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जीवन में हर व्यक्ति अनेक प्रकार के लोगों से मिलता है। कुछ लोग हमारे जीवन में खुशियाँ लेकर आते हैं, कुछ लोग हमें सीख देकर...
29/05/2026

जीवन में हर व्यक्ति अनेक प्रकार के लोगों से मिलता है। कुछ लोग हमारे जीवन में खुशियाँ लेकर आते हैं, कुछ लोग हमें सीख देकर चले जाते हैं, और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो कठिन परिस्थितियों में हमारे असली संबंधों की पहचान करा देते हैं। इसलिए जीवन में तीन प्रकार के लोगों को हमेशा याद रखना चाहिए।

सबसे पहले उन लोगों को याद रखना चाहिए जिन्होंने आपके कठिन समय में आपका साथ दिया। अच्छे समय में तो हर कोई साथ निभाने की बातें करता है, लेकिन जब परिस्थितियाँ विपरीत हो जाती हैं, जब जीवन संघर्षों से भर जाता है, तब जो व्यक्ति बिना स्वार्थ के आपके साथ खड़ा रहता है वही वास्तव में अपना होता है। ऐसे लोग हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। उनका साथ केवल हमारी मदद नहीं करता, बल्कि टूटते हुए आत्मविश्वास को भी संभाल लेता है। इसलिए जीवन में कभी उन लोगों को मत भूलिए जिन्होंने आपके आँसू देखे, आपकी पीड़ा को समझा और मुश्किल समय में आपका हाथ थामा।

दूसरे प्रकार के लोग वे होते हैं जिन्होंने बुरा समय आने पर आपका साथ छोड़ दिया। ऐसे लोग हमें यह सिखाते हैं कि दुनिया में हर संबंध स्थायी नहीं होता। कई लोग केवल हमारे अच्छे समय के साथी होते हैं। जब तक हमारे पास धन, शक्ति, सम्मान या सफलता होती है, वे हमारे आसपास बने रहते हैं, लेकिन जैसे ही जीवन में कठिनाई आती है, वे धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं। ऐसे लोगों को याद रखना इसलिए आवश्यक है ताकि भविष्य में हम संबंधों की वास्तविकता को समझ सकें और अंधविश्वास में किसी पर निर्भर न हो जाएँ। यह अनुभव हमें आत्मनिर्भर बनाता है और जीवन की सच्चाई से परिचित कराता है।

तीसरे प्रकार के लोग वे होते हैं जिन्होंने आपको कठिन परिस्थितियों में धकेला। जिन्होंने छल, ईर्ष्या, स्वार्थ या विश्वासघात के कारण आपके जीवन में पीड़ा पैदा की। ऐसे लोग हमें अंदर से मजबूत बनाते हैं। उनका दिया हुआ दर्द हमें अधिक सतर्क, समझदार और आत्मबल से भर देता है। यदि जीवन में कभी कोई व्यक्ति आपको गिराने का प्रयास करे, तो उससे घृणा करने के बजाय उससे मिली सीख को याद रखिए। क्योंकि कई बार हमारे जीवन की सबसे बड़ी मजबूती उन्हीं कठिन अनुभवों से पैदा होती है।

जीवन का सत्य यही है कि सुख और दुख दोनों ही हमें कुछ न कुछ सिखाने आते हैं। जो लोग कठिन समय में साथ देते हैं, वे हमें प्रेम और मानवता का अर्थ समझाते हैं। जो लोग साथ छोड़ देते हैं, वे हमें वास्तविकता का परिचय कराते हैं। और जो लोग हमें कष्ट देते हैं, वे हमें मजबूत बनाकर आगे बढ़ना सिखाते हैं।

इसलिए जीवन में लोगों को केवल उनके शब्दों से नहीं, बल्कि उनके व्यवहार और कठिन समय में निभाए गए साथ से पहचानिए। क्योंकि समय ही वह दर्पण है जिसमें हर रिश्ते का असली चेहरा दिखाई देता है।

महंत आनंद स्वामी
कृष्ण मंदिर गीता धाम

मनुष्य होना ही अपूर्ण होना है।जिस प्रकार आकाश में कभी-कभी बादल आ जाते हैं, उसी प्रकार जीवन में अच्छे से अच्छे इंसान से भ...
28/05/2026

मनुष्य होना ही अपूर्ण होना है।
जिस प्रकार आकाश में कभी-कभी बादल आ जाते हैं, उसी प्रकार जीवन में अच्छे से अच्छे इंसान से भी कभी न कभी कोई गलती हो जाती है। गलती होना यह सिद्ध नहीं करता कि व्यक्ति बुरा है, बल्कि यह सिद्ध करता है कि वह इंसान है। क्योंकि जहाँ मनुष्य है, वहाँ भूल की संभावना भी है।
लेकिन हर गलती समान नहीं होती।
कुछ गलतियाँ अनजाने में होती हैं, परिस्थितियों के दबाव में होती हैं, अज्ञानता में होती हैं। ऐसी गलतियों के बाद यदि किसी व्यक्ति के भीतर पछतावा जाग उठे, उसका अंतर्मन उसे धिक्कारे, और वह स्वयं को सुधारने का प्रयास करे, तो समझ लेना चाहिए कि उसके भीतर अभी भी मानवता जीवित है। वास्तव में वही व्यक्ति श्रेष्ठ होता है जो अपनी गलती स्वीकार करने का साहस रखता है। अपनी भूल को सुधारने की कोशिश करना ही चरित्र की महानता है।
एक सच्चा इंसान वही है जो गलती के बाद टूटता नहीं, बल्कि स्वयं को और बेहतर बनाने का प्रयास करता है। क्योंकि पश्चाताप आत्मा की पवित्रता का प्रमाण है। जिस व्यक्ति को अपनी भूलों का दुख होता है, वह भीतर से अभी भी अच्छा है। ऐसे लोग समाज की आशा होते हैं, क्योंकि वे सीखते हैं, बदलते हैं और अपने अनुभवों से स्वयं को ऊँचा उठाते हैं।
परंतु दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें गलत कार्य करने में आनंद आता है। वे जानबूझकर दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं, छल करते हैं, बार-बार वही गलतियाँ दोहराते हैं और उन्हें अपनी क्रूरता पर कोई पछतावा भी नहीं होता। ऐसी प्रवृत्ति केवल गलती नहीं, बल्कि दुष्टता है। जब इंसान का विवेक मरने लगे और दूसरों के दर्द से भी उसका हृदय न पिघले, तब वह मनुष्य होकर भी राक्षसी प्रवृत्ति का प्रतीक बन जाता है।
इसलिए किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसकी गलती से नहीं, बल्कि उस गलती के बाद उसके व्यवहार से करना चाहिए।
जो अपनी भूल स्वीकार कर बदलने का प्रयास करे, उसे अवसर देना चाहिए।
और जो बार-बार जानबूझकर गलतियाँ करे, उससे सावधान रहना चाहिए।
याद रखिए,
गलती इंसानियत की निशानी हो सकती है,
लेकिन गलती पर अहंकार और क्रूरता राक्षसता की पहचान है।

महंत आनंद स्वामी
कृष्ण मंदिर गीता धाम

एकादशी का व्रत भारतीय सनातन परंपरा का केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का एक अद्भुत विज्...
27/05/2026

एकादशी का व्रत भारतीय सनातन परंपरा का केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का एक अद्भुत विज्ञान भी है। प्रत्येक पंद्रह दिन में आने वाली एकादशी हमें यह अवसर देती है कि हम अपने जीवन को कुछ समय के लिए संयम, सात्विकता और आत्मनियंत्रण के मार्ग पर ले जाएँ। यह व्रत केवल भोजन त्यागने का नाम नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म को पवित्र बनाने का एक माध्यम है।
जब मनुष्य निरंतर भोग, स्वाद और अधिक भोजन में लिप्त रहता है, तब उसका शरीर अनेक प्रकार के विषैले तत्त्वों और विकारों से भरने लगता है। अधिक तामसिक भोजन, अनियमित दिनचर्या और असंयमित जीवन मन को भी अशांत, क्रोधित और एकाग्रता विहीन बना देता है। ऐसे में एकादशी का व्रत शरीर को विश्राम देने का कार्य करता है। उपवास के दौरान शरीर अपनी आंतरिक सफाई की प्रक्रिया को तीव्र करता है। शरीर में संचित विषैले तत्त्व बाहर निकलने लगते हैं और शरीर डिटॉक्स होने लगता है।
आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि नियंत्रित उपवास शरीर की कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने में सहायक होता है। लंबे समय तक लगातार भोजन मिलने पर शरीर की कई हानिकारक कोशिकाएँ भी सक्रिय रहती हैं, जबकि उपवास की स्थिति में शरीर स्वयं को सुधारने और रोगों से लड़ने की प्रक्रिया को मजबूत करता है। यही कारण है कि समय-समय पर किया गया सात्विक उपवास स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है। इससे पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है, मोटापा नियंत्रित होता है, मानसिक स्पष्टता बढ़ती है और शरीर हल्का तथा ऊर्जावान अनुभव करता है।
लेकिन एकादशी का महत्व केवल शारीरिक लाभ तक सीमित नहीं है। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य मन को सात्विक बनाना है। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीखता है, तब उसका आत्मबल बढ़ता है। भोजन पर नियंत्रण धीरे-धीरे इंद्रियों पर नियंत्रण का मार्ग खोलता है। यही संयम आगे चलकर व्यक्ति को क्रोध, लोभ, मोह और नकारात्मक विचारों से दूर ले जाता है।
एकादशी के दिन सात्विक विचार, भगवान का स्मरण, भजन, ध्यान और पूजा-पाठ करने से मन में शांति उत्पन्न होती है। जब शरीर हल्का होता है, तब मन अधिक स्थिर और एकाग्र हो जाता है। भक्ति में मन लगने लगता है और व्यक्ति भीतर से पवित्रता का अनुभव करता है। इस प्रकार यह व्रत केवल शरीर को नहीं, बल्कि हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व को शुद्ध करने का कार्य करता है।
इस व्रत के पालन में सात्विकता का विशेष महत्व बताया गया है। व्रत खोलने के लिए खिचड़ी जैसे हल्के, सुपाच्य और सात्विक भोजन का विधान इसलिए रखा गया है क्योंकि लंबे समय तक उपवास के बाद भारी और तामसिक भोजन शरीर पर बोझ डाल सकता है। खिचड़ी जैसे सरल भोजन से पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता और शरीर को आवश्यक ऊर्जा भी सहज रूप से मिल जाती है। यह परंपरा हमारे ऋषियों की गहरी स्वास्थ्य संबंधी समझ को दर्शाती है।
वास्तव में एकादशी हमें यह सिखाती है कि जीवन केवल खाने-पीने और भोग में डूबने का नाम नहीं है। संयम, शुद्धता और आत्मनियंत्रण ही वास्तविक शक्ति हैं। यह व्रत हमें बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार की स्वच्छता प्रदान करता है। नियमित रूप से किया गया एकादशी व्रत व्यक्ति को उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य, शांत मानसिक अवस्था और गहन आध्यात्मिक अनुभव प्रदान कर सकता है।
इसलिए एकादशी केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि स्वस्थ, संतुलित और सात्विक जीवन जीने का एक दिव्य मार्ग है।

महंत आनंद स्वामी
कृष्ण मंदिर गीता धाम

मनुष्य का पूरा जीवन उसकी आदतों से निर्मित होता है। हम आज जो हैं, वह केवल हमारे विचारों का परिणाम नहीं है, बल्कि उन आदतों...
25/05/2026

मनुष्य का पूरा जीवन उसकी आदतों से निर्मित होता है। हम आज जो हैं, वह केवल हमारे विचारों का परिणाम नहीं है, बल्कि उन आदतों का परिणाम है जिन्हें हम प्रतिदिन दोहराते हैं। कहा जाता है कि कोई भी कार्य यदि लगातार इक्कीस दिनों तक किया जाए तो वह आदत बनने लगता है, और यदि उसे 66 दिनों तक निरंतर निभाया जाए तो वह हमारे व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन जाता है।
तब वही कार्य जो पहले कठिन लगता था, सहज और स्वाभाविक लगने लगता है।

वास्तव में कठिनाई काम में नहीं होती, कठिनाई हमारी अस्थिरता में होती है। प्रारंभ में हर अच्छा कार्य कठिन लगता है। सुबह जल्दी उठना, समय पर सोना, नियमित व्यायाम करना, सीमित और संतुलित भोजन करना, अध्ययन करना, ध्यान लगाना या अपने लक्ष्य के लिए निरंतर परिश्रम करना — ये सब शुरुआत में बोझ जैसे प्रतीत होते हैं। लेकिन जो व्यक्ति धैर्य और अनुशासन के साथ इन्हें लगातार करता रहता है, उसके लिए यही कार्य बाद में जीवन का आनंद बन जाते हैं।
दूसरी ओर बुरी आदतें बहुत जल्दी हमारे जीवन में जगह बना लेती हैं, क्योंकि उनमें तत्काल सुख और आकर्षण दिखाई देता है। आलस्य करना, समय बर्बाद करना, अनुशासनहीन जीवन जीना, क्रोध करना या शरीर और मन को कमजोर करने वाली आदतों में पड़ जाना — ये सब प्रारंभ में आसान और आनंददायक लगते हैं। इसलिए लोग इन्हें बिना संघर्ष के लंबे समय तक दोहराते रहते हैं और धीरे-धीरे वही बुरी आदतें उनके जीवन का स्वभाव बन जाती हैं। फिर व्यक्ति चाहकर भी उनसे आसानी से मुक्त नहीं हो पाता।
एक जागरूक और विवेकशील व्यक्ति यह समझता है कि जीवन को महान बनाने के लिए महान आदतों का निर्माण आवश्यक है। यदि हम अपने सोने और उठने का समय निश्चित कर लें, भोजन को नियंत्रित कर लें, शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नियमित व्यायाम करें, अपने समय का सदुपयोग करें और अपने लक्ष्य के प्रति प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ते रहें, तो धीरे-धीरे पूरा जीवन बदलने लगता है। शरीर स्वस्थ होता है, मन प्रसन्न रहता है, चेहरे पर तेज आता है, आत्मविश्वास बढ़ता है और आर्थिक तथा मानसिक समृद्धि भी आने लगती है।
अच्छी आदतें किसी चमत्कार से कम नहीं होतीं। वे धीरे-धीरे हमारे व्यक्तित्व को निखारती हैं और हमें वह बना देती हैं जिसकी हमने कभी कल्पना की थी। इसलिए आवश्यक है कि हम केवल प्रेरित न हों, बल्कि संकल्प लें। ऐसा संकल्प जो परिस्थितियों के बदलने से न टूटे। क्योंकि जीवन में क्रांति एक दिन में नहीं आती, वह छोटे-छोटे अच्छे कार्यों की निरंतरता से आती है।
आइए, आज हम यह निश्चय करें कि हम अपने जीवन में अच्छी आदतों को स्थान देंगे। हम अनुशासन को अपना मित्र बनाएंगे, आलस्य को त्यागेंगे और हर दिन स्वयं को पहले से बेहतर बनाने का प्रयास करेंगे। याद रखिए, आदतें ही भविष्य का निर्माण करती हैं। यदि आदतें श्रेष्ठ होंगी, तो जीवन भी श्रेष्ठ बन जाएगा।

महंत आनंद स्वामी
कृष्ण मंदिर गीता धाम

विश्वासघात…यह शब्द अपने भीतर ही पूरा सत्य छुपाए बैठा है।जहाँ विश्वास था, वहीं से घात हुआ।जिसे अपना समझा, उसी ने चोट दी।ज...
20/05/2026

विश्वासघात…
यह शब्द अपने भीतर ही पूरा सत्य छुपाए बैठा है।
जहाँ विश्वास था, वहीं से घात हुआ।

जिसे अपना समझा, उसी ने चोट दी।

जिसके लिए दिल साफ रखा, उसी ने पीठ पीछे वार कर दिया।

लेकिन जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि किसने धोखा दिया…
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हमने अपना विश्वास कहाँ रखा था?
मनुष्य बार-बार इसलिए टूटता है क्योंकि वह उन लोगों पर विश्वास करता है जिनका स्वयं का कोई स्थिर चरित्र नहीं होता।
जो परिस्थिति के साथ बदल जाते हैं, स्वार्थ के साथ मुड़ जाते हैं, और लाभ देखकर रिश्तों की कीमत तय करते हैं।
ऐसे लोगों से यदि धोखा मिले तो आश्चर्य कैसा?
रेत पर महल बनाओगे तो एक दिन गिरना ही है।

परंतु जीवन में दो ऐसे विश्वास हैं जो यदि मजबूत हो जाएँ, तो मनुष्य को कोई शक्ति हरा नहीं सकती।

1- ईश्वर पर विश्वास।
2- स्वयं पर विश्वास

स्वयं पर विश्वास अर्थात यह भरोसा कि
“मैं गिर सकता हूँ, लेकिन हार नहीं मानूँगा।”
“मैं अकेला हो सकता हूँ, लेकिन असहाय नहीं हूँ।”
“मेरे भीतर वह शक्ति है जो हर अंधकार को चीर सकती है।”
जिस व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास जाग जाता है, उसकी चाल बदल जाती है, उसकी आँखों में चमक आ जाती है, उसके निर्णयों में दृढ़ता आ जाती है।
फिर वह परिस्थितियों का गुलाम नहीं रहता, परिस्थितियाँ उसकी परीक्षा लेने लगती हैं।
लेकिन केवल स्वयं पर विश्वास भी पर्याप्त नहीं है।
यदि मनुष्य केवल अपनी शक्ति पर ही भरोसा करने लगे और उस अदृश्य परम शक्ति को भूल जाए जिसने उसे जीवन दिया, बुद्धि दी, अवसर दिए — तो वही आत्मविश्वास धीरे-धीरे अहंकार में बदलने लगता है।
फिर व्यक्ति सोचने लगता है कि सब कुछ उसी के कारण हो रहा है।
और अहंकार वह आग है जो सबसे पहले उसी व्यक्ति को जलाती है जिसके भीतर वह पैदा होती है।

दूसरी ओर यदि कोई केवल ईश्वर पर विश्वास करे लेकिन स्वयं पर नहीं, तो वह कर्महीन हो जाता है।
वह हर कार्य को भाग्य पर छोड़ देता है।
वह प्रयास करना छोड़ देता है।

वह सोचता है कि सब कुछ ऊपर वाला कर देगा।
ऐसा विश्वास मनुष्य को शक्तिशाली नहीं, निर्बल बना देता है।

सच्चा मार्ग इन दोनों के संतुलन में है।
इतना आत्मविश्वास हो कि तुम संघर्ष कर सको…
और इतनी ईश्वर-भक्ति हो कि सफलता पर अहंकार न आए।
इतना भरोसा स्वयं पर हो कि तुम कठिन रास्तों पर चल सको…
और इतना भरोसा ईश्वर पर हो कि अंधेरे समय में भी तुम्हारा साहस न टूटे।

जब ये दोनों विश्वास एक साथ जागते हैं, तब मनुष्य के भीतर एक अद्भुत शक्ति जन्म लेती है।
फिर बाधाएँ बड़ी नहीं लगतीं, असफलताएँ स्थायी नहीं लगतीं, और दुनिया की नकारात्मकता उसे रोक नहीं पाती।
वह हर हार से सीखता है, हर चोट से मजबूत होता है, हर विश्वासघात से समझदार बनता है।
फिर वह लोगों के बदल जाने से नहीं टूटता, क्योंकि उसका आधार लोगों पर नहीं, स्वयं पर और ईश्वर पर टिका होता है।
यकीन मानिए…
जिस दिन आपने खुद पर विश्वास करना शुरू कर दिया,
जिस दिन आपने हर परिस्थिति में ईश्वर की उपस्थिति को महसूस करना शुरू कर दिया,
उस दिन से आपका जीवन बदलना शुरू हो जाएगा।
फिर रास्ते खुद बनेंगे।
असंभव दिखने वाले कार्य संभव होने लगेंगे।
असफलताएँ आपके सामने घुटने टेक देंगी।
और दुनिया की कोई ताकत आपको रोक नहीं पाएगी।
क्योंकि जिस व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास की अग्नि और ईश्वर पर विश्वास का प्रकाश एक साथ जल उठे…
वह वास्तव में अजेय बन जाता है।
वह Unstoppable बन जाता

महंत आनंद स्वामी
कृष्ण मंदिर गीता धाम...

18/05/2026

अगर व्यक्ति व्यर्थ की राजनीति से दूर रहकर सीधा-साधा जीवन जिए तो यह बहुत अच्छा है।
लेकिन गांव में रहकर ऐसा संभव ही नहीं..
क्योंकि यदि आप गांव में निष्पक्ष और तटस्थ रहकर जीवन जीना चाहते हो तो आपके खिलाफ साजिशें होना शुरू हो जाएंगी
और आप अकेले पड़ जाओगे

वरना इस बात में कोई शक नहीं कि इलेक्शन के समय जो विचार उचित लगे उसे विचारधारा को वोट करके बाद में किसी चीज का जिक्र ना किया जाए,
आराम से रहा जाए

पर गांव के दुष्ट लोग आपको आराम से रहने ही नहीं देंगे, आपके खिलाफ ग्रुप बनाएंगे
और आप भी इस दलदल में धसते चले जाएंगे
यही माहौल होता है अक्सर गांव का।

महंत आनंद स्वामी
कृष्ण मंदिर गीता धाम

14/05/2026

राजकुमार भाटी के ब्राह्मण विरोधी बयान की पूरी समीक्षा यदि की जाए तो बहुत सारी चीज सामने आती हैं

लेकिन फिर भी सद्भाव जरूरी है
राष्ट्रहित इसी में है कि हर चीज को छोड़कर आगे बढ़ा जाए

एक सन्तप्रात: काल भ्रमण हेतुसमुद्र के तट पर पहुँचे..नदी के तट परउन्होने एक पुरुष को देखा जो एक स्त्री की गोद में सर रख क...
12/05/2026

एक सन्त
प्रात: काल भ्रमण हेतु
समुद्र के तट पर पहुँचे..

नदी के तट पर
उन्होने एक पुरुष को देखा जो एक स्त्री की गोद में सर रख कर सोया हुआ था.

पास में शराब की खाली बोतल पड़ी हुई थी.*
*सन्त बहुत दु:खी हुए.

उन्होने विचार किया कि ये मनुष्य कितना तामसिक और विलासी है, जो प्रात:काल शराब सेवन करके स्त्री की गोद में सर रख कर प्रेमालाप कर रहा है.

थोड़ी देर बाद नदी से बचाओ, बचाओ की आवाज आई,

सन्त ने देखा एक मनुष्य नदी में डूब रहा है,
मगर स्वयं तैरना नहीं आने के कारण सन्त देखते रहने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे.

स्त्री की गोद में सिर रख कर सोया हुआ व्यक्ति उठा और डूबने वाले को बचाने हेतु पानी में कूद गया.

थोड़ी देर में अपने प्राणों की बाजी लगाकर उसने डूबने वाले को बचा लिया और किनारे ले आया.

सन्त विचार में पड़ गए की इस व्यक्ति को बुरा कहें या भला.

वो उसके पास गए और बोले भाई तुम कौन हो, और यहाँ क्या कर रहे हो...?

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया : —

मैं एक किसान नदी किनारे सब्जियां उगता हूँ

मेरी माँ मुझे लेने के लिए आई थी और साथ में(घर में कोई दूसरा बर्तन नहीं होने पर)इस मदिरा की बोतल में पानी ले आई.

कई दिनों की मेहनत से मैं थका हुआ था
और भोर के सुहावने वातावरण में ये पानी पी कर थकान कम करने माँ की गोद में सिर रख कर ऐसे ही सो गया.

सन्त की आँखों में आँसू आ गए कि मैं कैसा पातक मनुष्य हूँ, जो देखा उसके बारे में
मैंने गलत विचार किया जबकि वास्तविकता अलग थी.

कोई भी बात जो हम देखते हैं, हमेशा जैसी दिखती है वैसी नहीं होती है उसका एक दूसरा पहलू भी हो सकता है.

किसी के प्रति
कोई निर्णय लेने से पहले
सौ बार सोचें और तब फैसला करें.

क्योंकि हमेशा आंखों देखी बात भी सच्ची नहीं होती
कुछ चीज हमारा दिमाग गढ़ लेता है

इसलिए हर चीज में नकारात्मक पहलू देखने की बजाय यह सोचें कि उसमें भी कुछ अच्छी चीज की गुंजाइश हो सकती है

हरिॐ हरे कृष्ण
महंत आनंद स्वामी
कृष्ण मंदिर गीता धाम

श्री कृष्ण मंदिर गीता धाम खोसपुरा में हुई चोरी के विषय में हमने 8/5/2026 अज्ञात चोरों के खिलाफ थाने में एफआईआर कराई थी ।...
09/05/2026

श्री कृष्ण मंदिर गीता धाम खोसपुरा में हुई चोरी के विषय में हमने 8/5/2026 अज्ञात चोरों के खिलाफ थाने में एफआईआर कराई थी ।

जिसकी जांच के लिए इंस्पेक्टर प्रदीप कुमार जी श्री कृष्ण मंदिर गीता धाम आए ,

और उन्होंने अच्छे से हर चीज की जांच पड़ताल की।

प्रदीप कुमार जी मुझे बहुत अच्छे स्वभाव के और धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति लगे...

उन्होंने शीघ्रता पूर्वक इस मामले के निस्तारण का आश्वासन दिया है ।

थाना प्रभारी नकुडऔर यहां आए निरीक्षक प्रदीप कुमार जी का व्यवहार और उनकी कार्यशैली बहुत प्रभावित करने वाली लगी मुझे...

यह सारी चीजें पुलिस के अच्छे स्वरूप को दर्शाती हैं।

जिसे देखकर अच्छा लगता है।

मुझे यकीन है कि शीघ्रतापूर्वक पुलिस इस मामले का निस्तारण कर लेगी ...

महंत आनंद स्वामी
कृष्ण मंदिर गीता धाम
ग्राम खोसपुरा






08/05/2026

श्री कृष्ण मंदिर गीता धाम में 7/8 - 5-26 को दान पत्र तोड़कर चोरी हो गई है

यह तीसरी बार की घटना है
अबकी बार कुछ ज्यादा रुपए चोरी हुए हैं

यह चोरी निश्चित रूप से हिंदुओं के द्वारा ही की गई है
अगर यहां कर मुसलमान होते तो अब तक धर्म खतरे में आ चुका होता...

दिक्कत यह है कि हम बुराई का नहीं धर्म या जाति का विरोध करते हैं

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