06/10/2025
"सूरज को दिया" नामक अपने आलोचना संग्रह से कविवर दिनकर को निशाने पर लेते हुए....
✍️ अपनी रचना रूपी रश्मियों को हिन्दी भाषा प्रेमियों के बीच अनथक उल्लास के साथ वितरित करते हिन्दी के देदीप्यमान सूर्य श्री रामधारी सिंह दिनकर' के कालजयी काव्य 'रश्मिरथी' को पढते पढते जब हम अद्भुत आह्लाद के चरम पर पहुंचते हैं तो अचानक चेतना कुछ पंक्तियों पर रुक जाती है जैसे- अविरल बहती नदी की धार के बीच कोई बडा सा पत्थर अड़ गया हो और उससे आहत नदी की धार इधर उधर विचलित हो रही हो।
समाज के शोषित और वंचित वर्ग को महिमामंडित करते दिनकर ने अचानक ही "विप्र जाति के सिवा किसी को मत तलवार उठाने दो"
ऐसा क्यों व्यक्त किया और अन्य जातियों को असि ना उठाने देने की बात क्यों लिखी है ?
क्या दिनकर जैसे मूर्धन्य साहित्यकार में भी जातिगत दोष का समावेश हो गया तो क्या उन पर यह आरोप लग सकता है?
नही नही!!!
ऐसा सोचते भी मन कांप उठता है लेकिन फिर अगली पंक्तियां भी कुछ ऐसे ही भाव समेटे सामने आ जाती हैं।
"जियो जियो ब्राह्मणकुमार! तुम अक्षय कीर्ति कमाओगे"
आदि आदि।
ऐतिहासिक घटना पर आधारित इस काव्य का प्रसंग बडा रोचक है परंतु अंत उतना ही दुखद भी।
एक निष्ठावान और पूरे मनोयोग से शिक्षारत शिष्य को सिर्फ यह अनुमान कर की वो क्षत्रिय है, उस शिक्षा से रत कर देना क्या यह श्रेष्ठता हो सकती है या नही ?
यह विचारणीय है और शोध का भी विषय है लेकिन इस संदर्भ में गुरू द्रोणाचार्य कही आगे निकल जाते हैं जब वह समाज को निर्भय करने हेतु समाज के रक्षक वर्ग को शिक्षित करने का दायित्व उठाते हैं।............क्रमश:
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