04/02/2026
वायरल दावा क्या कहता है?
“ममता बनर्जी बार काउंसिल में रजिस्टर्ड नहीं हैं, फिर भी सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर बहस कर रही हैं।
जबकि आम नागरिक बिना बार काउंसिल रजिस्ट्रेशन जिला अदालत में भी जिरह नहीं कर सकता।”
👉 यह दावा आधा सच + आधा भ्रम है।
⚖️ कानून क्या कहता है? (बिल्कुल स्पष्ट)
1️⃣ क्या कोई आम नागरिक बिना Bar Council रजिस्ट्रेशन बहस कर सकता है?
❌ नहीं। बिल्कुल नहीं।
Advocates Act, 1961 के अनुसार:
सिर्फ वही व्यक्ति कोर्ट में “argue / plead” कर सकता है
जो Bar Council में पंजीकृत अधिवक्ता हो।
जिला अदालत हो, हाईकोर्ट हो या सुप्रीम कोर्ट —
👉 जिरह और बहस सिर्फ अधिवक्ता कर सकता है।
2️⃣ फिर ममता बनर्जी कोर्ट में कैसे बोलीं?
यहाँ सबसे ज़रूरी फर्क समझिए 👇
🔸 ममता बनर्जी ने:
✔️ खुद को “Advocate” बताकर बहस नहीं की
✔️ जिरह नहीं की
✔️ कानूनी दलीलें formally नहीं रखीं
उन्होंने क्या किया? 👉 Bench की अनुमति से अपनी बात रखी
👉 एक याचिकाकर्ता / राज्य की executive head के रूप में factual submission दी
⚠️ यह arguing the case नहीं कहलाता
⚠️ यह pleading / cross-examination नहीं है
3️⃣ क्या यह Bar Council के ऊपर है?
❌ नहीं। बिल्कुल नहीं।
Bar Council का अधिकार:
“कौन advocate है और कौन बहस कर सकता है”
Supreme Court का अधिकार:
किसे सुनना है, किस सीमा तक सुनना है
👉 Bench की अनुमति सर्वोच्च होती है,
लेकिन वह वकील बनने की छूट नहीं देती।
4️⃣ आम नागरिक और ममता बनर्जी में फर्क क्यों?
क्योंकि:
वह मामले की याचिकाकर्ता हैं
वह राज्य की मुख्यमंत्री (executive head) हैं
और उनके साथ:
कपिल सिब्बल
श्याम दीवान
जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता पहले से मौजूद थे
👉 कोर्ट ने खुद कहा:
“आपके वकील पहले ही सारी दलीलें रख चुके हैं।”
यानि: ✔️ बहस वकीलों ने की
✔️ बात रखने की अनुमति उन्हें दी गई
🔥 वायरल लाइन:
“देश में जूता सबसे बड़ा है… जो किसी में पड़ा है”
⚖️ कानूनी रूप से यह कथन तथ्य नहीं, भावना है।
कानून भावना से नहीं, प्रक्रिया से चलता है।
🧠 अंतिम निष्कर्ष (एकदम साफ)
✅ यह सच है कि बिना Bar Council रजिस्ट्रेशन कोई भी व्यक्ति कोर्ट में बहस नहीं कर सकता
❌ यह गलत है कि ममता बनर्जी ने कानून तोड़कर बहस की
❌ यह गलत है कि Bar Council की अवहेलना हुई
✔️ उन्होंने Bench की अनुमति से सीमित रूप में अपनी बात रखी,
जो संविधान और न्यायिक परंपरा के भीतर है।