26/07/2026
आज आदरणीय डॉ. उमाशंकर पचौरी जी, माननीय राज्य सूचना आयुक्त, मध्यप्रदेश का मेरे निवास एवं मेरे नवीन प्रतिष्ठान एस स्क्वायर होटल, मयूर मार्केट, थाटीपुर पर आगमन हुआ। यह मेरे लिए केवल एक भेंट नहीं थी,
आप मेरे लिए गुरु, बड़े भाई, संघटक और पिता-तुल्य मार्गदर्शक हैं। एक ही व्यक्तित्व ने मेरे जीवन को अनेक रूपों में दिशा दी है।
एक प्रसंग आज साझा करना चाहता हूँ। वर्ष 2014 में जब मैंने अपने शिक्षक जीवन की शुरुआत की थी, तब एक दिन किसी ने आकर कहा— "पचौरी सर आपकी प्रशंसा कर रहे थे। उनका कहना था कि लड़का अच्छा पढ़ाता है और बहुत मेहनती है।" उस समय मैं आपको व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता था। केवल इतना जानता था कि भीड़ में बैठकर आपका बौद्धिक सुन चुका हूँ और आपके व्यक्तित्व से परिचित था। लेकिन यह नहीं जानता था कि मेरे संघर्ष के उन शुरुआती दिनों में, जब मेरी कोई विशेष पहचान भी नहीं थी, तब भी एक श्रेष्ठ मार्गदर्शक की दृष्टि मुझ पर बनी हुई थी।
एक दिन मन अत्यंत अशांत था, बाइक उठाई और सीधे आपके घर पहुँच गया। वहाँ अनेक लोग आपसे मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे थे। आपने केवल हाथ के एक इशारे से मुझे कुर्सी पर बैठने का संकेत दिया। मैं शांत होकर आपकी बातें सुनता रहा। युवाओं को दिशा देने का आपका सहज, स्नेहपूर्ण और प्रेरक अंदाज़ आज भी मेरी स्मृतियों में जीवंत है।
कुछ देर बाद आपने मुस्कुराते हुए पूछा— "सत्येन्द्र जी, कोई विशेष बात?"
उस क्षण मन जैसे हल्का हो गया। मैंने सहज ही उत्तर दिया— "नहीं सर... आपकी बातें सुनकर मेरे सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गए।"
उस दिन से लेकर आज तक समय-समय पर आपका सान्निध्य और आशीर्वाद मुझे मिलता रहा है। व्यस्तताओं के कारण मुलाकातें भले कम होती हों, लेकिन हमेशा यह अनुभूति रहती है कि आपका स्नेह, आपका विश्वास और आपका आशीर्वाद मेरे साथ है। यही भाव मुझे आगे बढ़ने की शक्ति देता है।
आज की यह भेंट एक गुरु-शिष्य, शिक्षक-शिक्षक और संघटक-कार्यकर्ता के आत्मीय संबंध का पुनर्मिलन था।
शायद इसी कारण मैं आपको कभी गुरुजी, कभी सर, तो कभी भाईसाहब कहकर संबोधित कर देता हूँ। संबोधन बदलते रहते हैं, लेकिन मेरे मन में आपके प्रति सम्मान, श्रद्धा और आत्मीयता कभी नहीं बदलती।
आपका स्नेह, आपका मार्गदर्शन और आपका आशीर्वाद यूँ ही बना रहे— यही मेरी ईश्वर से प्रार्थना है।