24/09/2025
रिश्तों की डोर - भाग 5
शालिनी: पापा सागर का फोन नहीं आया। लगता है उसे बुरा लग गया।
हिम्मतलाल जी: बेटी अब मैं क्या कह सकता हूं। यह तुम दोंनो का आपस का मामला है।
तभी सुशीला जी किचन से निकल कर आ जाती हैं।
सुशीला जी: बेटी तूने उसे दो दिन दिये थे इसका मतलब तो यही है कि वह शादी नहीं करना चाहता अब तू उसका पीछा छोड़ कर आगे बढ़।
यह सुनते ही हिम्मतलाल जी को गुस्सा आ गया। वे बोले
हिम्मतलाल जी: किसी मजबूरी का फायदा उठाना अच्छी बात नहीं है। तुम दोंनो मॉं बेटी अपनी जिद्द में यह भी भूल गईं कि उसने शालिनी की कितनी मदद की थी जब वह नौकरी के लिये भटक रही थी।
शालिनी को कुछ याद आता है -
सागर: देखिये मेडम आपकी क्वालीफिकेशन कम है इस जॉब के लिये हमें एक्पीरियंस वाला स्टॉफ चाहिये।
शालिनी: सर एक चांस दे दीजिये मैं दो महीने में सारा काम सीख जाउंगी।
सागर: मेडम मैं आपको नहीं रख सकता आप टारगेट पूरे नहीं कर पायेंगी।
यह सुनकर शालिनी रोने लगती है उसे रोता देख कर सागर उसे बाहर ले जाता है।
कैन्टीन में बैठ कर सागर उसे समझाता है कि वह इस जॉब के लायक नहीं है।
शालिनी: सर मेरे पापा को बिजनेस में बहुत नुकसान हुआ है। मुझे नौकरी की बहुत सख्त जरूरत है। आप कुछ भी करके मुझे यह जॉब दे दीजिये मैं दिन रात एक करके काम सीख लूंगी।
सागर: ठीक है मैं तुम्हें एक महीने के लिये रख लेता हूं लेकिन तुम्हें ऑफिस से जाने के बार घर से काम करना होगा तभी टारगेट पूरे हो पायेंगे, और मैं तुम्हें ऑनलाईन गाईड करता रहूंगा।
शालिनी: सर मैं आपका अहसान जिन्दगी भर नहीं भूलूंगी।
इस तरह दोंनो एक ही कंपनी में जॉब करते करते नजदीक आ गये। इसके बाद सागर ने दूसरी कंपनी ज्वाईन कर ली, और शालिनी को प्रमोशन मिलता रहा।
एक पल के लिये ये सारी घटनायें शालिनी के सामने से गुजर गईं। वह कैसे सागर से एक जॉब के लिये भीख मांग रही थी। आज सागर उसका साथ देने के लिये उससे भीख मांग रहा है।
हिम्मतलाल जी: बेटी किसी की अच्छाई का यह सिला नहीं देना चाहिये कुछ तो उसके बारे में सोच।
सुशीला जी: समय के साथ आगे बढ़ जाना चाहिये। तू ज्यादा मत सोच कनाडा की प्रमोशन ले ले।
शालिनी: माँ ठीक है लेकिन मैं एक बार सागर से मिल लेती हूॅं।
सुशीला जी: उसे तेरी परवाह होती तो वो तुझसे मिलने आ सकता था। वह तो दो दिन पूरे होने का इंतजार कर रहा है। ताकि तुझसे पीछा छूटे।
हिम्मतलाल जी माँ बेटी की बातें सुनकर दुःखी मन से घर से बाहर चले गये।
इसी तरह दो दिन और बीत गये। न तो सागर का कोई फोन आया न शालिनी ने फोन किया।
शालिनी को सागर पर बहुत गुस्सा आ रहा था।
इसी गुस्से में शालिनी ने कनाडा जाने का फैसला किया। ऑफिस से घर आकर उसने सामान पैक किया जब वह एयरपोर्ट के लिये निकल रही थी, हिम्मतलाल जी ने उसे समझाया -
हिम्मतलाल जी: बेटी तूने जो फैसला ले लिया उसके लिये मैं तुझे कुछ नहीं कहूंगा। लेकिन जाते समय एक बार सागर से मिल ले या फोन पर बात कर ले।
शालिनी की आंखों से टप टप आंसू बह रहे थे।
शालिनी: नहीं पापा उसने एक बार भी मेरे से बात नहीं की अब मैं उससे कभी बात नहीं करूंगी।
यह कहकर वह एयरपोर्ट के लिये निकल गई।
कनाडा पहुंच कर उसने सबसे पहले अपनी सिम चेंज की जिससे सागर उससे कॉन्टेक्ट न कर सके। कुछ ही दिनों में वह अपने काम में बिजी हो गई।
सागर से उसका संपर्क बिल्कुल खत्म हो गया था।
उसे आजादी सी महसूस हो रही थी। लेकिन शाम के समय उसे कभी कभी सागर के साथ बिताये लम्हे याद आते तो उसकी आंखों से आंसू बहने लगते थे।
शालिनी को कनाडा गये छः महीने बीत गये। इस बीच उसे सागर की कोई खबर नहीं मिली।
एक दिन वह ऑफिस से घर आई खाना खाकर सोने जा रही थी, तभी हिम्मतलाल जी का फोन आया।
हिम्मतलाल जी: बेटी कैसी है कई दिन से फोन पर बात नहीं हुई।
शालिनी: पापा मैं बिल्कुल ठीक हूॅं। आप कैसे हैं?
हिम्मतलाल जी: मैं ठीक हूं। ये ले काव्या से बात कर।
काव्या और शालिनी एक ही ऑफिस में काम करती थीं। काव्या शालिनी के घर आई थी अपनी शादी का न्यौता देने।
काव्या: शालिनी तू तो विदेश जाकर सबको भूल गई।
शालिनी: नहीं बहन तुझे कैसे भूल सकती हूं। एक तू ही तो है जिससे में अपनी हर बात शेयर करती हूॅं। सुना तू कैसी है।
काव्या: मेडम इंड्यिा आने के लिये तैयार हो जाओ। एक महीने बाद मेरी शादी है और मैं कोई बहाना नहीं सुनुंगी।
शालिनी: सच मजा आ गया। मैं तो वैसे भी आने वाली थी चल अच्छा हुआ अब तेरी शादी में जरूर आउंगी।
काव्या: हाँ आजा बहुत मजे करेंगे।
शालिनी वापस आने की तैयारी करने लगती है। वह छुट्टी के लिये अप्लाई करती है। उसे छुट्टी मिल जाती है।
शालिनी एयरपोर्ट पहुंच कर देखती है तो सामने उसके मम्मी पापा खड़े होते हैं। इतने दिनों बाद किसी अपने को देख कर उसकी आंखें छलक आती हैं। वह दौड़ कर उनके गले लग जाती है।
क्रमशः
23/09/2025
रिश्तों की डोर – भाग 4
आज सागर थोड़ा ठीक था। ऐसा अक्सर होता है जब भी हम किसी परेशानी में होते हैं तो कुछ समय बाद मन उसे स्वीकार कर लेता है कि शायद यही नियति थी।
वैसे ही आज सागर यह मन बना चुका है कि शायद उसका और उसके पापा का साथ कुछ ही दिन का बचा है, ऐसे में उसे ही घर की जिम्मेदारी संभालनी है। उसे इस बात से बहुत आस बंधी थी कि उसके हर सुख दुख में शालिनी उसके साथ खड़ी है।
इधर शालिनी जब घर पहुंचती है तो वह पहले से भी ज्यादा दुःखी होती है। एक तरफ सागर के साथ इतना लंबा रिलेशनशिप और दूसरी ओर अपना भविष्य कुछ समझ नहीं आ रहा था।
तभी शालिनी की मॉं सुशीला जी उसके कमरे में आती हैं।
सुशीला: बेटी मैं तेरे भविष्य को लेकर बहुत चिंतित हूं इसीलिय तुझे बार बार सागर से दूर रहने के लिये कह रही हूं। आज सागर पर परेशानी चल रही है वह बात अलग है लेकिन प्रोक्टिकल होकर सोच ऐसे हारे हुए आदमी से तुझे क्या सुख मिलेगा। दूसरों की भलाई के चक्कर में तू अपना जीवन तो बर्बाद नहीं कर सकती।
शालिनी: लेकिन मॉं यह तो सोचो अगर यह सब मेरे साथ हुआ होता तो क्या होता।
सुशीला: बेटी तू बहुत सीधी है अगर यह सब तेरे साथ हुआ होता तो सागर तुझे कभी का छोड़ कर भाग गया होता, क्योंकि तू एक लड़की है तुझे वो इमोशनल कर देता है।
यह सुनकर शालिनी सोच में पड़ जाती है, उसे रात भर नींद नहीं आती सुबह उठ कर वह एक फैसला करती है।
इधर सागर अगले दिन ऑफिस जाने के लिये तैयार होता है। तभी उसके पापा उसके पास आते हैं।
प्रशांत जी: बेटा तेरी मम्मी अभी किचन में है। मुझे लगता है कि तू कल से बहुत परेशान है। क्या बात है।
सागर: नहीं पापा ऐसी कोई बात नहीं है। बस ऑफिस में काम ज्यादा था, उसी की टेंशन है।
प्रशांत जी: बेटा मेरी बीमारी को लेकर तो कोई बात नहीं है जो तू छुपा रहा है।
सागर: नहीं पापा ऐसा कुछ भी नहीं है, अब मैं चलता हूॅं बहुत देर हो रही है।
सागर ऑफिस पहुॅंच जाता है। वह बहुत कोशिश करता है काम करने की लेकिन उसका मन काम में नहीं लग रहा था।
सागर: क्या मैंने पापा से झूठ बोल कर सही किया?
तभी शालिनी का फोन आ जाता है।
शालिनी: सागर मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है अभी।
सागर: क्या हुआ शालिनी हम शाम को मिल तो रहे हैं तभी बात कर लेंगे।
शालिनी: नहीं सागर सुन लो तुम्हारे सामने मैं बोल नहीं पाउंगी। मैंने आज फैसला किया है, मैं चाहती हूॅं अगले पन्द्रह दिन में हम शादी कर लें।
सागर: ये तुम क्या कह रही हों?
शालिनी: सागर प्लीज पहले पूरी बात सुन लो। या तो हम अगले पन्द्रह दिन में शादी कर लें या फिर मैं प्रमोशन लेकर तीन साल के लिये कनाडा चली जाउं। यही दो रास्ते हैं मेरे सामने अब मैं अपना कैरियर और रिलेशन दोंनो को लटका कर नहीं रख सकती।
सागर: शालिनी तुम मुझे छोड़ कर जाने की बात सोच भी कैसे सकती हों?
शालिनी: सागर मुझे भी अपने बारे में सोचने का हक है या नहीं या मैं केवल तुम्हारे इंतजार में अपना सब कुछ दॉंव पर लगा कर बैठी रहूं।
सागर: शालिनी मुझे कुछ टाईम दो मैं सब ठीक कर दूंगा। इस समय पापा की बीमारी के अलावा मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा।
शालिनी: मैं भी तो यही चाहती हूं कि तुम्हारे पापा अपने सामने अपने बेटे की शादी देख लें। तुम आज ही उन से बात कर लो दो दिन का समय है तुम्हारे पास।
यह कहकर शालिनी ने फोन काट दिया।
सागर (मन में): शालिनी कितनी स्वार्थी हो गई है। इसे केवल अपनी शादी अपने कैरियर की पड़ी है। मेरे हालात के बारे में तो वह सोच ही नहीं रही। चली जाये जहां जाना है।
सागर कुछ देर अपनी चेयर पर बैठ कर सोचता रहा।
सागर: लेकिन मैं शालिनी के बिना जिन्दगी की कल्पना भी नहीं कर सकता। मुझे उससे बात करके उसे समझाना चाहिये।
सागर शाम को बात करने के लिये शालिीनी को बुलाता है।
शालिनी: देखो सागर मैं तुम्हारे हालात जानती हूॅं। लेकिन मैं अब और इंतजार नहीं कर सकती।
सागर: शालिनी तुम्हें मेरे पापा की बीमारी नहीं दिखाई दे रही। एक बार सब सेटल हो जाये फिर शादी भी कर लेंगे।
शालिनी: नहीं सागर तुम्हारे पास दो दिन हैं अगले सप्ताह मेरा कनाडा का ट्रांसफर है मुझे बता देना यह कहकर शालिनी उठ कर चली गई।
सागर निराश होकर घर आ गया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। क्या करे? किससे बात करे?
अगले दिन सागर शालिनी को फोन करता रहता है। लेकिन शालिनी फोन नहीं उठाती।
शालिनी घर पर अपनी मॉं से बात करती है।
शालिनी: मॉं मैंने ठीक तो किया न मुझे बहुत बुरा लग रहा है।
सुशीला जी: बेटी अगर वो तेरा साथ चहता है तो उसे तेरी बात माननी चाहिये, उसके पिता भी बेटे की शादी देख लें इसमें बुराई क्या है और अगर वह अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहता है तो तुझे उसका साथ छोड़ देना चाहिये।
दो दिन बीत जाने के बाद भी सागर की तरफ से कोई जबाब नहीं आया अब तो उसने फोन भी नहीं किया।
शेष आगे ...
रिश्तों की डोर - भाग 3
https://www.facebook.com/share/p/15EAZaTqBsj/
रिश्तों की डोर - भाग 2 https://www.facebook.com/share/p/1AuZehc54p/
रिश्तों की डोर - भाग 1 https://www.facebook.com/share/p/171S8xRB9P/
21/09/2025
रिश्तों की डोर - भाग 3
सागर ऑफिस नहीं जाकर उसी कैफे में जाकर बैठ गया जहां वह अक्सर शालिनी के साथ जाता था। उसने एक कॉफी ऑडर की।
कॉफी पीते पीते उसके दिमाग में अलग अलग ख्याल आ रहे थे, पापा की बीमारी के बारे में सोचता फिर उसे चिंता होती की शालिनी फोन क्यों नहीं उठा रही। अपना आज और अपना भविष्य उसे सब कुछ धुंधला नजर आ रहा था।
इधर शालिनी अपनें कमरे में बैठी थी। तभी उसके पापा कमरे में आये।
शालिनी की आंखें सूज रही थीं।
हिम्मतलाल जी: बेटा क्या बात है पूरी रात रोती रही क्या।
शालिनी: नहीं पापा बस ऐसे ही।
हिम्मतलाल जी: मैं सुबह से देख रहा हूं कई बार तेरा फोन रिंग हुआ और तूने उठाया नहीं कहीं सागर का फोन तो नहीं था।
शालिनी (थोड़ा असहज होते हुए) : जी पापा लेकिन मेरा मूड नहीं है उससे बात करने का।
हिम्मतलाल जी: लगता है तूने अपनी मॉं की बातों को मन से लगा लिया है। मैं यह नहीं कहता कि तेरी मॉं गलत कह रही है। तुझे उससे शादी करनी चाहिये या नहीं ये तेरा फैंसला है।
लेकिन एक गलती जो इस समय तू सबसे बड़ी कर रही है। वह यह कि उसे इस समय तेरी जरूरत है। इतने पुराने रिश्ते को एक पल में नहीं छोड़ा जाता, वो भी उस समय जब उसे तेरी सबसे ज्यादा जरूरत है।
घर में वो किसी से बात नहीं कर सकता। अपने दोस्तों से वह कम ही मिलता है। ऐसे मैं अकेली तू ही है जिसे वह अपना समझ कर फोन कर रहा है। उसे इस समय किसी सहारे की जरूरत है। जो वो तुझमें ढूंढ रहा है।
शालिनी: लेकिन पापा मेरी भी तो जिन्दगी है। मुझे भी तो अपने भविष्य के बारे में सोचना है।
हिम्मतलाल जी: बेटा यदि तू उसके साथ अपना भविष्य नहीं देखती तो कोई बात नहीं। लेकिन एक दोस्त की तरह उसकी परेशानी में उसका साथ तो दे सकती है।
शालिनी को अपनी गलती का अहसास होता है। वह तुरन्त सागर को फोन करती है।
शालिनी: सागर क्या बात है सब ठीक है न।
सागर: कहां हो यार शालिनी सुबह से कितने फोन किये तुम्हें।
शालिनी: वो कुछ जरूरी काम था। बताओ क्या काम है।
सागर: उसी कैफे में बैठा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। आज ऑफिस जाने का बिल्कुल मन नहीं था। क्या तुम एक बार मिलने आ सकती हों।
शालिनी: ठीक है मैं बीस मिनट में पहुंचती हूॅं।
शालिनी का जबाब सुनकर हिम्मतलाल जी मुस्कुराते हैं और कमरे से बाहर निकल जाते हैं।
कुछ देर बाद सागर और शालिनी मिलते हैं।
शालिनी: सागर क्या बात है इतना परेशान क्यों हो?
सागर: शालिनी मैं बहुत टूट चुका हूं। पापा का चेहरा मुझ से देखा नहीं जाता। आज पता लगा यदि पता हो कोई अपना साथ छोड़ कर जाने वाला है तो कैसा महसूस होता है।
यह सुनकर शालिनी को धक्का लगा वे सोचने लगी। इस समय वह भी तो यही करने जा रही थी। अगर पापा उसे नहीं समझाते तो वह भी तो सागर का साथ छोड़ कर जा रही थी। ऐसे में उस पर क्या बीतती।
शालिनी: सागर इतना मत सोचो सब कुछ भगवान पर छोड़ दो ये समय टूटने का नहीं है। अपने परिवार के साथ ढाल बन कर खड़े रहने का है। अब सब कुछ तुम्हें ही सम्हालना है। तुम टूट जाओगे तो तुम्हारे परिवार का क्या होगा।
और मैं भी तो तुम्हारे साथ हूं इस मुश्किल समय को हम दोंनों मिल कर निकल लेंगे।
सागर: बस तुम मेरे साथ हो तो मैं हर मुश्किल का सामना कर लूंगा।
शालिनी सागर की हिम्मत तो बढ़ा रही थी। लेकिन साथ साथ उसे अपना भविष्य भी अंधकार में दिख रहा था। जिस सागर से उसने प्यार किया था। वह एक जिंदा दिल इंसान था।
लेकिन जिस सागर से वह आज मिल रही है, वह एक हारा हुआ इंसान है जो उसके भरोसे सब कुछ छोड़ कर बैठा है।
शालिनी पूरे दिन सागर के साथ रही। सागर को ढंढासा बंधाती रही उसकी हिम्मत बढ़ाती रही लेकिन उसने देखा कि सागर बिल्कुल टूट चुका है। यह देख कर उसकी हिम्मत भी टूटने लगी।
एक तरफ अपनी मॉं की बातें और एक तरफ अपने पिता की बातें दोंनो में तालमेल बैठाने की कोशिश करती लेकिन सागर की बातें सुनकर मॉं का पक्ष भारी लगता।
इसी तरह पूरा दिन बीत गया। शाम को शालिनी को घर छोड़ कर सागर अपने घर आ गया।
रिश्तों की डोर - भाग 2 https://www.facebook.com/share/p/1AuZehc54p/
रिश्तों की डोर - भाग 1 https://www.facebook.com/share/p/171S8xRB9P/
20/09/2025
रिश्तों की डोर - भाग 2 : डॉक्टर: सागर तुम्हारे पापा की रिर्पोट आ गई है।
सागर: डॉक्टर साहब सब ठीक तो है न, कोई चिन्ता की बात तो नहीं है।
डॉक्टर: सागर तुम्हें हिम्मत से काम लेना होगा। तुम्हारे पिता को केंसर है। वो भी तीसरी स्टेज पर हैं।
सागर के पैरों तले जमीन खिसक गई .... उसकी आंखों से आंसू बहने लगे .... डॉक्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे पीने के लिये पानी दिया।
डॉक्टर: सागर तुम यह बात अपने पिता को नहीं बताना उनका हार्ट पहले ही कमजोर है।
सागर: डॉक्टर साब अब तो सांइस ने काफी तरक्की कर ली है आप बढ़िया से बढ़िया इलाज शुरू कीजिये पैसों की चिंता मत कीजिये मैं इंतजाम कर लूंगा।
डॉक्टर: सागर बात पैसों की नहीं है। कैंसर काफी फैल चुका है। उनके पास ज्यादा से ज्यादा छहः महीने का टाईम हैं। मैं कुछ दवाईंया लिख रहा हूं इससे उन्हें कुछ आराम मिलेगा। लेकिन जितना हो सके उन्हें खुश रखने की कोशिश करना।
सागर अंदर से टूट जाता है। वह बाहर निकल कर शालिनी को फोन करता है। दोंनो शाम को मिलते हैं। सागर शालिनी को सारी बात बताता है और रोने लगता है।
शालिनी: सागर तुम हिम्मत से काम लो सब ठीक हो जायेगा।
सागर: तुम्हें पता है शालिनी। मेरे पापा ने कितने कष्ट उठा कर मुझे पढ़ाया लिखाया अब जब उन्हें सुख से रहने का समय आया तो ये बीमारी खड़ी हो गई।
शालिनी: भाग्य के लिखे को कोई नहीं बदल सकता अब तुम केवल उनकी खुशी के बारे में सोचो उन्हें खुश रखो और खुद भी हिम्मत रखो।
इसी तरह बातें करके सागर घर आ गया।
घर आते ही पापा ने पूछा
प्रशांत जी: बेटा क्या हुआ रिपोर्ट लेने गये थे।
सागर: पापा सारी रिर्पोट र्नामल हैं कोई चिंता की बात नहीं है। बस कुछ बीपी बढ़ा हुआ है डॉक्टर ने कुछ मेडिसन लिख दी हैं। आप लेते रहियेगा।
यह कहकर सागर चुपचाप अपने कमरे में चला गया। उसके पीछे पीछे मॉं चली आई
पुष्पा जी: बेटा क्या बात है तू कुछ परेशान है। सब ठीक तो है न
सागर: हॉं मॉं सब ठीक है आप चिन्ता न करें।
पुष्पा जी: चल तो फ्रेश हो जा मैं तेरे लिये खाना लगा देती हूं।
सागर: नहीं मॉं वो शालिनी से मिल कर आ रहा हूं वहीं हमने खाना खा लिया था। आप और पापा खाना खा लो और सो जाओ। मैं भी सोने जा रहा हूॅं।
उनके जाने के बाद सागर कमरा बंद करके बहुत देर तक रोता रहता है।
अगले दिन वह घर से ऑफिस जाने के लिये निकला लेकिन आज उसका ऑफिस जाने का बिल्कुल मन नहीं था।
इधर एक दिन पहले जब शालिनी घर पहुंची तो उसका मन काफी उखड़ा हुआ था। घर पहुंचते ही उसने देखा उसके पिता हिम्मत लाल जी सोफे पर बैठे थे। शालिनी की मॉं सुशीला किचन में खाना बना रहीं थीं।
हिम्मत लाल जी ने पूछा
हिम्मतलाल जी: बेटी क्या बात है बहुत परेशान है।
उनके पूछने पर शालिनी ने सारी बात बता दी उसकी बात सुनकर हिम्मतलाल जी ने कहा -
हिम्मतलाल जी: यह तो बहुत बुरा हुआ। बहुत ही सज्जन हैं सागर के पिता।
कुछ देर चुप बैठने के बाद उन्होंने आगे कहना शुरू किया -
हिम्मतलाल जी: बेटी इस समय तुम्हें सागर का साथ देना चाहिये वह बहुत तनाव में होगा।
तभी सुशीला जी किचन में से बाहर आ गईं।
सुशीला जी: आप बाप बेटी भी कमाल करते हो कभी अपने बारे में भी सोचोगे या हमेशा दूसरों के बारे में ही सोचते रहोगे।
उन्होंने आगे कहना शुरू किया -
सागर और तुम पिछले तीन साल से शादी की बात कर रहे हो। हर बार तुम ही उसके लिये कुर्बानी देती रहो पहले उसकी नौकरी नहीं थी।
जब नौकरी लगी तो यह कह कर शादी के लिये मना कर दिया कि बहन की शादी करनी है।
उसके बाद भी हम इंतजार करते रहे। कल तक कह रहा था बहन की शादी को एक साल पूरा होते ही हम शादी कर लेंगे। लेकिन अब तो हद हो गई अब पिताजी की बीमारी बोल कर शादी को टाल रहा है। मुझे तो उसकी किसी बात पर विश्वास नहीं है कहीं तुम्हें बेवकूफ तो नहीं बना रहा।
मॉं ..... शालिनी लगभग चीखते हुए बोली।
शालिनी: मॉं तुम कैसी बातें कर रही हों।
सुशीला जी: ठीक कह रही हूं बेटा अगर तेरी जगह वो होता तो कब का किसी ओर से शादी कर लेता। क्या कुर्बानी सिर्फ औरतों के हिस्से में आती है।
शालिनी बिना कुछ बोले उठ कर अपने कमरे में चली गई।
उसे माँ पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह कुछ देर तक बिस्तर पर पड़े पड़े रोती रही। फिर उसने उठ कर मुंह धोया। फिर वह मॉं की बातों के बारे में सोचने लगी लेकिन इस बार उसे गुस्सा नहीं आया और कहीं न कहीं मॉं की बातें ठीक लगने लगी।
आखिर चार साल बहुत लम्बा समय होता है।
अगले दिन जब वह सुबह सोकर उठी तो मन बहुत उदास था। असमंजस की स्थिती थी कि ऐसे में सागर का साथ दे या अपने भविष्य के बारे में सोचे वह फैसला नहीं ले पा रही थी।
इसी कश्माकश के बीच सागर का फोन आ गया।
शालिनी बहुत कन्फयूज हो रही थी इसलिये उसने फोन नहीं उठाया।
इधर सागर फोन किये जा रहा था। लेकिन शालिनी फोन नहीं उठा रही थी।
रिश्तों की डोर - भाग 1 https://www.facebook.com/share/p/171S8xRB9P/
18/09/2025
गीता एक गरीब परिवार में रहने वाली छोटी सी बच्ची थी। उसकी मां कल्याणी लोगों के घरों में साफ सफाई का काम करती थी।
उसके पिता एक दिहाड़ी मजदूर थे। उन्हें कभी काम मिलता था, कभी नहीं मिलता था। गीता पहली क्लास में एक सरकारी स्कूल में पढ़ती थी।
गीता पढ़ाई में बहुत होशियार थी। गीता घर पर आकर घर का काम निबटा कर पढ़ने बैठ जाती थी।
एक दिन गीता शाम तक मां का इंतजार कर रही थी, मां के न आने पर वह परेशान हो गई। शाम को उसके पिता मोहन जी घर आये, तो वे गीता को घर पर छोड़ कर कल्याणी को ढूढंने निकले।
कल्याणी जिन घरों में काम करती थी। उन्होंने सब जगह पता किया, उन्हें पता लगा कि कल्याणी तो आज काम पर आई ही नहीं।
रात हो चली थी। मोहन जी पुलिस स्टेशन पहुंच गये। वहां जाकर उन्होंने कहा - ‘‘साहब मेरी पत्नी सुबह से गुम है। आप रिर्पोट लिख लो।’’
पुलिस वालों ने कहा - ‘‘चौबिस घंटे से पहले रिर्पोट नहीं लिख सकते।’’
मोहन जी को गुस्सा आ गया। वे बोले - ‘‘आपको पता है उसके साथ क्या हो सकता है। आप रिर्पोट लिखो और मेरे साथ उसे ढूंढने चलो।’’
पुलिस वाले ने उन्हें उल्टा सीधा बोल कर भगा दिया। निराश होकर वे घर आ गये। घर आकर उन्होंने देखा गीता बैठी रो रही थी।
मोहन जी फटाफट बाजार गये और गीता के लिये खाना लाये। गीता ने थोड़ा सा खाना खाया और सो गई। इधर मोहन जी इधर उधर भटकते रहे, लेकिन कल्याणी का कहीं कुछ पता नहीं लगा था।
सुबह जब गीता की आंख खुली तो उसके घर के बाहर भीड़ लगी हुई थी, सामने सफेद कपड़ा ओढ़े उसकी मां लेटी हुई थी। उनका सिर ढका हुआ था। गीता को कुछ समझा नहीं आया
पास ही में मोहन जी खड़े रो रहे थे। तभी गीता की चाची ने उसे अपने से लिपटा लिया और बोली - ‘‘बेटी तेरी मां हम सब को छोड़ कर चली गईं।’’
गीता का दिल धक से बैठ गया उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। वह रोती हुई मां से लिपट गई - ‘‘उठो न मां, उठो देखो रात को तुमने मेरे लिये खाना भी नहीं बनाया।’’
गीता की चाची उसे संभालने की कोशिश कर रही थी। कुछ देर बाद गीता रोते रोते बेहोश सी हो गई। उसे सब कुछ दिख रहा था। लेकिन अब उसे होश नहीं था। कुछ देर में उसकी मां को अंतिम संस्कार के लिये ले गये।
गीता अब गुमशुम रहने लगी थी। वह किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी। एक दिन मोहन जी ने गीता से कहा - ‘‘बेटी कल्याणी तो अब वापस नहीं आयेगी। तू और मैं ही रह गये हैं। तू चिन्ता मत कर मैं तेरा अच्छे से ख्याल रखूंगा।’’
इसी तरह समय बीत रहा था। गीता अब घर के काम निबटाने लगी थी।
एक दिन गीता मन्दिर जा रही थी। वह अब सुबह उठ कर नहा धो कर मन्दिर जाती थी। उसकी मां को मरे दो महीने हुए थे। वह अब मां के सारे काम करने लगी थी। उसकी मां मन्दिर जाती थी। इसलिये वह उनकी जगह मन्दिर जाने लगी।
मन्दिर में उसे एक बुर्जुग मिलती थीं। धीरे धीरे गीता और रंजना जी में जान पहचान हो गई। मन्दिर में दर्शन करने के बाद दोंनो मन्दिर की सीढ़ियों पर कुछ देर के लिये बैठ जाती। रंजना जी ने बातों बातों में गीता के बारे में सब कुछ जान लिया।
एक दिन मोहन जी घर पर ही थे। उनका काम छुट गया था। वे इसी उलझन में थे। कि अब क्या करेंगे। तभी गीता अन्दर आई और बोली - ‘‘पापा देखो कौन आया है।’’
मोहन जी ने देखा तो बाहर एक चमचमाती कार खड़ी थी। उसमें से एक औरत उतर कर उनके घर की ओर आ रही थीं। महंगे कपड़े, जेवर पहने हुए। मोहन जी ने इशारे से गीता से पूछा।
गीता ने बताया - ‘‘अरे पापा ये वही रंजना जी हैं जिनके बारे में मैंने आपको बताया था। ये रोज मुझे मन्दिर में मिलती हैं। आज ये घर आने के लिये कहने लगीं तो मैं इन्हें घर ले आई।
मोहन जी ने उनका हाथ जोड़ कर स्वागत किया और बोले - ‘‘मालकिन आपने क्यों कष्ट किया बच्ची से कह देंती मैं आपकी सेवा में हाजिर हो जाता।’’
यह सुनकर रंजना जी ने कहा - ‘‘कुए को प्यासे के पास आना पड़ता है।’’
मोहन जी बोले - ‘‘मैं कुछ समझा नहीं ओ हो मैं तो भूल ही गया। आप बैठ्यिे मैं आपके लिये कुछ खाने को लाता हूं।’’
रंजना जी बोली - ‘‘नहीं मोहन जी परेशान मत होईये। आप बैठ्यिे मुझे आपसे कुछ बात करनी है। जानतें हैं आपकी बेटी कितनी होनहार और संस्कारी है। जितने ध्यान से यह पूजा करती है। मैं भी नहीं कर सकती। इसके चेहरे का तेज, इसकी हसी मैं घर जाकर भी भूल नहीं पाती। मैं चाहती हूं कि मैं इसका अच्छे से पालन पोषण करूं। अपने घर ले जाकर।’’
मोहन जी जितना अपनी बेटी की तारीफ सुनकर खुश हो रहे थे। अब उतने ही दुःखी होकर बोले - ‘‘मालकिन मेरी पत्नी तो पहले ही चली गई है। अब मेरे जीने का एक ये ही सहारा है। इसे भी आप ले जायेंगी तो मैं कैसे जिउंगा।’’
रंजना जी ने आगे कहना शुरू किया - ‘‘मोहन जी आप गलत समझ रहे हैं। मैं आप दोंनो को ले जाना चाहती हूं। आपको यहां कभी काम मिलता है कभी नहीं। बस आप मेरे घर की देखभाल करना और गीता मेरे साथ रहेगी। मैं आपको बता दूं। मैं अकेली रहती हूं। मेरे पति अब इस दुनिया में नहीं हैं। और बच्चे विदेश में रहते हैं।’’
मोहन जी की आंखों में आंसू आ गये - ‘‘मालकिन एक बिन मां की गरीब बच्ची की आप मदद कर रही हैं। यह मैं सोच भी नहीं सकता था।’’
रंजना जी ने कहा - ‘‘नहीं मोहन जी, इस बच्ची से मिलते मिलते मैं इसे चाहने लगी हूं। जानते हैं। इससे थोड़ी सी छोटी मेरी पोती होगी, लेकिन उसे मैंने सिर्फ विड्यिो कॉल पर ही देखा है। मैं इसका अच्छे से पालन पोषण करूंगी। आपकी बेटी लाखों में एक है।’’
मोहन जी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। रंजना जी ने आगे कहना शुरू किया - ‘‘आप तैयारी कीजिये मेरे नौकर आकर आपका सामान ले जायेंगे। आप दोंनो अभी मेरे साथ चलिये।’’
रंजना जी दोंनो को गाड़ी में बिठा कर घर ले जाती हैं। घर से दो नौकरों को ड्राईवर के साथ मोहन जी के घर भेज कर जरूरी समान मंगवा लेती हैं। जिसमें सबसे जरूरी गीता की मां का फोटो था।
धीरे धीरे समय बीत जाता है एक दिन गीता घर आती है - ‘‘पापा देखो मैं डॉक्टर बन गई। आज ही मुझे डिग्री मिली है। कल से मुझे सरकारी हॉस्पिटल में जाना है।’’
मोहन जी उसे अपने साथ ले गये। एक बड़े से हॉल में रंजना जी की तस्वीर लगी थी। मोहन जी बोले - ‘‘बेटी इन्हें नमन कर जिन्होंने तेरी किस्मत बदल दी। माना ये देवी अब हमारे बीच में नहीं हैं। लेकिन मुझे आज भी याद है अपने अंतिम समय में इन्होंने मेरे से यही कहा था, कि मेरी यही अंतिम इच्छा है। मेरा अंतिम संस्कार गीता करे। आप यहां का सब संभाल लें और इसे डॉक्टर बनायें।’’
गीता और मोहन जी दोंनो की आंखों से आंसू बह रहे थे। एक तरफ रंजना जी के बेटे थे, तो उनके मरने पर भी नहीं आये और एक तरफ यह एक गरीब लड़की थी। जिसने रंजना जी को इतना प्यार दिया, कि वो अपना सब कुछ इसके नाम कर गईं।
Hindi Moral Story
03/08/2025
रिश्तों की डोर - भाग 1 : सागर आज सुबह जल्दी उठ गया। उसे आज अपने पापा को हेल्थ चेकअप के लिये लग जाना था। सुबह जल्दी उठ कर वह पापा के कमरे में गया। उसने देखा वहां पापा नहीं थे। वह किचन में मॉं के पास गया।
सागर: मॉं पापा कहां हैं। हॉस्पिटल जाना था।
पुष्पा जी: बेटा तेरे पापा सैर करने गये हैं।
सागर: लेकिन मॉं आपको पता उनका बी.पी. कितना बढ़ा हुआ है। उन्हें अकेले सैर पर नहीं जाना चाहिये था आपको उनके साथा जाना चाहिये था। या फिर मुझे बोल देते मैं चल देता।
पुष्पा जी: कोई बात नहीं बेटा उनके साथ कई लोग जाते हैं सैर करने आ जायेंगे अभी। तू तैयार हो गया तो नाश्ता कर ले।
सागर नाश्ता करने बैठ गया। कुछ ही समय में प्रशांत जी सैर करके आ गये।
सागर: पापा आप जल्दी तैयार हो जाईये चेकअप के लिये चलना है। उसके बाद आपको घर छोड़ कर मुझे ऑफिस भी जाना है।
प्रशांत जी: बेटा तू क्यों परेशान हो रहा है। मैं अकेले ही चला जाउंगा।
सागर: नहीं पापा आपको पता है न पिछली बार आप अकेले गये थे पूरे दिन भूखे प्यासे रहने से आपको चक्कर आने लगे थे। आप जल्दी से तैयार हो जाईये मैं गाड़ी निकालता हूं।
कुछ देर में दोंनो हॉस्पिटल के लिये निकल जाते हैं। रास्ते में प्रशांत जी सागर से बात करते हैं।
प्रशांत जी: बेटा तेरी अच्छी खासी नौकरी लग गई है। अब तू शादी के बारे में सोच मेरा क्या भरोसा। एक ही सपना है तेरी बहन तान्या की तरह तेरी भी शादी देख लूं।
सागर: पापा आप कैसी बात कर रहे हैं। आपको कुछ नहीं होगा वैसे भी अभी दीदी की शादी को एक साल भी नहीं हुआ है।
प्रशांत जी: बेटा वो तो ठीक है चल मेरी छोड़ पर शालिनी भी कई सालों से शादी के इंतजार में बैठी है। उसके बारे में भी तो सोच।
सागर: पापा मैंने शालिनी से बात कर रखी है। उसका इस साल फाईनल ईयर है उसके बाद हम दोंनो शादी कर लेंगे।
ऐसे ही बातें करते करते दोंनो हास्पिटल पहुंच जाते हैं।
सागर अकेले में डॉक्टर से बात करता है।
सागर: डॉक्टर कोई मेजर प्रोब्लम तो नहीं है पापा को।
डॉक्टर: सागर उम्र के साथ साथ शरीर ढलने लगता है। वैसे कुछ बड़ा नहीं लग रहा लेकिन वे ठीक से खाना नहीं खा पा रहे ये चिन्ता का विषय है। लेकिन तुम चिन्ता मत करो। मैं कुछ दवाईयां बढ़ा रहा हूॅं। बस एक बात का ध्यान रखना तुम्हारे पापा दवाईंया टाईम पर ले लें।
सागर पापा को घर छोड़ कर ऑफिस चला जाता है। शाम को वह ऑफिस से निकलने वाला होता है तभी शालिनी को फोन आ जाता है। दोंनो शाम को एक कैफे में मिलते हैं।
शालिनी: क्या बात है सागर कुछ परेशान हो।
सागर: शालिनी पापा की तबियत ठीक नहीं रहती आज वे शादी की बात भी कर रहे थे। तुम्हें तो पता है तान्या दीदी की शादी को अभी एक साल भी नहीं हुआ है। उनकी शादी के लिये मैंने लोन लिया था। जिसकी ईएमआई चल रही है। ऐसे में पापा के इलाज का खर्च। मैं शादी के बारे में अभी सोच भी नहीं सकता।
शालिनी: तुम चिन्ता मत करो दो महीने बाद मेरा कॉलेज खत्म हो जायेगा उसके बाद मुझे नौकरी मिल जायेगी। दोंनो मिल कर सब संभाल लेंगे।
सागर: नहीं शालिनी मैं अपने हालात का बोझ तुम पर कैसे डाल सकता हूं। मैं चाहता हूं कि तुम्हें सुख दे सकूं। बस थोड़ा सा समय और दो मुझे एक बार सब सेटल हो जाये फिर शादी कर लेंगे।
शालिनी चुप रह जाती है। दोंनो कुछ देर साथ समय बिता कर अपने अपने घर चले जाते हैं।
दो दिन बाद सागर के पास डॉक्टर का फोन आता है। सागर उनके पास पहुंच जाता है।
सागर: डॉक्टर साहब क्या बात है पापा की रिपोर्ट आ गईं क्या ?
शेष अगले भाग में ...
01/07/2025
आज तो किसी ने नहीं देखा ... सुबह ही घर से निकलते हुए प्रकाश बार बार पीछे मुड़ कर देख रहा था। जल्दी से साईकिल के पैडल मार कर वह इस बस्ती से दूर बड़े शहर की भीड़ में खो जाना चाहता था।
शहर पहुंचते ही वह सीधा रेलवे स्टेशन के सामने फुटओवर ब्रिज पर एक कोने में खड़ा हो गया। कुछ देर इधर उधर देख कर उसने अपने बैग से एक छोटा सफेद तौलिया निकाला और जमीन पर बिछा दिया।
कंधे पर लटकाये बड़े थैले में से रुमाल, कंघा, शेविंग ब्रश, नेल कटर निकाल कर सजाने लगा। कुछ देर बाद उसने देखा सामने स्टेशन पर ट्रेन आ गई है। अब सभी उस पुल से गुजरेंगे। वह खड़ा हुआ उसने अपने रुमाल को मास्क की तरह मुंह पर बांधा सिर पर कैप लगा कर आवाज लगाना शुरू किया।
कुछ रही देर में काफी लोग पुल से गुजर रहे थे। उसमें से कुछ लोग रुक कर सामान देख रहे थे।
अरे भाई ये कंघा कितने का है ... एक आदमी ने आवाज दी तो प्रकाश ने कहा दस रुपये का है .... उस आदमी ने कंघा ले लिया ... चलते हुए उसने प्रकाश से कहा भाई करोना गये एक साल हो गया है अब मास्क की तरह रुमाल क्यों बांधा है।
अब प्रकाश उसे क्या बताये कि यह रुमाल उसने अपनी पहचान छिपाने के लिये लगा रखा है। गॉव में पिताजी ने बार बार बोला बेटा ... गॉव में रहकर ही पढ़ ले शहर में जाकर किसी की नौकरी करने से अच्छा है अपने खेत पर काम कर लेकिन प्रकाश नहीं माना और पिता के खेत बेच कर शहर में बी.टेक करने पहुंच गया।
सारे खेत बेच कर शहर में रहकर किसी तरह बी.टेक पूरी हुई।
प्रकाश खुशी खुशी पिता के पास पहुंचा ... पिताजी बी.टेक हो गई अब मैं नौकरी करके आपका सारा पैसा उतार दूंगा ... पिता ने मुस्कुरा कर कहा ... बेटा अगर कुछ बचाना है तो नौकरी करके घर को बिकने से बचा ले ... खेत तो पहले ही चले गये ... दूसरे के खेत पर काम करने नहीं दे रहा ... आखिर इज्जत भी कोई चीज होती है ... अब तो भूखे मरने की नौबत आ गई है।
प्रकाश अगले ही दिन शहर में नौकरी ढूंढने लगा ... बहुत कोशिश की लेकिन नौकरी न मिल सकी ... गॉव में उसकी बहुत इज्जत थी ... लड़का इंजिनियर बन गया ... घर वाले न किसी से कुछ छिपा सकते न बता सकते थे।
इसी तरह कुछ दिन और बीत गये ... इधर पिता भी बीमार रहने लगे ... अब इंजनियरिंग का भूत उतर चुका था ... प्रकाश घर से निकल आता और नौकरी की तलाश में इधर उधर भटकता रहता।
एक दिन उसने अपने दोस्त से कुछ रुपये उधार लेकर बेचने के लिये सामन खरीदा फिर एक साईकिल किसी दोस्त से मांगी और सुबह चार बजे ही साईकिल पर सामान बांध कर निकल जाता था सामान बेचने।
कहीं कोई पहचान न ले इसलिये सिर पर टोपी और मुंह पर कपड़ा बांधे रहता... गॉव के लोग रात को जल्दी सो जाते थे वह रात को यह सुनिश्चित करता कि पूरा गॉव सो गया ... उसके बाद ही घर में घुसता था।
अगर बी.टेक. न की होती तो पिता के साथ खेत पर काम कर रहा होता। यही सोच कर चुपचाप खाना खा कर सो जाता।
पंद्रह घंटे मेहनत करके किसी तरह घर का खर्च चल जाता था ... कहीं उस पुल पर कोई परिचित न मिल जाये ... इसी डर ने उसका जीवन नर्क कर दिया था।
30/06/2025
एक समय की बात है बनारस की एक गली मैं एक बूढ़ा आदमी भीख मांग कर गुजारा कर रहा था। बनारस में वह एक चबूतरे पर बैठा आने जाने वालों को देखता रहता था। किसी से कुछ नहीं कहता था। जो भी उसे भीख में कुछ दे जाता उसे धन्यवाद वाली निगाहों से देखता रहता था।
उसी गली से एक पंडित जी सुबह सुबह निकल कर गंगा स्नान के लिये जाते थे। जब पंडित जी जाते तो वह सो रहा होता। बाद में जब पंडित जी वापस आते तो वह वहां से हट जाता।
पंडित जी उसके ठिकाने पर कुछ पैसे और प्रसाद रख कर चले जाते। वह बूढ़ा आदमी जब पंडित जी चले जाते तो जाकर पैसे उठा कर पास की दुकान से एक कुल्हड़ में चाय ले आता और प्रसाद खाकर चाय पीकर वहीं बैठ जाता।
दिन भर लोग उसे कुछ न कुछ देते रहते थे। शाम के समय वही पंडित जी गंगा आरती में शामिल होने जाते और वापस आते समय उसके लिये खाना लेकर आते और उसके बैठने की जगह पर रख कर ढक देते।
उनके जाने के बाद वह भिखारी आता और खाना खाकर वहीं सो जाता। कई सालों से यही सिलसिला चल रहा था।
पडिंत जी का एक शिष्य कुछ दिन से पंडित जी से ज्ञान प्राप्त कर रहा था। पंडित जी उसे शास्त्र अध्ययन के साथ साथ पूजा पाठ का विधि विधान सिखा रहे थे। वह भी पंडित जी के साथ सुबह जाता और शाम तक पंडित जी के साथ रहता।
एक दिन दोपहर के समय पंडित जी विश्राम कर रहे थे तो उनके शिष्य ने पूछ ही लिया - ‘‘गुरु जी आप उस भिखारी पर इतने मेहरबान क्यों हैं यहां तो बहुत से भिखारी रहते हैं लेकिन आप उन्हें बिल्कुल भी दान नहीं देते। फिर इस भिखारी के लिये इतना कष्ट क्यों उठाते हो।’’
पंडित जी ने जबाब दिया - ‘‘मैं जब भी इसे देखता हूं मेरा मन करुणा से भर जाता है’’
शिष्य - ‘‘नहीं गुरुजी आप मुझसे सच छिपा रहे हैं, यह आपको देख कर छिप जाता है। इसका क्या राज है? आज आपको बताना ही पड़ेगा।
पंडित जी - ‘‘अच्छा बहुत जिद करते हो तो सुनो - यह अपने समय में बनारस का बहुत बड़ा सेठ था। दिन रात पैसे कमाने में लगा रहता था। यह न कभी पूजा पाठ करता, न कभी प्रभु का नाम लेता, न किसी को एक रुपया दान में देता था।
इसके कोई सन्तान नहीं थी। एक दिन इसकी पत्नि ने घर पर पूजा रखने की बात इससे पूछी तब इसने मना कर दिया। लेकिन बहुत अनुनय करने पर यह पूजा में बैठने के लिये तैयार हुआ।
उस समय मैंने ही इसके घर में पूजा करवाई थी। पूजा के बाद इसने न तो एक रुपया दान किया न किसी को भोजन करवाया। मेरे साथ चार पंडित और थे। जिन्हें बहुत बुरा लगा। वे अपना अपमान समझ कर वहां से चले गये।
पुत्र की कामना से की गई पूजा के फल स्वरूप दो साल बाद इसके घर एक कन्या का जन्म हुआ।
यह देख कर सेठ को बहुत गुस्सा आया, वह उस कन्या से नफरत करने लगा। उसकी शक्ल भी नहीं देखता था।
पत्नि के बार बार समझाने पर भी वह नहीं माना और इसी गम में उसकी पत्नि चल बसी इसके बाद वह लड़की उसे बोझ लगने लगी।
धीरे धीरे कन्या बड़ी हो गई। अब सेठ को उसके विवाह के लिये वर ढूंढना था।
एक दिन सेठ ने पैसा बचाने के लिये उस कन्या का विवाह एक भिखारी से कर दिया।
मुझे विवाह पढ़ने के लिये बुलाया गया। भिखारी को देख कर मैंने सेठ को समझाने की बहुत कोशिश की। लेकिन वह नहीं माना भिखारी के साथ कन्या को विदा कर दिया।
कन्या के विदा होने के कुछ दिन बाद ही एक जंगल में उसका शव मिला भिखारी ने उसके पैसे जेवर सब छीन लिया उसे मार कर जंगल में डाल दिया।
सेठ ने उसका अन्तिम संस्कार किया।
उसके बाद से सेठ का सारा कारोबार चौपट हो गया। आज वह इस स्थिती में है यह तुम्हारे सामने है। अपनी पत्नि और बेटी को याद कर यह रोता रहता है। जिस पैसे को बचाने के लिये बेटी का विवाह भिखारी से कर दिया। आज वही पैसा उसके पास नहीं है।
क्योंकि मैंने सेठ के अच्छे दिन देखें हैं। इसको राजा से रंक बनते देखा है। इसकी आंखों में पछतावा देखा है। इसलिये मैं इसके खाने की व्यवस्था कर देता हूॅं।
शिष्य - ‘‘लेकिन यह आपको देख कर भाग क्यों जाता है।
पंडित जी - ‘‘एक स्नेह का रिश्ता इसके साथ बन गया है। इसे लगता है जो भी उससे स्नेह करते थे वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। कहीं इसके स्नेह में मेरी जान न चली जाये’’
एक दिन सुबह सुबह पंडित जी तैयार हो रहे थे, तभी उस शिष्य ने बताया -
‘‘गुरुजी वह बूढ़ा भिखारी कल रात मर गया’’
यह सुनकर पंडित जी को बहुत दुख हुआ और वे उसके अंतिम संस्कार की तैयारी मैं जुट गये।