26/05/2026
🔴 क्रांतिकारी अतुल कृष्ण घोष
जन्म - 1890
मृत्यु - 4 मई 1966
प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी थे। वे प्रसिद्ध 'अनुशीलन समिति' के सदस्य और 'युगांतर दल' के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने महान क्रांतिकारी बाघा जतिन के साथ मिलकर स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
एक भारतीय क्रांतिकारी, अनुशीलन समिति के सदस्य और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हिंदू जर्मन षड्यंत्र में शामिल जुगंतर आंदोलन के नेता थे।
प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी सफर
जन्म - 1890 में बंगाल में हुआ था।
अतुलकृष्ण का जन्म 1890 में बंगाल के नदिया जिले के कुश्तिया में स्थित एतामामपुर-जादुबोयरा गाँव में एक बंगाली हिंदू मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता तारेष चंद्र और बिनोदिनी देवी थे। इस दंपति के छह बच्चे थे। कुमारखाली में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने 1909 में कलकत्ता हिंदू स्कूल से प्रवेश परीक्षा, 1911 में स्कॉटिश चर्च कॉलेज से इंटरमीडिएट और 1913 में बरहामपुर के कृष्णनाथ कॉलेज से बीएससी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में एमएससी की पढ़ाई शुरू की, लेकिन राजनीतिक आंदोलन में सक्रिय होने के कारण उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया।
युगांतर और अनुशीलन समिति: वे बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारी संगठनों से गहराई से जुड़े हुए थे। जब बाघा जतिन क्रांतिकारी गतिविधियों के संगठन के लिए बाहर जाते थे, तब अतुलकृष्ण कलकत्ता (अब कोलकाता) के प्रभार और गतिविधियों को संभालते थे।
सशस्त्र आंदोलन -
सन 1906 में वे अपने गाँव के साथी नलिनीकान्त कर के साथ यतीन्द्रनाथ मुखर्जी के अनुयायी बन गए। वे दोनों स्थानीय अनुशीलन समिति में शामिल हो गए। डब्ल्यू. सेली की रिपोर्ट के अनुसार, अतुलकृष्ण घोष और नलिनिकांत कर दोनों ने खतरनाक महत्वपूर्ण बंदूकें चलाना सीखा। (पृष्ठ 23) अतुल ने पातालडांगा में अनुशीलन समिति से आत्मरक्षा के लिए विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया।
जितेंद्रनाथ मुखर्जी के साथ क्रांतिकारी कार्रवाई -
कोलकाता की पूरी जिम्मेदारी अतुलकृष्ण घोष को सौंपकर और पुलिस को ठेंगा दिखाते हुए यतीन्द्र अपने पैतृक घर झेनाइदाह पहुँच गये। वहाँ उनने जेस्सोर-झेनाइदाह रेलवे लाइन के निर्माण के लिए ठेकेदारी का व्यवसाय शुरू किया। इस व्यवसाय के चलते वह साइकिल या घोड़े पर सवार होकर जिले-जिले घूमते रहे और अथक परिश्रम से गुप्त संगठन की शाखाएँ स्थापित करता रहा।
हिंदू-जर्मन षड्यंत्र -
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, वे विदेशी हथियारों की सहायता से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए 'हिंदू-जर्मन षड्यंत्र' (Hindu-German Conspiracy) में शामिल थे।
भारत-जर्मन षड्यंत्र की विफलता और जतिन की असामयिक मृत्यु के बाद, निराश अतुल और अन्य जुगंतर नेता 1915 में भूमिगत हो गए और लगभग सात वर्षों तक भूमिगत ही रहे। इसके बावजूद, कई वर्षों तक क्रांतिकारियों ने विद्रोह के लिए हथियारों की तस्करी की उम्मीद बनाए रखी।
सक्रिय राजनीति से दूर -
अतुल 1921 में सार्वजनिक रूप से सामने आए। लेकिन उनके दादा (जतिन मुखर्जी) की वीरतापूर्ण मृत्यु ने उनके क्रांतिकारी उत्साह को समाप्त कर दिया और उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़ दी।
जब उनसे जतिंद्रनाथ की अपार शक्ति के स्रोत के बारे में पूछा गया, तो अतुल ने उत्तर दिया: "वे एक बहुत ही कुशल पहलवान और सर्वांगीण खिलाड़ी थे। लेकिन उनकी विशेषता उनकी आत्मिक शक्ति और एकाग्रता की क्षमता थी। वे अपनी सारी ऊर्जा अपने शरीर के एक ही हिस्से, जैसे कि अपनी मुट्ठी पर केंद्रित कर सकते थे। उस मुट्ठी का एक ही प्रहार न जाने कितने वोल्ट के विद्युत आवेश के बराबर था!"
स्वतंत्रता के बाद की भूमिका -
अतुलकृष्ण ने देश की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों द्वारा दी गई भारी यातनाएं सही।
उन्होंने अपनी पत्नी भारती बोस के कहने पर अपने परिवार के सभी आभूषण आजाद हिंद फौज के लिए दान कर दिए थे।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, उन्होंने किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता या संपत्ति स्वीकार नहीं की और राजनीति से दूर रहकर वंचितों के कल्याण और उत्थान के लिए जीवन समर्पित कर दिया।
निधन -
इस महान क्रांतिकारी अतुल का निधन 4 मई 1966 को कोलकाता स्थित उनके आवास पर शांतिपूर्वक हो गया।
एक श्रद्धांजलि
उनके युवा सहयोगी भूपेंद्रकुमार दत्ता ने याद करते हुए कहा: "स्वभाविक रूप से उदार विचारों वाले अतुलकृष्ण जाति और धार्मिक भेदभाव से घृणा करते थे। राजनीतिक क्षेत्र में लोकतंत्र और सामाजिक क्षेत्र में न्याय ही उनके लिए सर्वोपरि थे। अंतिम वर्षों में उन्होंने आध्यात्मिक जीवन की ओर रुख किया।"
आजादी के गुमनाम नायक अमर क्रान्तिकारी अतुल कृष्ण घोष पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन -वंदन 🙏🇮🇳
25/05/2026
🔴 स्वतंत्रता सेनानी कृष्ण चंद्र गजपति
जन्म - 26 अप्रैल 1892
मृत्यु - 25 मई 1974
वे एक शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और गरीबों के हिमायती थे। उन्होंने सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए परलाखेमुंडी में एक स्थायी रंगमंच की स्थापना की।
जन्म और आरंभिक जीवन -
उनका जन्म 26 अप्रैल 1892 को परलाखेमुंडी के जमींदार, गौर चंद्र गजपति और उनकी पत्नी राधामणि देवी के यहाँ हुआ था। वे भारतीय इतिहास के राजवंशों में से एक पूर्वी गंग वंश से सम्बंधित थे। उन्हें महाराजा सर कृष्ण चन्द्र गजपति नारायण देव के नाम से भी जाना जाता है।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पारालाखेमुंडी के स्थानीय महाराजा हाई स्कूल में प्राप्त की और फिर उच्च अध्ययन के लिए मद्रास के न्यूगटन कॉलेज चले गए। मद्रास में अपनी पढ़ाई के दौरान , उन्होंने अपने पिता को खो दिया। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वे परलाखेमुंडी लौट आए और वर्ष 1913 में खरसावां राज्य की राजकुमारी से शादी कर ली । उसी वर्ष वह 26 अप्रैल 1913 को अपनी संपत्ति के अगले जमींदार के रूप में सफल हुए।
क्रांतिकारी गतिविधियां -
गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी (1930): उन्होंने लंदन में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया, जहाँ उन्होंने भाषा और एकरूपता के आधार पर ओडिशा के लिए एक अलग प्रांत बनाने की पुरजोर वकालत की।
संवैधानिक संघर्ष: उन्होंने साइमन कमीशन के सामने ओडिया लोगों के अधिकारों के लिए सशक्त दलीलें पेश कीं।
ओडिशा राज्य की मांग -
महाराजा कृष्ण चंद्र गजपति, उत्कल गौरव मधुसूदन दास , उत्कलमणि गोपबंधु दास , फकीर मोहन सेनापति और उत्कल सम्मिलानी के अन्य प्रतिष्ठित सदस्यों ने तत्कालीन उड़ीसा-बिहार-बंगाल प्रांत में उड़िया भाषी क्षेत्रों के लिए एक साथ एक अलग ओडिशा राज्य की मांग की।
अंत में, इस उत्कल सम्मेलन के प्रयासों से , 1 अप्रैल 1936 को ओडिशा के अलग राज्य का गठन किया गया था।
उत्कल दिवस के रूप में मनाते हैं -
उस दिन से, 1 अप्रैल को ओडिया लोग उत्कल दिवस के रूप में मनाते हैं। विजागपट्टम जिले में उनकी संपत्ति को दो में विभाजित किया गया था - राजधानी और प्रमुख भाग उड़ीसा के अंतर्गत आते थे जबकि शेष तेलुगु-बहुसंख्यक क्षेत्र मद्रास प्रेसीडेंसी में बने रहे। 1937 में, ओडिशा के पहले राज्यपाल, सर जॉन ऑस्टिन हबबैक ने कृष्ण चंद्र को कैबिनेट बनाने के लिए आमंत्रित किया। वह 1 अप्रैल 1937 से 18 जुलाई 1937 तक ओडिशा के पहले प्रधान मंत्री बने, 24 नवंबर 1941 से 30 जून 1944 तक दूसरी बार फिर से चुने गए।
स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय अस्पतालों आदि का निर्माण -
उन्होंने उत्कल विश्वविद्यालय , एससीबी मेडिकल कॉलेज , विद्याधरपुर, कटक में प्रसिद्ध केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान और बाद में बरहामपुर में एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस तरह उन्होंने कई अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों, औद्योगिक संस्थानों, आधुनिक कृषि फार्मों की स्थापना की और अपने कृषि प्रधान मूल तालुक में रिकॉर्ड संख्या में 1281 सिंचाई सागर या पानी के टैंक प्रदान किए।
इसी कारण अविभाजित गंजम जिले को 'ओडिशा का धान का कटोरा' की उपाधि दी गई। गजपति के तहत, हजारों गरीब और मेधावी छात्रों को मानविकी, विज्ञान, कृषि, चिकित्सा और इंजीनियरिंग में छात्रवृत्ति प्रदान की गई।
प्रथम विश्व युद्ध में कप्तान के रूप में कार्य किया -
कृष्ण चंद्र ने प्रथम विश्व युद्ध में एक कप्तान के रूप में कार्य किया । उन्हें 1920 में तत्कालीन वायसराय और भारत के गवर्नर जनरल से एक दुर्लभ सनद प्राप्त हुआ, जो कि महान युद्ध के दौरान भारतीय सेना को प्रदान की गई उनकी सेवाओं और प्रशंसा के प्रतीक के रूप में थी। वह लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता में कृषि पर रॉयल कमीशन के सदस्य थे। वह मद्रास विधान परिषद के सदस्य भी थे।
संविधान सभा के सदस्य -
वे भारत की संविधान सभा के सदस्य थे और देश के प्रशासनिक ढांचे को आकार देने में योगदान दिया।
सम्मान और विरासत -
उन्हें उत्कल विश्वविद्यालय और बरहामपुर विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था, और 1946 के नए साल के सम्मान में उन्हें नाइट कमांडर ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ द इंडियन एम्पायर (KCIE) नियुक्त किया गया था। कृष्ण चन्द्र गजपति भारतीय संविधान सभा के सदस्य भी रहे।
निधन -
25 मई 1974 को 82 वर्ष की आयु में कृष्ण चंद्र का निधन हो गया। ओडिशा सरकार द्वारा उनका राजकीय अंतिम संस्कार किया गया और परलाखेमुंडी में पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।
महाराजा कृष्ण चन्द्र गजपति नारायण देव आधुनिक ओडिशा के निर्माता और एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने न केवल भारत की आजादी के लिए संघर्ष किया, बल्कि 1 अप्रैल 1936 को अलग ओडिशा राज्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, ऐसे महान क्रांतिकारी को उनकी जयंती पर शत-शत नमन-वंदन 🙏🇮🇳
24/05/2026
🔴 स्वतंत्रता सेनानी और महिला अधिकारों की पैरोकार (हिमायती) रेणुका रे
जन्म -4 जनवरी 1904
मृत्यु -11 अप्रैल 1997
1946 से 1949 के बीच जब भारत का संविधान तैयार किया जा रहा था, तब संविधान सभा में कई दिग्गज राजनीतिक हस्तियों का दबदबा था। इनमें मात्र 15 महिलाओं का एक छोटा समूह भी शामिल था। इस समूह में पश्चिम बंगाल की प्रतिनिधि रेणुका रे थीं , जिन्होंने समानता, धर्मनिरपेक्षता, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर सशक्त आवाज उठाई। उनके विचारों में यह दृढ़ विश्वास झलकता था कि स्वतंत्रता से वास्तविक सामाजिक परिवर्तन आना चाहिए, विशेषकर वंचितों के लिए। इसी कारण वे भारत में सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के विचार को व्यापक बनाने के लिए काम करने वाले शुरुआती अग्रदूतों में से एक थीं।
“ हम न तो कभी हिंदू वर्चस्व के पक्ष में रहे हैं और न ही आज हैं; हम यह नहीं चाहते कि हिंदू एक धार्मिक समुदाय के रूप में किसी अन्य हित से ऊपर हों। लेकिन हम यह जरूर चाहते हैं कि भारत के हित सर्वोपरि हों, और किसी भी विशेष समुदाय के हित आड़े न आएं, चाहे वह बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय, ” रेणुका राय ने संविधान सभा में धार्मिक अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर यह बात कही।
जन्म और आरंभिक जीवन -
1904 में ब्रिटिश भारत की बंगाल प्रेसीडेंसी में जन्मीं रेणुका रे एक राजनीतिक और सामाजिक रूप से सक्रिय परिवार में पली-बढ़ीं। हालाँकि उनका जन्म औपनिवेशिक निष्ठाओं वाले परिवार में हुआ था, लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे गांधीवादी आदर्शों को अपनाया और भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता विकसित की। उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए विदेश जाकर लंदन के केंसिंग्टन स्कूल और बाद में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्ययन किया, जहाँ उन्हें सामाजिक सुधार और सार्वजनिक नीति पर नए विचारों से अवगत कराया गया।
महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार -
भारत लौटने के बाद, रेणुका रे सार्वजनिक जीवन और सामाजिक सुधार में गहराई से शामिल हो गईं। अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की सदस्य के रूप में , उन्होंने महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों और कानूनी समानता के लिए अभियान चलाया। संगठन की कानूनी सचिव के रूप में, उन्होंने भारतीय महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली कानूनी बाधाओं पर एक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें व्यक्तिगत कानूनों में असमानताओं को उजागर किया गया और यह तर्क दिया गया कि महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार के लिए कानूनी सुधार आवश्यक है। उन्होंने एक समान व्यक्तिगत कानून ढांचे के विचार का लगातार समर्थन किया और उनका मानना था कि सार्थक स्वतंत्रता के लिए कानूनी समानता आवश्यक है।
उन्होंने शारदा विधेयक का विरोध किया था जिसमें लड़कियों की शादी की उम्र 14 साल और लड़कों की 18 साल तय की गई थी। रेणुका रे ने एक समान व्यक्तिगत कानूनी संहिता के लिए लड़ाई लड़ी, यह दावा करते हुए कि भारतीय महिलाओं की स्थिति दुनिया में सबसे अन्यायपूर्ण है।
क्रांतिकारी गतिविधियां -
क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं का प्रवेश और भागीदारी, तथा उसमें उनका राजनीतिक विकास, केवल उनके सशक्त व्यक्तित्व के कारण ही संभव हो सका। क्रांतिकारी आंदोलन ने ही महिलाओं को इतनी दृढ़ और संकल्पित पहचान हासिल करने में मदद की। रेणुका अपनी कई कहानियों में इस विकास प्रक्रिया का जीवंत चित्रण करती हैं। साथ ही, वे आंदोलन में मौजूद बाधाओं और सीमाओं तथा उन्हें दूर करने के लिए महिलाओं द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर भी ईमानदारी से चर्चा करती हैं।
क्रांतिकारी आंदोलन ने महिलाओं के लिए क्या किया है, यह एक अलग सवाल नहीं है। इसके साथ ही यह सवाल भी जुड़ा है कि आंदोलन में शामिल होने के बाद महिलाओं ने—खासकर आदिवासी और श्रमिक वर्ग की महिलाओं ने, जो लंबे समय से उत्पीड़न का शिकार रही हैं—आंदोलन में क्या योगदान दिया है। इन दोनों सवालों पर एक साथ विचार करने से ही "महिलाएं और क्रांतिकारी आंदोलन" विषय पर चर्चा पूरी हो सकती है। रेणुका ने स्वयं इस पहलू को समझा है। इसीलिए, जब हम क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल महिलाओं के बारे में उनकी कहानियां पढ़ते हैं, तो हमें एहसास होता है कि उन्होंने आंदोलन से बहुत कुछ सीखा, साथ ही साथ इसमें सूक्ष्म अंतर्दृष्टि और गहन दृष्टिकोण भी जोड़े।
संविधान सभा की सदस्या -
संविधान सभा में कई दिग्गज राजनीतिक हस्तियों का दबदबा था।
पश्चिम बंगाल की प्रतिनिधि रेणुका रे थीं , जिन्होंने समानता, धर्मनिरपेक्षता, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर सशक्त आवाज उठाई। उनके विचारों में यह दृढ़ विश्वास झलकता था कि स्वतंत्रता से वास्तविक सामाजिक परिवर्तन आना चाहिए, विशेषकर वंचितों के लिए। इसी कारण वे भारत में सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के विचार को व्यापक बनाने के लिए काम करने वाले शुरुआती अग्रदूतों में से एक थीं।
आज उन्हें याद करना केवल ऐतिहासिक मान्यता का कार्य नहीं है, बल्कि यह एक अनुस्मारक भी है कि जिन संस्थानों पर हम निर्भर हैं, वे भी उन महिलाओं द्वारा आकार दिए गए थे जिनके अमिट योगदान समाज को शांत लेकिन स्थायी तरीकों से प्रभावित करते रहते हैं।
स्वतंत्रता के बाद भी सामाजिक कल्याण के प्रति उनकी निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है , ऐसी महान क्रांतिकारी को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन-वंदन 🙏🇮🇳
23/05/2026
🔴 अमर शहीद महावीर सिंह का बलिदान याद रखेगा हिंदुस्तान
जन्म - 16 सितंबर 1904
मृत्यु - 17 मई 1933
जन्म और आरंभिक जीवन -
उत्तर प्रदेश के एटा जिले के राजा का रामपुर क्षेत्र के शाहपुर टहला गांव में राजपूती परिवार ठाकुर देवी सिंह राठौर के यहां 16 सितंबर 1904 को एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया महावीर। अब यह गांव कासगंज जिले के अंतर्गत आता है। कहते हैं बालक महावीर में अन्याय के खिलाफ लड़ मरने की भावना बचपन से ही कूट कूट कर भरी हुई थी। राजा के रामपुर से प्राथमिक शिक्षा के बाद महावीर सिंह ने एटा के राजकीय इंटर कॉलेज में अध्ययन किया और फिर आगे की पढाई के लिये कानपुर चले गये , जहां डी ए वी कॉलेज में अध्ययन के दौरान इनका क्रांतिकारियों से संपर्क हुआ।
देशभक्ति का वातावरण -
महावीर सिंह का बचपन घर में ही देशभक्ति के माहौल में बीता। कानपुर में क्रान्तिकारियो के सानिध्य से आजादी के लिए कुछ कर गुजरने के जज्बे को नयी राह मिली और ये पूरी तरह अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांतिकारी संघर्ष में कूद पड़े। इनकी गतिविधियों की जानकारी जब इनके पिता देवी सिंह को मिली तो उन्होंने विरोध की जगह अपने पुत्र को देश के लिये बलिदान होने के लिये आशीर्वाद ही दिया।
गौरतलब है कि अनेकों क्रांतिकारी उनके गाँव के घर में कई बार रुके थे। सरदार भगत सिंह तक खुद 3 दिन तक शाहपुर टहला उनके घर में छिपकर रहे थे।
गिरफ्तारी -
काकोरी और सांडर्स कांड के बाद वह अंग्रेज़ों के लिये चुनौती बन गए थे। उन्होंने सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह को लाहौर से निकालने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। 1929 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और अन्य क्रान्तिकारियो के साथ काला पानी की सजा सुनाई गई।
जेल में यातनाएं -
उस दौरान अंडमान जेल में क्रांन्तिकारियों को अनेक यातनाऐं दी जाती थीं। यातनाओं, बदसलूकी और बदइंतजामी के खिलाफ जेल में बंद क्रांतिकारियों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। अंग्रेज़ों ने इनकी भूख हड़ताल को तोड़ने की भरसक कोशिशें कीं लेकिन वह नाकाम रहे। बन्दियों को जबरदस्ती खाना खिलाने का भी प्रयास किया गया , लेकिन उसमें भी गोरे अंग्रेज नाकाम रहे। उन्होंने महावीर सिंह की भी भूख हड़ताल तुड़वाने की बहुत कोशिशें की, उन्हें अनेकों लालच भी दिए, यातनाएं दीं लेकिन वह अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुए। लाख कोशिशों के बावजूद अंग्रेज महावीर सिंह की भूख हड़ताल नहीं तुड़वा सके। अंग्रेज़ों ने फिर जबरदस्ती करके उनके मुँह में खाना ठूंसने की कोशिशें कीं, इसमें भी वो सफल नहीं हो पाए।
अंग्रेजों द्वारा दी गई यातनाओं से मृत्यु -
इस बारे में अनेकों किंवदंतियां हैं। कुछ के अनुसार इसके बाद अंग्रेजों ने नली के द्वारा नाक से उन्हें जबरदस्ती दूध पिलाने की कोशिश की । इस प्रक्रिया में उन्हें जमीन पर गिराकर 8 पुलिसवालों ने पकड़ रखा था। हठी महावीर सिंह राठौड़ ने पूरी जान लगाकर उनका विरोध किया जिससे दूध उनके फेफड़ों में चला गया । नतीजतन इससे तड़प तड़पकर उनकी 17 मई 1933 को मृत्यु हो गई ।
कुछ बंदी क्रांतिकारी कैदियों के द्वारा बाद में दी गयी जानकारी के अनुसार अंग्रेजों द्वारा उनका अनशन तुड़वाने की ख़ातिर जबरन खाना खिलाये जाने से क्रुद्ध होकर बलिष्ठ शरीर के स्वामी महावीर सिंह ने पकड़े सिपाहियों को धक्का देकर जेलर को पकड़ लिया और उसे बीच से चीर दिया। बाद में उन्हें वहीं फांसी दे दी गयी और उनके शव को पत्थरों से बांधकर समुद्र में फेंक दिया।
दुःख की बात है कि महावीर सिंह राठौड़ ऐसे ही एक राजपूत योद्धा थे जिनकी शहादत से आज भी बहुत कम लोग परिचित हैं। उनके परिवार को भी उनकी राष्ट्रभक्ति की कीमत भीषण यातनाओं के रूप में चुकानी पड़ी। अंग्रेज़ों की यातनाओ से तंग आकर उनके परिवार को 9 बार अपने घर ,यहां तक कि गांव को भी छोड़कर जाना पड़ा । आज भी उनका परिवार गुमनामी की जिंदगी जीने को विवश है। ऐसे वीर क्रांतिकारी के परिवार से आजाद भारत की सरकार आज भी मुंह मोड़े हुए है। इससे अधिक शर्मनाक बात और क्या हो सकती है। यह है देश के लिए अपना सर्वस्व होम करने वाले भारत मां के वीर सपूतों की हकीकत। उन्हें सम्मान की बात तो दीगर है, उनके परिजनों की सुध लेने वाला भी कोई नहीं।
हमारा दायित्व है कि हम आजादी की लड़ाई के उन योद्धाओं का स्मरण करें जिन्होंने देश के लिए खुद को बलिदान कर दिया। असलियत में ऐसे वीरों का बलिदान हमारी अमिट धरोहर है जिसे भुलाया नहीं जा सकता। इसके साथ ही धन्य है वह मां जिसने ऐसे वीर सपूत को जन्म दिया। हम सभी इस अवसर पर उस जननी को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं और क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौर उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन-वंदन 🙏🇮🇳
22/05/2026
🔴 स्वतंत्रता संग्राम का अद्भुत एवं अद्वितीय विस्मृत योद्धा – सूबेदार बलदेव तिवारी
“राजा शंकर शाह, रघुनाथ के बलिदान का प्रतिशोध”…..
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अनेक योद्धा हुए, जिनका स्मरण देश आज भी करता है. लेकिन अनेक योद्धा विस्मृत कर दिए गए, गुमनामी में कहीं खो गए। जबलपुर के एक ऐसे विस्मृत महायोद्धा के बारे में बताएंगे, नाम है सूबेदार बलदेव तिवारी। जिनके नाम से ही अंग्रेज अफसर कांपते थे।
सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सेना के साथ उन्होंने अंग्रेजों को खदेड़ा था। जबलपुर की 52वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के सूबेदार बलदेव तिवारी ने अद्भुत एवं अद्वितीय पराक्रम दिखाया था। सूबेदार बलदेव तिवारी ने न केवल राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह के बलिदान का प्रतिशोध लिया, बल्कि ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था।
जन्म और आरंभिक जीवन -
सूबेदार बलदेव तिवारी का जन्म 6 अगस्त, 1819 को हुआ था. 1840 में बलदेव तिवारी ब्रिटिश सेना में सिपाही के रूप में भर्ती हुए थे. शारीरिक कद काठी मजबूत थी और उनका निशाना अचूक था. ब्रिटिश सरकार के लिए कई युद्धों में भाग लेकर अपनी वीरता का लोहा मनवाया था. इसलिए सन् 1854 में उन्हें 52वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री में सूबेदार का पद प्राप्त हुआ था. सन् 1856 से भारत में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम की तैयारियां जोरों पर थीं और जबलपुर उन दिनों राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह के नेतृत्व में मध्यभारत का केंद्र बिंदु था।
स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि -
बात, सन् 1857 की है. जब जबलपुर में स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी। गढ़ा पुरवा में मंडला, सिवनी, नरसिंहपुर, सागर, दमोह सहित मध्यभारत के लगभग सभी जमींदार, मालगुजार के साथ 52 गढ़ों से सेनानी भी मिलने आने लगे थे।
सूबेदार बलदेव तिवारी और उनकी पलटन के साथ जबलपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट क्लार्क सदैव दुर्व्यवहार व अपमान करता था, जिससे सूबेदार बलदेव तिवारी और पलटन विक्षुब्ध रहती थी। इसलिए सूबेदार बलदेव तिवारी ने सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने का मन बना लिया था. जिसके बाद जबलपुर कैंटोनमेंट क्षेत्र से 52वीं नेटिव इन्फेंट्री के सूबेदार बलदेव तिवारी के साथ कई सैनिक राजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथ शाह से मिलने आते थे। राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह ने अंग्रेजों के विरुद्ध शक्तिशाली संगठन तैयार कर लिया था। सभी ने सर्वसम्मति से सूबेदार बलदेव तिवारी को संयुक्त सेना का प्रमुख चुन लिया। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह के साथ सूबेदार बलदेव तिवारी का झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे तथा कुंवर साहब से भी संपर्क था।
स्वतंत्रता संग्राम का आरंभ -
18 सितंबर, 1857 को राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह के बलिदान के बाद मध्यप्रांत के रजवाड़े परिवार एवं जमीदार और मालगुजारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छेड़ दिया। जबलपुर से 52वीं नेटिव इन्फेंट्री के सूबेदार बलदेव तिवारी ने 690 से अधिक सैनिकों को लेकर गढ़ा पुरवा को मुक्त कराकर पाटन के लिए कूच किया। 19 सितंबर, 1857 को बलदेव तिवारी अपनी 52वीं नेटिव इन्फेंट्री के साथ पाटन पहुंच गए और सरकार को अपदस्थ कर स्वतंत्रता का झंडा लहराया व लेफ्टिनेंट मेकग्रिगर को बंदी बना लिया गया। सूबेदार बलदेव तिवारी ने कर्नल जमीसन से जबलपुर में छूटे अपने 10 साथियों को भेजने की मांग की। कर्नल जमीसन ने सभी सैनिकों को इनाम और वेतन बढ़ाने का लालच दिया। साथ ही सूबेदार बलदेव तिवारी को आठ हजार रुपये देने का लालच दिया ताकि मेकग्रिगर को सकुशल वापस लाया जा सके, परंतु कोई लाभ नहीं हुआ।
अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए प्राणोत्सर्ग -
सूबेदार बलदेव तिवारी मेकग्रिगर को लेकर कटंगी पहुंचे और कटंगी को भी जीत लिया। यहां भी स्वतंत्रता का झंडा फहराया। कटंगी में लेफ्टिनेंट मेकग्रिगर ने पलटन में फूट डालने की कोशिश की। इसलिए सूबेदार बलदेव तिवारी ने उसका वध कर दिया। दो माह तक सूबेदार बलदेव तिवारी के नेतृत्व में पाटन और कटंगी में स्वायत्त सत्ता स्थापित रही। परंतु नवंबर में वॉटसन और जेनकिंस के नेतृत्व में भारी फौज कटंगी आ पहुंची। कई दिनों तक घमासान युद्ध के बाद 14 नवंबर, 1857 को सूबेदार बलदेव तिवारी और जेनकिंस के बीच आमने-सामने की लड़ाई हुई। जिसमें सूबेदार बलदेव तिवारी ने जेनकिंस का वध कर दिया. दोनों अंग्रेज अधिकारियों का वध कर सूबेदार बलदेव तिवारी ने राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह के बलिदान का प्रतिशोध भी ले लिया। युद्ध में सूबेदार बलदेव तिवारी को चार गोलियां लगी थीं और जंगल में चिकित्सकीय सुविधा असंभव थी, इसलिए उन्होंने अपनी बंदूक से प्राणोत्सर्ग किया।
सूबेदार बलदेव तिवारी सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दुर्दम्य सेनानायक थे, जिन्होंने जबलपुर कमिश्नरी में अंग्रेजों को हर मोर्चे पर मात दी थी। अंग्रेज अधिकारी उनका नाम सुनते ही भयाक्रांत हो जाते थे। ऐसे महान् योद्धा को इतिहास के पन्नों में समुचित जगह नहीं मिल पाई। जिस तरह महारथी मंगल पांडे के शौर्य को याद किया जाता है। उसी तरह महारथी बलदेव तिवारी को भी सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए याद किया जाना चाहिए।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इस गुमनाम नायक ने अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। ऐसे महारथी , महान योद्धा बलदेव तिवारी को शत-शत नमन-वंदन 🙏🇮🇳
21/05/2026
🔴 प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं राजनीतिक कार्यकर्ता अरुण चन्द्र गुहा
जन्म -14 मई 1892
मृत्यु 10 फरवरी 1983
अरुण चन्द्र गुहा भारत के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिक कार्यकर्ता थे। क़ानूनी शिक्षा प्राप्त करने के दौरान ही वह क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए थे। रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के विचारों से अरुण चन्द्र बहुत प्रभावित थे। भारत की आज़ादी के बाद अरुण चन्द्र गुहा संविधान परिषद के सदस्य भी चुने गए थे। वे तीन बार वर्ष 1952, 1957 और 1962 में लोकसभा के लिए भी निर्वाचित हुए। एक प्रसिद्ध लेखक के रूप में भी अरुण गुहा जाने जाते थे।
जन्म तथा शिक्षा -
अरुण चन्द्र गुहा का जन्म 14 मई, 1892 को बारीसाल (बगांल) में हुआ था। उन्होंने बारीसाल से ही अपनी स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे क़ानून की शिक्षा ग्रहण करने के लिए कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) आ गए। पंरतु कलकत्ता में उनका मन क़ानून के अध्ययन में नहीं लगा और वे देश की आज़ादी के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगे।
महापुरुषों का प्रभाव -
महापुरुष रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के विचारों से अरुण गुहा बहुत प्रभावित थे। ' गीता ' के निष्काम कर्मयोग को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के ' आनंदमठ' से भी वे प्रभावित हुए। 'बंग-भंग ' के विरोध में जो स्वदेशी आंदोलन आंरभ हुआ, 1906 में अरुण गुहा उसमें सम्मिलित हो गए।
क्रांतिकारी गतिविधियाँ -
वे बंगाल के प्रसिद्ध गुप्त क्रांतिकारी संगठन 'युगान्तर' (जुगांतर) के प्रमुख सदस्य थे।असहयोग आंदोलन, सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा कई बार गिरफ्तार किया गया।
उन्होंने जून 1946 तक जेल की सजा काटी थी।
जेल में रहने के दौरान, उन्होंने 1920 में असहयोग आंदोलन में शामिल होने का फैसला किया। उन्होंने कहा - ' मुझे लगा कि मुट्ठी भर लोगों द्वारा गुप्त रूप से संगठित क्रांति प्रभावी नहीं हो सकती। वे अग्रदूत की भूमिका निभा सकते थे, लेकिन आंदोलन जन-आधारित होना चाहिए ।' वे जल्द ही पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य बन गए, जहाँ उन्हें महासचिव चुना गया। बाद में, गुहा 1923 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में शामिल हुए, जहाँ वे 26 वर्षों तक सदस्य रहे।
संविधान निर्माण में योगदान -
अरुण चंद्र गुहा कांग्रेस पार्टी के टिकट पर पश्चिम बंगाल से संविधान सभा के लिए चुने गए थे।
उन्होंने संविधान के पुनर्लेखन पर चल रही बहस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने एक विस्तृत समापन भाषण दिया। जिसमें उन्होंने संविधान पर अपने विचार व्यक्त किए।
लेखन कार्य -
आजीवन अविवाहित रहने वाले अरुण गुहा एक प्रसिद्ध लेखक भी थे। उन्होंने ऐतिहासिक और पौराणिक विषयों पर अनेक रचनाएँ की थीं। क्रांतिकारी आंदोलन संबंधी उनकी पुस्तक 'फ़र्स्ट स्पार्क ऑफ़ रेवोल्यूशन' बहुत प्रसिद्ध हुई थी। 'देश-परिचय', 'विजयी-परिचय' और 'विद्रोही-परिचय' नामक उनकी पुस्तकों को विदेशी सरकार ने जब्त कर लिया था।
स्वातंत्र्योत्तर जीवन -
वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर पश्चिम बंगाल की बारासाट संसदीय सीट से तीन बार (वर्ष 1952, 1957 और 1962) लोकसभा के लिए सांसद निर्वाचित हुए।
निधन -
राष्ट्र सेवा में समर्पित जीवन के बाद 1983 में उनका निधन हो गया।
स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा के सदस्य और लोकप्रिय नेता के रूप में उन्होंने राष्ट्रनिर्माण और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सार्वजनिक जीवन में उनका योगदान सदैव सम्मानपूर्वक स्मरणीय रहेगा , ऐसे महान क्रांतिकारी को उनकी जयंती पर शत-शत नमन-वंदन 🙏🇮🇳
20/05/2026
🔴 चिन्तन के क्षणों में
कुल चार दिनों का जीवन था,
दो काट चुके दो कटने हैं,
दो दिन के बाकी जीवन में
संसार दिखायेगा क्या-क्या?
सब भले-बुरे की परिभाषा
ही बदल जायगी क्षण भर में,
यदि तुम्हें बताने बैठूँ मैं
देखा है भला-बुरा क्या-क्या?
हर चीज मुझे जब हासिल थी,
मिलता था मगर एक तू ही नहीं,
क्या तुझको बताऊँ तेरे बिना
इस दिल का तमाशा था क्या-क्या?
मैं तो पहचान नहीं पाया,
तू ही जाने तेरी माया,
जीवन के इन व्यापारों में
मेरा क्या-क्या तेरा क्या-क्या?
-अखण्ड ज्योति
-मई 1960
20/05/2026
🔴 अमर शहीद सुखदेव थापर
जन्म -15 मई 1907
शहादत - 23 मार्च 1931
देवगढ़, काकोरी, महुआ बाज़ार और लाहौर षड्यंत्र केस के बंदी भी अन्य बंदियों के साथ जेलों में बंद है।..... एक दर्जन से अधिक बन्दी सचमुच फाँसी के फंदों के इन्तजार में हैं। इन सबके बारे में क्या हुआ?" सुखदेव ने यह भी लिखा, भावुकता के आधार पर ऐसी अपीलें करना, जिनसे उनमें पस्त-हिम्मती फैले, नितांत अविवेकपूर्ण और क्रांति विरोधी काम है। यह तो क्रांतिकारियों को कुचलने में सीधे सरकार की सहायता करना होगा।' सुखदेव ने यह पत्र अपने कारावास के काल में लिखा। इस पत्र को उनके बलिदान के एक मास बाद 23 अप्रैल, 1931को 'यंग इंडिया' में छापा।
सुखदेव थापर भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी थे। भगत सिंह और राजगुरु के साथ उनकी घनिष्ठ मित्रता थी। उन्होंने 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) का नेतृत्व किया और 23 मार्च 1931 को लाहौर षड्यंत्र केस के तहत उन्हें फाँसी दे दी गई।
जन्म और आरंभिक जीवन -
सुखदेव थापर का जन्म लुधियाना, पंजाब में हुआ था। उसके पिता रामलाल थापर तथा माता रल्ली देवी थी। उसका परिवार पंजाबी-हिन्दू परिवार था जो हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों को मानता था।
सुखदेव जब छोटा था तभी उसके पिता का देहांत हो गया था। पिता के देहांत होने के बाद, उसके चाचा लाला अचिंतराम ने उसकी देख रेख की। सुखदेव का पूरा नाम सुखदेव थापर था जो एक क्रांतिकारी थे। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में सम्मिलित होकर देश को ब्रिटिश शासन से मुक्ति दिलाने के लिए अथक प्रयास किये।
नौजवान भारत सभा -
सुखदेव ने पंजाब के युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल करने के लिए वर्ष 1926 में 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना में अहम भूमिका निभाई।
इसके मुख्य योजक सुखदेव, भगत सिंह, यशपाल, भगवती चरण व जयचन्द्र विद्यालंकार थे। ' असहयोग आंदोलन ' की विफलता के पश्चात् 'नौजवान भारत सभा' ने देश के नवयुवकों का ध्यान आकृष्ट किया। प्रारम्भ में इनके कार्यक्रम नौतिक, साहित्यिक तथा सामाजिक विचारों पर विचार गोष्ठियाँ करना, स्वदेशी वस्तुओं, देश की एकता, सादा जीवन, शारीरिक व्यायाम तथा भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता पर विचार आदि करना था। इसके प्रत्येक सदस्य को शपथ लेनी होती थी कि वह देश के हितों को सर्वोपरि स्थान देगा।
क्रांतिकारी गतिविधियां -
ब्रिटिश सरकार ने जॉन सांडर्स की हत्या के अपराध में भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को फांसी देने का आदेश दिया। उनकी सजा के मुताबिक तीनों क्रांतिकारियों को 24 मार्च 1931 को फांसी होनी थी, परंतु, अंग्रेजों ने जनता के विद्रोही व्यवहार से भयभीत होते हुए, एक दिन पहले ही यानी कि 23 मार्च 1931 को लाहौर की जेल में सुखदेव, भगत सिंह व राजगुरु को फांसी दे दी। उसी दिन उन तीनों की मृत्यु हो गई।
भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु का अंतिम संस्कार पंजाब के फिरोजपुर जिले के हुसैनवाला गांव में सतलज नदी के किनारे पर किया गया था। जब तीनों वीर क्रांतिकारियों की मृत्यु की सूचना प्रेस व न्यूज़ में आई तब युवाओं ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ रोष जाहिर किया। कुछ सूचनाओं के मुताबिक, महात्मा गांधी को भी इस हत्याकांड का दोषी भी ठहराया गया था।
विरासत -
पंजाब के फिरोजपुर जिले के हुसैनवाला गांव में राजगुरु, भगत सिंह तथा सुखदेव के अंतिम संस्कार के बाद वहां पर स्मृति स्थल बनाया गया। प्रत्येक वर्ष 23 मार्च को राजगुरु, भगत सिंह तथा सुखदेव के सम्मान में राष्ट्र शहीद दिवस मनाया जाता है। पंजाब के फिरोजपुर जिले के हुसैनवाला गांव में राजगुरु, भगत सिंह तथा सुखदेव के अंतिम संस्कार के बाद वहां पर स्मृति स्थल बनाया गया।
प्रत्येक वर्ष 23 मार्च को राजगुरु, भगत सिंह तथा सुखदेव के सम्मान में राष्ट्र शहीद दिवस मनाया जाता है।
भारत माता के इस वीर सपूत ने मात्र 24 वर्ष की अल्पायु में अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया और हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर हो गए, ऐसे वीर बलिदानी को उनकी जयंती पर शत-शत नमन-वंदन 🙏🇮🇳
19/05/2026
🔴 भारत के एक राष्ट्रवादी एवं क्रांतिकारी शहीद बैकुण्ठ शुक्ल
जन्म - 15 मई 1907
बलिदान दिवस - 14 मई 1934
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा…
’ जगदंबा प्रसाद मिश्र (हितैषी) की कविता की यह पंक्तियां किसी शहीद के स्मारक को देख कर साकार हो उठती हैं।आजादी के आंदोलन में बिहार के लोगों ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। कई लोग फांसी पर चढ़ गये थे। इनमें ही एक हैं बैकुंठ शुक्ल, जिन्होंने भगत, सुखदेव व राजगुरू के खिलाफ गवाही देने वाले गद्दार को मौत के घाट उतारा था।
बैकुण्ठ शुक्ल भारत के एक राष्ट्रवादी एवं क्रांतिकारी थे। वे योगेन्द्र शुक्ल के भतीजे थे जो हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापकों में से एक थे। बैकुण्ठ शुक्ल ने फणीन्द्र नाथ घोष की हत्या कर दी थी क्योंकि वह अंग्रेज सरकार का मुखवीर था। इसके लिए अंग्रेज सरकार ने उन्हें 14 मई 1934 को गया के केन्द्रीय जेल में फाँसी पर लटका दिया था। वह हिंदुस्तान सेवा दल और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी जैसे क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े थे।
जन्म और आरंभिक जीवन -
बैकुंठ शुक्ला का जन्म 15 मई 1907 को जलालपुर गांव में हुआ था जो वर्तमान में बिहार के लालगंज प्रखण्ड के मुजफ्फरपुर जिले में है। उनके चाचा योगेन्द्र शुक्ल भी एक महान क्रांतिकारी थे जो बिहार में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोशिएसन का नेतृत्व कर रहे थे। उनके सानिध्य का बैकुण्ठ शुक्ल पर गहरा प्रभाव पड़ा और 18 वर्ष की आयु में ही वे सपत्नीक आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव में प्राप्त की और गाँव मथुरापुर में एक निम्न प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक बन गए।
क्रांतिकारी गतिविधियां -
उन्होंने 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया जिसके लिये उन्हें पटना कैम्प जेल में सजा भुगतनी पड़ी। यहीं से बैकुंठ शुक्ला की जेल यात्रा प्रारम्भ हुई। गांधी-इरविन समझौते के बाद उन्हें अन्य सत्याग्रहियों के साथ रिहा किया गया था। रिहा होने के बाद 1931 में मुजफ्फरपुर के ऐतिहासिक तिलक मैदान में पत्नी राधिका देवी के साथ झंडा फहराया। राधिका देवी तो बच निकलीं पर बैकुण्ठ पकड़ लिए गए। बाद में 1932 में पत्नी भी पकड़ ली गईं।
गद्दारों से प्रतिशोध -
सेंट्रल एसेम्बली बम कांड में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 1931 में फांसी की जो सजा हुई थी वह बेतिया निवासी फणीन्द्र नाथ घोष के इकबालिया गवाह के रूप में दिए गए बयान के कारण हुई थी। फणीन्द्र नाथ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का सदस्य थे किन्तु उन्होंने सरकारी गवाह बनकर अपने ही साथियों से गद्दारी की थी। बिहार पर यह कलंक था। 1932 के उत्तरार्ध में देश के अन्य क्रांतिकारियों ने यह संदेश भेजकर पूछा कि इस कलंक को धोओगे या ढोओगे? यह कथन बड़ा गूढ़ अर्थ वाला था। इसे लेकर सशस्त्र क्रांतिकारी पार्टी सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की बैठक हुई। फनीन्द्रनाथ घोष की हत्या के लिये लगाई गई गोटी बैकुंठ शुक्ला और चंद्रमा सिंह के नाम निकली।
मुखबिर की हत्या -
अब दोनों फणीन्द्र घोष की तलाश में निकल पड़े। पता चला कि वह बेतिया में ही कहीं छुपा है। साइकिल से वहां पहुंचकर उसे मार गिराया और साइकिल सड़क पर छोड़ कर भाग निकले। तब फणीन्द्र नाथ घोष अपने मित्र गणेश प्रसाद गुप्त से बात कर रहा था। गणेश ने बैकुंठ शुक्ल को पकड़ने का प्रयास किया तो उस पर भी प्रहार किये गये। फणीन्द्र नाथ घोष का अन्त 17 नवंबर को हुआ, जबकि गणेश प्रसाद का 20 नवंबर 1932 को मर गया। जाँच से इस बात की पुष्टि हुई कि फनीन्द्रनाथ घोष की हत्या बैकुंठ शुक्ल और चंद्रमा सिंह ने की है।
गिरफ्तारी -
फणीन्द्र की मौत से ब्रिटिश सरकार की नींव हिल गयी थी। जोर-शोर से हत्यारों की तलाश शुरू हुई। अंग्रेज सरकार ने बैकुंठ शुक्ल की गिरफ्तारी पर इनाम की घोषणा कर दी। 5 जनवरी 1933 को कानपुर से चंद्रमा सिंह की गिरफ्तरी हुई। 06 जुलाई 1933 को सोनपुर के गंडक पुल पर अंग्रेजों की फौज ने जबरदस्त घेराबंदी करते हुए बैकुंथ शुक्ल को पकड़ लिया। गिरफ्तारी के समय उन्होंने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘जोगेन्द्र शुक्ल की जय’ के नारे लगाये। मुजफ्फरपुर में दोनों पर फणीन्द्र नाथ घोष की हत्या का मुकदमा चलाया गया।
फांसी -
उन्होंने चंद्रमा सिंह को बचाते हुए हत्या की सारी जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली। 23 फरवरी 1934 को सत्र न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए बैकुंठ शुक्ल को फांसी की सजा दे दी, जबकि चंद्रमा सिंह को दोषी नहीं पाते हुए छोड़ दिया गया। बैकुंठ शुक्ल ने सत्र न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ पटना उच्च न्यायालय में अपील की, लेकिन 18 अप्रैल 1934 को हाईकोर्ट ने सत्र न्यायाधीश के फैसले की पुष्टि कर दी।
13 मई को रात भर वे देश भक्ति के गीत गाते रहे थे। अन्य कैदियों ने भी रात में खाना नहीं खाया। 14 मई 1934 को गया जेल में बैकुंठ शुक्ल को फांसी दे दी गयी। उन्होने "सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए- कातिल में है" गाते हुए फांसी का फंदा चूम लिया।
विरासत -
बिहार राज्य सरकार ने बैकुण्ठ शुक्ल की आदमकद प्रतिमा मुजफ्फरपुर में लगाई है। उनके नाम पर गया केन्द्रीय जेल का नाम रखने की मांग विभिन्न संगठनों द्वारा समय-समय पर उठती रहती है।
14 मई 1934 को गया केंद्रीय जेल में 28 वर्ष की उम्र में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल कर वे बैकुंठ शुक्ल से अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल बन कर इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमरत्व को पा गए। गौरतलब है कि वे महान क्रांतिकारी और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापकों में से एक योगेंद्र शुक्ल के भतीजे भी थे।
क्रांतिकारी नायकों की सूची में भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे नाम प्रमुख हैं, जबकि बैकुंठ शुक्ल जैसे अनगिनत जमीनी कार्यकर्ताओं का योगदान, जिन्होंने इन आंदोलनों की रीढ़ की हड्डी का निर्माण किया , ऐसे महान क्रांतिकारी को शत-शत नमन-वंदन 🙏🇮🇳