13/05/2023
📄 *सवाल (Suwal)*
बेहयाई और बदनज़री के अज़ाब बताएं,
Be'hayai aur bad'nazari ke azaab batayen,
📄 *जवाब (Jawab)*
देखें, जिस तरह से हर मज़हब का एक बुनियादी अख़लाक़ होता है ठीक उसी तरह मज़हबे इस्लाम का बुनियादी अख़लाक़ हया है,
यानी शर्म व हया और ग़ैरत दीने इस्लाम का बुनियादी अख़लाक़ है, तो जो भी नेक मुसलमान होगा उसके बुनियादी अख़लाक़ में हया व ग़ैरत होगी, वो मुसलमान अपनी नज़रों की हिफाज़त करता है, उसके अख़लाक़ में हया होती है, उसके अंदर ग़ैरत ज़िंदा होती है,
लेकिन अफ़सोस की आज जिस तरह से लोग इस्लाम की तालीम से दूर होते जा रहे हैं उनके अंदर से शर्म व हया और ग़ैरत खत्म होते जा रही है,
हमारे मुआशरे में बेपर्दगी, बदनज़री, बेहयाई, उरयानियत फैलते जा रही है, ना जाने ये बेपर्दगी की रस्में हमने किस मुआशरे से ली है,
हमारा रब ﷻ तो ये भी पसंद नही करता कि कोई रस्म जो दूसरे मज़हबों की है मुसलमान उसकी मुशाबिहत करे अगर्चे वो रस्में दीने इस्लाम के उसूलों से टकराती ना हों, लेकिन हमने उन मुशाबिहत को अपने अंदर जज़्ब कर लिया जो हमारे दीन में नस्से क़तई से नाजाएज़ व हराम हैं,
आज के वक़्त में औरतें बेपर्दा खड़ी हैं साथ ही बाप भाई और बेटा व शौहर भी मौजूद है लेकिन ना बाप व बेटे के अंदर हया है और ना ही भाई और शौहर के अंदर ग़ैरत बची हुई है,
और अफ़सोस ये बाप भाई और बेटा व शौहर भी कैसे पर्दे के लिए कह सकते हैं क्यूंकि ये खुद वो हैं जो गलियों और बाजारों में दूसरों की बहन बेटियों पर नज़रें टिका कर रखते हैं,
हदीसे पाक है कि प्यारे आक़ा ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं_
"शिर्क के बाद जो सबसे बड़ा गुनाह है वो बदकारी और बेहयाई है,
और फ़रमाया कुछ औरतें ऐसी हैं जो लिबास पहन कर भी नंगी हैं, फ़रमाया ये वो औरतें हैं जिनको अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ﷻ जन्नत की हवा भी अता नही करेगा, जन्नत की खुश्बू तक नही दी जाएगी,
आज मुसलमान परेशान हाल है, वो बेरोज़गारी, बेसुकूनी, नाकामयाबी और बेबरकती के शिकार हैं, किसी का रिज़्क़ साथ नही दे रहा है तो किसी की शादी नहीं हो पा रही है, लेकिन अगर देखा जाए तो जिनमें से उमूमन वो लोग हैं जो इसी बेहयाई के शिकार हैं,
फिर लोग कहते हैं कि परेशानियां बड़ी हैं, हमारी शादी नहीं हो रही है, भाइयों और बहनों की शादी नही हो रही है, बच्चों का निकाह नही लग रहा है, बेबरकती बहुत है, रिज़्क़ में कुशादगी नही है, घरों में बेसुकूनी बहुत है, बड़ी आज़माइश है,
कोई अमलियात मांग रहा है तो कोई तावीज़ मांग रहा है, कि मुश्किलें खत्म हो, तो अगर परेशानियों में हो तो रब ﷻ की नाफरमानी वाले काम ना करो, अगर तकलीफ में हो तो रहमत वाले काम करो ना, तब तो रब ﷻ की रहमत नाज़िल होगी, बन्दा दुख में हो और काम अज़ाब वाले करे तो उसे आसानी कैसे हासिल होगी,
लेकिन रिवायतों के मुताबिक बताया जाए तो मुसलमान शुक्र मनाएं की उनपर आग नही बरस रही है, अज़ाबे इलाही ﷻ नाज़िल नही हो रहा है,
दूसरी क़ौमों में एक एक गलती के बदले आसमानों से अज़ाबे इलाही नाज़िल हो जाता था, किसी कौम पर आग की बारिश हुई तो किसी पर तूफान क़ाएम कर दी गयी, किसी क़ौम पर पत्थर बरसाए गये तो किसी पर खून की बारिश हुई, किसी क़ौम को उनके सहित ज़मीन पलट दी गयी तो किसी क़ौम को पत्थर का बना दिया गया,
लेकिन इस उम्मत पर सिर्फ और सिर्फ सरकारे मदीना ﷺ के सदके से अज़ाब नाज़िल नही हो रहा है,
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ﷻ फरमाता है अये महबूब ﷺ सिर्फ आपकी वजह से अज़ाब नही भेजा जा रहा है,
शायर कहता है_
अगर उनकी रहमत ना हो दरमियाँ में,
आग लग जायेगी दोनों जहाँ में,
और आज मुसलमान अपना अख़लाकी बुनियाद को छोड़ कर बेपर्दगी, उरयानियत, बेहयाई जैसे बुरे अफ़आल में मुब्तिला हो कर अपनी नज़रों को नापाक करके कहता है कि हम पर अल्लाह ﷻ की रहमत नाज़िल नही हो रही, हम परेशान हाल हैं, लेकिन मुसलमान शुक्र मनाएं की उनपर आग नही बरसाई जा रही है, उनपर पत्थर नही बरसाए जा रहे हैं, शुक्र करो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का कि ये सरकारे दो आलम ﷺ के क़दमों का सदक़ा है,
लेकिन ये भी याद रखा जाए कि रिवायतों में मौजूद है कि जब मुसलमान बदकारियों में मुब्तिला हो जाता है, अल्लाह ﷻ का खौफ़ करना छोड़ देता है, तो उनपर ज़ालिम बादशाह को मुसल्लत कर दिया जाता है,
अब गौर करें कि क्या आज ऐसा नही है, आज के हुक्मरान मुसलमानों पर जुल्म व तशद्दुद कर रहे हैं, तो कब हम इस बात को समझेंगे, कब अपने वक़ार को वापस हासिल करेंगे,
▪️याद रखें जिन लोगों की नजरें नापाक रहती हैं उनका हाफ़िज़ा कमज़ोर हो जाता है, उनकी इबादत में लज़्ज़त नही रह जाती, यानी इनको इबादत में वो सुकून और फ़वाएद हासिल नहीं होते, इबादत में मन नहीं लगता,
ऐसे लोग ज़हनी और कलबी तौर पर परेशान रहते हैं, इनके पास सबकुछ होते हुए भी इनका दिल उचाट रहता है, क्यूंकि इन्होंने वो नशा पाला है जिससे कभी पेट और ज़हन भरता ही नही, बन्दा जब संजीदा उम्र को पहुंच जाता है तब भी ये बन्दे का पीछा नहीं छोड़ती,
मुसनद इमाम अहमद बिन हम्बल में नज़र की हिफाज़त के हवाले से एक हदीस शरीफ़ मौजूद है कि नबी करीम ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं_
"तेरी नज़र अगर किसी जगह पड गयी तो वापस कर ले और अल्लाह ﷻ से डर जा, अगर तूने अल्लाह ﷻ के डर से नज़र को वापस फेर लिए तो तेरा वो फेरना अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ﷻ इबादत में बदल देगा, और इबादत भी ऐसी जिसमे लज़्ज़त हासिल होगी,
बेहयाई वाले का निकाह जल्दी नहीं होता, बहुत मुश्किलें आती हैं, रिज़्क़ से बरकत खत्म हो जाती है, उम्र से बरकत खत्म हो जाती है, वक़्त में बरकत नही रहती, क़ल्ब और ज़हन में सुकून नही रहता,
बेहयाई और बेपर्दगी पर ये जो कुछ भी बताया गया ये समन्दर के एक क़तरे का हजारवां हिस्सा है, न जाने कितनी तफसील और अज़ाब हैं इस नापाक काम के,
इस लिए मुसलमानों अपने वक़ार पर जियो, अपनी आंखों में शर्म व हया पैदा करो, निगाहों की हिफाज़त करो ताकि इस्लामी और खुशहाल ज़िन्दगी हासिल हो,