Biology AXIS
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23/05/2025
LNMU Darbhanga
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आइबेक्स को हिरन कहा जाता है, मादा को हिरणी कहा जाता है, और युवा किशोरों को बच्चे कहा जाता है। [1] आइबेक्स हिरन आमतौर पर हिरणी से बड़ा और भारी होता है। लिंगों के बीच सबसे अधिक ध्यान देने योग्य अंतर हिरन के सींगों का बड़ा आकार है। हिरणी छोटे, पतले सींगों की एक जोड़ी उगाती है जो हिरन की तुलना में काफी धीमी गति से विकसित होती है। आइबेक्स के सींग जन्म के समय दिखाई देते हैं और जीवन भर बढ़ते रहते हैं। जंगली बकरियों की प्रजातियाँ जिन्हें आइबेक्स कहा जाता है:
कैपुचिन बंदर उपपरिवार सेबिना के नई दुनिया के बंदर हैं । उन्हें आसानी से " ऑर्गन ग्राइंडर " बंदर के रूप में पहचाना जाता है, और कई फिल्मों और टेलीविजन शो में उनका उपयोग किया गया है। कैपुचिन बंदरों की श्रेणी में मध्य अमेरिका और दक्षिण अमेरिका से लेकर दक्षिण में उत्तरी अर्जेंटीना तक के कुछ उष्णकटिबंधीय वन शामिल हैं । मध्य अमेरिका में, जहां उन्हें सफेद चेहरे वाले बंदर ("काराब्लांका") कहा जाता है, वे आमतौर पर कोस्टा रिका और पनामा के कैरीबियाई तट पर गीले तराई के जंगलों और प्रशांत तट पर पर्णपाती शुष्क जंगल पर कब्जा कर लेते हैं।
लाल कंगारू सबसे बड़े जीवित मार्सुपियल्स हैं, जिनमें नर का वजन 180 पाउंड तक होता है और उनकी ऊंचाई पांच फीट तक होती है, जबकि मादाएं बहुत छोटी होती हैं, जिनका वजन 65 पाउंड तक होता है। नर लाल कंगारूओं की पीठ पर हल्का लाल या ईंट जैसा लाल रंग का फर होता है, मादाओं में नीले-भूरे रंग का फर होता है और दोनों के पेट सफेद रोयेंदार होते हैं।
05/07/2023
दुनिया का सबसे बड़ा जहाज जिसे "आइकॉन ऑफ द सीस" कहा जाता है जनवरी 2024 में नौकायन करने वाला है। रॉयल कैरेबियन इंटरनेशनल नामक जहाज बनाने वाली कंपनी द्वारा फिनलैंड में निर्मित जहाज 5,610 यात्री और 2,350 चालक दल सदस्यों को ले जाएगा। समुद्र का प्रतीक टाइटेनिक से 5 गुना बड़ा और भारी है जिसका वजन 250,800 टन है जबकि टाइटेनिक का वजन 50,210 टन है।
इस बीच, हजारों लोगों ने अपने पहले यात्रियों में टिकट बुक किए हैं।
29/06/2023
आप सभी को देर सारी शुभकामनाए एवम् बधाई..!!!
#बायलॉजीएक्सिस
.Sc .Sc
े_सिंह
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Thank you,
S.K.SINGH
08/04/2023
ओरांग उटान हम इन्सानों के सबसे क़रीबी रिश्तेदारों में शामिल हैं। जंगल के ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंसे ही उनके जीवन की डोर जुड़ी होती है । फ़िलहाल उनका रहवास मलेशिया औरइंडोनेशिया तक सिकुड़ गया है। ख़ासतौर पर बोर्नियो और सुमात्रा के वर्षावनों में।ज़मीन से 60-70 फ़ीट की ऊँचाई पर पेड़ों पर ही उनकी जीवन-क्रिया चलती है। ज़मीन परआना उन्हें पसन्द नहीं । फल उनके भोजन का सबसे बड़ा हिस्सा होता है । ओरांग उटानबुद्धिमान प्राणी हैं। वे कुछ हद तक औज़ारों का भी प्रयोग करते हैं । मलय भाषा में ओरांगउटान का अर्थ जंगल में रहने वाला आदमी है यानी हमारे यहाँ के बनमानुष जैसा कुछ। पॉम ऑयल की खेती के लिए वर्षावनों को बुरी तरह से समाप्त किया जा रहा है । इसके साथ हीओरांग उटान का जीवन भी ख़तरे में पड़ा हुआ है। ज़रूरत इस संकट को समझने की है।
31/12/2022
नववर्ष 2023 की हार्दिक शुभकामनाएं। आइए, हम सभी नई आशा, उमंग, ऊर्जा, जुनून, उम्मीद, नए विचार, संकल्प, विश्वास और शुरुआत के साथ नूतन वर्ष का स्वागत करें।
नववर्ष 2023 आप सभी के लिए मंगलमय, सुखमय और फलदायक हो।
बायोलॉजी एक्सिस
एस. के.सिंह
14/12/2022
आज 11th में ऑनलाइन टेस्ट ली गई जिसमे 100 नंबर के ऑब्जेक्टिव प्रश्न में से 106 का 79 सही जवाब मात्र 1घंटा27 मिनट में इरशाद आलम ने दी जिसे हमने पुरस्कृत कर छात्र और छात्राओं में प्रतिस्पर्धा का माहौल तैयार कर दिया हूं। ताकि आने वाले समय में 1 नहीं सारे बच्चों में प्रथम स्थान लाने की होड़ हो और सभी अपनी पढाई में लगन से खूब मेहनत कर सके। आप सभी बायलॉजी एक्सिस के अमूल्य धरोहर है।
खूब मेहनत करें आपके
शिक्षक :-
े_सिंह
07/12/2022
आज हमलोग का विषय है की क्रायोनिक्स
महाभारत काल में राक्षसो के गुरु शुक्राचार्य ने मरे हुए में जान डालने की जो बुद्धि सीखी थी वैसे ही आज के लोगो का ऐसा मानना है की जीवन संभव हो सकता है इसी लिए आज इस पर कई देश कार्य कर रही है।
क्या डेढ़ करोड़ खर्च कर कभी नहीं मरेगा इंसान:भविष्य में फिर जिंदा होने के लिए डेड बॉडी फ्रीज करा रहे लोग; क्या है क्रायोनिक्स?
साल 2018 की बात है। कोलकता की ‘जेम्स लॉन्ग सरानी कॉलोनी’ में रहने वाले सुभब्रत मजूमदार की मां की मौत हो गई। इसके बाद मजूमदार ने मां के मृत शरीर को एक क्रायोनिक्स कंपनी के फ्रीजर में रखने का फैसला किया। दरअसल, मजूमदार को इस बात पर भरोसा है कि एडवांस मेडिकल तकनीक और क्रायोनिक्स साइंस के जरिए भविष्य में मरे हुए इंसानों को जिंदा करना संभव है।
सुभब्रत मजूमदार ऐसा करने वाले अकेले शख्स नहीं हैं बल्कि दुनियाभर में 600 से ज्यादा लोगों की डेड बॉडी को इसी तरह से फ्रीज करके रखा गया है।
आज भास्कर एक्सप्लेनर में जानेंगे कि क्रायोनिक्स तकनीक क्या है और क्या इसके जरिए हजारों साल तक जीना संभव है?
दुनिया भर में बढ़ रहा है डेड बॉडी को फ्रीज कराने का ट्रेंड
इस वक्त दुनियाभर में करीब 600 लोगों की डेड बॉडी को फ्रीज करके रखा गया है। इनमें से 300 से ज्यादा डेड बॉडी तो सिर्फ दो देश अमेरिका और रूस में हैं। इन लोगों के पूरी तरह से मरने से पहले इनके दिमाग और शरीर को लैब में रखा गया था।
कानूनी तौर पर भले ही ये लोग मर चुके हैं, लेकिन क्रायोनिक्स तकनीक में भरोसा रखने वाले साइंटिस्टों का मानना है कि वो अभी सिर्फ बेहोश हुए हैं।
यही वजह है कि दुनिया में कई सारे लोग मरने से पहले अपने परिवार के सामने ये इच्छा जाहिर कर रहे हैं कि उनके शरीर को हमेशा के लिए खत्म करने की बजाय इस तकनीक के जरिए सुरक्षित रखा जाए।
इसी वजह से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, रूस, भारत समेत दुनिया के दर्जनों देशों में प्राइवेट कंपनियों ने लैब बनाई हैं, जो डेड बॉडी को सुरक्षित रखने का दावा करती हैं।
मुर्दे को जिंदा करने वाली क्रायोनिक्स तकनीक क्या है?
अमेरिकी साइंटिस्ट डॉक्टर रिचर्ड गिब्सन के मुताबिक, ‘जब इंसान को कोई तकनीक या साइंस जिंदा रखने में असफल हो जाती है। फिर मौत के बाद उसकी डेड बॉडी को फ्रीजर में इस उम्मीद में रखा जाता है कि भविष्य में विज्ञान और मेडिकल साइंस के डेवलप होने के बाद उस इंसान को फिर से जिंदा करना संभव हो सकेगा।’
मतलब साफ है कि इन लोगों को लगता है कि आने वाले समय में मेडिकल साइंस मौत के बाद इंसानों को जिंदा कर सकेगी।
उन्होंने कहा है कि 'डिमॉलिशन मैन' या 'वनीला स्काई' जैसी हॉलीवुड फिल्मों में भी इसी तकनीक के जरिए मरे हुए इंसानों को फिर से जिंदा करने की संभावनाओं को दिखाया गया था।
अब ग्राफिक्स से जानिए कैसे डेड बॉडी को क्रायोनिक्स साइंस से ठंडी जगह पर रखा जाता है…
- Dainik Bhaskar
मरे हुए इंसान के शरीर को फ्रीज करने को लेकर क्या कानून है?
जीवन जीने का अधिकार लगभग सभी देशों के संविधान में एक जैसा है लेकिन क्या ये अधिकार मौत के बाद भी होता है?
इस सवाल का जवाब 6 अक्टूबर 2016 को लंदन हाई कोर्ट के एक फैसले में मिला था। यहां 14 साल की लड़की जिजीविषा (बदला हुआ नाम) की कैंसर से 17 अक्टूबर 2016 को मौत हो गई थी। अपनी मौत से पहले उसने लंदन हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी कि उसकी मौत कैंसर बीमारी से होने वाली है। ऐसे में एक बार फिर से जीवन जीने का उसे अधिकार मिलना चाहिए।
बच्ची और उसके परिवार को भरोसा था कि 50 या 100 साल के बाद मेडिकल साइंस में उसकी बीमारी का इलाज संभव होगा और उसे डॉक्टर एक बार फिर जिंदा कर सकेंगे। इसलिए क्रायोनिक्स तकनीक से अपने शरीर को सुरक्षित रखने की कोर्ट से अपील की थी।
इस मामले में जस्टिस पीटर जैक्सन ने लड़की के शरीर को 100 साल तक फ्रीज करने की इजाजत दे दी थी।
इंडियन फ्यूचर सोसायटी के फाउंडर अविनाश कुमार सिंह के मुताबिक भारत में बॉडी को फ्रीज करके रखने के लिए कोई स्पष्ट कानून नहीं है। यहां कोर्ट और सरकार से इजाजत लेना काफी मुश्किल है।
अब जानिए डेड बॉडी को फ्रीज करके सुरक्षित रखने में कितना खर्च आता है…
- Dainik Bhaskar
क्या सच में डेड बॉडी का जिंदा होना संभव है?
अमेरिका के टेक्सस स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ बायोएथिक्स एंड हेल्थ ह्यूमैनिटीज के प्रोफेसर रिचर्ड गिब्सन के मुताबिक, इस तकनीक से इंसानों को जिंदा करने की बात पर दुनिया के वैज्ञानिक दो खेमों में बंटे हुए हैं। कुछ लोग इसे संदेह से देखते हैं तो कुछ का मानना है अगले 50 से 100 साल में ऐसा संभव है।
उन्होंने कहा, ‘अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूंगा ऐसा आने वाले वक्त में संभव है। भले ही अभी ये सब काल्पनिक लग रहा हो, लेकिन मेडिकल साइंस ऐसा कर सकता है।’ हालांकि, रिचर्ड का मानना है कि कई सवालों का जवाब अभी मिलना बाकी है लेकिन रिसर्च जारी है।
रिसर्च में कई सप्ताह बाद भी मरे खरगोश का दिमाग सुरक्षित मिला
अमेरिका के मिशीगन स्थित क्रायोनिक्स इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट डेनिस ने एक इंटरव्यू में बताया कि फरवरी 2016 में एक खरगोश के दिमाग को क्रायोनिक्स तकनीक से बेहद ठंडे माहौल में रखा गया था। कई सप्ताह के बाद जांचने पर देखा गया कि तब भी दिमाग सुरक्षित था।
हालांकि, डेनिस मानते हैं कि मरे हुए खरगोश का दिमाग फिर से चलाना और किसी मरे इंसान को जिंदा करने में बहुत फर्क है। लेकिन, साथ ही इस रिसर्च परिणाम के आधार पर उन्हें लगता है कि अगले 10 साल में क्रायोनिक्स प्रिजर्व के जरिए डेड बॉडी को जिंदा करना आसान होगा।
जून 2021 में करेंट बायोलॉजी नाम की पत्रिका की एक रिपोर्ट में कहा गया कि साइबेरिया में 24,000 साल तक बर्फ में जमे रहने के बाद डेलॉइड रोटिफर नामक सूक्ष्म जीव जिंदा हो गया।
आखिर इंसानों को जिंदा करना कब संभव होगा? इस सवाल के जवाब में क्रायोनिक्स तकनीक की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक एल्कोर का कहना है कि- ये एक मौका भर है जो 100 साल या फिर 1000 साल में भी संभव हो सकता है।
अब अगले ग्राफिक्स में जानिए सबसे पहले दुनिया में किस इंसान की डेड बॉडी को क्रोयनिक्स प्रिजर्व करके रखा गया है...
क्या क्रायोस्लीप के जरिए स्पेस में भेजा सकता है इंसान?
कई हॉलीवुड फिल्मों जैसे ‘इंटरस्टेलर’, ‘लाइफ’, ‘लोस्ट इन स्पेस’ में इंसान को क्रायोस्लीप के जरिए यानी बर्फ में जमाकर स्पेस में भेजते हुए दिखाया गया है। हालांकि, ये सवाल उठता रहा है कि फिल्मों में दिखाए जाने वाले इस सीन में कितनी सच्चाई है।
वॉइस डॉट कॉम की एक रिपोर्ट दावा करती है कि जनवरी 2016 में यूरोपीयन यूनियन के टॉप 15 साइंटिस्टों ने मिलकर इस कल्पना को हकीकत में बदलने पर काम शुरू किया है। रिपोर्ट के मुताबिक डीप स्पेस में इंसान को भेजने के लिए यूरोपीयन स्पेस एजेंसी और NASA के साइंटिस्ट मिलकर इस तकनीक पर काम कर रहे हैं।
देखते हैं इस विज्ञान के युग में कैसे यह सफल होता है।
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