26/08/2021
‘‘धूप में जलते
और खेत में झूमते/
बीज बोते हुए
धान-गेंहूँ-रहर/
हिन्द के गाँव में
रहने वाले कृषक!
माँ धरा! पर फिरा कर
नजर प्रेम की/
सर झुकाए हुए
गीत गाते हैं ये
आस्था से भरे
गुनगुनाते हैं ये-
‘माँ सुनो!
जब कि सूखे हुए बीज ये
तेरी ममता से
लहराती फसलें बनें
मान लेना मेरी इक दुआ उस घड़ी
जब कि दहकां को रोटी मयस्सर करो
सबसे पहले मेरे चाकरों के लिए
पेट भरने को फलसों की बालें खिलें
उनके बच्चों को चूल्हे से ठंडक मिले
उनके बूढ़ो को तावों से गर्मी मिले/
बेसहारों कि खातिर उगे अन्न फिर
और उनके भी चेहरे पे छलके खुशी
फिर हो मन्दिर में भगवान को भोग भी
और परसाद साधू की झोली भरे/
फिर ये करना कि मेहमान आए जो घर
उसको भूखा कभी भी न जाना पड़े
फिर मेरे खेत में हो मेहर जो तेरी
मेरे बच्चों की खातिर भी दानें पड़ें/
मेरी माँ! मेरी धरती!
अगर फिर तुझे
यूँ लगे कि मेरे वास्ते कुछ भी है
तो मुझे बख्श देना वो दुनका कि मैं
पेट अपना भरुँ और आगे बढूँ
कि तुझे सब्ज-चुनर चढ़ा फिर सकूँ
तेरी मिट्टी को सर पर सजा कर
फिरूँ...!!’’
स्वामी ओमा दि अक 24 अगस्त 2017
(एक लोकगीत डॉ. बनवारीलाल नाटिया
जी द्वारा काशी में 21 अगस्त 2017 को अक महोत्सव मेंसुनाया/उसके
भाव-भाषान्तर की कोशिश)
लोकगीत राजस्थानी भाषा में मेरे मित्र प्रोफ़ेसर किरण जी नाहटा ने लिखा था क्या भाव एक ग्रामीण व अनपढ़ भारतीय के हैं यह अपने आप में एक अनूठा उदाहरण है बताइए वह ग्रामीण सच्चा भारतीय संस्कृति का उपासक है अथवा पढ़ा लिखा शहरी व्यक्ति। यह निर्णय में आप पर छोड़ता हूं