर एक साथ उछाल दें — बिना भेद, बिना द्वेष, बिना भय। शायद तभी हम समझ पाएँगे कि उत्सव क्या होता है।
त्योहार कभी–कभी औपचारिक हो जाते हैं, पर उत्सव वह है जो वर्तमान क्षण में जीया जाए — बिना किसी की हार–जीत के भाव के।
जीवन का असली अर्थ भी यही है — साथ जियो, खुलकर जियो, और रंगों की तरह एक–दूसरे में घुल जाओ।