धर्म शास्त्र - Dharma Shastra

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�मेरा प्रयास: धर्म के ज्ञान को साझा करना�

"अपने धर्म की बातों को लोगों तक पहुँचाना बहुत से ज्ञानी लोगों द्वारा लिखा और कहा गया है, जिसे मैं आप तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा हूँ।"

26/05/2026

*मीरा चरित अध्याय – ४१:--*

*(राधा जी ने कहा मेरी अन्तरंग एवं प्रिय सखी चम्पकलता ही तेरी चम्पा है। चम्पा तेरी दासी बनकर कलयुग में सेवा ही नहीं करेगी, अपितु इस जीवन यात्रा में तेरा पाथेय (मार्ग दर्शक) भी बनेगी)*

*ललिता ने गोद में लेकर दुलार से समझाया - "वह अमानिशा बीत गयी माधवी!*

*देख तो, जीवन प्रभात समीप है अब तो।"*

*जल पिलाने पर सचेत होकर उसने पूछा - "यह चम्पा .....?" "मेरे साथ आ! बताती हूँ।"*

*ललिता जी ने साथ चलने का संकेत करते हुए कहा।*

*_मीरा देख रही थी कि यहाँ की भूमि कहीं स्वर्ण, कहीं स्फटिक, कहीं हरितमणी और कहीं पुष्पराग की है।_*

*_इसी प्रकार वृक्ष-वल्लरियाँ पुष्प, पत्र और फल भी मणिमय, स्वर्ण और रजतमय ही है।_*

*_विविध पुष्पों के सौरभ से प्रकृति महक रही है छहों ऋतु सदा यहाँ प्रियालाल जी के भाव को समझ सदा सेवा सम्पादन को उपस्थित रहती हैं।_*

*_यमुना के घाट स्वर्ण और स्फटिक के बने हुए हैं। सीढ़ीयाँ कहीं प्रवाल और कहीं पन्ने की।_*

*पत्र, पुष्प, लता, वृक्ष, सबके सब मणिमय प्रकाशमय होते हुए भी अत्यंत कोमल हैं।*

*जिस ओर भी दृष्टि जाय, सर्वत्र सुंदरता, मधुरता, कोमलता, दिव्यता ही छायी है।*

*कभी-कभी उसे सम्पूर्ण प्रकृति में प्रियालाल जू की ही झाँकी दिखाई पड़ती।*

*वहाँ कुछ भी जड़ नहीं था, सब चैतन्य, दिव्य एवं चिन्मय था जो युगल दम्पति के सुख के निमित्त हेतु लीला में आवश्यकता अनुसार कोई भी रूप धारण कर लेता था।*

*सखियाँ एवं श्री राधा रानी की मधुरता, उनके श्री विग्रह की कोमलता अचिन्त्य थी*

*मानों वह सब चलित रत्नमय विग्रह हों। उनके कुण्डलों का प्रतिबिंब कपोलों पर स्पष्ट दिखाई पड़ता।*

*सभी वृक्ष फूलों के भार से नमित हो मानों ललिता जू से सेवा का आग्रह कर रहे हों*

*जैसे कह रहे हों कि हमारे प्राणेश्वर एवं प्राणेश्वरी को शीघ्र वन विहार करा हमें कृतार्थ करो न सखी !*

*पशु पक्षी सब श्री श्यामसुन्दर के विरह में शिथिल गात होकर उनके समीप आ जाते,*

*तब ललिता जू उन्हें हाथ से दुलारती हुई कहती - माधव शीघ्र ही आयेंगे और अपनी प्राण प्रिया के संग आकर तुम्हें दर्शनान्द अवश्य प्रदान करेंगे।*

*पर मीरा के स्पर्श से वे थोड़ा बचने की चेष्टा करते।*

*_"अरे बाँवरो ! यह तो अपनी ही हैं। अपनी ही सखी है। हाँ, हाँ ! किशोरीजू ने आश्वासन दिया है कि एक दिन फिर यह अन्तरंग लीला में सम्मिलित होंगी।_*

*देखो न, ऐसा न होता तो यह यहाँ कैसे होती भला?"*

*ललिता जी मीरा का हाथ थामकर मृग दम्पति, पक्षियों और शशकों पर फिराती।*

*एक चिरैया मीरा के हाथ पर बैठकर स्नेह से सिर घुमा-घुमाकर संकेत कर आश्वस्त करने लगी।*

*ललिता जू के संग ही कुछ पद चलकर उसने देखा कि झरने के पास शिला पर एक अर्ध मूर्छित किशोरी पड़ी है।*

*_उसके दीर्घ कृष्ण केश भू-लुंठित बिखरे पड़े हैं और सुन्दर नेत्रों से आँसुओं की धार बह रही है।_*

*_उसी समय चम्पा वहाँ आई। उसने उस किशोरी को बाँहों में भरकर उठाया।_*

*_मीरा ने देखा, वह किशोरी तो माधवी है।_*

*"चम्पा ने उससे परिचय पूछा और यह जानकर कि वह सुन्दर की बहु है, प्रसन्न हुई।*

*चम्पा ने स्नेह से कहा, "इस प्रकार धीरज खोने से कैसे चलेगा बहिन !*

*तुम अकेली ही तो नहीं हो। जो सबने खोया है, वही तुमने भी खोया है।*

*यों धीरज खो दोगी तो कैसे बात बन पायेगी। जब श्यामसुन्दर मथुरा से आ जायेंगे तो क्या मुख लेकर उनके समक्ष जाओगी?"*

*"दूसरी बहिनों से मेरी क्या समता बहिन! वे सब भाग्यशालिनी हैं - उन्होंने कुछ पाकर खोया है।*

*मुझ अभागिनी ने तो पाने से पूर्व ही खो दिया।*

*आप सबका घट उन्हें खोकर भी परिपूर्ण है और मैं दुर्भागिनी तो सदैव रीती की रीती (ठाकुर के स्नेह से वंचित) ही रही।" कहते-कहते माधवी फूट-फूट कर रो पड़ी।*

*चम्पा ने माधवी को ढांढस बँधाते हुए कहा, "हाय ! श्री कृष्ण के मथुरा जाने से आज तो ब्रज में सब अपने-अपने दुर्भाग्य को सब से बड़ा समझ रही हैं,*

*मानो दुर्भाग्य की होड़ लगी हो, किन्तु तुम अपनी बात कहो तो मैं कुछ समझू। इन आँसुओं की जुबां नहीं होती। मुख से कुछ तो कहो।"*

*माधवी के नेत्रों की बरखा रुकने में ही नहीं आती थी। चम्पा के बहुत अनुरोध-प्रबोध के बाद वह कुछ कहने का प्रयत्न करती तो होंठ फड़फड़ा कर रह जाते।*

*चम्पा ने स्नेह से माधवी के केशो को संभाल कर बाँधा।*

*चुनरी छोर भिगोकर मुँह पोंछा। ह्रदय से लगाकर प्यार भरी झिड़की दी, "अहा, कैसा रूप दिया है विधाता ने ?*

*इसे इस प्रकार नष्ट करने का क्या अधिकार है तुझे री? यह तो अपने ब्रज वल्लभ की सम्पति है, इसे........।"*

*बात पूरी होने से पहले ही माधवी बुरी तरह रो पड़ी, मानो प्राण निकल ही जायँगे।*

*उसकी यह हालत देखकर चम्पा भी अपने को रोक नहीं पायी।*

*उसके धैर्य ने मानों हार मान ली थी। आँखे बरबस बहने लगी।*

*यह सोचकर कि इस प्रकार तो यह मर ही जायगी, उसने अपने आपको सँभाला और स्नेह एवं अधिकार से कहते हुए उसका मुख ऊपर किया - "क्या है?*

*मुझसे नहीं कहेगी? क्यों कहेगी भला! परायी जो हूँ।" कहते हुए चम्पा के नेत्र भर आये।*

*"ऐसा मत कहो, मत कहो।" माधवी के कंठ से मरते पशु-सा आर्तनाद निकला।"*

*"फिर कह ! पहले अपनी आँखों को प्रवाह थाम, अन्यथा एक भी बात मैं समझ नहीं पाऊँगी।"*

*माधवी ने रूकते-अटकते शब्दों में भरे कंठ से सारी व्यथा, अपनी दुर्भाग्य कथा कह डाली - "मेरा दुर्भाग्य सीमा-हीन है बहिन !*

*_मैं प्रतिदिन निराशा के गहन गर्त में विलीन होती जा रही हूँ ! न जाने कलिकाल (कलयुग) कितनी दूर हैं न जाने कहाँ जाना होगा कैसे किसके सहारे? भवाटवी की भयानक अँधेरी गलियों में अवलम्बहीन मैं ........."_*

*माधवी पुन: चम्पा की गोद में सिर रख फूट-फूट करके रो पड़ी।*

*_चम्पा कुछ देर तक उसे गोद में लिए बैठी, मन में सोचती रही, "सचमुच ऐसा प्रबल दुर्भाग्य तो ब्रज के पशु – पाहन का भी नहीं रहा कभी !_*

*किन्तु इसे ऐसे भी कैसे छोड़ दूँ?"*

*_"सुन माधवी!" उसने कहा - "कलिकाल (कलयुग) चाहे कितनी ही दूर हो, तुझे चाहे जहाँ जाना पड़े, जैसे भी रहना पड़े, मैं तेरे संग चलूँगी और संग रहूँगी।_*

*बस अब रोना बंद कर! श्यामसुन्दर चाहकर भी कभी किसी के प्रति कठोर नहीं हो पाते।*

*अवश्य ही इसमें तेरा हित निहित है। और माधव की दया, करुणा, कोमलता, मधुरता, कृपा की घनीभूता स्वरूप है श्रीकिशोरीजू। चल, मेरे साथ चल।*

*उनके चरणों के दर्शन-चिंतन मात्र से ही विपत्ति का भय नष्ट हो जाता है। उठ!" उसने हाथ पकड़ कर कर उठाया।*

*"जीजी! आपने मेरे लिए कलिकाल (कलयुग) में, संसार के .........।"*

*_"अरी चुप! अब एक भी बात नहीं बोलेगी तू। बहिन ! मैं और तू एक ही माला के फूल हैं, कोई आगे तो कोई पीछे। हम सबका दुःख समान है।_*

*_श्री किशोरीजू का सुख ही हमारा सुख है और उनका दुःख ही हमारा दु:ख। हम सब उनकी हैं और उनके लिये ही हैं।_*

*चम्पा उसे लेकर बरसाने के राज महल में श्री किशोरी जू के पास गयी।*

*प्रणाम के अनन्तर चम्पा के मुख से सब कुछ सुनकर उन्हों ने माधवी के सिर पर हाथ रखा - "मत घबरा मेरी बहिन! अपनों को श्रीकृष्ण कभी निर आश्रित नहीं छोड़ते।*

*_प्रयोजन की प्रेरणानुसार अपनों को अपने से दूर करके वे उसके लिए स्वयं व्याकुल रहते हैं, और क्षण-क्षण में उसकी सार-सँभाल करते हैं।_*

*_तेरे साथ तो फिर चम्पा ने अपने को बाँध लिया है। ऐसा साथ सहज ही नहीं मिलता ........।"_*

*"श्रीजू ! मेरे लिए जीजी ने अपने को कैसी विपत्ति में डाल लिया है।" माधवी ने बीच में ही भरे गले से कहा - "आप इन्हें निवारित करें।"*

*_"ऐसा मत कह बावरी! यह साथ रहेगी तो कलिकाल के कंटक तुझे छूने का साहस नहीं कर पायेंगे।_*

*_प्राणेश्वर प्रतिक्षण तेरे तन-मन-नयन में बसे रहेंगें। चम्पा तेरी दासी बनकर सेवा ही नहीं करेगी, अपितु इस जीवन यात्रा में तेरा पाथेय (मार्ग दर्शक) भी बनेगी।"_*

*_यह सब सुनकर माधवी "हा स्वामिनी! हा स्वामिनी!" कहती मूर्छित हो गई।_*

*यह सब देख श्रवण कर मीरा अतीत और वर्तमान को मिलाते हुये ललिता जी के साथ आगे बढ़ आई*

*तथा राधा रानी को प्रणाम कर रुंधे कण्ठ से बोली, "हे मेरी स्वामिनी! इतनी अनुपम ममता, अगाध करूणा, अपार कृपा ....... इस तुच्छ दासी पर!" कहते-कहते मीरा श्री किशोरी जू के चरणों में गिर गई।*

*नेत्र जल से उनके चरण पखारने लगी। श्री किशोरी जू का वात्सलय पूर्ण कर - पल्लव उसके मस्तक पर उसे सहला रहा था*

*_"यह देख, मेरी अन्तरंग एवं प्रिय सखी चम्पकलता ही तेरी चम्पा है।"_*

*मीरा चम्पा को देखते ही उसके चरणों में प्रणाम करने बढ़ी कि चम्पकलता ने हँसते हुए उसे कण्ठ से लगा लिया और रागानुगा भक्ति का सार आधार तत्त्व स्वाभाविक ही बताते हुये कहा*

*"यहाँ हम सब सखियाँ हैं बहिन ! स्वामिनी हमारी हैं किशोरीजू। अतः चरण वन्दना, सेवा-टहल सब इनकी और इनके प्रियतम श्यामसुन्दर की।"*

जय श्री कृष्णा

26/05/2026

*मीरा चरित अध्याय – ४०:--*

*(माधवी का व्यवहार एका एक परिवर्तित हो गया)*

*उस दिन के पश्चात माधवी का व्यवहार एका एक परिवर्तित हो गया।*

*अब नित्य प्रातः सायँ मुरली-स्वर कानों में पड़ते ही अटारी पर चढ़ जाती, पुष्प वर्षा करती।*

*सखियों के संग जा-जा कर लीला-स्थलियों के दर्शन करती और उनकी बाते ध्यान से सुनती*

*_आज कन्हैया ने किसका घड़ा फोड़ा, किसके घर माखन की कमोरी फोड़ी, किसकी चोटी खाट से बाँधी, किसके बछड़े को खोलकर दूध पिला दिया। इन विविध लीलाओं को सुन-सुन करके अकेले में अश्रु बहाती।_*

*_सोचती मैं भी तो सबके साथ ही रहती हूँ परन्तु मेरी मटकी को हाथ तक भी नहीं लगाया, कभी मुझे चिढ़ाया भी नहीं, और तो और कभी मेरी ओर ठीक से देखा तक नहीं।_*

*_उसकी सास बार-बार पूछती - "कोई मांदगी लगी हैं क्या बहू ? कही दुखता हैं बेटी?, तू ठीक से कुछ खाती-पीती भी नहीं। पीहर की, मैया की याद आ रही हो तो कछु दिन वहाँ हो आ लाली!"_*

*_माधवी ने तुरन्त उत्तर दिया - "ना मैया! मोकू पीहर नाय जानों। मैं तो स्वस्थ हूँ मैया! आप कछु चिंता मत करबो करौ!"_*

*मीठा बोल सास को तो समझा लेती पर उसका हृदय ही जानता कि जिसकी मधुर छवि उसके मन प्राण में अटकी है, उसकी उपेक्षा, उसकी विमुखता को सहन करने में वह किस कष्ट में जी रही है।*

*भीतर ही भीतर जैसे वह घुलती सी जा रही थी।*

*ऐसे में उसके प्राणाराध्य की चर्चा ही उसके प्राणों का आधार थी।*

*गृह कार्यों से निवृत हो वह पद-सेवा के मिस अपने पति सुंदर के चरणों को गोद में लेकर बैठ जाती और, धीरे से कोई चर्चा चला देती - "आज आपके सखा और आप .......?*

*बस, उसके लिए इतना संकेत ही पर्याप्त था। ब्रज में तो सभी कृष्ण-चर्चा, कृष्ण-गुणगान के व्यसनी हैं।*

*चर्चा आरम्भ हुई तो दोनों इतने निमग्न की रात्रि कब बीती, दोनों ही जान नहीं पाते। भोर होने पर ताम्रचूड की बाँग ही उन्हें सचेत करती।*

*दिन बीत रहे थे इसी प्रकार, और एक दिन वज्रपात हुआ - वृन्दावन में तो जैसे सबके पावँ तले धरती ही खिसक गई हो।*

*पता लगा कि मथुरा से अक्रूर श्रीकृष्ण को लिवाने आया है।*

*श्रीराधा रानी तो ठाकुर के लिये माला गूंथ कर यमुना किनारे प्रतीक्षा रत थीं।*

*श्रीकृष्ण के मथुरा गमन जाने का सुन उनकी अन्तरंग सखियों की स्थिति तो कहाँ तक वर्णन करें ?*

*श्रीराधा रानी को कौन कैसे बताये ?*

*ललिता जी स्वयं को सम्भाल प्रियाजी को नन्दभवन के बाहर राजपथ तक रथ के पास ले आईं।*

*वहाँ तो समस्त ब्रज ही मानों आँसुओं में डूब रहा था। माधवी भी स्वयं की मर्यादा भूल राजपथ पहुँची - आँसुओं की झड़ी थमती न थी*

*"हाय ! जब श्यामसुन्दर यहाँ थे, तो मैं बैरन लाज के जंजाल में फँसी रही ...... जब सुध आई तो मेरे हिस्से में उपेक्षा ही आई ..... और अब मैं कैसे जीवन धारण करूँगी?"*

*क्रूर अक्रूर, ब्रजेन्द्रनन्दन, ब्रज के प्राणाधार को लेकर मथुरा ले चला गया।*

*और इधर मीरा मुर्छित हो ललिता के चरणों में जा गिरी।*

जय श्री कृष्णा

25/05/2026

*मीरा चरित अध्याय – ३९:--*

*(माधवी को श्यामसुंदर के आदेश कलिकाल (कलयुग) में जन्म लेकर भक्ति-पथ का अनुसरण करने पर शुद्ध होकर ही मुझे प्राप्त कर पाओगी)*

*माधवी की सास कहती - 'पहले तो नंदलाला रोज घर आता।*

*_कुछ न कुछ माँग कर खाता, सुंदर के साथ खेलता, मुझसे और सुंदर से बतियाता, पर जब से बहू आई है, ऐसा लजाने लगा है कि बुलाने पर भी नहीं आता।_*

*_बहू को भी ऐसी लाज लगती है कि कन्हैया के आने की भनक लगते ही दौड़कर भीतरी कोठे में पहुँच जाती है।_*

*_"अरे, बावरी ! लाला से कहा लाज? वह तो अपनो ही है।"_*

*इसी तरह कुछ समय व्यतीत हुआ।*

*इन्द्रयाग के स्थान पर गिरिराजजी की पूजा हुई।*

*_पूजा-परिक्रमा के समय भी माधवी ऐसी ही सावधान रही कि आँखों की पलकें झुकाये ही रहती।_*

*_माधवी की ठाकुर के प्रति ऐसी बेरूखी और बेगानापन देख,_*

*_इधर मीरा की आँखों से झर झर अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी - "आह! कैसी प्राणघाती शिक्षा मैया की और कैसी मूढ़ता मेरी?"_*

*ललिता माधवी को गिरिराज के चरण-प्रान्त में ले गयी।*

*_माधवी ने देखा, इन्द्र के कोप से घनघोर वर्षा और उपल-वृष्टि आरम्भ हुई। मानव, पशु सब अति बेहाल!_*

*ऐसा प्रतीत होता मानो प्रलय उपस्थित हो गया हो। किसी को किसी भी ओर से त्राण (रास्ता) नहीं दिखाई देता था।*

*_गाय, बछड़े, बैल डकरा रहे थे। करुण-स्वर में सभी जन पुकार रहे हैं - "कन्हैया रे! लाला रे! कनुआ रे! भैया रे! श्यामसुंदर! हे कृष्ण! बचाओ, बचाओ।"_*

*ऐसा प्रतीत होता था, मानो इन्द्र का कोप आज ब्रज का नाश कर देगा।*

*आँधी-पानी के भयानक स्वर में उन ब्रजवासियों के स्वर डूब-डूब जाते।*

*तभी वहाँ घन-गंभीर स्वर सुनायी दिया, प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक जन को सुनायी दिया -"गिरिराज तरहटी में चलो, वही हमारी रक्षा करेंगे।"*

*माधवी भी भाग रही है। प्राण के संकट के समय लाज-चूँघट का स्मरण किसे रहता हैं।*

*_सबके साथ वह भी गिरिराज-शिला के नीचे पहुँच गयी।_*

*जब थोडा ढाढ़स बँधा तो देखा कि सबके सिर पर गिरिराज गोवर्धन छत्र की भाँति तना हुआ है।*

*पानी की एक बूंद भी जो कहीं टपकती हो। पर ये गिरिराज किसके आश्रय ठहरे हैं?*

*_घूमती हुई दृष्टि एक छोटी-सी कनिष्ठिका पर जा रुकी।_*

*_ऐसी सुंदर अंगुली और हाथ आश्चर्याभिभुत दृष्टि, भुज के सहारे नीचे उतरने लगी_*

*_और वह मुख वह छवि एक नजर में जो देखा जा सका, सो ही बस, नेत्रों के पथ से उस रूप-समुद्र ने उमड़कर ह्रदय को लबालब भर दिया।_*

*_मन, बुद्धि न जाने किस ओर भाग छूटे ? सात दिन कब बीते, इसका ज्ञान किसी और को हो तो हो, माधवी को नहीं था।_*

*_एक दिन पुन: वही स्वर गूंजा - "वर्षा थम गयी हैं, सब बाहर निकलकर अपने -अपने घर जाओ।"_*

*_मैया यशोदा कह रही हैं - 'लाला रे! तेरा हाथ दुखतो होयगो बेटा! अब तो धर दे याऐ नीचे।"_*

*_इतना सुन माधवी का ह्रदय हाहाकार कर उठा।_*

*श्यामसुंदर सबकी ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे, और जाते हुए लोगो को हंसकर कुछ न-कुछ आश्वासन दे रहे थे।*

*_किन्तु माधवी की ओर एक बार भी भूलकर ना देखा।_*

*_माधवी स्वयं को यूँ उपेक्षिता पा तड़प सी उठी - "अरी मैया! यह कैसी उल्टी शिक्षा दी तैंने ? यह शिक्षा, यह लाज ही मेरी बैरन हो गई!"_*

*_वह व्याकुल हो पुकार उठी - "क्षमा करो ठाकुर! मुझ अबोध से भूल हुई। कृपा करो !_*

*_मैं ऐसा क्या करूँ जिससे आप प्रसन्न होवो अब यह माधुरी छवि मेरी आँखों से दूर न हो कृपा करो।" वह जहाँ थी वहीं अचेत सी गिर पड़ी।_*

*अब की बार सरस-मीठी वाणी कानों में सुधा-सिंचन करने लगी*

*_"भूल मान गयी है, अत: दर्शन तो नित्य होंगे, पर हमारी अन्तरंग लीला में सम्मिलित न हो सकोगी।_*

*_परिमार्जन (पश्चाताप) के लिए कलिकाल में जन्म लेकर भक्ति-पथ का अनुसरण करने पर शुद्ध होकर ही मुझे प्राप्त कर पाओगी।"_*

*इतना सुनते ही माधवी अचेत हो गयी।*

जय श्री कृष्णा

25/05/2026

*पुरुषोत्तम (अधिकमाह) मास माहात्म्य अध्याय ०९:--*

*(मेधावी ऋषि की कन्या का दुःख)*

सूत उवाच ॥ ततस्तं विस्मयाविष्टः पप्रच्छ नारदो मुनिः ॥ मेधाविद्विजवर्यस्य सुतावृत्तान्तमद्‌भुतम्‌ ॥१॥ नारद उवाच ॥ मुने मुनिसुता तत्र किं चकार तपोवने ॥ को वा मुनिवरस्तस्याः पाणिग्रहमचीकरत्‌ ॥२॥ श्रीनारायण उवाच ॥ निवसन्त्या स्ततस्तस्याः कियान्‌ कालो विनिर्गतः ॥ स्मारं स्मारं स्वपितरं शोचन्त्या श्च मुहुर्मुहुः ॥३॥ शून्यसद्मनि संविष्टां यूथभ्रष्टां मृगीमिव ॥ गलद्वाष्पौघनयनां ज्वलद्‌धृदयपङ्कजाम्‌ ॥४॥ विनिःश्वासपरां दीनां संरुद्धामुरगीमिव ॥ चिन्‍‍तयन्तीयमपश्यन्तीं दुःखपारं कृशोदरीम्‌ ॥५॥

*सूतजी बोले – तदनन्तर विस्मय से युक्त नारद मुनि ने मेधावी ऋषि की कन्या का अद्‌भुत वृत्तान्त पूछा ॥१॥*

*_नारदजी बोले – हे मुने ! उस तपोवन में मेधावी की कन्या ने बाद में क्या किया ? और किस मुनिश्रेष्ठ ने उसके साथ विवाह किया ? ॥२॥_*

*श्रीनारायण बोले – अपने पिता को स्मरण करते-करते और बराबर शोक करते-करते उस घर में कुछ काल उस कन्या का व्यतीत हुआ ॥३॥*

*यूथ (समूह) से भ्रष्ट हुई हरिणी की तरह घबड़ाई, शून्य घर में रहनेवाली, दुःखरूप अग्नि से उठी हुई भाप द्वारा बहते हुए अश्रुनेत्र वाली, जलते हुए हृत्कमल वाली ॥४॥*

*दुःख से प्रतिक्षण (हर क्षण) गरम श्वालस (साँस) लेनेवाली, अतिदीना, घिरी हुई सर्पिणी की तरह अपने घर में संरुद्ध (रोका हुआ), अपने दुःख को सोचती और दुःख से मुक्त होने के उपाय को न देखती हुई - उस कृशोदरी को ॥५॥*

तामाससाद भगवान्‌ भविष्यद्‌बलनोदितः ॥ यदृच्छया वने तस्मिन्‌ परमः कोपनो मुनिः ॥६॥ यद्विलोकनमात्रेण त्रस्येदपि शतक्रतुः ॥ जटाकलापसञ्छन्नः साक्षादिव सदाशिवः ॥७॥ यस्त्वज्जनन्या राजेन्द्र शैशवेऽतिप्रसादितः ॥ त्रिदशाऽऽकर्षिणीं विद्यां ददावस्यै सुपूजितः ॥८॥ येनाहमपि भूपाल सर्वदेवनमस्कृतः ॥ रथे संयोजितः साक्षाद्रुक्मिण्या सह नारद ॥९॥ उभाभ्यां चालिते मार्गे रथे दुर्वाससान्विते ॥ अत्युग्रया तृषा शुष्यत्ताल्वोष्ठपुटयाऽनया ॥१०॥ सूचितोऽहं जलार्थिन्या स्कन्धस्थयुगया पुरा ॥ गच्छन्नेव पदाग्रेण सम्पीङ्य वसुधातलम्‌ ॥११॥

*उसके शुभ भविष्य की प्रेरणा से सान्त्व ना देने के लिए उस वन में अपनी इच्छा से ही परक्रोधी – जिनको देखने से ही इन्द्र भयभीत होते हैं – ऐसे, जटा से व्याप्त, साक्षात्‌ शंकर के समान भगवान्‌ दुर्वासा ऋषि आये ॥६-७॥*

*हे नारद ! भगवान्‌ कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर से कहा कि - हे राजेन्द्र ! वह दुर्वासा आये जिसको कि आपकी माता कुन्ती ने बालापन में प्रसन्न किया था।*

*तब उन सुपूजित महर्षि ने देवताओं को आकर्षण करने वाली विद्या उन्हें दी और हे भूपाल ! जिन्होंने सब देवताओं से नमस्कार किए जाने वाले मुझको भी रुक्मिणी के साथ रथ में बैलों की जगह जोता ॥८-९॥*

*दुर्वासा को बैठाकर रथ खींचते हुए जब हम दोनों मार्ग चलने लगे - तब चलते-चलते मार्ग में अति तीव्र प्यास से सूख गये थे।*

*तालु और ओष्ठ जिस रुक्मिणी के ऐसी जल चाहने वाली रुक्मिणी ने - जब मुझे सूचित किया तब कन्धे पर रथ की जोत को रखे हुए चलते-चलते ही पाँव के अग्रभाग से पृथ्वी को दबा कर ॥१०-११॥*

आनीतवान्‌ भोगवतीं प्रियाप्रेमपरिप्लुतः ॥ सैवोर्ध्वगामिनी भूत्वा तावन्मात्रेण वारिणा ॥१२॥ न्यवारयन्महाराज रुक्मिणीतृषमुल्बणम्‌ ॥ तद्‌दृष्ट्वा तत्क्षणोत्पन्नक्रोधेन प्रज्वलन्निव ॥१३॥ प्रलयाग्निरिवोत्तिष्ठन्‌ शशाप कोपनो मुनिः ॥ अहो श्रीकृष्ण तेऽत्यन्तं वल्लभा रुक्मिणी सदा ॥१४॥ यद्भवान्‌ मामवज्ञाय प्रियाप्रेमपरिप्लुतः ॥ पाययामास पानीयं माहात्म्यं दर्शयन्‌ स्वकम्‌ ॥१५॥ दम्पत्योरुभयोरेव वियोगोऽस्तु युधिष्ठिर ॥ इति यो दत्तवान्‌ शापं स एव मुनिसत्तमः ॥१६॥ साक्षाद्रुद्रांशसम्भूतः कालरुद्र इवापरः ॥ अत्रेरुग्रतपः कल्पवृक्षदिव्यफलं महत्‌ ॥१७॥

*_रुक्मिणी के प्रेम के वशीभूत मैंने भोगवती नाम की नदी को उत्पन्न किया। तब वही भोगवती ऊपर से बहने लगी। अनन्तर उसी के जल से ॥१२॥_*

*_हे महाराज ! रुक्मिणी की प्यास को मैंने बुझाया। इस प्रकार रुक्मिणी की प्यास का बुझना देख उसी क्षण अग्नि की तरह दुर्वासा क्रोध से जलने लगे ॥१३॥_*

*और प्रलय की अग्नि के समान उठकर दुर्वासा ने शाप दिया - बोले बड़ा आश्चगर्य है, हे श्रीकृष्ण ! रुक्मिणी तुमको सदा अत्यन्त प्रिय है ॥१४॥*

*_अतः स्त्री के प्रेम से युक्त तुमने मेरी अवज्ञा कर अपना महत्व दिखलाते हुए इस प्रकार से उसे पानी पिलाया ॥१५॥_*

*_अतः तुम दोनों का वियोग होगा, इस प्रकार उन्होंने शाप दिया था।_*

*_हे युधिष्ठिर ! वही यह दुर्वासा मुनि हैं ॥१६॥_*

*साक्षात्‌ रुद्र के अंश से उत्पन्न, दूसरे कालरुद्र की तरह, महर्षि अत्रि के उग्र तपरूप कल्पवृक्ष के दिव्य फल ॥१७॥*

*_पतिव्रताओं के सिर के रत्नृ, अनुसूया भगवती के गर्भ से उत्पन्न, अत्यन्त मेधायुक्त दुर्वासा नाम के ऋषि ॥१८॥_*

पतिव्रताशिरोरत्नाऽनुसूयागर्भसम्भवः ॥ दुर्वासा नाम मेधावी यथा वै मूर्तिमत्तपः ॥१८॥ नैकतीर्थजलक्लिन्न जटाभूषितसच्छिराः ॥ तमालोक्य समायान्तं कुमारी शोकसागरात्‌ ॥१९॥ उन्मज्ज्योत्थाय धैर्येण ववन्दे चरणौ मुनेः ॥ नत्वा स्वाश्रममानीय बाल्मीकिं जानकी यथा ॥२०॥ अर्ध्यपाद्यैर्वन्यफलैः पुष्पैश्च विविधैर्मुनिम्‌ ॥ स्वागतं पृच्छय सा बाला पूजयामास सादरम्‌ ॥ ततः सविनया राजन्नुवाच मुनिकन्यका ॥२१॥ बालोवाच ॥ नमस्तेऽस्तु महाभाग अत्रिगोत्रदिवाकर ॥ कुतोऽधिगमनं साधो दुर्दैवाया ममाश्रमे ॥ मम भाग्योदयो जातस्तवागमनतो मुने ॥२२॥

*_अनेक तीर्थों के जल से भींगी हुई जटा से भूषित सिर वाले, साक्षात्‌ तपोमूर्ति दुर्वासा ऋषि को आते देखकर - कन्या ने शोकसागर से निकल कर धैर्य से मुनि के चरणों में प्रार्थना की। ॥१९॥_*

*प्रार्थना करने के बाद जैसे बाल्मीकि ऋषि को जानकी अपने आश्रम में लाई थीं वैसे ही यह भी दुर्वासा को अपने घर में लाकर ॥२०॥*

*अर्ध्य, पाद्य और विविध प्रकार के जंगली फलों और पुष्पों से स्वागत के लिए आज्ञा लेकर आदरपूर्वक पूजन कर तदनन्तर - हे राजन्‌ ! यह बाला बोली ॥२१॥*

*कन्या बोली – हे महाभाग ! हे अत्रि कुल के सूर्य ! आपको प्रणाम है। हे साधो ! मेरी अभाग्या के घर में आज आपका शुभागमन कैसे हुआ ? हे मुने ! आपके आगमन से आज मेरा भाग्योदय हुआ है ॥२२॥*

अथवा मत्पितुः पुण्यप्रवाहप्रेरितो भवान्‌ ॥ सम्भावयितुं मामेव ह्यागतो मुनिसत्तमः ॥२३॥ भवादृशां पादरजस्तीर्थरूपं महात्मनाम्‌ ॥ स्पृशन्त्याः सफलं जन्म सफलं चाद्य मे व्रतम्‌ ॥२४॥ अद्य मे सफलं पुण्यमद्य मे सफलो भवः ॥ भवादृशा महापुण्या यन्मे दृष्टिपथं गताः ॥२५॥ एवमुक्त्वाट च सा बाला तस्थौ तूष्णीं तदग्रतः ॥ सस्मितं मुनिराहेदं दुर्वासाः शङ्करांशजः ॥२६॥ दुर्वासा उवाच ॥ साधु साधु द्विजसुते कुलमभ्युद्‌धृतं पितुः ॥ मेधाऋषेः सुतपसः फलमेतादृशी सुता ॥२७॥ कैलासादहमागच्छं ज्ञात्वा ते धर्मशीलताम्‌ ॥ त्वदाश्रममनुप्राप्तस्त्वया सम्पूजितोऽस्म्यहम्‌‌ ॥२८॥

*_अथवा मेरे पिता के पुण्य के प्रवाह से प्रेरित मुझे सान्त्वना देने के लिये ही आप मुनिसत्तम आये हैं ॥२३॥_*

*_आप ऐसे महात्माओं के पाँव की धूल जो है वह तीर्थरूप है उस धूल का स्पर्श करने वाली मैं अपना जन्म आज सफल कर सकी हूँ, आज मेरा व्रत भी सफल है ॥२४॥_*

*_आप ऐसे पुण्यात्मा के जो मुझे आज दर्शन हुए। अतः आज मेरा उत्पन्न होना और मेरा पुण्य सफल है ॥२५॥_*

*_ऐसा कहकर वह कन्या दुर्वासा के सामने चुपचाप खड़ी हो गयी। - तब भगवान्‌ शंकर के अंश से उत्पन्न दुर्वासा मुनि मन्द हास्य युक्त बोले ॥२६॥_*

*_दुर्वासा बोले – हे द्विजसुते ! तू बड़ी अच्छी है तूने अपने पिता के कुल को तार दिया। - यह मेधावी ऋषि के तप का फल है। जो उन्हें तेरी ऐसी कन्या उत्पन्न हुई ॥२७॥_*

*_तेरी धर्म में तत्परता जान - कैलास से मैं यहाँ आया, और तेरे घर आकर तेरे द्वारा मेरा पूजन हुआ ॥२८॥_*

गमिष्यामि वरारोहे शीघ्रं बदरिकाश्रमम्‌ ॥ द्रष्दुं नारायणं देवं सनातनमुनीश्वरम्‌ ॥२९॥ तपश्चमरन्तमेकाग्रमत्युग्रं लोकहेतवे ॥ बालोवाच ॥ ऋषे त्वद्दर्शनादेव शुष्को मे शोकसागरः ॥३०॥ अतः परं शुभं भावि यस्मात्‌ सम्भाविता त्वया ॥ समुद्भूतबृहज्ज्वाल दुःखहव्यभुजं मुने ॥३१॥ कि न वेत्सि दयासिन्धो तन्निर्वापय शङ्कर ॥ हर्ष हेतुर्न मे कश्चिद्‌ दृश्यते सुविचारतः ॥३२॥ न माता न पिता भ्राता यो मे धैर्यं प्रयच्छति ॥ कथङ्कारमहं जीवे दुःखसागरपीडिता ॥३३॥ यां यां दिशं प्रपश्यामि सा सा शून्या विभाति मे ॥ मम दुःखप्रतीकारं कुरु शीघ्रं तपोनिधे ॥३४॥

*हे वरारोहे ! मैं शीघ्र ही बदरिकाश्रम में मुनीश्वर सनातन, नारायण, देव के दर्शन के लिये जाऊँगा जो प्राणियों के हित के लिए अत्यन्त उग्र तप कर रहे हैं।*

*कन्या बोली – हे ऋषे ! आपके दर्शन से ही मेरा शोकसमुद्र सूख गया ॥२९-३०॥*

*अब इसके बाद मेरा भविष्य उज्ज्वल है; क्योंकि आपने मुझे सान्त्वना दी।*

*हे मुने ! मेरी उस प्रादुर्भूत बड़ी भारी ज्वाला युक्त दुःख रूप अग्नि को क्या आप नहीं जानते हैं ? हे दयासिन्धो ! हे शंकर ! उस दुःखाग्नि को शान्त कीजिये।*

*मेरे विचार से हर्ष का कारण मुझे कुछ भी दिखलाई नहीं देता ॥३१-३२॥*

*_न मुझे माता है, न पिता, न तो भाई है, जो धैर्य प्रदान करता, अतः दुःख समुद्र से पीड़ित मैं कैसे जीवित रह सकती हूँ ? ॥३३॥_*

*_जिस-जिस दिशा में मैं देखती हूँ वह-वह दिशा मुझे शून्य ही प्रतीत होती है, इसलिये हे तपोनिधे ! मेरे दुःख का निस्तार आप शीघ्र करें ॥३४॥_*

न मां कामयते कश्चित्‌ पाणिग्रहणहेतवे ॥ अतः परं भविष्यामि वृषलीति महद्भयम्‌ ॥३५॥ तस्मान्न जायते निद्रा न रुचिर्भोजने मम ॥ ब्रह्मन्‌ मुमूर्षुरस्म्येव इति मे निश्चयोऽधुना ॥३६॥ इत्युक्त्वामश्रुमुखी बाला विरराम तदग्रतः ॥ दुर्वासास्तदुपायाथ विचारमकरोत्तदा ॥३७॥ श्रीनारायण उवाच ॥ इति मुनितनयावचो निशम्य बहुतलमा मुनिराड्‌ विचार्य छन्दः ॥ अतिशयकृपया विलोक्य बालां किमपि हितं निजगाद सारभूतम्‌ ॥३८॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये दुर्वाससस्तपोवनगमनं नाम नवमोऽध्यायः ॥९॥

*_मेरे साथ विवाह करने के लिए कोई भी नहीं तैयार होता है। इस समय मेरा विवाह न हुआ तो मैं फिर वृषली (रजस्वला स्त्री) शूद्रा हो जाऊँगी यह मुझे बड़ा भय है ॥३५॥_*

*_इसी भय से न मुझे निद्रा आती है, और न भोजन में मेरी रुचि होती है, हे ब्रह्मन्‌ ! अब मैं शीघ्र ही मरने वाली हूँ, यह मेरा इस समय निश्चय है ॥३६॥_*

*ऐसा कहकर आँसू बहाती हुई कन्या दुर्वासा के सामने चुप हो गयी तब दुर्वासा कन्या का दुःख दूर करने का उपाय सोचने लगे ॥३७॥*

*श्रीनारायण बोले – इस प्रकार मुनि कन्या के वचन सुनकर और इसका अभिप्राय समझ कर बड़े क्रोधी मुनिराज दुर्वासा ने - उस कन्या का कुछ हित विचार पूर्ण कृपा से उसे देखकर सारभूत उपाय बतलाया ॥३८॥*

*इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥९॥*

जय श्री कृष्

25/05/2026

*मीरा चरित अध्याय – ३८:--*

*(ललिता ने दिखया मीरा का अपना पिछले जन्म में माधवी रूप के दर्शन)*

*वृन्दावन में मीरा की प्रेम भक्ति एक नया मोड़ ले रही थी।*

*दिन, या तो सत्संग में बीतता या रात्रि के दर्शन के आनन्द में।*

*मीरा रात्रि होते ही ललिता जू की प्रतीक्षा में सतर्क हो बैठती।*

*वह उनका संकेत पाते ही उठकर चल देती। ललिता जू मीरा को नित्य नवीन लीलास्थली में नव-नव लीला दर्शन कराती।*

*वे लीला-दर्शन के लिए जाती तो रात्रि में ही पर किन्तु लीला यदि दिन की है*

*जैसे घेणु-चारण, कालिय दमन, माखन चोरी, दान लीला, पनघट लीला इन सबका दर्शन करते समय उन्हें दिन ही दिखाई देता।*

*वे भूल जातीं कि अभी अर्धरात्रि में वह शय्या से उठकर आयी हैं। वे केवल देखती ही नहीं, उन लीलाओं में सम्मिलित भी होती।*

*ललिता उन्हें सदा अपने समीप रखती।*

*लीलाओं में श्री किशोरीजू का सरल शान्त भोलापन देखकर वह न्यौछावर हो-हो जाती।*

*श्यामसुन्दर की बात-बात में चतुराई, उनका अपनत्व, ठिठौली और उनका प्रेम मीरा के रग-रग में बस गया। उसका रोम-रोम श्याममय हो गया।*

*_सबसे अन्त में देखा मीरा ने अपना माधवी रूप।_*

*_ब्रज के ही एक छोटे से गाँव में माधवी रहती है।_*

*बचपन में ही उसके पिताजी उसका विवाह नंदीश्वर के सुन्दर से कर देते हैं।*

*विवाह के कुछ समय के उपरान्त माधवी के पिताजी का देहान्त हो जाता है।*

*माधवी माँ के संरक्षण में - उसकी रोक-टोक में ही बड़ी होती है।*

*माधवी बड़ी हो रही है तो बहुत सुन्दर दिखने लगी है। उसकी सुन्दरता की उपमा गाँव वाले लक्ष्मी और गौरी माँ से देते।*

*नन्दगाँव से माधवी के ससुराल से गौना करवाने का समाचार आया।*

*_इधर माधवी की माँ ने सुना कि नंदराय जी के पुत्र श्री कृष्ण की ऐसी मोहिनी है कि जो एक बार देख लेता है, वह बौरा ही हो जाता है।_*

*स्त्रियाँ अग-जग कहीं की नहीं रह जाती।*

*_केवल उसके दर्शन से ही लोग पागल नहीं होते, जो कदाचित उसकी वाणी अथवा वंशी का स्वर भी कान में पड़ जाये, तब भी तन-मन का विघटन हो जाता है।_*

*_डरकर मैया बेटी माधवी को शिक्षा देने लगी कि भूलकर भी वह कभी नंदराय जी के उस सलोने सुत को न स्वयं देखे न अपना मुख उसे दिखाये, अन्यथा उसके पाति व्रत्य की मर्यादा भंग हो जायेगी।_*

*माँ उसे पतिव्रत धर्म की महिमा एवं मर्यादा सुनाती और उसके भंग होने की हानि भी समझाती।*

*_भोली माधवी ने मैया की एक-एक बात एक-एक शिक्षा गाँठ बाँध ली।_*

*उसने मन-ही-मन प्रतिज्ञा की कि किसी प्रकार भी वह ब्रज के युवराज को नहीं देखेगी और न ही स्वयं को देखने देगी।*

*अंत में वह दिन भी उदित हुआ।*

*_जब कि रथ लेकर उसक पति सुंदर उसे लिवाने आया। जैसा नाम था, वैसा ही सुंदर था सुंदर।_*

*_समय पर माँ ने एक बार और अपनी शिक्षा की याद दिलायी।_*

*सबने आँखों मे आँसू भरकर उसे विदा किया।*

*_रास्ते में पति ने एकाध बार अपने सखा कन्हैया की चर्चा भी की पर माधवी ने कोई उत्साह नहीं दिखाया तो वह चुप हो गया।_*

*सुंदर रथ हाँक रहा था और वह रथ में बैठी थी। अगर कोई गाँव पथ में पड़ता तो रथ के पर्दे गिरा दिये जाते।*

*सुंदर बीच-बीच में अपनी मैया की, अपने गाँव की व घर की बातें करता जाता और वह चुपचाप बैठी सुनती रहती।*

*_एका एक सुंदरने कहा "देखो ! ये हमारे व्रज की गायें चर रहीं हैं! कन्हैया यहीं कहीं होगा! देखेगा तो अभी दौडा आयेगा!"_*

*_सुनकर माधवी ने मुख ही नहीं अपने हाथ-पैर अच्छी तरह ढांक लिये।_*

*_तभी कोई पुकार उठा - "सुंदर! बहू ले आया क्या ?"_*

*"हाँ भैया!"*

*_"भैया! मोंकू भाभी को मोहडो तो दिखाय दे।"_*

*"अरे भैया! पहले मों ते तो तू मिल के हिय को ताप बुझाय दे।*

*सुंदर रथ से कूद पड़ा और दूसरे ही क्षण किसी से आलिंगनबद्ध हो उठा - "भैया कन्नू रे !*

*_ऐसो लगे जुगन बाद मिल्यो तोसौं। तेरी चर्चा हूँ जहाँ न होय, वहाँ विधाता कब हूँ वास न दें।"_*

*"अब दिखाये दे मोंकू बहू को मोहडो।"*

*"कन्नू रे, मैं कहा दिखाऊं? भैया, तूही देख ले। तोसों काह परदो है?"*

*_माधवी को लगा कि एक बालक रथ पर चढ़ गया है_*

*_"ऐ भाभी! अपना मोहड़ो तो दिखाय दे। कहते हुये उसने चूँघट उठाना चाहा।_*

*_लेकिन माधवी ने कसकर अपना यूँघट पकड़े रखा। मुख तो दूर रहा, अपनी उँगली का पोर भी नहीं देखने दिया।_*

*_"मैं काह देखू? अब तो तू ही मेरो मुख देखिबे को तरसेगी।" कहते हुए नन्दसुवन रथ से उतर गया।_*

*_वह स्वर सुनकर माधवी थोड़ी चौंकी, क्योंकि वह स्वर न उसके पति का था और न ही उस बालक का।_*

*_वह गम्भीर स्वर मानों सत्यता की साक्षी देता - सा ....। अपनी जीत पर माधवी प्रसन्न थी।_*

*दो-तीन दिन बाद उसकी सास उसे नन्दरानी के यहाँ प्रणाम कराने के लिए।*

*नई बहू का मुख देख नन्दरानी बहुत प्रसन्न हुईं, और अति चाव से भूषण-वसन देकर उसका मुख मीठा कराया।*

*अनेक प्रकार के दुलार करते देख उसकी सास ने कहा, "अब तो हमारे कन्हैया को विवाह कर ही दो रानी जू!*

*जब भी उसके किसी सखा का विवाह होता है, तो उसका भी विवाह का चाव बढ़ जाय है।"*

*"क्या कहू बहिन ! मेरी.........।"*

*_तभी कन्हाई ने आकर कहा, "मैया! हो मैया! बड़ी जोर की भूख लगी है। कछु खायबे को देय!"_*

*_फिर अकस्मात नई बहू को देखकर वह पूछ बैठा, "यह कौन की बहू है मैया?"_*

*"आ, तोकू याको मोहड़ो दिखाऊँ ! कैसो चाँद जैसो मुख है याको !*

*_तेरे सखा सुन्दर की बहू है।" मैया ने उन्हें पुकारा।_*

*_"अच्छा तो यह सुन्दर की बहू है ? अभी नाय मैया! अभी मोंकु सखाओं के साथ कहूँ जानो है।" वे मुड़कर जाने लगे।_*

*_"अरे लाला! कछु खातो तो जा! तोकू तो भूख लगी थी।"_*

*मैया पुकारती रह गई, पर वे न रूके।*

*_"न जाने याको कहा सरम लगी! नयी दुल्हन को मुख देखने को तो यह सदा आतुर रहता है। आज कान्हा को जी अच्छा नहीं है शायद!" माँ ने अनमनी होकर कहा।_*

*माधवी गोचारण का समय होते ही भीतरी कोठे में चली जाती।*

*_कानों में अंगुली दे देती ताकि वंशी का नाद उसे सुनाई न पड़े।_*

*_फिर ऐसे ही वह सांझ को करती।_*

*_जल भरने भी उस समय जाती जब घाट सूना होता।_*

*_पर घर में तो सबको, घर में ही क्यों ब्रज भर के सभी जनों को कृष्ण के गुणगान का व्यसन था।_*

*_वह अपने गृहकार्य में लगी रहती और मन ही मन हँसती - कैसे हैं ये लोग?_*

*_सब के सब एक कृष्ण के पीछे बावरे हो रही हैं।_*

*_वह बार-बार अपनी मैया की शिक्षा याद करके अपने पतिव्रत धर्म की सावधानी से रक्षा करती।_*

जय श्री कृष्णा

24/05/2026

*मीरा चरित अध्याय – ३७:--*

*(मीरा संग नाचे संत और श्री जीव गोस्वामी पाद)*

*संत की सादगी और अपनत्व ने, उनके आलाप-कण्ठ की गहराई और राग-स्वर की शुद्धता ने मीरा को चकित कर दिया था।*

*मीरा ने सम्मान सहित कहा, "अब तो महाराज हमें भी आप कुछ श्रवण कराईये।"*

*"क्यूँ थक गई हो बेटा?" संत बोले।*

*"नहीं महाराज! हरि गुण गान से तो थकान उतरती है, चढ़ती नहीं।*

*फिर संतों के दर्शन और सत्संग में तो मेरे प्राण बसते है। यदि पात्र समझे तो कृपया अपना परिचय दीजिये न बाबा!"*

*"साधु का क्या परिचय पुत्री!"*

*वह सरलता से हँस दिए - "कभी सचमुच आवश्यकता पड़ी तो स्वयं जान जाओगी।"*

*महात्मा फिर हँसे, "तो फिर बेटी एक भजन और सुनाओ ! आज मैं तुम्हें अच्छे से थकाये देता हूँ।"*

*"यह सहज सम्भव नहीं है बाबा!" मीरा ने हँसकर उत्तर दिया*

*और कर पल्लव में करताल खड़-खड़ा उठी। जब एक रूचि के दो लोग मिले तो समय का कहाँ भान रहता है? और जहाँ ठाकुर को प्यार करने वाले मिल जायें तो वहीं सत्संग हो जाता है।*

*मीरा संत के आग्रह पर पुनः कर-पल्लव में करताल ले आलाप ले नृत्य के लिए खड़ी हो गई।*

*उसी समय श्री जीव गोस्वामी पाद आ गये।*

*परस्पर नमन के पश्चात उन्होंने वृद्ध संत को प्रणाम किया और केसरबाई के द्वारा बिछाई गद्दी पर बैठ गये।*

*केसर ने मीरा के इंगित पर उनके चरणों में नुपूर बाँधे और वह मंजीरे लेकर चमेली के पास बैठ गई।*

*श्री जीव गोस्वामी पाद सत्संग का जमा जमाया वातावरण पाकर अति आनन्दित हो उठे।*

*मीरा ने गोपी स्वरूप से नृत्य करते हुए श्री श्यामसुन्दर की माधुरी का एक अतिश य भावपूर्ण पद गाया*

आली रे म्हारे नैनन बान पड़ी।
चित्त चढ़ी म्हारे माधुरी मूरत हिय बिच आन गड़ी।
कब की ठाढ़ी पंथ निहारूँ अपने भवन खड़ी॥
अटक्या प्राण साँवरी सूरत जीवन मूल जड़ी।
मीरा गिरधर हाथ बिकाणी लोग कहे बिगड़ी॥
आली री म्हरे नैनन बान पड़ी.....

*अन्तिम पंक्ति की पुनरावृति करते हुए संत ने कितने ही विभिन्न विभिन्न भावों से सुन्दर आलाप लिए। उनके कण्ठ की सरसता से सब आत्म विभोर हो उठे।*

*मीरा को तो भावावेश हो आया।*

*संत और गोस्वामी जी विभोर-विह्वल थे।*

*मीरा ने बिना रूके नाचते हुए दूसरा शरणागति का पद आरम्भ किया*

मैं गिरधर के घर जाऊँ।
गिरधर म्हाँरो साँचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊँ॥
रैण पड़े तब ही उठि जाऊँ भोर भये उठी आऊँ।
रैण दिना वाँके संग खेलूँ ज्यूँ त्यूँ ताहि लुभाऊँ।
जो पहिरावै सो ही पहिरूँ जो दे सोई खाऊँ।
म्हारी वाँकी प्रीत पुराणी उण बिन पल नू रहाऊँ॥
जहाँ बिठाबैं तितही बैह्र बैचे तो बिक जाऊँ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर बार-बार बलि जाऊँ॥

*पद-गायन के बीच में ही वृद्ध संत ने ललक करके चमेली के हाथ से ढोलक ले ली और श्री जीव गोस्वामी पाद ने केसर से मञ्जीरें देने का संकेत किया। दोनों ही उमंग के साथ बजाने लगे।*

*कभी-कभी महात्माजी बीच में लम्बा आलाप लेते और सम पर लाकर छोड़ते ही सब झूम जाते।*

*मीरा भाव के अनुसार मंद, मध्यम और तीव्र गति में नृत्य कर रही थी।*

*उसकी कनक वल्लरी सी कोमल देह और मृदुल मृणाल सी बाहु युगल सुन्दर भावभिव्यक्ति की सार्थकता दर्शा रही थी।*

*_मीरा के मुख की दिव्य कान्ति उसके किसी अन्य लोक में होने की साक्षी दे रही थी।_*

*नेत्रों की वर्षा कभी थमती और कभी तीव्र होती। कभी मीरा के सुन्दर नयन समर्पण के भावाधिक्य में मुँद जाते और कभी दर्शन के आह्रलाद में विस्फुरित हो पलकों को झपकाना भूल जाते।*

*दिनमणि ढल गये तो मीरा ने करताल रखकर संतों को प्रणाम किया।*

जय श्री कृष्णा

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