25/11/2023
Sanjeev Tyagi
The Indian Wellfare
25/11/2023
25/11/2023
Oh Paazi
21/03/2023
DLF School -Wall of Fame .
21/02/2021
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अबकी बार दक्षिण पर वार
विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा ने कसी कमर, असम से लेकर तमिलनाडू तक पीएम मोदी की ताबड़तोड़ रैलियां बहुत जल्द पश्चिम बंगाल में चुनाव की तारीखों का ऐलान होने वाला है और भाजपा ने इस बात बंगाल की सत्ता पर कब्ज़ा जमाने के...
06/07/2020
30/05/2020
Rose Garden -Poly house @ Bhuni, Uttar Pradesh, India
खुद की सेल्फी लेना सेकेण्डों का काम है ...
लेकिन खुद की इमेज बनाने में जिंदगी गुजर जाती है ...
है जिंदगी चार दीना दी , न किसी से शिकवा कीजिये ...
दवा, जाम , इश्क़ जो मिले बस उसका मजा लीजिये ...
वो बचपन की यादें , वो पेड़ के नीचे छाया में बैठना
कहा गयी वो मुद्दते ,अब तो रह गया शेहरो में ऐंठना.
बिताया है बचपना जिंदगी का ,बेशुमार खुशियों के साथ
खो गया है न जाने इस शहर में कहा अपनों का साथ.
था बेख़ौफ़ और बड़ा ही बेबाक सा बचपना उस जिंदगी का
है बदला सा मौसम फ़िज़ा का , नहीं कोई अपना अब इस जिंदगी का .
आता है याद वो गुरु का डाँटना था छुपा उसमे भी एक अपनापन
कहे किसे अब अपना इस बेजान व अनजान शहर में , है जँहा एक तन्हापन.
समय...
स्लेट को जीभ से चाटकर अक्षर मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें ।
पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था ।
स्कूल में टाट पट्टी की अनुपलब्धता में घर से बोरी का टुकड़ा बगल में दबा कर ले जाना भी हमारी दिनचर्या थी ।
पुस्तक के बीच विद्या , तुलसी पौधे की पत्ती और मोरपंख रखने से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ विश्वास था ।
कपड़े के थैले में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था ।
हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था ।
माता पिता को हमारी पढ़ाई की कोई फ़िक्र नहीं थी , न हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझा थी । सालों साल बीत जाते पर माता पिता के कदम हमारे स्कूल में न पड़ते थे ।
एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा हमने कितने रास्ते नापें हैं , यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं ।
स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता था , दरअसल हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है ?
पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया थी ,पीटने वाला और पिटने वाला दोनो खुश थे , पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे , पीटने वाला इसलिए खुश कि हाथ साफ़ हुवा।
हम अपने माता पिता को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं क्योंकि हमें आई लव यू कहना नहीं आता था ।
आज हम गिरते - सम्भलते , संघर्ष करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं , कुछ मंजिल पा गये हैं तो कुछ न जाने कहां खो गए हैं ।
हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है , हमे हकीकतों ने पाला है , हम सच की दुनियां में थे ।
कपड़ों को सिलवटों से बचाए रखना और रिश्तों को औपचारिकता से बनाए रखना हमें कभी नहीं आया इस मामले में हम सदा मूरख ही रहे ।
अपना अपना प्रारब्ध झेलते हुए हम आज भी ख्वाब बुन रहे हैं , शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है वरना जो जीवन हम जीकर आये हैं उसके सामने यह वर्तमान कुछ भी नहीं ।
हम अच्छे थे या बुरे थे पर हम एक समय थे, काश वो समय फिर लौट आए ।
"बस यूंही"
दिल की कलम से.
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Ghaziabad