हमें अपने परिवार की परम्पराएँ कुल,गोत्र एवं पूर्वजों के बारे में जानकारी होना कितना ज़रूरी है ?
अपने परिवार की जड़ों—यानी कुल, गोत्र और पूर्वजों—के बारे में जानना केवल पुरानी बातों को याद करना नहीं है, बल्कि यह अपनी पहचान को समझने की एक गहरी प्रक्रिया है। भारतीय संस्कृति में इसका महत्व आध्यात्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक तीनों दृष्टिकोणों से है।
जब हमें पता होता है कि हमारे पूर्वज कौन थे और उन्होंने समाज में क्या योगदान दिया, तो हमारे भीतर एक आत्म-सम्मान का भाव पैदा होता है। यह हमें समझने में मदद करता है कि हम कौन हैं और किस महान विरासत का हिस्सा हैं।
हर 'कुल' की अपनी कुछ विशेष परंपराएं और मूल्य होते हैं। उन्हें आगे बढ़ाना हमारा दायित्व होता है।अनेक घरों में कुलदेवी -कुलदेवता की पूजा आने वाली पीढ़ियां को अपने मूल से जोड़े रखती है।
'गोत्र' प्रणाली का एक मुख्य आधार जीन (Genes) की शुद्धता बनाए रखना है।प्राचीन ऋषियों ने 'सगोत्र विवाह' को वर्जित किया था ताकि आनुवंशिक बीमारियाँ अगली पीढ़ी में न जाएँ।अपने गोत्र को जानने का अर्थ है अपने DNA वंश (Lineage) को समझना।
हिंदू धर्म में 'पितृ ऋण' की अवधारणा है।अपने पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना , हम अपना नैतिक कर्तव्य मानते हैं।श्राद्ध और तर्पण जैसी परंपराएं इसी कृतज्ञता का प्रतीक हैं।
कुल और गोत्र के माध्यम से हम समाज के एक बड़े नेटवर्क से जुड़ते हैं। यह समान मूल वाले लोगों के बीच भाईचारे और सामूहिकता की भावना को मजबूत करता है।
अपनी जड़ों को भूलना उस पेड़ की तरह होने जैसा है जिसकी जड़ें काट दी गई हों; ऐसा पेड़ लंबे समय तक खड़ा नहीं रह सकता। पूर्वजों की जानकारी हमें जड़ों से मजबूती और भविष्य के लिए दिशा प्रदान करती है।
"जिस व्यक्ति को अपने अतीत पर गर्व नहीं है, वह कभी एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता।"
Quien es Maestro
Hi! I'm Gita Parihar,former principal of a public school,having spent 35 years among students of pre-primary to 10+2 level.
During this period I attended a good number of conferences & presented my papers in seminars.I experienced the challenges before the teachers teaching english as 2nd language.I felt that neither students nor parents give due importance to learning english as compared to PCM/PCB .It's not easy to establish the importance of learning english I wish to share my part of experience through this page.
मौसम
खुशगवार मौसम कहे, किस पर हो उपकार,
कहीं हँसी की धूप है, कहीं घिरा अँधियार।
किसी द्वार पर राग है, किसी उर में शूल,
कहीं सावन मुसकाए है, कहीं सूखी धूल।
कहीं खेतों में हरियाली, कहीं टूटी आस,
किसी के हिस्से मधु ,किसी के हिस्से प्यास।
हवा किसी को छू सके, किसी को छोड़ जाए,
किस्मत की इस चाल को, मौसम न समझाए।
खुशगवार मौसम जाने, किस पर मेहरबान हो,
कहीं सोना उपजे, कहीं मेहनत निष्काम हो।
किसी के होंठों पर तृप्ति, किसी के हिस्से प्यास,
किसी के घर में उत्सव, किसी की टूटती आस।
कहीं सावन गीत जगाए, कहीं आँसू बन बरसे,
किसी को पीड़ा तडपाए, किसी पर धैर्य बरसे।
खुशगवार मौसम जाने, किस पर मेहरबान हो,
कहीं भाग्य सँवारे, कहीं सब्र का इम्तिहान हो।
प्रेम:बंधन या मुक्ति
प्रेम अपने आप में न बंधन है, न मुक्ति; यह एक ऊर्जा है।यदि प्रेम जकड़ने का काम करता है, तो वह बंधन है।यदि प्रेम स्वतंत्र करने का काम करता है, तो वह मुक्ति है।सच्चा प्रेम उड़ने की शक्ति देता है, न कि जंजीरों में जकड़ता है।
ओशो का मानना है कि यदि प्रेम में स्वतंत्रता नहीं है, तो वह प्रेम नहीं, बल्कि एक समझौता है।प्रेम बहती हुई नदी की तरह है, जिसे दीवारों में नहीं बांधा जा सकता।
प्रेम में अपेक्षाएँ और अधिकार की भावना उसे बंधन बना देती है,विशेषकर तब जब हम सामने वाले को अपनी शर्तों पर चलाना चाहते हैं।
जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो उसकी सुख-दुख से स्वयं को जोड़ लेते हैं। उसकी चिंता हमारी चिंता बन जाती है।यह मुक्ति के साथ निभाया गया बंधन है।
जब प्रेम प्रभु से होता है तो व्यक्ति किसी बंधन में नही बंधना,अपने में खोया रहना.है, विषय भोगों से ,अज्ञान भावमुक्त से हो जाता है।
मोद
मोद बसे जिस हृदय में, शीतल होवे चित्त।
छिन जाए सब क्लेश तब, हँसे जीवन नित्य॥
मोद बिना मन सूना है, सूनी हर एक राह।
मोद मिले तो क्षण बने, उत्सव-सी हर चाह॥
मोद न धन से उपजता, न ही ऊँचे मान।
संतोषी मन में सदा, करता यह निवास॥
मोद जहाँ मुस्कान है, मोद वहीं संसार।
थोड़ा पा जो हर्ष ले, वही सफल विचार॥
मोद' रस की बूँद सा, सूखा मन हरियाय।
मीठे बोल, कोमल दृष्टि, जीवन रस भर लाय॥
हम सच्चाई से मुंह मोड़ सकते हैं लेकिन इसके परिणाम से मुंह नहीं मोड़ सकते।"
यह कथन महान विचारक और लेखक स्टीफन कोवे के दर्शन से प्रेरित है। यह जीवन के एक अटल सत्य को दर्शाता है: स्वतंत्रता चुनाव करने में है, परिणामों में नहीं।
सच्चाई धूप की तरह होती है।हमअपनी आँखें बंद करके यह दावा कर सकते हैं कि अंधेरा है, लेकिन इससे सूरज का अस्तित्व खत्म नहीं होता। जब हम अपनी गलती से मुंह मोड़ते हैं, तो हम केवल एक 'भ्रम' पैदा कर रहे होते हैं।वास्तविकता अपनी जगह स्थिर रहती है और समय आने पर अपना प्रभाव दिखाती है।
हमारे पास अपने कर्म चुनने की स्वतंत्रता तो है, लेकिन उस कर्म से उत्पन्न होने वाले परिणाम पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता।अगर कोई विद्यार्थी परीक्षा की सच्चाई से मुंह मोड़कर पढ़ाई नहीं करता, तो वह 'पढ़ाई न करने' का चुनाव तो कर सकता है, लेकिन वह 'असफलता' के परिणाम से नहीं बच सकता।
सच्चाई को अनदेखा करना अक्सर तात्कालिक मानसिक शांति तो देता है, लेकिन यह 'किस्त' पर ली गई शांति है जिसका 'ब्याज' भविष्य में बहुत भारी पड़ता है। जब हम किसी समस्या को स्वीकार नहीं करते, तो वह समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि और भी जटिल होती जाती है।
सच्चाई को स्वीकार करना साहस का काम है। यह हमें सुधार का अवसर देती है। वहीं, सच्चाई से मुंह मोड़ना केवल एक 'अस्थायी पलायन' है। अंततः, परिणाम हमें वहीं आकर घेर लेते हैं जहाँ से हम भागना शुरू करते हैं। इसलिए, बुद्धिमानी इसी में है कि हम सच्चाई का सामना करें।
" क्रोध बड़ा होकर प्रतिशोध बनता है और प्रतिशोध बूढ़ा हो कर पश्चाताप"....
क्रोध एक ऐसी अग्नि है, जो असंयमित हो जाए ,तो प्रतिशोध का रूप ले लेती है।व्यक्ति विवेक खो बैठता है और दूसरे को कष्ट पहुँचाकर संतुष्ट होता है। किंतु समय बीतने पर और परिणाम सामने आने पर वही प्रतिशोध पश्चाताप में बदल जाता है। तब समझ आता है कि क्रोधवश लिया गया निर्णय शांति भी न दे सका और न संबंध बच सके।
क्रोध पर नियंत्रण ही जीवन को संतुलित और सुखद बना सकता है।
17/01/2026
#यादों के साये
बीती हुई बातों की, एक धुँधली सी शाम है,
'यादों के साये' हैं, जहाँ दिल का मुकाम है।
ये साये भी अजीब हैं, जो पीछा नहीं छोड़ते,
हर मोड़ पर थाम लेते हैं, रिश्ता नहीं तोड़ते।
"सफलता आती जाती रहती है, पर मैदान में टिके रहने के लिए निरंतरता जरूरी है।"
जीवन में सफलता अक्सर अस्थायी होती है।यह एक पड़ाव है, मंजिल नहीं।हम कड़ी मेहनत कर सकते हैं, किंतु बाहरी कारक हमेशा अंतिम परिणाम को प्रभावित करते हैं। इसलिए, सफलता का शिखर हमेशा कायम नहीं रहता।मैदान में टिके रहने का अर्थ है विपरीत परिस्थितियों के बावजूद काम को न छोड़ना।जिसे लचीलापन और दृढ़ता कहते हैं।
निरंतरता से ही कौशल में धीरे-धीरे सुधार होता है और दृढ़ता वह ईंधन है जो हमें असफलता से उबरने और सफलता की चोटियों पर चढ़ने और आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है।
यह विचार हमें सिखाता है कि हमें परिणामों का पीछा करने के बजाय आदतों का निर्माण करना चाहिए। सफलता एक मीठा फल है, लेकिन निरंतरता वह जड़ है जो पेड़ को हर मौसम में जीवित रखती है और बार-बार फल देने में सक्षम बनाती है।
सफलता एक घटना है, निरंतरता एक जीवनशैली है और मैदान में बने रहने के लिए एक जीवनशैली की जरूरत है।
"यदि हम स्थाई परिवर्तन चाहते हैं, तो समस्याओं के आकार नहीं, स्वयं के विस्तार पर फोकस करे।"
अक्सर हम अपनी समस्याओं को बहुत बड़ा मान लेते हैं और स्वयं को उनके सामने छोटा समझने लगते हैं।परिणामस्वरूप भय, तनाव और निराशा जन्म लेते हैं। क्या समस्याएँ इतनी बड़ी होती हैं कि हम अपनी क्षमता पर संदेह करने लगें ?
क्यों न हम अपने ज्ञान, कौशल, दृष्टिकोण और मानसिक दृढ़ता का विस्तार करैं कि समस्याएँ स्वतः छोटी प्रतीत होने लगें ?
स्वयं का विस्तार केवल शिक्षा या योग्यता बढ़ाने तक सीमित न रखें, बल्कि सोच को व्यापक बनाएं, धैर्य विकसित करें, आत्मविश्वास जगाएं और असफलताओं से सीखने की क्षमता पैदा करें और हर चुनौती को सीखने का अवसर मानें, तब समस्या बाधा नहीं बल्कि सीढ़ी बन जाएगी।
परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। यदि हम केवल समस्याओं को हल करने पर केंद्रित रहें, तो हर नई परिस्थिति में फिर संघर्ष शुरू हो जाता है। लेकिन यदि हम स्वयं को मजबूत बना लें, तो हम हर परिस्थिति का सामना सहजता से कर सकते हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि समस्याओं पर नियंत्रण पाने का सबसे प्रभावी उपाय स्वयं को इतना सक्षम बनाना है कि समस्याएँ हमें रोक न सकें। जब व्यक्ति बड़ा होता है, तो चुनौतियाँ अपने आप छोटी हो जाती हैं—और यही स्थाई परिवर्तन की असली कुंजी है।
12/01/2026
ऐसी खबरों पर आपकी प्रतिक्रिया क्या होती है? आज भी बिहार में डायन कुप्रथा पाई जाती है।
वर्ष 2000 में झारखंड के 4 जिलों पूर्वी सिंहभूम, रांची, बोकारो और देवघर में सर्वेक्षण किया गया। डायन- बिसाही के कुल 176 मामलों का पता लगा। 4 जिलों में 176 महिलाओं पर प्रताड़ना का मामला प्रकाश में आया। इस आधार पर पूरे राज्य में यह आंकड़ा हजारों में होगा।
डायन कुप्रथा प्रतिषेध अधिनियम 1995 का ड्राफ्ट सौंपा।इसके आधार पर सरकार ने 1999 में कानून बनाया था। बाद में इसी कानून को 7 राज्यों ने अपनाया।
हाल ही में उन्होंने अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता को कक्षा 6 से लेकर पीजी तक के पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए विभाग को पत्र लिखा है, ताकि इसकी भयावहता को विद्यार्थी भी जान सकें।
डायन कुप्रथा का अस्तित्व अशिक्षा और अंधविश्वास के कारण है। जागरूकता इसके खिलाफ बड़ा हथियार है। झारखंड में डायन- बिसाही के नाम पर महिला- पुरुषों को प्रताड़ित करने और पीट-पीटकर मार डालने की घटनाएं आम हैं।
1991 में जमशेदपुर के मनिकुई गांव में एक महिला को डायन होने के आरोप में पीटा जाने लगा, बचाव करने पर उसके पति व एक बेटे को भी पीट -पीट कर मार डाला गया।1995 में झारखंड के बिरबाँस गांव में तांत्रिक और पंचायत नें एक महिला को डायन घोषित कर दिया । 500 रुपए जुर्माना लगा । महिला को लगा जुर्माना चुकाकर वो छूट जाएगी मगर नही,एक सुबह भीड़ ने दरवाजा तोड़ा और ज़बरदस्ती मानव मल पिलाया । वो रोती रही, छोड़ने की विनती करते रही ।गांव वाले उसे कभी भी मार सकते थे इसीलिए वह एक रात अपने 4 बच्चों को लेकर घर से भाग निकली। जिस समाज ने उन्हें डायन घोषित करके मानव मल पिलाया,बलात्कार करने की कोशिश की,उसी समाज मे छुटनी महतो ने डायन का ठप्पा लगी औरतों को संगठित करके उन्हें इससे लड़ना सिखाया। डायन के नाम से समाज का तिरस्कार झेल रही महिलाओं का एक संग़ठन खड़ा करके 25 सालों तक जनजागरण अभियान चलाकर समाज से इस कुप्रथा को ख़त्म किया ताकि फिर किसी छुटनी महतो के साथ ऐसा बुरा ना हो।
मोदी सरकार ने इस साल छुटनी महतो के इस संघर्ष को नमन करते हुए उन्हें “पद्म श्री पुरस्कार” से सम्मानित किया है।
क्या टीवी सीरियल और फिल्मों में भूत- पिशाच और डायन आदि के प्रदर्शन पर रोक लगना जरूरी है?क्या आप सहमत हैं,तो फिर आवाज़ उठाएं!
बहुत सी बातों, रीति रिवाज़ों या कहें कि आदतों के लिए हम भारतीयों को कोसा जाता है, हमारा मज़ाक बनाया जाता है, किसी अन्य के द्वारा नहीं, खुद को आधुनिकता की दौड़ में सबसे आगे मानने वाले भारतीयों द्वारा ही।
हमारा जीवन जीने का तरीका, हमारी सभ्यता या संस्कृति कुछ ऐसी है कि समय के साथ चलने के बावजूद हमें कहीं न कहीं पिछड़ेपन का एहसास कराया जाता है।
हमारे बचपन में माँ, दादी या नानी पूरे साल का अनाज,मसाले पूरे साल के लिए रख लेती थीं, यहाँ तक कि शक्कर भी पूरे साल के लिए भर ली जाती थी। अचार- पापड़ ,वड़िया, आलू के चिप्स ,चावल के पापड़ पूरे साल के लिए बनाती थीं, कारण शायद ये था कि उनके पास वाहन की इतनी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी सो साल में एक बार इन सब बातों के लिए वक़्त और पैसा दोनों निकाला जाता था।
इस पीढ़ी में पैदा हुए लोग पूरे साल के लिये स्टोर करना या लाना गैरज़रूरी झंझट समझने लगे, सब कुछ तो मार्किट में साल भर मिलता है, क्या ज़रूरत है इतना सामान इकट्ठा करने की। महीने में एक बार सुपरमार्केट जाओ और ट्रॉली भर के सामान ले आओ।
आज बाज़ार से सिरका, प्रिजर्वेटिव मिले अचार -चटनियाँ लाना शान है। कामवाली और आधुनिक होम अप्लायंसिस के चलते काम का बोझ हल्का होने के बावजूद आज की पीढ़ी पापड़, चकली बनाने में अपना समय नष्ट करना नहीं चाहती।
अब होटल या रेस्टोरेंट में खाना भी चलन में है।बच्चों और युवाओं में फास्ट फूड का चलन जिस गति से बढ़ रहा है,चिंता का विषय है। अब तक यह बड़े नगरों व महानगरों तक सीमित था लेकिन अब तो यह छोटे कस्बों में भी पैर पसारने लगा है।
समय के साथ परिवर्तित होना आवश्यक है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि हर परिवर्तन सही हो।हमारे बच्चे इसकी गिरफ्त में आकर अपना स्वास्थ्य ख रहे हैं 10 और 11 वर्ष के बच्चे मधुमेह ,हृदय रोग इत्यादि बीमारियों का शिकार हो रहे हैं, देश में हर साल लगभग 10,000 बेरियाट्रिक सर्जरी होती है जिनमें से दो से 4 फ़ीसदी तक छोटे बच्चे या किशोर होते हैं।फास्ट फूड में कैलरी अधिक होती है नमक अधिक होता है इसका उपयोग न हो पाने से शरीर में आलस्य मोटापा अपना घर बना लेता है।यही नहीं फास्ट फूड का सेवन बच्चों की आईक्यू को भी कमजोर करता है कोल्ड ड्रिंक में उपलब्ध चीनी हमारे शुगर लेवल को प्रभावित करती है और मधुमेह का कारण बनती है।
हमारे माता-पिता का मंत्र था, पहले बचत करो फिर खर्च करो।नये कपड़े त्योहारों पर मिला करते थे, जिससे त्योहारों की खुशी दोगुनी हो जाती थी।जितनी लम्बी चादर उतने ही पैर पसारे जाते थे।आज बचत को कंजूसी माना जाता है।आज हर व्यक्ति चाहता है कि उसके पास सब कुछ हो। ऐसे में तनाव से वह गंभीर बीमारियों को न्योता देता है।जो बातें हमारी संस्कृति, हमारे परिवार ने हमें बचपन से सिखाईं, बड़े होते- होते हम इतने आधुनिक हो गए कि हमारे बड़ों की जीवनशैली हमें छोटी दिखने लगी।ज़बकि उनकी अच्छी बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कल थीं।
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