12/11/2017
हर बच्चा अपने माता पिता से बहुत कुछ सीखता है | लेकिन वो सबकुछ इस बात पर निर्भर करता है कि माता पिता ने किस तरीके से अपनी बात उनके सामने रखी है | अगर एक बच्चा अपने माँ बाप मैं एक रोल मॉडल, एक मोटीवेटर नहीं देख सकता तो समझ लीजिए कि बच्चा अपने घर से बाहर कदम रख चुका है , उसने अपनी एक दुनिया अपने घर से दूर बना ली है | अब आप चाहकर भी उसे वापिस नहीं ला सकते | क्या किया उन माँ बाप ने अपने बच्चे के बड़े होने तक जो अब कहते हैं कि हमारा बच्चा हमारी बात नहीं सुनता , हमारे पास बैठना पसंद नहीं करता , अपनी कोई बात हम से साझा नहीं करता , जो बात हम उन्हें समझाना चाहते हैं वो बात उसे समझना तो दूर सुनना भी पसंद नहीं करता |
सभी माँ बाप अपने आप से सवाल पूछिए :-
१. जब बच्चा तीन साल का हुआ तो हमने उसे तुरंत स्कूल में डालना उचित समझा क्यूँ ? क्यूंकि हम उनसे उम्मीद करते हैं कि वो जल्दी चीजों को सीखेंगे | जब तक वो अपने घर को और परिवार के लोगों को अच्छी तरह से समझता हमने उसे बाहर कि दुनिया समझने घर से बाहर निकाल दिया वो भी बिना सहारे के | जो समय उसे माँ बाप के साथ गुजारना था हमने हमारा हाथ छुडाकर बाहर वो समय किसी और के हाथ मैं दे दिया |
२. जब बच्चा खाना नहीं खाता तो हम उसके हाथ में मोबाइल पकड़ा देते हैं या टेलीविजन दिखाना शुरू कर देते हैं ताकि वो खाना खा सके और हम अपने समय को बचा सके | और जब बच्चा मोबाइल का आदि हो जाता है तो हम शिकायत करते हैं और उपाय पूछते हैं कि इस आदत को कैसे छुड़ाया जाये |
३. क्या आपको याद है जब बच्चा छोटा था ,बच्चे के स्कूल से आने के बाद आपने उससे पूछा कि बेटा आज स्कूल मैं क्या क्या हुआ ? क्या कोई नया फ्रेंड आपने बनाया ? क्या कोई अच्छी बात आज आपने स्कूल में सीखी ? आपके टीचर्स ने आपको कैसा और किस तरीके से पढ़ाया ? जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो वो दूरी बनाकर चलने लगते हैं , और हम कहते हैं की हमारा अपना बच्चा हमारा ध्यान नहीं रखता , हमसे बात नहीं करता | जिस उम्र में उसे सबसे ज्यादा आपकी जरुरत थी आपने अपना हाथ छुडाकर किसी दूसरे का हाथ उसे थाम दिया क्यूँ ? क्यूंकि आप अपना करियर , बिज़नस एक अच्छे प्रोफेशनल तरीके से आगे बढ़ा सकें ? अगर में गलत हूँ तो यही मुझे टोक दीजियेगा |
४. जब बच्चा जवानी की दहलीज पर पहुंचा क्या आपने कभी अपनी समस्या बच्चे के साथ साझा की है ? आप किन तकलीफों से दो –चार हुए ? क्या किसी की मदद आप ले पाए या खुद से कोई समाधान आपने ढूँढा ? अगर नहीं तो ये जान लीजिए कि आपने जिंदगी समझने का मौका उसे नहीं दिया | वो क्या समझेगा जब वो बड़ा होगा और उन्ही मुश्किलों से उसे गुजरना पड़ेगा ?
५. हम इतने प्रोफेशनल हो चुके हैं कि हमें अपने बच्चों में ही अपना प्रोफेशन नज़र आने लगता है | हम उम्मीद करते हैं कि हमारे सामने बात करने वाला हर व्यक्ति प्रोफेशनल तरीके से अपनी बात रखे | क्यूंकि हमें अब सिर्फ वही भाषा समझ आती है |
६. ज़रा सोचिये प्रोफेशनली तो हमसे स्कूल मैनेजमेंट ने भी बात कि थी | लेकिन क्या वो सबकुछ जो कमिटमेंट्स उन्होंने किये थे बच्चे के एडमिशन के समय क्या वो सबकुछ कभी पूरा हुआ ? जो वादे किये गए थे कभी पूरे हुए ? अगर बच्चा कमज़ोर है तो क्या इम्प्रूवमेंट करने कि कोशिश स्कूल मैनेजमेंट और टीचर्स ने की ? अगर की होती तो आप लोगों को अपने बच्चों को ट्यूटर्स के पास भेजने की जरुरत नहीं पड़ती | लेकिन फिर भी हम कभी अपने बच्चे के कमज़ोर होने के लिए , उसके किसी विषय को न समझ पाने के लिए स्कूल को जिम्मेदार नहीं ठहराते क्यूँ ?
७. आप ज़रा स्कूल मैनेजमेंट और टीचर्स से पूछ कर तो देखिये की अगर बच्चा नहीं समझ पा रहा तो उन्होंने कभी पढाने का तरीका बदलने की कोशिश की ? जब हर बच्चा अलग अलग फीस भरता है तो उसे अलग से समझाने और पढाने में मैनेजमेंट को क्या हर्ज़ ? बच्चा पढ़ने में होशियार है तो सभी क्रेडिट लेना चाहते हैं |
८. जब बच्चा और बड़ा हुआ घर से अकेला निकलने लगा क्या हमने उसे जिंदगी का पाठ पढ़ाना शुरू किया ? क्या हमने उसे कभी बताया कॉमनसेंस क्या होता है ? किस परिस्थिति में उसे क्या और कैसे करना है ? शायद कभी नहीं |
९ अब हुआ ये कि उसे जो ज्ञान बाहर से मिला उसने सीख लिया | जो मदद मिली बस ले ली | अब जब सब कुछ घर के बाहर से ही मिल रहा है तो उसे कुछ भी पाने के लिए अब घर कि और घरवालों कि जरुरत नहीं हैं |
१०. हमने बहुत पैसा कम लिया और अब जब मौका मिला कि अपने बच्चे से बात करें तो पता चला कि बच्चे की हमसे बात करने में कोई रूचि नहीं है | अगर आपने अपनी बात को मजबूती के साथ बच्चे के सामने रखा होता उसे अपने पास बैठकर समझाया होता तो वो ज़रूर समझता | लेकिन किसी ने ये ज़रुरी नहीं समझा |
११. मेरे पिताजी कहा करते थे की एक बच्चे के माँ बाप उसके सबसे बड़े और सबसे पहले गुरु होते हैं | ये बात इन उदाहरणों से सच साबित होती है |
अब कुछ सलाह सभी परेंट्स के लिए :-
१. कच्चे घड़े को आग में पकाएंगे तो पककर मजबूत हो जायेगा , लेकिन अगर पानी में बहने के लिए छोड़ दिया तो टूट कर बिखर जायेगा | इसी तरह अपने बच्चों को मौका दीजिए जिंदगी की आग में पकने का ना की बाहर की दुनिया में घुलकर बह जाने का | विकल्प आपको चुनना है |
२. मेरे पिताजी ये भी कहा करते थे बेटे चीजों की कद्र करोगे तो चीजें तुम्हारी क़द्र करेंगी | अपने बच्चों को चीजों की क़द्र करना सिखाईए ये मेरा दावा है आपसे कि वो रिश्तों की क़द्र करना खुद ब खुद सीख जायेंगे | आप अपने बच्चों कि क़द्र करेंगे तो वो आपकी क़द्र करेंगे |
३. अभी भी मौका है अपने दिनचर्या के समय में से कुछ कीमती समय अपने बच्चों के लिए निकालिए | यकीं मानिये आपका आज का दिया गया समय कल आपको सूद के साथ वापिस मिलेगा |
४. अपने बच्चों से कुछ भी पाने की या उनसे जल्दी सीखने की आग में मत झोंकिये | उन्हें पेड़ बनने दीजिए जो समय तो लंबा लेते हैं बड़े होने और फल देने में लेकिन जड़े बहुत गहरी होती हैं जिन्हें आसानी से उखाड़ा नहीं जा सकता | ना की फसल बनने में जो उगती भी जल्दी है, पकती भी जल्दी है और उतनी ही जल्दी कट भी जाती है | फैसला आपको लेना है |
५. अगर आप किसी बात को लेकर परेशान हैं तो तुरंत काउंसलिंग सर्विसेज लीजिए | क्यूंकि आप नहीं जानते कब क्या बात कितनी बड़ी आपके बच्चे के लिए हो जाये | और वो किस हद तक उसे अपने दिमाग में बिठा ले |
रिश्तों की मोती बड़े नाज़ुक होते हैं जिन्हें पिरोये रखने के लिए जिंदगी की डोरी से बांधे रखना पड़ता है , लेकिन ये तभी संभव है, जब हम इन रिश्तों की अहमियत को समझें और जिंदगी को खूबसूरती के नज़रिए से देखें | अगर ये मोती बिखर भी जाएँ तो डरने या घबराने की जरुरत नहीं उन्हें फिर से समेट कर बांधने के लिए बस आपको थोड़ी सी हिम्मत जुटानी होगी |
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© 2018 Ranjeet Rajput