18/07/2025
योग दर्शन में महर्षि पतंजलि ईश्वर की परिभाषा इस तरह लिखते हैं -
'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुष विशेष ईश्वरः।
अर्थात- क्लेश, कर्म, विपाक और आशय- इन चारों से अपरामष्ट- जो संबंधित नहीं है वही पुरुष विशेष ईश्वर है। कहने का आशय यह है कि जो बंधन में है और जो मुक्त हो गया है वह पुरुष ईश्वर नहीं है, बल्कि ईश्वर न कभी बंधन में था, न है और न रहेगा।
लेकिन ईश्वर को हम लोग क्यों जाने, क्यों माने, क्यों देखें? इससे हमें क्या मिलेगा? क्योंकि मनुष्य कोई भी काम बिना लाभ का नहीं करता, इससे हमें क्या लाभ हैं यदि हम नहीं जानते तो ईश्वर की स्तुति, प्राथना, उपासना हम नहीं कर सकते
यजुर्वेद के 31वें अध्याय में लिखा है
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।। ―(यजु० ३१/१८)
अर्थात्― मैं उस प्रभु को जानूँ जो सबसे महान् है, जो करोड़ों सूर्यों के समान देदीप्यमान है, जिसमें अविद्या और अन्धकार का लेश भी नहीं है। उसी परमात्मा को जानकर मनुष्य दुःखों से, संसाररुपी मृत्यु-सागर से पार उतरता है, मोक्ष-प्राप्ति का और कोई उपाय नहीं है।
तो जिसे जानने से आपका सारा दुःख दूर हो जाए तो क्या हम उस अभिनाशी परमेश्वर को न जाने
फिर प्रश्न उठता है उसे कौन जान और देख सकता है
यजुर्वेद के 31वें अध्याय में लिखा है
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातम् अग्रतः । तेन देवा ऽ अयजन्त साध्या ऽ ऋषयश् च ये ॥यजुर्वेदः- ३१/९
अर्थात: उस ईश्वर को जो अन्नत काल से जिसे सभी लोग पूजते हे सदा ही, उसे देवता, साधक और ऋषि ही जान सकते हैं देख सकते है|
फिर प्रश्न उठता है देवता आदि हम बने कैसे
इसका उतर है आष्टांग योग से यम, नियम आदि
यह एक तरीका है उसे जानने का उस निराकार, सर्वशक्तिमान, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक सत्यचितानन्द, नित्य, पवित्र, अनादि, अनुपम, दयालु, और सृष्टिकर्ता को जानने कि
साधक/नवीन ऋषि
डॉ. रतीश चंद्र मिश्र 🙏