हिन्दी कथाएं Hindi Stories

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"सूरज को दिया" नामक अपने आलोचना संग्रह से कविवर दिनकर को निशाने पर लेते हुए....    ✍️ अपनी रचना रूपी रश्मियों को हिन्दी ...
06/10/2025

"सूरज को दिया" नामक अपने आलोचना संग्रह से कविवर दिनकर को निशाने पर लेते हुए....

✍️ अपनी रचना रूपी रश्मियों को हिन्दी भाषा प्रेमियों के बीच अनथक उल्लास के साथ वितरित करते हिन्दी के देदीप्यमान सूर्य श्री रामधारी सिंह दिनकर' के कालजयी काव्य 'रश्मिरथी' को पढते पढते जब हम अद्भुत आह्लाद के चरम पर पहुंचते हैं तो अचानक चेतना कुछ पंक्तियों पर रुक जाती है जैसे- अविरल बहती नदी की धार के बीच कोई बडा सा पत्थर अड़ गया हो और उससे आहत नदी की धार इधर उधर विचलित हो रही हो।
समाज के शोषित और वंचित वर्ग को महिमामंडित करते दिनकर ने अचानक ही "विप्र जाति के सिवा किसी को मत तलवार उठाने दो"
ऐसा क्यों व्यक्त किया और अन्य जातियों को असि ना उठाने देने की बात क्यों लिखी है ?
क्या दिनकर जैसे मूर्धन्य साहित्यकार में भी जातिगत दोष का समावेश हो गया तो क्या उन पर यह आरोप लग सकता है?
नही नही!!!
ऐसा सोचते भी मन कांप उठता है लेकिन फिर अगली पंक्तियां भी कुछ ऐसे ही भाव समेटे सामने आ जाती हैं।

"जियो जियो ब्राह्मणकुमार! तुम अक्षय कीर्ति कमाओगे"

आदि आदि।

ऐतिहासिक घटना पर आधारित इस काव्य का प्रसंग बडा रोचक है परंतु अंत उतना ही दुखद भी।
एक निष्ठावान और पूरे मनोयोग से शिक्षारत शिष्य को सिर्फ यह अनुमान कर की वो क्षत्रिय है, उस शिक्षा से रत कर देना क्या यह श्रेष्ठता हो सकती है या नही ?
यह विचारणीय है और शोध का भी विषय है लेकिन इस संदर्भ में गुरू द्रोणाचार्य कही आगे निकल जाते हैं जब वह समाज को निर्भय करने हेतु समाज के रक्षक वर्ग को शिक्षित करने का दायित्व उठाते हैं।............क्रमश:
#हिन्दीसाहित्य #हिन्दीगौरव #हिन्दीविचारमाला #हिन्दीगीत

शीर्षक - वफादार घोड़े:- 🐎 आज के परिवेश मे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की घोर निष्ठा और वफादारी अपनी स्वामिभक्ति के लिए विख्यात...
28/09/2025

शीर्षक - वफादार घोड़े:-

🐎 आज के परिवेश मे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की घोर निष्ठा और वफादारी अपनी स्वामिभक्ति के लिए विख्यात 'घोड़ों' को भी मात देती है। अपनी इच्छाओं को लज्जा और शर्म के आवरण मे समेटे एकनिष्ठ होकर अपने नायकों की सेवा करते इन कार्यकर्ताओं की इस वफादारी के बावजूद उन्हें प्राप्त क्या है ?
इसका आंकलन किये बगैर मै अपनी कविता आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूं, आशा करता हूं आपको पसंद आयेगी............

घोड़े हां, हां ये घोड़े ही तो
करते हैं जंग की शुरुआत
वर्ना राजाओं की फितरत
हंसते गलेमिल भूलने की है।01

घोड़े ही बैठे होते हैं तैयार
निज खूं बहाने को पागल
वर्ना इक राजा की दुश्मनी
दिखी कभी किसी और से।02

ये दौड़ते है सरपट मैदां से
रौंदते है बेजा हरे भरे खेत
और मिटाते है खेत-खलिहां
जो भरता है इनका भी पेट।03

आखिर मे जीतता है राजा
हारने पर हार जाते है घोड़े
जीत बनी राजा की खातिर
चोटिल होने को बने हैं घोड़े।04

खुश होने पे पाते थोड़ी घास
गुस्से मे दमभर पाते हैं कोड़े
इनमें है वफादारी का सबब
आदत से ही मजबूर हैं घोड़े।05

भूल सहज कोड़ो के निशां
सारा बोझ सिर पे उठाते हैं
पूरी चोट देता हो सवार इन्हें
उसे भी सिर पे ही बिठाते हैं।06

:- शशिवेंद्र 'शशि'

महादेवी वर्मा उस कलम सिद्ध साहित्यकार का नाम है जो बर्बरीक की भांति अपने एक ही रचना रूपी प्रहार से समकालीन साहित्य के तम...
24/08/2025

महादेवी वर्मा उस कलम सिद्ध साहित्यकार का नाम है जो बर्बरीक की भांति अपने एक ही रचना रूपी प्रहार से समकालीन साहित्य के तमाम दिग्गज साहित्यकारों का सादर अभिवादन करती और समान हैसियत के रचनाकारों के कंधे पर स्नेहपूर्ण भ्रातृसम हस्त रखती प्रतीत होती हैं।
उनकी रचना 'संस्मरण' दद्दा राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त से आरंभ होकर निराला, प्रेमचंद और सुंघनी साहू के तंग बनारस की गलियों से गुजरती पंत और सुभद्रा से सुखद चर्चा करती गुरूदेव रवीन्द्र के ऋषित्व को प्रणाम करती है, आगे बढ़कर राष्ट्रपिता बापू के स्मरण मे बाबू राजेंद्र प्रसाद की सादगी को श्रद्धा से स्पर्श करती पंडित नेहरू और राजर्षि टंडन तक अपनी स्मृतियों की गुल्लक का संचय दिखाती पूर्ण होती है।
गार्गी और अपाला जैसे भारतीय नारियों की दर्शन और साहित्य में सिद्धा परंपरा को आगे बढाती ऐसी विदुषी मनीषा की भावपूर्ण लेखनी को प्रणाम🙏

मेरी नई पुस्तक "पुंजा" से उद्धरित   गोत्र नही पूछा करते है साधू और योद्धा कानिजताहीन सदा रहता कृत कर्मवीर क्रोधा काकरना ...
08/01/2023

मेरी नई पुस्तक "पुंजा" से उद्धरित

गोत्र नही पूछा करते है साधू और योद्धा का
निजताहीन सदा रहता कृत कर्मवीर क्रोधा का
करना तो कर विचार बस उसकी अमर कहानी
समय नदी मे बहता रहता सदा अनवरत पानी।।

यादें है ठहराव वही जो जीवन-यात्रा मे मिलती हैं
सुन्दर और सजीले पल को भावों से सिलती हैं
दुर्गम मान समंदर को जो बैठ किनारे सोचे
उसको कभी नही मिलते हैं पार जाने के मौके।।

यही सोच कर राणा ने जब शस्त्र उठाये अपने
बोल पड़ा था भील वो शब्द सुने थे सबने
जाते हो जाओ पर इक विनय सुनो तुम मेरी
फड़क रहे है बाजू ज्यो ज्यों बजती रणभेरी।।

है अंधियारी रात घनी तुम मुट्ठी भर जुगनू हो
राष्ट्र शत्रु के लिए यम और प्रलयंकर बने हुए हो
पर हमको भी दो इक अवसर माता पर मरने का
मोल चुकाने और तुम मुझको मामा होने का।।

अब दुविधा मे थे प्रताप ये कैसा दांव लगा है
कैसा भाग्य लिखा नियति ने कैसा चाल चला है
हां कहता तो राजधर्म से नाहक निष्ठ गंवाऊं
ना कहकर क्या वीर हृदय को चोट लगाऊं।।

इतने मे पुंजा ने दुविधा को भांप लिया था
असमंजस को निज अनुभव से नाप लिया था
होता गर मै सगा तुम्हारा तो क्या ऐसा करते
ऊंचा गोत्र देखकर मेरा शायद तुम हां करते।।

जानबूझकर नश्तर मारा कोमल मृदुल हृदय मे
निज आहूति देने को आतुर था वो धर्म विजय में
राणा ने फिर आह भरी और तर्क बचा ना बाकी
इसी तर्क से हुए निरूत्तर अंतिम मे बस हां की।।

ठान लिया मुगलों को राजे की तलवारें तौलेंगी
भीलों की सुन्दर धनुहैं भी संग मे जय बोलेंगी
समरयज्ञ मे थी धधकी घोर प्रस्फुटित ज्वाला
तीरों संग तलवारों से अब कौन बचाने वाला।।

हिन्दी कथानक:-  हिन्दी जगत की लघु कथाओं का एक ऐसा मंच है जहां शशिवेन्द्र "शशि" द्वारा लिखित कथायें प्रस्तुत की जाती हैं।...
19/11/2022

हिन्दी कथानक:- हिन्दी जगत की लघु कथाओं का एक ऐसा मंच है जहां शशिवेन्द्र "शशि" द्वारा लिखित कथायें प्रस्तुत की जाती हैं। सामान्य भारतीय जनमानस का प्रतिनिधित्व करती एवं भारतीयता के रंग से ओतप्रोत यह अपनी जड़ो एवं मूल्यों से जुड़ने का एक लघु प्रयास है।
आधुनिक परिवेश की आपा धापी मे यहां आप ऐसी पठनीय सामग्री की आशा कर सकते है जो कुछ पल सुकून और शांति के प्रदान करती हैं।

🙏विचार एवं आलोचना का सहर्ष स्वागत है।

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16/11/2022

मुक्ति

हिन्दु धर्म मे तर्पण और अंत्येष्टि का बड़ा महत्व है बिना सम्पूर्ण क्रिया के मृतात्मा को सद्गति नही मिलती। अतः लोग अपने प्रियजन की मृत्यु का क्रियाकर्म बड़ी श्रद्धा से कराते थे इसके लिए आवश्यकता होत है ज्ञानी और सदाचारी ब्राह्मण की।

ब्रहंनाथ तिवारी की कई पीढियां घाट पर क्रिया कर्म कराती रही हैं। जब से होश संभाला तो दादा जी के साथ जाना शुरू किया था। दादा के नाम का डंका बजता था पर वो अपने खुद के बेटे के आचरण से नाखुश थे अतः पोते को बचपन से ही सिखाते थे।

हालांकि गांव के हमउम्र बच्चे ब्रहंनाथ को महाब्राह्मण कह कर चिढ़ाते थे तीन तेरह का भेद बना कर भी मजाक करते थे। जब बालक ब्रह्मंनाथ व्यंग्य और अपमान से क्षुब्ध हो जाता तो दादा से शिकायत करता। दादा समझाते ब्राह्मण कौन है?

जो ब्रह्मा का अंश है औरों को भी ब्रहं का ही अंश मानता है। जब सभी उसीका अंश तो फिर एक का दूसरे से भेद क्यूं।

तुम बताओ जन्म और वैवाहिक बंधन श्रेष्ठ या मुक्ति पाकर आत्मा का परमात्मा से मिलन?

मुक्ति, हर्षित होकर ब्रह्मंनाथ बोले

और मुक्ति मे माध्यम कौन?

ब्रहंनाथ चहककर बोलते:- महाब्राह्मण

फिर बड़ा छोटा कोई हुआ क्या।

खिलखिलाते ब्रहंनाथ ना मे सिर हिलाकर दादा से चिपट जाते और खूब सारा प्यार पाते।

दादा के कई चेहरे थे कभी उग्र कभी मद्धम पर कर्म के प्रति न्यायवादिता पर बेजोड़ थे।

गांव मे कई बार विवाद उठा दादा बड़े स्पष्ट थे मृत शरीर की कोई जाति नहीं यदि है तो सिर्फ उसका धर्म अर्थात रीति रिवाज के अनुसार शव की अंत्येष्टि करना ही उचित सम्मान है।

दादा को मरे कई दशक हो गये माता पिता भी गुजर गये समय बदल गया था। लोगो मे भौतिकता और आधुनिकता कूट कूट कर भरी हुई थी। लोग जीवित माता पिता को साथ रखने को राजी नही तो मरने के बाद क्या खर्च करते। जमाना किरिस्तानी सोच का हो गया था।

आमदनी कम हो गई थी घर मे बच्चे और पत्नी कुल पांच प्राणी इस महंगाई मे खर्च चलाना भारी था खेती बाड़ी कोई दूसरा कमाई का श्रोत और नही था।

घाट पर बैठे यही कुछ सोच रहे थे कि बंधू नाई की आवाज से तन्द्रा टूटी

अरे बाबा,सुने वो धर्मशाला वाली बुढ़िया माई मर गई।

बरसों पहले एक बुजूर्ग औरत कहीं से भटकती हुई इस गाँव मे आयी रहने का कोई ठौर नही था तो नदी किनारे एक पुराने जर्जर धर्मशाला में ही ठिकाना बना लिया गाहे बगाहे तिवारी भी दान दक्षिणा का सामान दे आते थे। आज उसकी मृत्यु की खबर पर जाने क्यूं आंखे भर आयीं थी। दोनो धर्मशाला पहुंचे सूरज आसमान मे दो लट्ठ उपर चढ़ आया था। शव को ससम्मान घाट तक ले जाया गया सारी तैयारी हो गई थी, प्रश्न था अब मुखाग्नि कौन दे।

ब्रहंनाथ ने कुर्ता निकाला जनेऊ और धोती पहने हुए सारी क्रियायें विधिपूर्वक संपन्न की। जन सहयोग से तेरहवीं की विधिवत तैयारी की गई।

तेरहवीं के दिन ब्रहंनाथ को दादा बरबस याद आ गये "मुक्ति" दिलाने वाला ही श्रेष्ठ हैं



:- शशिवेन्द्र "शशि"

अधूरा वादा"भरारा" स्टेशन पर गाड़ी आज थोड़ी ज्यादा देर तक रूकी, नीलेश खिड़की से अपने गांव जाने वाले रास्ते को निहार रहा थ...
10/11/2022

अधूरा वादा

"भरारा" स्टेशन पर गाड़ी आज थोड़ी ज्यादा देर तक रूकी, नीलेश खिड़की से अपने गांव जाने वाले रास्ते को निहार रहा था। नरकट और सरपत के झुरमुटों से ढकी पगडण्डी और हल्की हवा से हिलते पत्ते जैसे सिर हिला हिला कर उसको विदा कर रहे हों बरसों पहले पिता जी वहीं एक छोटी सी गुमटी पर इंतजार करते हुए मिलते थे, कुर्ता पाजामा पहने, पान से लाल होंठ मुस्कराते हुए, चरण स्पर्श करने के बाद वहां जुटे लोगों का अभिवादन और फिर बाप बेटे अपनी पुरानी बुलेट पर गांव तक उस पगडण्डी का 4 कोस का सफर लचकते हिलते डुलते पूरा करते थे, पहुंचने तक सांझ हो जाती थी, गाड़ी से उतरते ही ओसारे मे लालटेन जलाती मां दीखती पर घर मे घुसने से पहले कुल देवी को प्रणाम करके ही आगे बढ़ना होता था, मां आगे बढ़कर आंचल से ढक कर ढेरों आशीर्वाद देते हुए अंदर ले जाती थी।

बातें शुरू होती तो खाते-पीते, सोने तक खूब बातें पिछली पुरानी, विस्मृत, शरारती, ठिठोली खत्म ही न होने वाली पर पिता जी के सामने गंभीरतापूर्वक फिर जाने कब नींद आ जाती और सुबह नींद खुलती तब तक पूरा गांव जग जाता था।

पूरे घर मे उत्सव का माहौल रहता बाहर से मित्र और संबंधी भी मिलने आते थे, कुशल क्षेम के साथ ही दावत पर भी बुलाया जाना लेकिन इतने दिनो तक शहर का खाना फिर मां के हाथ के खाने का मौका कौन छोड़ दे।

सीधे मना भी नही कर सकते सो रोज मां को दो तीन लोगो के लिए अतिरिक्त खाना बनाना पडता था।

मां खुश रहती थीं, पूरा घर पुलकित रहता था लेकिन न जाने क्यूं छुटटियों के दिन जल्दी बीत जाते और लौटने की तैयारी शुरू हो जाती अभी तो ठीक से बातें भी ख़त्म नही हुई, वहां मंदिर मे जाना था, मामा के घर भी जाना है।

मां अबकी बार कैसे होगा लेकिन अगली बार जब आउंगा तब जरूर चलेंगे, यही अधूरा वादा हर बार करके नीलेश लौटता था मां चुप रह जाती थीं। अब जबकि बहुत कुछ बदल गया, ना पिता जी रहे ना ही वो गुमटी, रह गया तो सिर्फ नीलेश का बहुप्रतीक्षित वादा, वो भी आधा, अधूरा, अपूर्ण..........

ट्विटर

:-शशिवेन्द्र "शशि"

"भरारा" स्टेशन पर गाड़ी आज थोड़ी ज्यादा देर तक रूकी, नीलेश खिड़की से अपने गांव जाने वाले रास्ते को निहार रहा था। नरक.....

बुद्ध पर न क्षणिक द्वंद हैंबुद्ध तो निरद्वंद हैंउच्चस्थ मानदंड कास्वर्णिम काल-खंड है।।http://mailtoshashi.blogspot.com/2...
10/11/2022

बुद्ध पर न क्षणिक द्वंद हैं
बुद्ध तो निरद्वंद हैं
उच्चस्थ मानदंड का
स्वर्णिम काल-खंड है।।
http://mailtoshashi.blogspot.com/2022/07/blog-post.html
विकराल लोल लोपसा
भयावही कराल काढ़
बढ़ी कलिंग लीलने
मनुष्यता को छीनने।।
उन्मत चंडाशोक था
अखण्ड जिसका जोश था।।
शोणित नदी बहाने को
आतुर था शव बिछाने को।।
सहस्त्र सैन्य साजकर
पैदल, रथ,वाजि, गज।।
कलिंग दुर्ग आ डटा
विरोध पे ना पग हटा।।
धावा करेगा सूर्य पर
किले के शीर्ष तूर्य पर।।
कलिंग वीरदेश था
संकल्पों मे बंधा हुआ।।
न एक पग पीछे हटे
सूरमा सब रण में डटे।।
सहस्त्रों शीश कट गयें
ताजी रक्त धार बह चली।।
मानवता को धिक्कारती
चीखती पुत्कारती।।
दहाडे मार रो पडीं
जो नारियां थी बच रहीं।।
इस दर्द को ना सह सका
अशोक वहां ना रूक सका।।
विक्षिप्त आप मानकर
धिक्कारने लगा वो स्वयं को।।
यह क्या अनर्थ हो गया
विजय का हार व्यर्थ हो गया।।
अब अश्रुधार बह चली
हृदय मे घोर खलबली।।
आत्मग्लानी मे न यूँ जलो
बुद्ध की शरण चलो।।
वही सभी को तारते
नयी दिशा संवारते।।
मन मे ऐसा ठानकर
भावावेश जानकर।।
शरण मे आके गिर पड़ा
नि:शक्त था न हो पाया खड़ा।।
यह क्या ही पाप हो गया
बचा हुआ भी खो गया।।
जब लुट चुका संसार है
क्या बच रहा जो तार दें।।
वह बौद्ध भिक्षु बन गया
चंडाशोक अब "पियदर्शी" हो गया।।


शशिवेन्द्र "शशि"

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Samarth Academy Shalimar Garden
Ghaziabad
201005

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