17/01/2023
एक मूर्तिकार
एक पत्थर को तोड़ रहा था।
कोई देखने गया कि
मूर्ति कैसे बनाई जाती है।
उसने देखा कि
मूर्ति तो बिलकुल नहीं बनाई जा रही है,
सिर्फ़ छैनी और हथौड़े से
पत्थर तोड़ा जा रहा था ।
उस आदमी ने पूछा,
यह आप क्या कर रहे हैं?
मूर्ति नहीं बनाएँगे।
मैं तो मूर्ति का बनना देखने अाया हूँ।
आप तो सिर्फ़ पत्थर तोड़ रहे हैं ।
उस मूर्तिकार ने कहा कि
मूर्ति तो पत्थर के भीतिर छिपी है
उसे बनाने की ज़रूरत नहीं है,
सिर्फ़ उसके ऊपर जो व्यर्थ पत्थर जुड़ा है
उसे अलग करने की ज़रूरत भर है,
और मूर्ति प्रकट हो जाए।
मूर्ति बनाई नहीं जाती मूर्ति सिर्फ़
आविष्कृत होती है,
अनावृत होती है,
उघाड़ी जाती है।
मनुष्य के भीतिर प्रेम छिपा है,
सिर्फ़ उघाड़ने की बात है।
उसे पैदा करने का कोई सवाल नहीं है ।
अनावृत करने की बात है ।
कुछ है,
जो हमने उपर से ओढ़ा हुअा है,
जो प्रेम को प्रकट नहीं होने देता ।