02/04/2026
मेरे काव्य संग्रह *संस्कार संगम* की अक्षर का समर्पण,शब्द का सामर्थ्य,निशब्द की ध्वनि के पश्चात रिश्तों का गणित सादर प्रस्तुत है---
*रिश्तों का गणित*
अंक.........
सिर्फ गिनती नहीं होते,
वे छिपे रहते हैं
जीवन के हर रिश्ते में।
कभी
वे समय बनकर चलते हैं,
और कभी
परिवार के बिगड़ते संतुलन में
चुपचाप बदल जाते हैं।
शून्य
जब घर में आ जाता है---
तो खालीपन
दीवारों से टपकने लगता है,
और एक
जब “मैं” बन जाता है
तो अपनों के बीच भी
दूरी बना देता है।
दो
जो साथ का प्रतीक था,
आज दो रास्तों में बंट जाता है,
तीन
जहाँ संतुलन होना चाहिए था--
वहीं तीसरा बनकर
दूरी बढ़ा देता है।
चार
जो घर की दीवारें थी
अब उन्हीं में रिश्ते कैद हो गए हैं,
पाँच
जो समझ की इंद्रियाँ थी--
पर अब हर बात पर
अहंकार हावी है।
अंक बढ़ते जाते हैं........
पर संस्कार घटते जाते हैं,
गिनती तो बढ़ रही है---
पर परिवार बिखरता जा रहा है।
कभी जोड़ थे रिश्ते,
आज घटाव बन गए हैं,
गुणा होना था प्रेम का--
पर द्वेष ही बढ़ता जा रहा है।
भाग देते-देते
सब कुछ बाँट दिया—
घर, आँगन, दिल…
और अंत में
अपने भी बंट गए।
गुणनखंड
जहाँ मिलकर संख्या पूरी होती है,
वहीं रिश्तों के छोटे-छोटे हिस्से
टूटकर बिखर रहे हैं--
अब कोई
एक-दूसरे का सहारा नहीं बनता।
वर्गमूल
जो कठिन को आसान करता है,
वही
जीवन के सवालों में खो गया है--
उलझनें बढ़ती जाती हैं,
पर हल कोई नहीं खोजता।
औसत
जो सबको बराबर रखता था,
आज भावनाओं में खो गया है--
किसी को ज्यादा, किसी को कम,
संतुलन अब नहीं रहा।
प्रतिशत
हर रिश्ते की कीमत बताता है,
पर अब
अपनापन भी प्रतिशत में बंट गया है
कहीं स्नेह सच्चा,
कहीं सिर्फ दिखावा,
सच्चाई कम होती जा रही है।
अंक
चुपचाप देखते रहते हैं---
कौन किसका कितना है?
और कौन
किससे कितना दूर?
अंक बताते हैं---
कि
हिसाब सिर्फ पैसों का नहीं होता,
रिश्तों का भी होता है,
और जब
रिश्तों में कमी बढ़ जाए---
तो कोई गणित काम नहीं आता।
अंक
यह भी सिखाते हैं---
समझ जरूरी है,
नहीं तो..
एक छोटी-सी “गलती”
कब जीवन का पूरा हिसाब
“शून्य” कर देती है--
यह समझ आते-आते
बहुत देर हो जाती है।
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रचनाकार
*डॉ. ओम प्रकाश भार्गव*