15/08/2025
अगर कोई कहता है "भगवान ने दुनिया बनाई", तो स्वाभाविक अगला सवाल होता है:
> "तो भगवान को किसने बनाया?"
यही से दो रास्ते निकलते हैं:
1. असीम पीछे जाना (Infinite regress) –
हर चीज़ का कारण पूछते-पूछते हम पीछे अनंत तक चले जाते हैं — यह न तो तार्किक रूप से आसान है, न ही इसका अंत मिलता है।
2. स्वयं-विद्यमान (Self-existent) सिद्धांत –
कुछ दार्शनिक और वैज्ञानिक धाराएं मानती हैं कि कोई एक तत्व, ऊर्जा, या नियम अनादि-अनंत से है, जिसे किसी ने नहीं बनाया।
प्राचीन श्रमान परंपरा (जैसे बौद्ध, जैन, लोकायत) में “ब्रह्मांड हमेशा से है” — इसे किसी देवी-देवता की ज़रूरत नहीं।
आधुनिक भौतिकी में भी “ऊर्जा न उत्पन्न होती है, न नष्ट होती है” — यानी ऊर्जा ही अंतिम सत्य है, जिसे कोई "बनाता" नहीं।
तो जब हम कहते हैं कि ब्रह्मांड खुद ही एक "परम शक्ति" है — तो हम इस अनावश्यक चक्र से बच जाते हैं जिसमें हर बार पूछना पड़ता है “उसको किसने बनाया?”
मगर देवी-देवताओं की कथाएं इसलिए बनीं क्योंकि:
लोग प्राकृतिक घटनाओं को समझ नहीं पाते थे, तो उनको मानवीय रूप दे दिया।
सत्ता और समाज पर नियंत्रण रखने का आसान तरीका था।
डर और आशा के ज़रिए लोगों को जोड़ना आसान था।
सीधे शब्दों में — अगर हम ब्रह्मांड को ही अनादि मान लें, तो किसी गढ़े हुए भगवान की आवश्यकता नहीं होती।
इस सोच को ही प्राचीन भारत में "अनीश्वरवाद" और "नैसर्गिक दर्शन" कहा गया।