Shri Mahant Dharmendra Das ji

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प्रिय भक्त,गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आप सपरिवार उपस्थित हुए ! आपका आभार 🙏 । आपको यश कीर्ति प्राप्त हो ! आपकी जय हो ! विजय...
30/07/2026

प्रिय भक्त,
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आप सपरिवार उपस्थित हुए ! आपका आभार 🙏 । आपको यश कीर्ति प्राप्त हो ! आपकी जय हो ! विजय हो !

*प्रज्ञाबलेन तपसा चतुर्वेदविभाजकः।
कृष्णद्वैपायनो यश्च तस्मै श्रीगुरवे नम*

महान गुरु कृष्णद्वैपायन व्यास को नमन,
जिन्होंने अपनी बुद्धि और तपस्या के बल पर चारों वेदों को विभाजित किया।

- महन्त श्री धर्मेंद्र दास जी

प्रिय भक्त,गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आपको सपरिवार बहुत बहुत शुभमंगलकामनाएं । आपको यश कीर्ति प्राप्त हो ! आपकी जय हो ! विज...
29/07/2026

प्रिय भक्त,
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आपको सपरिवार बहुत बहुत शुभमंगलकामनाएं । आपको यश कीर्ति प्राप्त हो ! आपकी जय हो ! विजय हो !

*प्रज्ञाबलेन तपसा चतुर्वेदविभाजकः।
कृष्णद्वैपायनो यश्च तस्मै श्रीगुरवे नम*

महान गुरु कृष्णद्वैपायन व्यास को नमन,
जिन्होंने अपनी बुद्धि और तपस्या के बल पर चारों वेदों को विभाजित किया।

श्री गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आइये, श्री गुरु पर्व महोत्सव में , संगत मंदिर, चौक , लखनऊ में । प्राप्त करिए गुरु एवम प्रभु का आशीर्वाद ।
कार्यक्रम
27/7/2026 अखंड रामायण पाठ ( इस वक़्त भी जारी है .
28/7/2026 पाठ समापन , अभिषेक ।
29/7/2026 व्यास पूजन , गुरु पूजन पर्व , विशाल भंडारा महोत्सव
- महन्त श्री धर्मेंद्र दास जी

प्रिय भक्त,श्री गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आइये, श्री गुरु पर्व महोत्सव में , संगत मंदिर, चौक , लखनऊ में । प्राप्त करिए गु...
28/07/2026

प्रिय भक्त,
श्री गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आइये, श्री गुरु पर्व महोत्सव में , संगत मंदिर, चौक , लखनऊ में । प्राप्त करिए गुरु एवम प्रभु का आशीर्वाद ।
कार्यक्रम
27/7/2026 अखंड रामायण पाठ ( इस वक़्त भी जारी है .
28/7/2026 पाठ समापन , अभिषेक ।
29/7/2026 व्यास पूजन , गुरु पूजन पर्व , विशाल भंडारा महोत्सव
- महन्त श्री धर्मेंद्र दास जी

चातुर्मासव्रत का आध्यात्मिक,शास्त्रीय एवं सांस्कृतिक महत्व                         १००८ महन्त श्रीधर्मेन्द्रदास जी महारा...
26/07/2026

चातुर्मासव्रत का आध्यात्मिक,शास्त्रीय एवं सांस्कृतिक महत्व
१००८ महन्त श्रीधर्मेन्द्रदास जी महाराज

भारतीय संस्कृति में चातुर्मासव्रत-पर्व चार महीनों का आत्मसंयम, साधना, स्वाध्याय और लोकमंगल का पवित्र पर्व है। यह काल आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से प्रारम्भ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थान एकादशी) तक चलता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस अवधि में भगवान श्रीविष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और समस्त देवकार्य सीमित हो जाते हैं। अतः मनुष्य के लिए यह समय आत्मशोधन और ईश्वर-साधना का श्रेष्ठ समय माना गया है।
शास्त्रीय पक्ष पर विचार करें तो पद्मपुराण में कहा गया है-
आषाढस्य सिते पक्षे एकादश्यां जनार्दनः।
शयने याति देवेशः कार्तिके प्रबुध्यते॥
अर्थात् आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान् जनार्दन योगनिद्रा में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागृत होते हैं। अतः इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है।
स्कन्दपुराण में चातुर्मास को व्रत, दान, जप, तप तथा तीर्थसेवन के लिए सर्वोत्तम समय बताया गया है—
चातुर्मास्यव्रतं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
विष्णुलोकप्रदं नॄणां सर्वाभीष्टफलप्रदम्॥ अर्थात् चातुर्मास का व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला तथा भगवान् विष्णु के लोक की प्राप्ति कराने वाला है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अन्तर्गत प्रतिपादित संयमशील व्यक्ति के लिए जिस आहार, विहार तथा क्रिया कलापादि कको सम्पादित करने का विधान बताया गया है वे ही नियम “चातुर्मासव्रत” में अपनाने का प्रयत्न किया जाता है-
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥ (भगवद्गीता 6.17)
यानि कि, संयमित आहार-विहार तथा नियमित जीवनचर्या से योग सिद्ध होता है। चातुर्मास का संयम इसी सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप है।
चातुर्मास के व्रत साधना में श्रद्धा एवं संयम के साथ परमात्म-तत्व के प्रति आत्मार्पण का भाव व्यंजित होता है, जिसमें भक्ति को सर्वोपरि रखकर चेतना के उच्चतम स्तर पर पहुंचने का साधन माना गया है। स्वयं परमात्मा का वचन है कि भक्ति से अर्पित की गई छोटी से छोटी वस्तु भी ईश्वर को प्रिय होती है-
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ (भगवद्गीता 9.26)
चातुर्मास में किया गया तप सात्त्विक उपासना और सरल भक्ति का आदर्श प्रस्तुत करता है।
कठोपनिषद् के आलोक में देखें तो चातुर्मास जागरण का प्रतीक है—बाह्य नहीं, अपितु आन्तरिक जागरण का, जोकि हमें प्रेरित करता है --
उत्तिष्ठत! जाग्रत! प्राप्य वरान्निबोधत! उठो! जागो और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करो!
मुण्डकोपनिषद् के कथनानुसार-“सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा।“
अर्थात् आत्मा की प्राप्ति सत्य और तप के द्वारा होती है। चातुर्मास तप, संयम और आत्मानुशासन का ही पर्व है।
संत परम्परा में चातुर्मास व्रत का संयम आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य तथा अनेक संत-महात्मा वर्षा ऋतु में एक स्थान पर रहकर शास्त्र-चर्चा, प्रवचन, साधना और लोकशिक्षा का कार्य करते थे। इसी कारण आज भी अनेक मठों एवं आश्रमों में चातुर्मास विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसी क्रम में आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरुपूर्णिमा का उत्सव मनाया जाता है। गुप्त नवरात्रि के सम्पन्न होते ही चातुर्मास का आरम्भ, ऊर्जा संचित करने का एक आध्यात्मिक उपक्रम हैं। इसके अन्तर्गत कास्मिक एनर्जी के साथ आत्मीकरण किया जाता है तथा गुरु पूर्णिमा के माध्यम से गुरु शिष्य परंपरा में भी तादात्म्यीकारण का उत्सव सम्पादित किया जाता है।
वैसे आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो वर्षा ऋतु में जठराग्नि मंद हो जाती है। इसलिए इस काल में सात्त्विक, हल्का एवं सुपाच्य भोजन करने का विधान है। हरी पत्तेदार सब्जियों तथा कुछ खाद्य पदार्थों के त्याग की परम्परा भी स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की दृष्टि से उपयोगी मानी गई है।
चातुर्मास में भगवान विष्णु एवं श्रीकृष्ण की उपासना, जप, ध्यान, स्वाध्याय, श्रीमद्भागवत महापुराण, रामचरितमानस, गीता आदि का नियमित पाठ तथा दान, सेवा, गौसेवा, सात्त्विक आहार एवं इन्द्रियनिग्रह,संतसंगति, धर्मश्रवण, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील एवं जीव-जंतुओं के प्रति करुणा का भाव रख कर अखण्ड व्रत का पालन करना चाहिए।
अद्यतन मनुष्य तनाव, उपभोगवाद और असंयम से घिरा हुआ है। ऐसे समय में चातुर्मास हमें आत्मनियंत्रण, सादगी, नियमित जीवन, पर्यावरण-संरक्षण, आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश देता है। यदि इन चार महीनों में व्यक्ति अपने जीवन में एक भी श्रेष्ठ संस्कार स्थायी रूप से स्थापित कर ले, तो उसका जीवन सुखी, संतुलित सार्थक व श्रेष्ठ बन सकता है।
चातुर्मास भारतीय ऋषियों की दूरदर्शिता का अनुपम उदाहरण है। इसमें धर्म, दर्शन, योग, आयुर्वेद, पर्यावरण और लोकजीवन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यह काल हमें बाह्य संसार की चंचलता से हटाकर अपने अंतर्मन की ओर ले जाता है। भगवान श्रीविष्णु के शयन का वास्तविक संदेश यही है कि हम अपने भीतर सोई हुई दिव्यता को जगाएँ और सत्य, संयम, सेवा तथा साधना से जीवन को प्रकाशित करें।

श्रीश्री १००८ महन्त श्रीधर्मेन्द्रदास जी महाराज

दुर्गा सप्तशती हिन्दू धर्म का एक बहुत ही पवित्र ग्रंथ है। इसे 'देवी महात्म्य' भी कहते हैं। इसमें माँ दुर्गा की शक्ति और ...
25/07/2026

दुर्गा सप्तशती हिन्दू धर्म का एक बहुत ही पवित्र ग्रंथ है। इसे 'देवी महात्म्य' भी कहते हैं। इसमें माँ दुर्गा की शक्ति और उनकी कथाओं के 700 श्लोक हैं।
! आज 25 जुलाई 2026 को देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास प्रारंभ हो गया है। इस चार महीने की अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, जिससे सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है।

प्रिय भक्त,आज हवन संध्याकाल में प्रभु श्री राम के अद्भुत दर्शन ! यदि आपको भी इस चित्र में एहसास हो रहे हों तो “जय श्री र...
18/07/2026

प्रिय भक्त,
आज हवन संध्याकाल में प्रभु श्री राम के अद्भुत दर्शन ! यदि आपको भी इस चित्र में एहसास हो रहे हों तो “जय श्री राम“ लिखें
- महन्त श्री धर्मेन्द्रदास जी

12/07/2026

बड़े उदासीन अखाड़े, खदरा, लखनऊ स्थित बड़ा उदासीन अखाड़ा का आवश्यक मार्ग चौड़ीकरण एवम प्रशासन को चुनौती देता मार्ग का वृहद अतिक्रमण को तत्काल हटाने के लिए छेत्र की जनता और प्रभु राम जी के भक्तों द्वारा पैदल मार्च किया गया । १०० मीटर से अधिक सड़क पर अतिक्रमण मट्ठ के लिए चिंता का विषय है । प्रशासन और सरकार को हर स्तर पर अवगत कराया जा चुका है। यदि सरकार इसे संज्ञान में नहीं लेती है तो छेत्र की जनता और संत समाज अपने हक की लड़ाई के लिए सड़क पर उतरेगा ।
- महन्त श्री धर्मेंद्र दास जी

संघ के १०० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर , उदासीन अखाड़े खदरा में विशाल हिंदू महासम्मेलन का आयोजन 1 फ़रवरी 2026 को परम पूज्...
29/01/2026

संघ के १०० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर , उदासीन अखाड़े खदरा में विशाल हिंदू महासम्मेलन का आयोजन 1 फ़रवरी 2026 को परम पूज्य श्री महन्त धर्मेन्द्र दास जी के निर्देशन में आयोजित किया जा रहा है । हिन्दू धर्म के इस सम्मान के कार्यक्रम में स्वयं को सम्मानित करने के लिए आप पूरे परिवार के साथ आपकी उपस्थिति अनिवार्य है । आइए साथ मिलकर धर्म को बढ़ाते हैं और आने वाली पीढ़ी को हम धर्म से अवगत कराते हैं । यहाँ पर भोज का भी आयोजन किया गया है 1 बजे दोपहर आप सब की प्रतीक्षा में बाबा महंत धर्मेंद्र दास जी ।
दिनांक - 1 February 2026
समय - दोपहर 1 बजे
स्थान - नानक शाही मट, खदरा, लखनऊ ।
संपर्क सूत्र - 8707244187 / 8707771407 / 9450009966

श्री श्रीचंद्र द्वार
https://goo.gl/maps/HxDj14DgPo1YbeRk8?g_st=aw

अयोध्या: धर्म ध्वजा और भारतीय अस्मिता का पुनरोदयअयोध्या भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना का केंद्र है। य...
25/11/2025

अयोध्या: धर्म ध्वजा और भारतीय अस्मिता का पुनरोदय
अयोध्या भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना का केंद्र है। यह नगरी केवल धर्म का प्रतीक नहीं, बल्कि वह जीवंत मानवीय भाव है जिसने हजारों वर्षों से भारतीय संस्कृति को ऊर्जा दी है। भगवान श्रीराम की जन्मभूमि के रूप में यह स्थान भारतीय जीवन-दर्शन, मर्यादा, कर्तव्य और आदर्शों का आधार स्तंभ रहा है। आज विवाह पंचमी के शुभ अवसर पर जिस ‘धर्म ध्वजा’ को हम अयोध्या में ऊँचाई पर फहराता हुआ देख रहे हैं, वह केवल एक वस्त्र का टुकड़ा नहीं है; यह भारतीय अस्मिता, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सशक्त प्रतीक है। यह ध्वजा सदियों के संघर्षों, आक्रांताओं के अत्याचारों और रामभक्तों की अदम्य आस्था का जीवंत प्रमाण है।
भारतीय परंपरा में ध्वजा का महत्व अत्यंत प्राचीन है। वेदों और पुराणों में ध्वजा को विजय, धर्म और आत्मबल का प्रतीक माना गया है। रामायण में हनुमान जी द्वारा धारण किया गया ‘कपिध्वज’ केवल एक सेना संकेत नहीं था, बल्कि अच्छाई की ओर से बुराई को चुनौती देने का प्रतीक था। ध्वजा हमेशा से धर्म और सत्य की स्थापना का चिह्न रही है। इसी आधार पर अयोध्या में स्थापित धर्म ध्वजा भारतीय समाज को यह संदेश देती है कि धर्म की विजय शाश्वत है और सत्य का मार्ग कभी समाप्त नहीं होता। यह ध्वजा रामायण काल की स्मृति से लेकर आधुनिक भारत तक के वैचारिक सेतु के रूप में खड़ी दिखाई देती है।
अयोध्या के इतिहास में एक ऐसा अध्याय भी है जिसने इस पवित्र स्थल को अत्यंत पीड़ा पहुंचाई। सन् 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी द्वारा राम जन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया। यह घटना केवल स्थापत्य विनाश नहीं थी, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक अस्मिता पर किया गया एक आक्रमण था। मंदिर का विध्वंस समस्त राष्ट्र की चेतना को झकझोरने वाला था। अनेक इतिहासकारों के अनुसार, उस समय से लेकर आधुनिक काल तक राम जन्मभूमि को पुनः प्राप्त करने के लिए 70 से अधिक संघर्ष हुए। इस लंबे काल में रामभक्तों ने असहनीय पीड़ा, बलिदान और संघर्ष सहा, परंतु आस्था की ज्योति बुझने नहीं दी। इन संघर्षों के बीच धर्म ध्वजा का फहराया जाना प्रतिरोध, संकल्प और साहस का प्रतिनिधित्व था— यह घोषणा थी कि आस्था को दबाया जा सकता है, परंतु समाप्त नहीं किया जा सकता।
राम जन्मभूमि आंदोलन भारत के इतिहास का सबसे सशक्त सांस्कृतिक आंदोलन माना जाता है। यह केवल एक धार्मिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उद्गम बिंदु था। राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए लाखों लोग, संत और कारसेवक आगे आए। उनके कंधों पर जो भगवा धर्म ध्वजा फहराई थी, वह एकता, साहस और त्याग का प्रतीक बनी। रथ यात्राओं, सभाओं और अनगिनत कारसेवा अभियानों में वही ध्वजा लोगों को जोड़ने वाली शक्ति थी। यह आंदोलन इस बात का प्रमाण था कि भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति कितना सजग और समर्पित है।
राम जन्मभूमि का संघर्ष केवल भूमि का विवाद नहीं था, बल्कि चार अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्नों का प्रतीक था— अस्मिता का, न्याय का, संस्कृति का और राष्ट्रीय स्वाभिमान का। यह अस्मिता का प्रश्न था क्योंकि भगवान राम भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ हैं; उनका अस्तित्व हमारे सामूहिक मानस में रचा-बसा है। यह न्याय का प्रश्न था क्योंकि पाँच सौ वर्षों का अन्याय समाप्त होना आवश्यक था। यह संस्कृति का प्रश्न था क्योंकि राम को नकारना भारत को नकारने जैसा था। और यह स्वाभिमान का प्रश्न था क्योंकि स्वतंत्र भारत को अपने सबसे पवित्र स्थान को पुनः प्राप्त करने का हक था।
आज अयोध्या में फहराती धर्म ध्वजा कई रूपों में महत्वपूर्ण है। यह न्याय और सत्य की विजय का प्रत्यक्ष प्रमाण है। लंबे संघर्षों के बाद मंदिर की पुनर्स्थापना ने पूरे विश्व को यह संदेश दिया कि भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों को न केवल पहचानता है, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध भी है। यह ध्वजा वैश्विक हिंदू समाज को एक पहचान, एक केंद्र और एक गौरव प्रदान करती है। अयोध्या अब विश्व के आध्यात्मिक मानचित्र पर एक महान धुरी बन चुकी है, जहाँ से भारत अपने सांस्कृतिक संदेशों को दुनिया तक पुनः स्थापित कर रहा है।
इस ध्वजा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह सामाजिक समरसता और शांति का प्रतीक बन चुकी है। मंदिर निर्माण किसी के विरोध में नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की स्थापना के लिए हुआ है। यह ध्वजा हमें यह स्मरण कराती है कि जब अतीत के घाव भर जाते हैं, तब समाज विकास, सद्भाव और एकता के मार्ग पर आगे बढ़ता है। यह भारत के उस आदर्श को पुनः स्थापित करती है जिसमें धर्म, सत्य और करुणा सर्वोच्च मूल्य हैं।
धर्म ध्वजा अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों का सेतु है। यह अतीत के संघर्षों की स्मृति है, वर्तमान की विजय का उत्सव है और भविष्य के लिए प्रेरणा का पर्व है। यह ध्वजा पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि भारत की सांस्कृतिक धारा अविरल और अटूट है। चाहे कितने भी आक्रमण हों, चाहे कितनी भी चुनौतियाँ आएँ, भारत की आत्मा को पराजित नहीं किया जा सकता।
अंततः, अयोध्या की धर्म ध्वजा भारतीय अस्मिता का पुनरोदय है। यह उन लाखों बलिदानों का स्मारक है जिन्होंने संस्कृति की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित किया। आज जब यह ध्वजा अयोध्या में आकाश को स्पर्श करती है, तब वह केवल हवा में लहराती नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के हृदय में गर्व, आस्था और आत्मविश्वास की अग्नि प्रज्वलित करती है। यह ध्वजा हमें यह संदेश देती है कि सत्य अमर है, धर्म अजर है और भारत की आत्मा अविनाशी है। यही अयोध्या है, यही राम हैं, और यही भारत की अनश्वर सांस्कृतिक पहचान है।
जयश्रीराम।
महंत श्री धर्मेन्द्र दास

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