26/05/2026
*मीरा चरित अध्याय – ४१:--*
*(राधा जी ने कहा मेरी अन्तरंग एवं प्रिय सखी चम्पकलता ही तेरी चम्पा है। चम्पा तेरी दासी बनकर कलयुग में सेवा ही नहीं करेगी, अपितु इस जीवन यात्रा में तेरा पाथेय (मार्ग दर्शक) भी बनेगी)*
*ललिता ने गोद में लेकर दुलार से समझाया - "वह अमानिशा बीत गयी माधवी!*
*देख तो, जीवन प्रभात समीप है अब तो।"*
*जल पिलाने पर सचेत होकर उसने पूछा - "यह चम्पा .....?" "मेरे साथ आ! बताती हूँ।"*
*ललिता जी ने साथ चलने का संकेत करते हुए कहा।*
*_मीरा देख रही थी कि यहाँ की भूमि कहीं स्वर्ण, कहीं स्फटिक, कहीं हरितमणी और कहीं पुष्पराग की है।_*
*_इसी प्रकार वृक्ष-वल्लरियाँ पुष्प, पत्र और फल भी मणिमय, स्वर्ण और रजतमय ही है।_*
*_विविध पुष्पों के सौरभ से प्रकृति महक रही है छहों ऋतु सदा यहाँ प्रियालाल जी के भाव को समझ सदा सेवा सम्पादन को उपस्थित रहती हैं।_*
*_यमुना के घाट स्वर्ण और स्फटिक के बने हुए हैं। सीढ़ीयाँ कहीं प्रवाल और कहीं पन्ने की।_*
*पत्र, पुष्प, लता, वृक्ष, सबके सब मणिमय प्रकाशमय होते हुए भी अत्यंत कोमल हैं।*
*जिस ओर भी दृष्टि जाय, सर्वत्र सुंदरता, मधुरता, कोमलता, दिव्यता ही छायी है।*
*कभी-कभी उसे सम्पूर्ण प्रकृति में प्रियालाल जू की ही झाँकी दिखाई पड़ती।*
*वहाँ कुछ भी जड़ नहीं था, सब चैतन्य, दिव्य एवं चिन्मय था जो युगल दम्पति के सुख के निमित्त हेतु लीला में आवश्यकता अनुसार कोई भी रूप धारण कर लेता था।*
*सखियाँ एवं श्री राधा रानी की मधुरता, उनके श्री विग्रह की कोमलता अचिन्त्य थी*
*मानों वह सब चलित रत्नमय विग्रह हों। उनके कुण्डलों का प्रतिबिंब कपोलों पर स्पष्ट दिखाई पड़ता।*
*सभी वृक्ष फूलों के भार से नमित हो मानों ललिता जू से सेवा का आग्रह कर रहे हों*
*जैसे कह रहे हों कि हमारे प्राणेश्वर एवं प्राणेश्वरी को शीघ्र वन विहार करा हमें कृतार्थ करो न सखी !*
*पशु पक्षी सब श्री श्यामसुन्दर के विरह में शिथिल गात होकर उनके समीप आ जाते,*
*तब ललिता जू उन्हें हाथ से दुलारती हुई कहती - माधव शीघ्र ही आयेंगे और अपनी प्राण प्रिया के संग आकर तुम्हें दर्शनान्द अवश्य प्रदान करेंगे।*
*पर मीरा के स्पर्श से वे थोड़ा बचने की चेष्टा करते।*
*_"अरे बाँवरो ! यह तो अपनी ही हैं। अपनी ही सखी है। हाँ, हाँ ! किशोरीजू ने आश्वासन दिया है कि एक दिन फिर यह अन्तरंग लीला में सम्मिलित होंगी।_*
*देखो न, ऐसा न होता तो यह यहाँ कैसे होती भला?"*
*ललिता जी मीरा का हाथ थामकर मृग दम्पति, पक्षियों और शशकों पर फिराती।*
*एक चिरैया मीरा के हाथ पर बैठकर स्नेह से सिर घुमा-घुमाकर संकेत कर आश्वस्त करने लगी।*
*ललिता जू के संग ही कुछ पद चलकर उसने देखा कि झरने के पास शिला पर एक अर्ध मूर्छित किशोरी पड़ी है।*
*_उसके दीर्घ कृष्ण केश भू-लुंठित बिखरे पड़े हैं और सुन्दर नेत्रों से आँसुओं की धार बह रही है।_*
*_उसी समय चम्पा वहाँ आई। उसने उस किशोरी को बाँहों में भरकर उठाया।_*
*_मीरा ने देखा, वह किशोरी तो माधवी है।_*
*"चम्पा ने उससे परिचय पूछा और यह जानकर कि वह सुन्दर की बहु है, प्रसन्न हुई।*
*चम्पा ने स्नेह से कहा, "इस प्रकार धीरज खोने से कैसे चलेगा बहिन !*
*तुम अकेली ही तो नहीं हो। जो सबने खोया है, वही तुमने भी खोया है।*
*यों धीरज खो दोगी तो कैसे बात बन पायेगी। जब श्यामसुन्दर मथुरा से आ जायेंगे तो क्या मुख लेकर उनके समक्ष जाओगी?"*
*"दूसरी बहिनों से मेरी क्या समता बहिन! वे सब भाग्यशालिनी हैं - उन्होंने कुछ पाकर खोया है।*
*मुझ अभागिनी ने तो पाने से पूर्व ही खो दिया।*
*आप सबका घट उन्हें खोकर भी परिपूर्ण है और मैं दुर्भागिनी तो सदैव रीती की रीती (ठाकुर के स्नेह से वंचित) ही रही।" कहते-कहते माधवी फूट-फूट कर रो पड़ी।*
*चम्पा ने माधवी को ढांढस बँधाते हुए कहा, "हाय ! श्री कृष्ण के मथुरा जाने से आज तो ब्रज में सब अपने-अपने दुर्भाग्य को सब से बड़ा समझ रही हैं,*
*मानो दुर्भाग्य की होड़ लगी हो, किन्तु तुम अपनी बात कहो तो मैं कुछ समझू। इन आँसुओं की जुबां नहीं होती। मुख से कुछ तो कहो।"*
*माधवी के नेत्रों की बरखा रुकने में ही नहीं आती थी। चम्पा के बहुत अनुरोध-प्रबोध के बाद वह कुछ कहने का प्रयत्न करती तो होंठ फड़फड़ा कर रह जाते।*
*चम्पा ने स्नेह से माधवी के केशो को संभाल कर बाँधा।*
*चुनरी छोर भिगोकर मुँह पोंछा। ह्रदय से लगाकर प्यार भरी झिड़की दी, "अहा, कैसा रूप दिया है विधाता ने ?*
*इसे इस प्रकार नष्ट करने का क्या अधिकार है तुझे री? यह तो अपने ब्रज वल्लभ की सम्पति है, इसे........।"*
*बात पूरी होने से पहले ही माधवी बुरी तरह रो पड़ी, मानो प्राण निकल ही जायँगे।*
*उसकी यह हालत देखकर चम्पा भी अपने को रोक नहीं पायी।*
*उसके धैर्य ने मानों हार मान ली थी। आँखे बरबस बहने लगी।*
*यह सोचकर कि इस प्रकार तो यह मर ही जायगी, उसने अपने आपको सँभाला और स्नेह एवं अधिकार से कहते हुए उसका मुख ऊपर किया - "क्या है?*
*मुझसे नहीं कहेगी? क्यों कहेगी भला! परायी जो हूँ।" कहते हुए चम्पा के नेत्र भर आये।*
*"ऐसा मत कहो, मत कहो।" माधवी के कंठ से मरते पशु-सा आर्तनाद निकला।"*
*"फिर कह ! पहले अपनी आँखों को प्रवाह थाम, अन्यथा एक भी बात मैं समझ नहीं पाऊँगी।"*
*माधवी ने रूकते-अटकते शब्दों में भरे कंठ से सारी व्यथा, अपनी दुर्भाग्य कथा कह डाली - "मेरा दुर्भाग्य सीमा-हीन है बहिन !*
*_मैं प्रतिदिन निराशा के गहन गर्त में विलीन होती जा रही हूँ ! न जाने कलिकाल (कलयुग) कितनी दूर हैं न जाने कहाँ जाना होगा कैसे किसके सहारे? भवाटवी की भयानक अँधेरी गलियों में अवलम्बहीन मैं ........."_*
*माधवी पुन: चम्पा की गोद में सिर रख फूट-फूट करके रो पड़ी।*
*_चम्पा कुछ देर तक उसे गोद में लिए बैठी, मन में सोचती रही, "सचमुच ऐसा प्रबल दुर्भाग्य तो ब्रज के पशु – पाहन का भी नहीं रहा कभी !_*
*किन्तु इसे ऐसे भी कैसे छोड़ दूँ?"*
*_"सुन माधवी!" उसने कहा - "कलिकाल (कलयुग) चाहे कितनी ही दूर हो, तुझे चाहे जहाँ जाना पड़े, जैसे भी रहना पड़े, मैं तेरे संग चलूँगी और संग रहूँगी।_*
*बस अब रोना बंद कर! श्यामसुन्दर चाहकर भी कभी किसी के प्रति कठोर नहीं हो पाते।*
*अवश्य ही इसमें तेरा हित निहित है। और माधव की दया, करुणा, कोमलता, मधुरता, कृपा की घनीभूता स्वरूप है श्रीकिशोरीजू। चल, मेरे साथ चल।*
*उनके चरणों के दर्शन-चिंतन मात्र से ही विपत्ति का भय नष्ट हो जाता है। उठ!" उसने हाथ पकड़ कर कर उठाया।*
*"जीजी! आपने मेरे लिए कलिकाल (कलयुग) में, संसार के .........।"*
*_"अरी चुप! अब एक भी बात नहीं बोलेगी तू। बहिन ! मैं और तू एक ही माला के फूल हैं, कोई आगे तो कोई पीछे। हम सबका दुःख समान है।_*
*_श्री किशोरीजू का सुख ही हमारा सुख है और उनका दुःख ही हमारा दु:ख। हम सब उनकी हैं और उनके लिये ही हैं।_*
*चम्पा उसे लेकर बरसाने के राज महल में श्री किशोरी जू के पास गयी।*
*प्रणाम के अनन्तर चम्पा के मुख से सब कुछ सुनकर उन्हों ने माधवी के सिर पर हाथ रखा - "मत घबरा मेरी बहिन! अपनों को श्रीकृष्ण कभी निर आश्रित नहीं छोड़ते।*
*_प्रयोजन की प्रेरणानुसार अपनों को अपने से दूर करके वे उसके लिए स्वयं व्याकुल रहते हैं, और क्षण-क्षण में उसकी सार-सँभाल करते हैं।_*
*_तेरे साथ तो फिर चम्पा ने अपने को बाँध लिया है। ऐसा साथ सहज ही नहीं मिलता ........।"_*
*"श्रीजू ! मेरे लिए जीजी ने अपने को कैसी विपत्ति में डाल लिया है।" माधवी ने बीच में ही भरे गले से कहा - "आप इन्हें निवारित करें।"*
*_"ऐसा मत कह बावरी! यह साथ रहेगी तो कलिकाल के कंटक तुझे छूने का साहस नहीं कर पायेंगे।_*
*_प्राणेश्वर प्रतिक्षण तेरे तन-मन-नयन में बसे रहेंगें। चम्पा तेरी दासी बनकर सेवा ही नहीं करेगी, अपितु इस जीवन यात्रा में तेरा पाथेय (मार्ग दर्शक) भी बनेगी।"_*
*_यह सब सुनकर माधवी "हा स्वामिनी! हा स्वामिनी!" कहती मूर्छित हो गई।_*
*यह सब देख श्रवण कर मीरा अतीत और वर्तमान को मिलाते हुये ललिता जी के साथ आगे बढ़ आई*
*तथा राधा रानी को प्रणाम कर रुंधे कण्ठ से बोली, "हे मेरी स्वामिनी! इतनी अनुपम ममता, अगाध करूणा, अपार कृपा ....... इस तुच्छ दासी पर!" कहते-कहते मीरा श्री किशोरी जू के चरणों में गिर गई।*
*नेत्र जल से उनके चरण पखारने लगी। श्री किशोरी जू का वात्सलय पूर्ण कर - पल्लव उसके मस्तक पर उसे सहला रहा था*
*_"यह देख, मेरी अन्तरंग एवं प्रिय सखी चम्पकलता ही तेरी चम्पा है।"_*
*मीरा चम्पा को देखते ही उसके चरणों में प्रणाम करने बढ़ी कि चम्पकलता ने हँसते हुए उसे कण्ठ से लगा लिया और रागानुगा भक्ति का सार आधार तत्त्व स्वाभाविक ही बताते हुये कहा*
*"यहाँ हम सब सखियाँ हैं बहिन ! स्वामिनी हमारी हैं किशोरीजू। अतः चरण वन्दना, सेवा-टहल सब इनकी और इनके प्रियतम श्यामसुन्दर की।"*
जय श्री कृष्णा
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