29/07/2026
🕉️ योगी राज दृष्टि से अद्वैत रहस्य
🌕 गुरु पूर्णिमा महोत्सव
"जिसने स्वयं को जान लिया, उसी ने परमात्मा को जान लिया।"
यही अद्वैत का परम रहस्य है। आत्मा और परमात्मा दो नहीं हैं। जब तक मनुष्य स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार मानता है, तब तक वह संसार के बंधन में रहता है। जैसे ही अपने वास्तविक स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, वही ब्रह्म का साक्षात्कार है।
उदाहरण
एक घड़े के भीतर का आकाश और बाहर का आकाश अलग दिखाई देते हैं। परंतु जब घड़ा टूट जाता है, तब पता चलता है कि आकाश कभी अलग था ही नहीं। उसी प्रकार शरीर और अहंकार ही जीव और ब्रह्म का भेद प्रतीत कराते हैं। अज्ञान का घड़ा टूटते ही केवल ब्रह्म ही शेष रहता है।
अष्टावक्र गीता
अष्टावक्र ऋषि कहते हैं कि "तुम न शरीर हो, न मन हो; तुम शुद्ध, साक्षी, चैतन्य स्वरूप हो।" जब यह प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है, तब संसार का आकर्षण स्वयं क्षीण होने लगता है।
विज्ञान भैरव तंत्र
भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि मन के मध्य, श्वास के मध्य या "मैं" के विलय के क्षण में जो शुद्ध जागरूकता प्रकट होती है, वही भैरव स्वरूप है। वहाँ इच्छा, वासना और द्वैत का अस्तित्व नहीं रहता।
गुरु गोरखनाथ
गुरु गोरखनाथ का उपदेश है कि जो अपने भीतर के अमर तत्व को पहचान लेता है, वही सच्चा योगी है। उसका जीवन संसार में रहते हुए भी संसार से मुक्त हो जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण
भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं कि स्थितप्रज्ञ पुरुष कामनाओं का त्याग कर आत्मा में ही संतुष्ट रहता है। ऐसा ज्ञानी कर्म करता हुआ भी कर्म से बंधता नहीं।
भगवान गौतम बुद्ध
भगवान बुद्ध ने तृष्णा को दुःख का मूल कारण बताया। जहाँ तृष्णा समाप्त होती है, वहीं निर्वाण प्रकट होता है। निर्वाण कोई स्थान नहीं, बल्कि वासनाओं से मुक्त शुद्ध जागरूकता की अवस्था है।
महर्षि पतंजलि
पतंजलि योगसूत्र कहते हैं—"योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।" जब चित्त की वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं, तब द्रष्टा अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है। वही आत्मसाक्षात्कार है।
वासना और ब्रह्मज्ञान
ब्रह्मतत्त्व को जानने वाला व्यक्ति भीतर से संसार की वासनाओं का दास नहीं रहता। वह संसार में रह सकता है, परिवार का पालन कर सकता है, कर्म भी कर सकता है; पर भीतर आसक्ति, अहंकार और तृष्णा का बंधन नहीं रहता।
यदि मन निरंतर विषय-वासनाओं और अहंकार में ही उलझा है, तो यह संकेत है कि ब्रह्मतत्त्व का प्रत्यक्ष अनुभव अभी शेष है। इसलिए यह शिक्षा दूसरों का निर्णय करने के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर झाँकने के लिए है।
गुरु पूर्णिमा का संदेश
गुरु वह है जो शिष्य को स्वयं के वास्तविक स्वरूप तक पहुँचा दे। बाहरी गुरु अंततः भीतर के आत्मगुरु का द्वार खोलते हैं।
"जिसने स्वयं को जान लिया, उसी ने परमात्मा को जान लिया।"
ॐ शिव गोरक्ष आदेश। आदेश।