15/11/2025
27. लोकतंत्र और विकास : एक मूल्यांकन
प्रश्न 1 भारत में लोकतंत्र के क्रम-विकास एवं विकास को स्पष्ट करें तथा लोकतंत्र संबंधी विभिन्न संकल्पनाओं को स्पष्ट करें तथा लोकतंत्र-संबंधी विभिन्न संकल्पनाओं पर चर्चा करें।
अथवा
भारत में लोकतंत्र के कार्य निष्पादन पर निबंध लिखिए।
अथवा
प्रक्रियात्मक लोकतंत्र पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर - स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाया था। भारत में लोकतंत्र की संस्थाएँ औपनिवेशिक शासन के दौरान ही पनपनी शुरू हो गई थीं। वे ब्रिटिश इंडिया सरकार के विभिन्न कानूनों और भारत व इंग्लैण्ड में एक वर्ग-विशेष के भीतर माँग के फलस्वरूप ही जन्मे। लोकतांत्रिक प्रावधानों ने 1909, 1919 व 1935 के भारत सरकार अधिनियमों में अपना स्थान बना लिया। संविधान सभा के भीतर विचार-विमर्श होने के बाद, 1950 में भारत गणतांत्रिक संविधान के लागू होने के साथ ही स्वातंत्र्योत्तर भारत में लोकतंत्र लागू कर दिया गया।
भारत में सरकार का संसदीय स्वरूप चुना ताकि वह गाँधीवादी सिद्धांतों के आलोक में ग्राम-स्तरीय सरकार की तुलना में सार्वभौम वयस्क मताधिकार व आवधिक चुनाव के सिद्धांतों पर आधारित राष्ट्र-राज्य (आधुनिकता) का निर्माण कर सके।
लोकतंत्र का मूल्यांकन उसे इंगित करने अथवा मापन के लिए प्रयोग किए गए निर्देशको पर निर्भर करता है। लोकतंत्र के संबंध में निर्देशकों के मुख्यतः दो मॉडल है-एक संस्थागत, अल्पतम, प्रक्रियात्मक लोकतंत्र से संबंधित. दूसरा सत्तावाचक अथवा प्रभावी लोकतंत्र से संबंधित। पूर्ववर्ती मॉडल लोकतंत्र को लोकतंत्र की संस्थाओं, राजनीतिक दलों व अन्य सघों व संगठनों, आवधिक चुनावों, सार्वभौम वयस्क मताधिकार, नेतृत्व, आदि के रूप में देखता है। परवर्ती मॉडल संस्थागत प्रक्रियात्मक लोकतंत्र को लोकतंत्र का व्यापक संकेत नहीं मानता। चुनावी लोकतंत्र, दरअसल, न्यूनतम का समर्थक है, जोकि उन अनेक कारको द्वारा भी इंगित होता है जो लोकतंत्र के प्रति हानिकर होते हैं।
सामाजिक स्थान में चुनावों से परे क्या होता है। वैकल्पिक रूप से, सत्तावाचक लोकतंत्र की दृश्यघटना को अपने द्विपृथक्करण व प्रसरणों, पुनर्वितरणकारी न्याय, मानवीय क्षमताओं एवं. हकदारियों (शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत ढाँचा आदि) सामाजिक पूँजी संबद्ध कारकी (आस्था, मूल्य, मानदंड), सभ्य समाज, मानवाधिकार व प्रतिष्ठानों, शासन (भागीदारी, उत्तरदायित्व, प्रभावकारिता, पारदर्शिता आदि) के आलोक में देखता है। ये विकास के विषय में प्रासंगिक है जिस प्रकार विकास दूसरी ओर लोकतंत्र के विषय में प्रासंगिक है। भारत में लोकतंत्र विषयक बहस की प्रेरणा लोकतंत्र के अवस्थान्तर गमन, दृढ़ीकरण व सघनीकरण के विषय में रही है। प्रथम दो मामले स्वातंत्र्योत्तर काल में लोकतंत्र के प्रथम दो दशकों के दौरान छाये रहे और लोकतंत्र का सघनीकरण अभी हाल ही की अवधि में एक ध्यानाकर्षण विषय के रूप में लिया गया है। विभिन्न पहचानों/नए सामाजिक आंदोलनों का दावा-लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया, ने लोकतंत्र सघनीकरण परियोजना में योगदान दिया है।
सत्तावाचक (ठोस) लोकतंत्र (Substantive Democracy) - विगत दशकों में भारत में, सत्तावाचक लोकतंत्र को लोकतंत्र विषयक संलाप में एक महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है। सत्तावाचक लोकतंत्र का मूल्यांकन भारत में राष्ट्र निर्माण से संबंधित विषयों-धर्मनिरपेक्षता, कल्याणवाद एवं विकास पर राज्य (लोकतंत्र के साथ) की भूमिका के संबंध में किए जाने का प्रयास किया जाता है और भूमण्डलीकरण के संदर्भ में इन मुद्दों के विषय में राज्य की भूमिका के संबंध में भी। नीरजा जयाल का दावा है कि राज्य व लोकतंत्र के बीच संबंध के मताल्लिक दो प्रचार के तर्क हैं-एक ऐसे, प्रभावशाली राज्य के बिना, जो राज्य के सत्तावाद का सामना करने हेतु एक सशक्त सभ्य समाज होते हुए भी अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है, कोई लोकतंत्र नहीं हो सकता। जयाल का तर्क है कि राज्य व समाज, दोनों लोकतंत्र की स्थापना के संबंध में एक-दूसरे के पूरक हैं। परंतु नागरिकता संबंधी सार्वभौम मापदंडों के अभाव में अनन्यतावादी स्वार्थ लोकतंत्र की योजना का अपहरण कर सकते हैं। उनके मतानुसार भारतीय राज्य एक हस्तक्षेपवादी राज्य है जिसका भारी प्रयास विकासात्मक रहा है. न कि कल्याणकारी राज्य ।
सभ्य समाज भी सत्तावाचक लोकतंत्र का एक अनिवार्य संघटक रहा है। भारत में सभ्य समाज विषयक दो दृष्टिकोण हैं। एक, वह उन मुद्दों पर ध्यान दिए बगैर, जो वे उठाते हैं, सभी संघों एवं सामूहिक कार्यों को सभ्य समाज के रूप में लेता है, दूसरा, केवल वे संघ जो सार्वभौमिक महत्त्व के हैं, न कि सांप्रदायिक, उन मुद्दों को उठाते हैं और जिनका आधार धर्मनिरपेक्ष/सार्वभौम है, सभ्य समाज माने जाते हैं। अभी हाल ही में हमारे देश में एक नई बहस ने जोर पकड़ा है-साम्यवादियों तथा उदारवादियों के बीच बहस, व्यक्तियों एवं समुदायों के बीच संबंध, उनके भीतर और उनके बीच।
एकात्म्य राजनीतिक का उदय दलित, अन्य पिछड़े वर्ग, महिलाएँ, जनजातियाँ, नृजातीयता, पर्यावरणीय विषय आदि-नए सामाजिक आंदोलन तथा उस संलाप की शक्तिहीनता . जो लोकतंत्र को चुनाव-संबंधी विशेषाधिकार देता है. सतावाचक लोकतंत्र विषयक ध्यान केंद्रण को आवश्यक बना दिया है। इसको राष्ट्र राज्य के सामने एक चुनौती के साथ-साथ देश की लोकतान्त्रिक विषयवस्तु में वृद्धि के रूप में भी लिया जाता है, इस समझ के साथ कि भारत अधिक लोकतात्रिक होता जा रहा है, एक ऐसी स्थिति जो आशुतोष वाष्र्णेय पसद करते हैं। राष्ट्र-राज्य परिप्रेक्ष्य की सर्वाधिक तीखी आलोचना उन विद्वानों के लेखों में मिलती है जो देश के उत्तर-पूर्वी भारत जैसी परिधियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। संजीव बरुआ की पुस्तक इण्डियन अगेन्स्ट इटसैल्फ इसी पहलू का प्रतिनिधित्व करती है। यह बड़ी संख्या में इन मुद्दों के एक साथ उठने के साथ ही हुआ शासन, सभ्य समाज, सामाजिक पूँजी. मानवाधिकार, आदि। इन सभी कारकों की विद्यमानता देश में लोकतंत्र के अस्तित्व सबंधी एक सकेतक के रूप में ली जाती है। यहाँ भी कुछ विपरीत दृष्टिकोण है जो इन कारकों की अनुपस्थिति और उपस्थिति दोनों का सुझाव देते हैं।
सामान्य तौर पर भारत में लोकतंत्र का मूल्यांकन राष्ट्रीय, राज्य अथवा जिला स्तर पर किया गया है और इन स्तरों पर लोकतंत्र की कार्यवाही परस्पर निरपेक्ष रही है। भारत में लोकतन्त्र हेतु उपगम्य 'ऊपर से नीचे" रहा है, न कि "नीचे-से-ऊपर। अतुल कोहली ने, - हालाँकि, अपनी पुस्तक, डेमोक्रेसी एंड डिसकॅन्टेट इण्डियाज क्राइसिस ऑव गवर्नेबिलिटी में तीन स्तरों को लिया है।
रजनी कोठारी के मतानुसार, स्वतंत्रता पश्चात् प्रथम दो दशकों में लोकतंत्र-निर्माण में भारतीय राज्य ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उसने कल्याणकारी योजनाएँ तथा विकास कार्यक्रम चलाए हालाँकि तब यह एक औसत दर्जे का राज्य था, भारतीय लोकतंत्र, इस चरण के दोरान सभी हितों के समायोजन एवं मतैक्य गठन द्वारा सूचित किया गया। परंतु 1970 के दशक से ही, खासकर भारत में आपास्थिति की घोषणा के साथ ही, कार्यपालिका ने सत्ता - अपने हाथों में संकेंद्रित कर ली। इसने राज्य की परिमितिता को हानि पहुँचाई। परिणामतः कार्यपालिका ने लोकतांत्रिक संस्थाओं एवं निजीगत संस्थाओं को गुप्त रूप'से क्षति पहुँचाते हुए लोकप्रियतावाद का सहारा लिया। राज्य ने प्रत्यक्षतः लोकतंत्र के खिलाफ काम करना शुरू कर दिया।
भारतीय लोकतंत्र की उत्तरजीविता ने कुछ पर्यवेक्षकों को विस्मय में डाला, है, जिनके अनुसार यह तीसरी दुनिया की राजनीतिक प्रणालियों की एक 'पहेली" अथवा "अपवाद" है, इसने अपनी उत्तरजीविता जाति, धर्म, भाषा आदि की विविधता के आधार पर कायम रखी है. जो प्रायः हिंसा में फलित होती है। अरैण्ड लिजकर्ट इस 'पहेली' को एक मैत्रीपूर्ण व्याख्या प्रस्तुत कर स्पष्ट करती हैं। मैत्रीवाद का सिद्धांत इस आधार-वाक्य पर आधारित है कि एक बहु-नृजातीय समाज में, समाज के विभिन्न समूहों के बीच सत्ता का साझा होता है। किसी समाज में मैत्रीवाद चार शर्तों पर प्रासंगिक होता है-
(1) गठबंधन सरकार जिसमें सभी नृजातीय समूहों का प्रतिनिधित्व होता है,
(2) मैत्री सुमहों की सांस्कृतिक स्वायत्तता,
(3) राजनीति एवं नागरिक सेवाओं में उनका आनुपातिक प्रतिनिधित्व और
(4) अल्पसंख्यक अधिकारों एवं स्वायत्तता से संबंधित विषयों पर अल्पसंख्यक निषेधाधिकार। लिजफर्ट का दावा है कि कांग्रेस व्यवस्था की सफलता, गठबंधन सरकारें, संघवाद, रक्षात्मक विभेद-संबंधी सिद्धांत, एवं अल्पसंख्यकों के धार्मिक व सांस्कृतिक अधिकारों के सांवैधानिक प्रावधान तथा राजनीतिक दबाव के माध्यम से अल्पसंख्यक निषेधाधिकार एक सांवैधानिक रीति से भारतीय लोकतंत्र की सफलता के संकेत हैं। भारतीय लोकतंत्र में "सत्ता-बाँट प्रणाली" - जैसे कि ऑस्ट्रिया, नीदरलैण्ड्स, स्विटजरलैंड, लैबनान व कुछ अन्य देशों में प्रचलित है, के सिद्धांतों पर अपनी उत्तरजीविता कायम रखी है।
प्रक्रियात्मक (विधिक) लोकतंत्र (Procedural Democracy) - सामान्यतः यह माना जाता है कि भारत में लोकतंत्र सफल रहा है। इस मूल्यांकन के मापदंड हैं-भागीदारी और प्रतिस्पर्धा। ये भारत में चुनावों की प्रायिकता और चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक बलों के बीच प्रतिस्पर्धा द्वारा दर्शाये जाते हैं। मतदान प्रतिशत और पार्टियों द्वारा पड़े हुए वोटों की गणना भागीदारी को दर्शाते हैं। इस उपगम्य के पक्षधर भारत में चुनावी राजनीति की इस सफलता के विषय में प्रफुल्ल हैं, जिसको लोकतंत्र की सफलता में व्यापक प्रतिमान के रूप में लिया जाता है। वे लोग जो लोकतंत्र की सफलता को चुनावों भागीदारी और प्रतिस्पर्धा की नजर से देखते हैं, लोकतंत्र के मूल्यांकन के लिए सर्वेक्षण विधि अपनाते हैं। वे मतदान प्रतिशत और मत-प्रतिशत अथवा सांख्यिकी विधि प्रयोग सहसंबंध, सहकारण या समाश्रयण विश्लेषण की भाषा में प्रतिशत में प्रबल प्रवृत्तियों को उपलक्षित करते हैं। वे मतदान प्रतिशत और निर्वाचन क्षेत्र-विशेष में सामाजिक-आर्थिक आँकड़ों के साथ भागीदारी के बहुपरिवर्तनीय संबंध पर विचार करते हैं। इस आधार पर कि यह विश्लेषण सर्वेक्षण पर आधारित होता है और किसी क्षेत्र-विशेष के सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक कारकों को ध्यान में रखता है. इसे पारिस्थितिक विश्लेषण भी कहा जाता है।
प्रक्रियात्मक लोकतंत्र का उद्देश्य भारत में राष्ट्र-निर्माण में योगदान देना था। पूर्व दशको में भारत में लोकतंत्र विषयक अध्ययनों का ध्यान इस बात की जाँच करने पर लगा था कि इसने सार्वभौम वयस्क मताधिकार और आवधिक चुनाव की पुनस्थापना के माध्यम से राष्ट्र-निर्माण में किस प्रकार मदद की है। इसको आधुनिकीकरण सिद्धांत के रूप में जाना गया। आधुनिकीकरण सिद्धांत का दावा था कि विकासशील देश आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से गुजरे हैं-जिनका अंतिम लक्ष्य स्थिर लोकतंत्र रहा, इसके साथ ही सामाजिक-आर्थिक आधुनिकीकरण आया, यथा शहरीकरण, जनसंचार माध्यमों का प्रसार, शिक्षा, धन-संपति तथा समानता। यह माना जाता है कि भारत में विकास लोकतंत्र को मजबूत करेगा और जाति धर्म आदि पर आधारित बँटवारे खत्म हो जाएँगे।
प्रक्रियात्मक लोकतन्त्र की समीक्षा उन विद्वानों द्वारा प्रस्तुत की जाती है जो सत्तावाचक लोकतंत्र का अध्ययन करते हैं। उनके मतानुसार, यह लोकतंत्र को एक सीमित रूप में देखता है। चुनावी लोकतंत्र अल्पतम लोकतंत्र है। स्वतंत्र निष्पक्ष चुनाव, सार्वभौम वयस्क मताधिकार, राजनीतिक दल, दबाव समूह और संविधान की उपलब्धता आदि लोकतंत्र के लिए पर्याप्त है शर्तें नहीं है, हालाँकि ये आवश्यक है (लोकतंत्र समाज में तलाशना पड़ता और उसे संस्थागत रीति से बाहर निकालना होता है। लोकतंत्र की इस वैकल्पिक दृष्टि को सत्तावाचक लोकतंत्र नाम दिया जा सकता है। बीथम ने एक 'लोकतंत्रीकरण-संबंधी सामाजिक कार्यसूची हेतु तर्क प्रस्तुत किया। लोकतंत्र को, चुनावों में भागीदारी एवं प्रतिस्पर्धा से परे, समाज की हकीकत में उतरना पड़ता है। फरीद जकारिया, हालाँकि, सत्तावाचक लोकतंत्र की इस दृष्टि ते आलोचना करते हैं कि वह लोकतंत्र को अधिकारों की एक व्यापक श्रृंखला वाले 'उत्तम शासन सरीखी मानकी पारिभाषिकी की दृष्टि से देखते हैं, वह व्याख्यात्मक लोकतंत्र पर ध्यान नहीं देते।
प्रश्न 2. विकास की संकल्पना तथा लोकतंत्र से उसके संबंध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भारतीय संसदीय लोकतंत्र ने अपने यात्राक्रम में दो परस्पर विरोधी विचारों को जन्म दिया है। नवजात राष्ट्रों की सबसे बड़ी समस्या है-लोकतंत्र और विकास। इन दोनों समस्याओं के संदर्भ में नेतृत्व का प्रश्न अत्यधिक महत्त्व का हो जाता है। राष्ट्रीय आंदोलनों के दौरान उनके उत्थानशील राष्ट्रों में लोकतंत्रात्मक संरचना के अंतर्गत ही चमत्कारिक करिश्मे के नेता उभरकर सामने आए। इन नेताओं को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने अपने करिश्मे से जनता को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के पक्ष में आहुति देने के लिए प्रेरित किया। लेकिन इन नेताओं के उसी करिश्मे ने लोकतंत्रात्मक परंपराओं का स्वाभाविक विकास नहीं होने दिया। इस स्थिति का एक स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि जैसे ही करिश्मे के नेता राजनीतिक रंगमंच से अदृश्य हुए, वैसे ही लोकतंत्रात्मक संरचना में शून्य की स्थिति उत्पन्न हो गई और लोकतंत्रात्मक संस्थाओं की जान पर आ बनी। जब तक चमत्कारी नेता विद्यमान रहे। तब तक प्रतीत होता था कि देश की लोकतंत्रात्मक संस्थाओं में स्थिरता भी है और परिपक्वता भी, लेकिन इन नेताओं के तिरोभाव के साथ ही कृत्रिमता का आवरण हट गया और कितनी संक्रियागत दुर्बलताओं की यथार्थताएँ सामने आ खड़ी हुई।
एक तथ्य जिस पर प्रायः अधिक जोर नहीं दिया जाता, वह यह है कि लोकतंत्र एक जटिल राजनीतिक पद्धति है तथा उसके क्रियान्वयन की व्यवस्था बड़ी उलझी हुई है। इसलिए लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए एक उपयुक्त शिक्षा कार्यक्रम अनिवार्य है। यदि लोगों में लोकतंत्र के संस्कार जागृत करने के लिए आयोजित इन कार्यक्रमों को कार्य रूप दिया गया, तो जनता में आकांक्षाओं का ज्वार उमड़ पड़ेगा और उस ज्वार को मर्यादा में रखने के लिए द्भुत विकास की आवश्यकता होगी। यहाँ भी लोकतंत्रात्मक परंपराओं के प्रति वचनबद्ध लोकनेता लोकतंत्र को सुदृढ़ आधार प्रदान कर सकते हैं और लोगों के हृदय में नव आशाएँ-आकाक्षाएँ जगाकर उन्हें विकास की गतिविधियों में लगा सकते हैं। इस क्षेत्र में सशक्त नेतृत्व का विशेष महत्त्व है क्योंकि केवल समर्थ नेता ही अपने राजनीतिक निर्णय द्वारा आर्थिक लक्ष्यों की पूर्ति संभव बना सकते हैं। विकासशील देशों में प्राय ही राजनीतिक तथ्यों का आर्थिक निर्णयों पर प्रभाव पड़ता है। अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं, जबकि विचारों और संवैधानिक तथा विधिक शक्तियों के होते हुए भी केंद्रीय अथवा राज्य सरकारें अपने आर्थिक विकास के लिए अतिरिक्त संसाधनों का संयोजन केवल इसलिए नहीं कर सकती, क्योंकि उनमें राजनीतिक साहस का अभाव होता है।
लोकतंत्र में सरकार और जनता के बीच केवल यही संबंध नहीं होना चाहिए कि सरकार अथवा सत्ताधारी राजनीतिक दल कुछ वर्षों में एक बार जनता से मत माँग लें।
श्रीमानों और श्रीहीनों के बीच खाई जितनी चौड़ी होगी, लोकतंत्र के लिए खतरा भी उतना ही भयकर होगा। अतः लोकतंत्र की प्राणों की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि विकास कार्यक्रमों द्वारा अमीरी और गरीबी का भेद कम किया जाए। यदि लोकतंत्र की संरचना के क्षेत्र में राजनीतिक नेता सर्वोच्च है, तो विकास प्रक्रिया के क्षेत्र में विशेषज्ञों एवं प्राविधिज्ञों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए तथा इस क्षेत्र में उनकी भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण होनी चाहिए।
प्रश्न 3. प्रजातंत्र को सफल बनाने के लिए आवश्यक बातों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर - एक अमरीकी लेखक ने 'विकासशील राष्ट्रों में प्रजातंत्र को चुनौती" नामक पुस्तिका में प्रजातंत्र के सफल संचालन के लिये अग्रलिखित पूर्व दशायें आवश्यक बताई है। प्रथम, वैदेशिक और कल्याणकारी (अर्थात् आंतरिक) नीति की मुख्य दिशाओं पर समाज के भीतर सापेक्षतः व्यापक एकमत होना चाहिए अर्थात् सरकार के दो आधारभूत कार्यों के सार पर। दूसरी, अल्पसंख्यकों में यह भावना हो कि उनके अधिकारों की रक्षा की जायेगी तथा उन्हें जीवित राजनीतिक प्रक्रिया के भाग रूप में अपने विरोधी मतों को स्वतंत्र तथा प्रभावी रूप में अभिव्यक्त करने का सामर्थ्य प्राप्त रहेगा। तीसरी, संपूर्ण राजनीतिक प्रक्रिया का आधार प्रजातंत्रात्मक मूल्यों और स्वयं प्रजातंत्रात्मक प्रक्रिया की निरंतरता के प्रति व्यापक निष्ठा है। विशेष रूप से उन लोगों में जो समाज के प्रमुख समूहों का नेतृत्व करते हैं। समाज में व्यक्तिगत नगारिकों और सारपूर्ण समूहों को समय-समय पर स्थायी प्रतियोगी राजनीतिक पद्धति को कायम रखने के अधिक बड़े सामुदायिक हित में अपने हितों को हानि पहुँच जाने को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
हमारे विचार में इन तीनों ही पूर्व दशाओं का होना आवश्यक है, किंतु खेद की बात यह है कि आज देश में इनमें से कोई भी पूर्व दशा पूर्णरूप अथवा बड़ी मात्रा में विद्यमान नहीं है। इनके अतिरिक्त प्रजातंत्र का एक अन्य आधार जनता की ऐच्छिक गतिविधियाँ हैं।
यहाँ अब यह बात दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि भारतीय प्रजातत्र के लिए साप्रदायिकता, प्रादेशिकता व भाषावाद, जातिवाद और भ्रष्टाचार बड़े गंभीर खतरे है। प्रजातंत्र को सफलतापूर्वक चलाने के हित में हमें दो अन्य बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। प्रथम, प्रजातंत्र में हिंसापूर्ण आंदोलन, घेराव और असंवैधानिक तरीकों का त्याग करना अति आवश्यक है। सभी नागरिकों व जन-समूहों को यह विश्वास रहना चहिए कि वे शांतिपूर्ण और वैध तरीकों द्वारा सरकार को अपनी माँगों पर उचित विचार करने के लिए विवश कर सकते हैं। दूसरी, विश्वविद्यालयों में शैक्षिक वातावरण को भंग करना उचित नहीं है। विद्यार्थियों को सक्रिय दलबंदी से दूर रहना चाहिए और अपने को अच्छा विद्यार्थी बनाकर भावी नागरिकों पर आने वाले भारी दायित्वों को सुचारु रूप में पूरा करने के योग्य बनाना चाहिए।
इस विषय में हम सन् 1968 के गणतंत्र दिवस पर 'हिन्दुस्तान टाईम्स' द्वारा आयोजित 'राउण्ड टेबिल' में भाग लेने वाले कुछ अनुभवी राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मतों को देना उचित समझते हैं, जो अग्रलिखित हैं-हम चुनौती देने वाले संकट से गुजर रहे हैं, जो ऐसे सभी राजनीतिक दलों से जिनका प्रजातंत्र में वास्तविक विश्वास है मिल-जुलकर काम करने की माँग करता है। इस समय कांग्रेस सहित एक राष्ट्रीय मिली-जुली सरकार की केंद्र तथा राज्यों में आवश्यकता है, जो ऐसी अविलम्ब कार्यवाही चलाने वाली समस्याओं को हल कर सके जो कि किसी एक दल के साधनों से बाहर हैं। सत्यनिष्ठा और सक्षमता वाले व्यक्तियों को जिनका सार्वजनिक सेवा का रिकार्ड बिना धब्बे वाला हो, प्रशासन का भार सँभालने के लिए एक साथ मिलना चाहिए अन्यथा भारत मे प्रजातंत्र का भविष्य अँधेरे में है।
जहाँ तक भारत में प्रजातंत्र के भविष्य का संबंध है, मैं आशावादी हूँ। इस समय हम इस देश में स्थायी प्रजातांत्रिक व्यवस्था के जन्म पर होने वाले कष्टों से गुजर रहे हैं। वर्तमान गड़बड़ी और राजनीतिक खलबली इस समय काम कर रही राजनीतिक गतिशीलता की ओर संकेत करती हैं। परंतु एक चीज महत्त्वपूर्ण है, जिसे अनुभव करने की आवश्यकता है और जिसे आने वाले वर्षों में अवश्य ही अनुभव किया जायेगा, वह है शांतिपूर्ण अहिंसक विधियों द्वारा उच्च राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में विश्वास को नया करना। सार्वजनिक संपत्ति का नाश और अपने राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हिंसक विधियों का प्रयोग प्रजातंत्रात्मक जीवन शैली की सफलता की ओर ले जाने वाले नहीं हैं।
सबसे अधिक सभ्य मार्ग होने के कारण यह (प्रजातंत्र) शासन और जीवन शैली की सबसे कठिन पद्धति है। यह हमारे जैसे नव-स्वतंत्रता प्राप्त देश के लिए विशेष रूप से ऐसी है जिसमें निर्धनता फैली है और जो ऐसी असमताओं व अन्य बुराइयों के भार से दबा है जो कि अधिकांशतः लंबे काल की दासता से उत्पन्न हुई। परंतु हमें घेरने वाली सभी कठिनाइयों के साथ हमने प्रजातंत्र मार्ग पर लगकर बड़ी मात्रा में सफलता प्राप्त की है। जीवन के प्रजातंत्रात्मक मार्ग पर लगकर चलने की हमारी सक्षमता के बारे में अभी तक संदेह बने हुए हैं, परंतु सदैव सन्देह करने वाला मन प्रजातंत्र को निरंतर सफलता के लिए उचित बौद्धिक वातावरण नहीं पैदा करता। वे जिनका प्रजातंत्र में विश्वास गहरे कारण रखता है, यह नहीं चाहेंगे कि जनता के मन में संदेह पैदा करें, वरन् वे तो ऐसी शक्तियों को सुदृढ़ बनायेंगे जो किसी भी नव-स्वतंत्रता प्राप्त देश में, जो समस्याओं से भरा हो और विश्व के विभिन्न भागों से आने वाली परिवर्तनकारी हवाओं के लिए खुला हो, प्रजातंत्र को सफल बनाने वाली है। इसकी सफलता को जारी रखने के लिए अनेक दशायें हैं जिन्हें अभी पैदा करना है। अतएव भारत में प्रजातंत्र का भविष्य पूर्व-निर्धारित नहीं हैं। यह तो हम पर निर्भर करता है कि हम दशाओं की रचना करें, जिनमें कि प्रजातंत्र की आगे सफलता उचित रूप से आश्वस्त हो जाए। (श्री सादिक अली, जनरल सेक्रेटरी, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति)। किसी भी राष्ट्र में उसका नेतृत्व करने के लिए गाँधी या नेहरू नहीं रहते। व्यक्तिगत स्वतंत्रता सच्चे प्रजातंत्र की मूलभूत दशा है। संविधान द्वारा भारत में विधि का शासन (Rule of law) स्थापित हुआ है और वह नागरिकों को विभिन्न प्रकार की स्वतंत्रतायें प्रदान करता है। दूसरा, संविधान के वे प्राविधान जिन्होंने देश में संघ व राज्य के स्तरों पर प्रजातंत्रात्मक शासन प्रणाली के लिये व्यवस्था की है। परंतु प्रजातंत्र स्वयं एक साधन है, साध्य नहीं। अतः प्रश्न उठता है कि हमारा उद्देश्य क्या है? हम सभी का उद्देश्य व्यक्ति के लिये अच्छा जीवन है। अच्छे जीवन का अर्थ है कि व्यक्ति की आधारभूत आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जायेगी और उसका जीवन स्तर ऊँचा उठाया जायेगा, जिससे कि वह अपनी रचनात्मक शक्तियों का विकास कर सके।
संविधान एक पूर्ण आलेख है-सन् 1964 में ब्रिटेन के भूतपूर्व प्रधानमंत्री लार्ड एटली ने 'भारत में प्रजातंत्र के लिए खतरे' शीर्षक के अंतर्गत एक लेख में इस विषय का बड़े सुंदर ढंग से वर्णन किया था' अच्छे अधिकृत सूत्र ने मुझे बताया है कि भ्रष्टाचार का भद्दा भूत कुछ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में भी अपना सर उठा रहा है। यहाँ इसका दूसरा खतरा है। प्रथम, सभी प्रकार का भ्रष्टाचार अच्छे प्रशासन का विनाशक है, यह प्रजातंत्रात्मक सरकार की जड़ पर वार करता है और राष्ट्रीय चरित्र को हानि पहुँचाता है। मैंने अन्य एशियाई देश के एक मित्र से एक बार यह प्रश्न पूछा था कि क्या उसे साम्यवादी अंतःस्पंदन का भय है। उसने उत्तर दिया 'नहीं' हमारा शासन भ्रष्ट नहीं है। जहाँ कहीं भ्रष्टाचार का प्रवेश होता है वहीं साम्यवादी अपना पैर जमाता है।'
बड़ी शर्म और दुर्भाग्य की बात है कि यद्यपि स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद से ही भ्रष्टाचार का विलोपन करने के लिए अनेक पग उठाये गए हैं, फिर भी उसकी मात्रा कम होने के बजाय बढ़ती रही है। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन के अंश बन गये हैं। भ्रष्टाचार का मुख्य स्रोत लाईसेंसों, परमिटों, कोटे तथा उद्योग, व्यापार और व्यवसाय पर विनिमयों य प्रतिबंधों (जो सरकारी अधिकारियों के हाथों में व्यापक विवेक निहित करते हैं) की वस्तुतः भूल-भूलैया में है। संसदीय प्रजातंत्र में विधायक ही सार्वजनिक नैतिकता के अंतिम संरक्षक हैं। यदि वे अपनी स्थिति का प्रयोग अनुचित लाभ उठाने या अपने प्रभाव व पहुँच द्वारा स्वार्थ हित में दूसरों को लाभ पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं, तो भ्रष्टाचार अर्द्ध-वैधता का रूप धारण कर लेता है। आज वास्तव में स्थिति कुछ ऐसी ही है। हमारे राजनीतिक जीवन तथा प्रशासन में भ्रष्टाचार इस सीमा तक फैल गया है कि सत्यनिष्ठ मनुष्यों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में तथा सरकारी पदों पर कार्य करना बहुत कठिन हो गया है। सरकारी दफ्तरों में काम करने की प्रक्रियायें भारी-भरकम और देर लगाने वाली हैं। देरी से बचने की चिंता ने बेईमानी की प्रथाओं, जैसे जल्दी काम कराने के लिए घूस देने की पद्धति को प्रोत्साहन दिया है। नीचे के स्तरों पर सरकारी कर्मचारियों के वेतन आज की मूल्य-वृद्धि को देखते हुए बहुत कम हैं, अतः वे विवशता के कारण भी घूस लेते हैं। डॉ. पी. एस. मुहर ने लिखा है-सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार एक जटिल विषय है।