25/08/2026
🔴 वीरांगना अंजलाई अम्माल मुरुगप्पन पदाय्याची
अंजलाई अम्माल मुरुगप्पन तमिलनाडु के कुड्डालोर की एक प्रसिद्ध भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक सुधारक और राजनेता थीं, जिन्हें महात्मा गांधी ने "दक्षिण भारत की झांसी की रानी" कहा था।
स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्होंने साढ़े सात साल जेल में बिताए। वह तमिलनाडु राज्य विधानमंडल के लिए चुनी जाने वाली शुरुआती महिलाओं में से थीं, और 1937 और 1946 में अपनी चुनावी जीत के बाद कांग्रेस विधायक के रूप में कार्य किया।
आरंभिक जीवन -
1 जून 1890 को कदलूर (तमिलनाडु) के छोटे से शहर मुथु नगर में जन्मी अंजलाई अम्मल एक सामाजिक सुधारक एवं स्वतंत्रता सेनानी थीं। उनका जन्म बहुत ही साधारण परिवार में हुआ था। उनकी पढ़ाई कक्षा पांचवी तक ही हो पाई थीं। उनके पति एक मैगज़ीन में ऐजेंट थे। अंजलाई अम्मल ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत ‘असहयोग आंदोलन’ से की थी यही कारण है कि अंजलाई अम्मल को 1921 में ‘असहयोग आंदोलन’ में भाग लेनेवाली पहली दक्षिण भारतीय महिला होने का गौरव प्राप्त है।
उन्होंने 1921 में असहयोग आंदोलन से अपने राजनीतिक सक्रियता की शुरुआत की और बाद में नील प्रतिमा सत्याग्रह , नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया । उनका साहस इतना प्रसिद्ध था कि महात्मा गांधी ने उन्हें " दक्षिण भारत की झांसी रानी " कहा था। जब गांधीजी अंजलाई अम्माल से मिलने कदलूर आए, तो ब्रिटिश सरकार ने उनकी मुलाकात पर रोक लगा दी। लेकिन अंजलाई अम्माल ने बुर्का पहनकर उनसे मिलने का प्रबंध किया । उन्होंने अपनी नौ वर्षीय बेटी को भी विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया, जिसका नाम गांधीजी ने स्वयं लीलावती रखा था।
स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान -
जेल की सजा -
देश की आजादी की लड़ाई में उन्होंने कुल साढ़े सात साल जेल में बिताए।
नील की प्रतिमा का विरोध -
वर्ष 1927 में चेन्नई में अंग्रेज अधिकारी नील की प्रतिमा हटाने के आंदोलन में उन्होंने और उनके परिवार ने हिस्सा लिया, जिसके चलते उनकी बेटी और पति को भी जेल जाना पड़ा।
महात्मा गांधी से भेंट -
वर्ष 1934 में जब अंग्रेजों ने उन्हें गांधीजी से मिलने से रोका, तब वह बुर्का पहनकर और घोड़े की गाड़ी से उनसे मिलने पहुँचीं। उनकी इसी बहादुरी से प्रभावित होकर गांधीजी ने उन्हें 'दक्षिण भारत की झांसी की रानी' की उपाधि दी।
विदेशी वस्तुओं का त्याग -
1930 में, अंजलाई अम्माल को मद्रास में गोडाउन स्ट्रीट पर विदेशी सामानों के विरोध में दुकानों पर धरना देने के लिए गिरफ्तार किया गया था। अपनी अदालत की सुनवाई में, उन्होंने अपना बचाव किया, अपराध से इनकार किया और पुलिस पर प्रदर्शनकारियों के साथ कठोर व्यवहार करने का आरोप लगाया।
1931 में, उन्होंने अखिल भारतीय महिला कांग्रेस सम्मेलन की अध्यक्षता की। 1932 में, उन्होंने एक और संघर्ष में भाग लिया जिसके लिए उन्हें वेल्लोर जेल भेज दिया गया। वेल्लोर जेल भेजे जाने के समय वे गर्भवती थीं। प्रसव के कारण उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। अपने बेटे के जन्म के दो सप्ताह के भीतर ही उन्हें वापस वेल्लोर जेल भेज दिया गया। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, वे तीन बार तमिलनाडु विधानसभा की सदस्य चुनी गईं ।
निधन -
जीवन के अंतिम समय तक वह सामाजिक सुधार और राजनीति में सक्रिय रहीं।
मृत्यु 20 फरवरी 1961 को हुई थी।
ऐसी महान वीरांगना अंजलाई अम्माल को शत-शत नमन-वंदन 🙏🇮🇳