True friendship..Friends Forever

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Photos 14/08/2016

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

आप सभी को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें::

शहीद जवान के बच्चे की कविता दिल छू गई::

ओढ़ के तिरंगा क्यों पापा आये है?

माँ मेरा मन बात ये समझ ना पाये है,

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

पहले पापा मुन्ना मुन्ना कहते आते थे,

टॉफियाँ खिलोने साथ में भी लाते थे।

गोदी में उठा के खूब खिलखिलाते थे,

हाथ फेर सर पे प्यार भी जताते थे।

पर ना जाने आज क्यूँ वो चुप हो गए,

लगता है की खूब गहरी नींद सो गए।

नींद से पापा उठो मुन्ना बुलाये है,

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

फौजी अंकलों की भीड़ घर क्यूँ आई है,

पापा का सामान साथ में क्यूँ लाई है।

साथ में क्यूँ लाई है वो मेडलों के हार ,

आंख में आंसू क्यूँ सबके आते बार बार।

चाचा मामा दादा दादी चीखते है क्यूँ,

माँ मेरी बता वो सर को पीटते है क्यूँ।

गाँव क्यूँ शहीद पापा को बताये है,

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

माँ तू क्यों है इतना रोती ये बता मुझे,

होश क्यूँ हर पल है खोती ये बता मुझे।

माथे का सिन्दूर क्यूँ है दादी पोछती,

लाल चूड़ी हाथ में क्यूँ बुआ तोडती।

काले मोतियों की माला क्यूँ उतारी है,

क्या तुझे माँ हो गया समझना भारी है।

माँ तेरा ये रूप मुझे ना सुहाये है,

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

पापा कहाँ है जा रहे अब ये बताओ माँ,

चुपचाप से आंसू बहा के यूँ सताओ ना।

क्यूँ उनको सब उठा रहे हाथो को बांधकर,

जय हिन्द बोलते है क्यूँ कन्धों पे लादकर।

दादी खड़ी है क्यूँ भला आँचल को भींचकर,

आंसू क्यूँ बहे जा रहे है आँख मींचकर।

पापा की राह में क्यूँ फूल ये सजाये है,

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

क्यूँ लकड़ियों के बीच में पापा लिटाये है,

सब कह रहे है लेने उनको राम आये है।

पापा ये दादा कह रहे तुमको जलाऊँ मैं,

बोलो भला इस आग को कैसे लगाऊं मैं।

इस आग में समा के साथ छोड़ जाओगे,

आँखों में आंसू होंगे बहुत याद आओगे।

अब आया समझ माँ ने क्यूँ आँसू बहाये थे,

ओढ़ के तिरंगा पापा घर क्यूँ आये थे ।

Note:: इस तरह ही भारत की स्वतंत्रता के लिए पता नही कितने अनगिनत लोग शहीद हुए हैं उन्ही शहीदों के कारण हम अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए। इस स्वतन्त्रता को व्यर्थ ना करो आज हमारे देश में ही पता नही कितने देश के दुश्मन बैठे हैं हमे उन्हें मुह तोड़ जवाब देना चाहिए ताकि आने वाली पीढियां और भी स्वतन्त्रता से जीवनयापन कर सकें।

आप सभी को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें।

Posted by::Roni sharma

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Photos 12/08/2016

सुंदरता हो न हो
सादगी होनी चाहिए
खुशबू हो न हो
महक होनी चाहिए
रिश्ता हो न हो
बंदगी होनी चाहिए
मुलाकात हो न हो
बात होनी चाहिए
यूं तो उलझे है सभी अपनी उलझनों में
पर सुलझाने की कोशिश हमेशा होनी चाहिए ।।

आपका दिन मंगलमय हो

हर हर गंगे जय माँ गंगे।

जय महाकाल। जय जय महाकाल।

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Photos from माँ गंगा आह्वान अखाडा हरिद्वारएक अभियान धर्म के नाम's post 11/08/2016
Photos from माँ गंगा आह्वान अखाडा हरिद्वारएक अभियान धर्म के नाम's post 23/05/2016

जल रहे हैं इंसान नफरत की आग में और जिन्हें कहते हैं जानवर वो प्यार का पाठ पढ़ा रहे हैं।
इंसान सीखा रहा जानवर को अपना तरीका और जानवर इंसान को इंसानियत क्या है ये सिखा रहे हैं।

Photos 18/04/2016

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भगवान शिव के तीन नेत्रों का रहस्य:::

समस्त देवी देवताओं में केवल भगवान शिव के ही तीन नेत्र है लेकिन क्या आप भगवान भोले के तीनों नेत्रों के रहस्यों के बारे में जानते है ? अगर नही तो हम आपकों आज भगवान शिव के तीनों नेत्रों का रहस्य बताते है ।

भगवान भोलेनाथ का एक नाम त्रिलोचन भी है क्योंकि एक मात्र भोले नाथ ही ऐसे हैं जिनकी तीन आंखें हैं। शिव के दो नेत्र तो सामान्य रुप से खुलते और बंद होते रहते हैं लेकिन तीसरी आंख शिव जी तभी खोलते हैं जब शिव जी बहुत क्रोधित होते हैं। इस नेत्र के खुलने का मतलब है प्रलय का आगमन।

ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि शिव जी की तीसरी आंख सामान्य आखों की तरह दिखती नहीं है। शिव के तीन नेत्र इस बात का प्रतीक है कि भगवान शिव में तीनों लोक स्वर्ग, मृत्यु और पाताल समाहित है।

भगवान शिव ही तीनों लोकों पर नजर रखते हैं। शिव के तीन नेत्र इस बात के प्रतीक हैं कि शिव ही संसार में व्याप्त तीनों गुण रज, तम और सत्व के जनक हैं। इनकी ही प्रेरणा से रज, तम और सत्व गुण विकसित होते हैं।

शिव का तीसरा नेत्र वास्तव में ज्ञान नेत्र है, जिसके खुलने मात्र से काम भष्म हो जाता है। इसका प्रमाण है कि जब शिव जी ने पहली बार तीसरी आंख खोली तो कामदेव जलकर भष्म हो गए।

शिव का तीसरा नेत्र मनुष्य के लिए ज्ञान रुपी नेत्र को विकसित करने की प्रेरणा देने वाला है ताकि मनुष्य धरती पर ज्ञान द्वारा काम और वासनाओं से मुक्त होकर मुक्ति प्राप्त कर सके।

हर हर महादेव
जय महाकाल।

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Posted by:: Roni sharma

Photos 15/04/2016

असंभव मनोकामना भी हो सकती है पूरी यदि आप करेंगे इस तरह से शि‍व जी का रुद्राभिषेक::

“भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी”: रामायण
महादेव को प्रसन्न करने का रामबाण उपाय है रुद्राभिषेक. सही समय पर रुद्राभिषेक करके आप शिव से मनचाहा वरदान पा सकते हैं. क्योंकि शिव के रुद्र रूप को बहुत प्रिय है अभिषेक तो आइए जानते हैं, रुद्राभिषेक क्यों है इतना प्रभावी और महत्वपूर्ण….

रुद्राभिषेक की महिमा::
भोलेनाथ सबसे सरल उपासना से भी प्रसन्न होते हैं लेकिन रुद्राभिषेक उन्हें सबसे ज्यादा प्रिय है. कहते हैं कि रुद्राभिषेक से शिव जी को प्रसन्न करके आप असंभव को भी संभव करने की शक्ति पा सकते हैं तो आप भी सही समय पर रुद्राभिषेक करिए और शिव कृपा के भागी बनिए…

रुद्र भगवान शिव का ही प्रचंड रूप हैं.

शिव जी की कृपा से सारे ग्रह बाधाओं और सारी समस्याओं का नाश होता है.

शिवलिंग पर मंत्रों के साथ विशेष चीजें अर्पित करना ही रुद्राभिषेक कहा जाता है.

रुद्राभिषेक में शुक्ल यजुर्वेद के रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों का पाठ करते हैं.

सावन में रुद्राभिषेक करना ज्यादा शुभ होता है.

रुद्राभिषेक करने से मनोकामनाएं जल्दी पूरी होती हैं.

रुद्राभिषेक कोई भी कष्ट या ग्रहों की पीड़ा दूर करने का सबसे उत्तम उपाय है.

कौन से शिवलिंग पर करें रुद्राभिषेक?

अलग –अलग शिवलिंग और स्थानों पर रुद्राभिषेक करने का फल भी अलग होता है. आइए हम आपको बताते हैं कि कौन से शिवलिंग पर रुद्राभिषेक करना ज्यादा फलदायी होता है…

मंदिर के शिवलिंग पर रुद्राभिषेक करना बहुत उत्तम होता है.

इसके अलावा घर में स्थापित शिवलिंग पर भी अभिषेक कर सकते हैं.

रुद्राभिषेक घर से ज्यादा मंदिर में, नदी तट पर और सबसे ज्यादा पर्वतों पर फलदायी होता है.

शिवलिंग न हो तो अंगूठे को भी शिवलिंग मानकर उसका अभिषेक कर सकते हैं.

अलग-अलग वस्तुओं से अभिषेक करने का फल

रुद्राभिषेक में मनोकामना के अनुसार अलग-अलग वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है. ज्योतिष मनाते हैं कि जिस वस्तु से रुद्राभिषेक करते हैं उससे जुड़ी मनोकामना ही पूरी होती है तो आइए जानते हैं कि कौन सी वस्तु से रुद्राभिषेक करने से पूरी होगी आपकी मनोकामना…

घी की धारा से अभिषेक करने से वंश बढ़ता है.

इक्षुरस से अभिषेक करने से दुर्योग नष्ट होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने से इंसान विद्वान हो जाता है.

शहद से अभिषेक करने से पुरानी बीमारियां नष्ट हो जाती हैं.

गाय के दूध से अभिषेक करने से आरोग्य मिलता है.

शक्कर मिले जल से अभिषेक करने से संतान प्राप्ति सरल हो जाती हैं.

भस्म से अभिषेक करने से इंसान को मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है.

कुछ विशेष परिस्थितियों में तेल से भी शिव जी का अभिषेक होता है.

रुद्राभिषेक कब होता है सबसे उत्तम?:::
कोई भी धार्मिक काम करने में समय और मुहूर्त का विशेष महत्व होता है. रुद्राभिषेक के लिए भी कुछ उत्तम योग बनते हैं. आइए जानते हैं कि कौन सा समय रुद्राभिषेक करने के लिए सबसे उत्तम होता है…

रुद्राभिषेक के लिए शिव जी की उपस्थिति देखना बहुत जरूरी है.

शिव जी का निवास देखे बिना कभी भी रुद्राभिषेक न करें.

शिव जी का निवास तभी देखें जब मनोकामना पूर्ति के लिए अभिषेक करना हो.

शिव जी का निवास कब मंगलकारी होता है?::
देवों के देव महादेव ब्रह्माण्ड में घूमते रहते हैं. महादेव कभी मां गौरी के साथ होते हैं तो कभी-कभी कैलाश पर विराजते हैं. ज्योतिषाचार्याओं की मानें तो रुद्राभिषेक तभी करना चाहिए जब शिव जी का निवास मंगलकारी हो…

हर महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया और नवमी को शिव जी मां गौरी के साथ रहते हैं.

हर महीने कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी और अमावस्या को भी शिव जी मां गौरी के साथ रहते हैं.

कृष्ण पक्ष की चतुर्थी और एकादशी को महादेव कैलाश पर वास करते हैं.

शुक्ल पक्ष की पंचमी और द्वादशी तिथि को भी महादेव कैलाश पर ही रहते हैं.

कृष्ण पक्ष की पंचमी और द्वादशी को शिव जी नंदी पर सवार होकर पूरा विश्व भ्रमण करते हैं.

शुक्ल पक्ष की षष्ठी और त्रयोदशी तिथि को भी शिव जी विश्व भ्रमण पर होते हैं.

रुद्राभिषेक के लिए इन तिथियों में महादेव का निवास मंगलकारी होता है.

शिव जी का निवास कब अनिष्टकारी होता है?::
शिव आराधना का सबसे उत्तम तरीका है रुद्राभिषेक लेकिन रुद्राभिषेक करने से पहले शिव के अनिष्‍टकारी निवास का ध्यान रखना बहुत जरूरी है…

कृष्णपक्ष की सप्तमी और चतुर्दशी को भगवान शिव श्मशान में समाधि में रहते हैं.

शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी और पूर्णिमा को भी शिव श्मशान में समाधि में रहते हैं.

कृष्ण पक्ष की द्वितीया और नवमी को महादेव देवताओं की समस्याएं सुनते हैं.

शुक्लपक्ष की तृतीया और दशमी में भी महादेव देवताओं की समस्याएं सुनते हैं.

कृष्णपक्ष की तृतीया और दशमी को नटराज क्रीड़ा में व्यस्त रहते हैं.

शुक्लपक्ष की चतुर्थी और एकादशी को भी नटराज क्रीड़ा में व्यस्त रहते हैं.

कृष्णपक्ष की षष्ठी और त्रयोदशी को रुद्र भोजन करते हैं.

शुक्लपक्ष की सप्तमी और चतुर्दशी को भी रुद्र भोजन करते हैं.

जय महाकाल:::::

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Photos 14/04/2016

जानिए कैसे शिवजी के त्रिशूल पर टिकी है काशी:::
काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। मान्यता है कि काशी भगवान भोलेनाथ के त्रिशूल पर टिकी है। यह कथन बहुत प्राचीन है।
आज भी कहा जाता है कि काशी इस पृथ्वी पर नहीं, बल्कि भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है। वे जटा में जहां गंगा को धारण करते हैं, अपने त्रिशूल पर काशी को स्थान देते हैं।

इस मान्यता का क्या अर्थ है? वास्तव में यहां त्रिशूल और काशी के बीच बहुत निकट के संबंध को बताया गया है। त्रिशूल से भगवान शिव भक्तों को अभय रहने का वरदान देते हैं और इसी से दुष्टों को दंड भी देते हैं।

त्रिशूल पर काशी को धारण करने का अर्थ है- काशी की प्राचीनता, पवित्रता की स्वयं भोलेनाथ रक्षा करते हैं। विभिन्न ग्रंथों में कहा गया है कि काशी में भगवान शिव अखंड वास करते हैं। यह बाबा विश्वनाथ की नगरी है जो संपूर्ण विश्व के नाथ हैं।

मनुष्य के जीवन में तीन तरह के कष्ट माने जाते हैं- दैविक, दैहिक और भौतिक। काशी के कण-कण में भगवान शिव का वास है।

यहां शिव के दर्शन करने से ये तीनों ताप दूर होते हैं तथा जीवन में शीतलता का आगमन होता है। शिव के त्रिशूल से इन तीनों का शमन होता है। इसलिए कहा जाता है कि काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी है।

इसे मुक्ति की नगरी भी कहा जाता है। मान्यता है कि जो काशी में देहत्याग करता है, शिव उसके कान में मुक्ति का मंत्र फूंकते हैं। प्रश्न है कि वाराणसी को यह नाम क्यों मिला?

दरअसल यह नाम इसे दो नदियों की वजह से मिला। यहां वरुणा और अस्सी नदियां प्रवाहित होने से दोनों नदियों के नाम को मिलाकर संयुक्त रूप से इस नगरी को वाराणसी कहा जाता है।

हर हर महादेव
जय हो काशी विश्वनाथ महादेव
Sharma

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Photos 08/04/2016

अवश्य पढ़ें तथा महाकाल की जय बोल कर ये पेज भी like करें।

काल का पत्र, मनुष्य के नाम:::
एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था. एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को अपना मित्रबना लिया.उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र, तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगो!काल ने कहा- ये मृत्यु लोक है. जो आया है उसे मरना ही है. सृष्टि का यह शाश्वत नियम है इस लिए मैं मजबूर हूं. पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी रियायत कर सकता हूं, करूंगा ही. मुझ से क्या आशा रखते हो साफ-साफ कहो.व्यक्ति ने कहा- मित्र मैं इतना ही चाहता हूंकि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल- बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं.काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है, मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा. चिंता मत करो. चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो.मनुष्य बड़ा प्रसन्न हुआ सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया, मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे.

दिन बीतते गये आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची. काल अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोला- मित्र अब समय पूरा हुआ. मेरे साथ चलिए. मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोड़ूंगा.मनुष्य के माथे पर बल पड़ गए, भृकुटी तन गयी और कहने लगा- धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर. मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती?तुमने मुझे वचन दिया था कि लेने आने से पहले पत्र लिखूंगा. मुझे बड़ा दुःख है कि तुम बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए. मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया.काल हंसा और बोला- मित्र इतना झूठ तो न बोलो. मेरे सामने ही मुझे झूठा सिद्ध कर रहे हो. मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे. आपने एक भी उत्तर नहीं दिया.मनुष्य ने चौंककर पूछा – कौन से पत्र? कोई प्रमाण है? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है तो दिखाओ.काल ने कहा – मित्र, घबराओ नहीं, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं.

मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला, आपके काले सुन्दर बालों को पकड़ कर उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो.नाम, बड़ाई और धन-संग्रह के झंझटो को छोड़कर भजन में लग जाओ पर मेरे पत्र का आपके ऊपर जरा भी असर नहीं हुआ.बनावटी रंग लगा कर आपने अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए. आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं.कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा. नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी.फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे. दो मिनिट भी संसार की ओर से आंखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया.इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकीदीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा.

इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया.आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे.मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बात एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है.अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग- क्लेश तथा पीड़ाओ को भेजा परन्तु आपने अहंकारवश सब अनसुना कर दिया.जब मनुष्य ने काल के भेजे हुए पत्रों को समझातो फूट-फूट कर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मोपर पश्चाताप करने लगा. उसने स्वीकार किया कि मैंने गफलत में शुभ चेतावनी भरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा.मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा. अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊंगा, पर वह कल नहीं आया.काल ने कहा – आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग-रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए किया. जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़कर जो काम करता है, वह अक्षम्य है.मनुष्य को जब अपनी बातों से काम बनता नज़र नहीं आया तो उसने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया.

काल ने हंसकर कहा- मित्र यह मेरे लिए धूलसे अधिक कुछ भी नहीं है. धन-दौलत, शोहरत, सत्ता, ये सब लोभ संसारी लोगो को वश में कर सकता है, मुझे नहीं.मनुष्य ने पूछा- क्या कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तुम्हें भी प्रिय हो, जिससे तुम्हें लुभाया जा सके. ऐसा कैसे हो सकताहै!काल ने उत्तर दिया- यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मो का धन संग्रह करते. यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था. अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था. पर तुम्हारे पास तो यह धन धेले भर का भी नहीं है.तुम्हारे ये सारे रूपए-पैसे, जमीन-जायदाद, तिजोरी में जमा धन-संपत्तिसब यहीं छूट जाएगा. मेरे साथ तुम भी उसी प्रकार निवस्त्र जाओगे जैसे कोई भिखारी की आत्मा जाती है.काल ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय-हाय करके रोने लगा.

सभी सम्बन्धियों को पुकारा परन्तु काल ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर.काल ने कितनी बड़ी बात कही. एक ही सत्य हैजो अटल है वह है कि हम एक दिन मरेेंगे जरूर. हम जीवन में कितनी दौलत जमा करेंगे, कितनी शोहरत पाएंगे, कैसी संतान होगी यह सब अनिश्चित होता है, समय के गर्भ में छुपा होता है.परंतु हम मरेगे एक दिन बस यही एक ही बात जन्म के साथ ही तय हो जाती है. ध्रुव सत्यहै मृ्त्यु. काल कभी भी दस्तक दे सकता है.प्रतिदिन उसकी तैयारी करनी होगी.समय के साथ उम्र की निशानियों को देख कर तो कम से कम हमें प्रभु की याद में रहने का अभ्यास करना चाहिए और अभी तो कलयुग काअन्तिम समय है इस में तो हर एक को चाहे छोटा हो या बड़ा सब को प्रभु की याद में रहकर ही कर्म करने हैं.

जय श्री महाकाल।

Posted by:: महाकाल भक्त

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Photos 05/04/2016

खुशहाली जीवन के लिए ये काम कभी ना करे:
1=रसोई घर के पास में पेशाब करना ।
2=टुटी हूई कन्घी से कंगा करना ।
3=टूटा हुआ सामान उपयोग करना।
4= घर में कूडा-करकट रखना।
5=रिश्तेदारो से बदसुलूकी करना।
6=बांए पैर से पैंट पहनना।
7=सांध्या वेला मे सोना।
8=मेहमान आने पर नाराज होना।
9=आमदनी से ज्यादा खर्च करना।
10=दाँत से रोटी काट कर खाना।
11=चालीस दीन से ज्यादा बाल रखना
12=दांत से नाखून काटना।
13=खडे खडे पेशाब करना ।
14=औरतो का खडे खडे बाल बांधना।
15 =फटे हुए कपड़े पहनना ।
16=सुबह सूरज निकलने तक सोते रहना।
17=पेंड के नीचे पेशाब करना।
18=बैतूल खला में बाते करना।
19=उल्टा सोना।
20=श्यमशान भूमि में हसना ।
21=पीने का पानी रात में खुला रखना
22=रात में मागने वाले को कुछ ना देना
23=बुरे ख्याल लाना।
24=पवित्रता के बगैर धर्मग्रंथ पढना।
25=शौच करते वक्त बाते,करना।
26=हाथ धोए बगैर भोजन करना ।
27=अपनी औलाद को कोसना।
28=दरवाजे पर बैठना।
29=लहसुन प्याज के छीलके जलाना।
30=साधू फकीर को अपमानित करना या उस से
रोटीया फिर और कोई चीज खरीदना।
31=फूक मार के दीपक बुझाना।
32=ईश्वर को धन्यवाद किए बगैर भोजन करना।
33=झूठी कसम खाना।
34=जूते चप्पल उल्टा देख करउसको सीधा नही करना।
35=हालात जनाबत मे हजामत करना।
36=मकड़ी का जाला घर में रखना।
37=रात को झाडू लगाना।
38=अन्धेरे में भोजन करना ।
39=घड़े में मुंह लगाकर पानी पीना।
40=धर्मग्रंथ न पढ़ना।
41=नदी , तालाब में शौच साफ करना और उसमें पेसाब करना ।
42=गाय , बैल को लात मारना ।
43=माँ-बाप का अपमान करना ।
44=किसी की गरीबी और लाचारी का मजाक उडाना ।
45=दाँत गंदे रखना और रोज स्नान न करना ।
46=बिना स्नान किये और संध्या के समय भोजन करना ।
47=पडोसियों का अपमान करना , गाली देना ।
48=मध्यरात्रि में भोजन करना ।
49=गंदे बिस्तर में सोना ।
50=वासना और क्रोध से भरे रहना ।
51= दूसरे को अपने से हीन समझना । आदि ।
शास्त्रों में है कि जो दूसरो का भला करता है ,ईश्वर उसका भला करता है।

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Posted by:: Roni sharma

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