14/01/2025
Maths By Vikas Bansal Sir
learn with playing games...
14/01/2025
*मुंशी प्रेमचंद जी की एक "सुंदर कविता", जिसके एक-एक शब्द को, बार-बार "पढ़ने" को "मन करता" है-_*
ख्वाहिश नहीं, मुझे
मशहूर होने की,"
_आप मुझे "पहचानते" हो,_
_बस इतना ही "काफी" है।_😇
_अच्छे ने अच्छा और_
_बुरे ने बुरा "जाना" मुझे,_
_जिसकी जितनी "जरूरत" थी_
_उसने उतना ही "पहचाना "मुझे!_
_जिन्दगी का "फलसफा" भी_
_कितना अजीब है,_
_"शामें "कटती नहीं और_
-"साल" गुजरते चले जा रहे हैं!_
_एक अजीब सी_
_'दौड़' है ये जिन्दगी,_
-"जीत" जाओ तो कई_
-अपने "पीछे छूट" जाते हैं और_
_हार जाओ तो,_
_अपने ही "पीछे छोड़ "जाते हैं!_😥
_बैठ जाता हूँ_
_मिट्टी पे अक्सर,_
_मुझे अपनी_
_"औकात" अच्छी लगती है।_
_मैंने समंदर से_
_"सीखा "है जीने का तरीका,_
_चुपचाप से "बहना "और_
_अपनी "मौज" में रहना।_
_ऐसा नहीं कि मुझमें_
_कोई "ऐब "नहीं है,_
_पर सच कहता हूँ_
_मुझमें कोई "फरेब" नहीं है।_
_जल जाते हैं मेरे "अंदाज" से_,
_मेरे "दुश्मन",_
-एक मुद्दत से मैंने_
_न तो "मोहब्बत बदली"_
_और न ही "दोस्त बदले "हैं।_
_एक "घड़ी" खरीदकर_,
_हाथ में क्या बाँध ली,_
_"वक्त" पीछे ही_
_पड़ गया मेरे!_😓
_सोचा था घर बनाकर_
_बैठूँगा "सुकून" से,_
-पर घर की जरूरतों ने_
_"मुसाफिर" बना डाला मुझे!_
_"सुकून" की बात मत कर-
-बचपन वाला, "इतवार" अब नहीं आता!_😓😥
_जीवन की "भागदौड़" में_
_क्यूँ वक्त के साथ, "रंगत "खो जाती है ?_
-हँसती-खेलती जिन्दगी भी_
_आम हो जाती है!_😢
_एक सबेरा था_
_जब "हँसकर "उठते थे हम,_😊
-और आज कई बार, बिना मुस्कुराए_
_ही "शाम" हो जाती है!_😓
_कितने "दूर" निकल गए_
_रिश्तों को निभाते-निभाते,_😘
_खुद को "खो" दिया हमने_
_अपनों को "पाते-पाते"।_😥
_लोग कहते हैं_
_हम "मुस्कुराते "बहुत हैं,_😊
_और हम थक गए_,
_"दर्द छुपाते-छुपाते"!😥😥
_खुश हूँ और सबको_
_"खुश "रखता हूँ,_
_ *"लापरवाह" हूँ ख़ुद के लिए_*
*-मगर सबकी "परवाह" करता हूँ।_😇🙏*
*_मालूम है_*
*कोई मोल नहीं है "मेरा" फिर भी_*
*कुछ "अनमोल" लोगों से_*
*-"रिश्ते" रखता हूँ।*
🟥🌷🟩
*शिक्षक* हो़ना है़ *सरल* ज़ितना
*गुरु* होना है *उ़तना* ही मुश्कि़ल
शिक्षक़ तो ब़न सक़ते है हम सभी
गुरु की महिमा सब़ सार्थक क़र सक़ते नही
ऩही छ़लक़ता क़भी ज़िनके सब्र क़ा पैमाना
अत्यत विष़म परिस्थतियो मे भी
वो चाह़ते है शिष्य क़ो सब़ कुछ सिख़ाना
नही टूटने देते है वो हौसला क़भी
काटो भ़री राह से गुज़रक़र भी
सिखाते है मजिल क़ो क़िस तरह है पाना
ज़िनके होते हुए हम नही होते क़भी निराश
अधेरे मे देक़र जो अपना ज्ञान क़ा हमे प्रकाश
क़रते है रोशन हमारा ज़ीवन
ब़िना किसी स्वार्थ ब़िना क़िसी आस
है वही सच्चे अर्थो मे गुरु
जिनक़े ब़िना नही मिट सक़ती
हम सब़के ज्ञान और जिज्ञासा की प्यास
*ध्यानमूलं गुरुर्मूर्तिः*
*पूजामूलं गुरुरपदम् ।*
*मन्त्रमूलं गुरुवाक्यां*
*मोक्षमूलं गुरुकृपा ॥*
आप सब को गुरुपूर्णिमा की बहुत बहुत बधाई ।
शुभ रविवार ...🙏😊🙏
मनुष्य द्वारा दूसरों से किया व्यवहार अपने स्वयं के साथ किये का प्रतिबिंब ही होता है।
10/06/2024
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