25/07/2026
आख़िरी ट्रेन का यात्री
उस रात घड़ी में ठीक 11:57 बजे थे। स्टेशन लगभग सुनसान था। हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और प्लेटफ़ॉर्म की टिमटिमाती पीली लाइटें माहौल को और रहस्यमय बना रही थीं।
रवि ने जेब से टिकट निकाला और बुदबुदाया, "बस ये आख़िरी ट्रेन मिल जाए..."
तभी उसके पास एक बूढ़ा आदमी आया। सफ़ेद दाढ़ी, भीगा हुआ कुर्ता और हाथ में पुरानी लकड़ी की छड़ी।
वह धीमी आवाज़ में बोला, "बेटा... इस ट्रेन में मत बैठना।"
रवि मुस्कुरा दिया। "क्यों बाबा? कोई भूत-प्रेत है क्या?"
बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "भूत नहीं... पछतावा है।"
इतना कहकर वह भीड़ में गायब हो गया। रवि ने चारों तरफ़ देखा, लेकिन वहाँ कोई था ही नहीं।
उसी समय दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी। ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफ़ॉर्म पर आकर रुकी। अजीब बात यह थी कि पूरी ट्रेन खाली थी।
रवि ने सोचा, "खाली ट्रेन! बैठने के लिए पूरी सीट मिल जाएगी।"
जैसे ही वह अंदर गया, दरवाज़े अपने आप बंद हो गए।
ट्रेन चल पड़ी।
कुछ मिनट बाद उसने देखा कि सामने वाली सीट पर वही बूढ़ा आदमी बैठा था।
"आप... आप यहाँ कैसे?"
बूढ़ा मुस्कुराया, "मैं तो पहले से यहीं था।"
रवि घबरा गया।
तभी ट्रेन एक सुरंग में दाखिल हुई। अँधेरा छा गया। जब रोशनी वापस आई तो बूढ़ा गायब था... लेकिन उसकी जगह एक पुरानी डायरी रखी थी।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
"जो इस ट्रेन में बैठता है, उसे अपने जीवन का सबसे बड़ा सच देखना पड़ता है।"
रवि काँपते हुए पन्ने पलटने लगा।
हर पन्ने पर उसकी अपनी ज़िंदगी लिखी थी—बचपन की शरारतें, माँ की डाँट, पिता का संघर्ष, दोस्तों के साथ बिताए पल... यहाँ तक कि वे बातें भी, जो उसने किसी को कभी नहीं बताई थीं।
अचानक आख़िरी पन्ना खुला।
उस पर सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—
"अगला स्टेशन... तुम्हारा अंतिम निर्णय।"
ट्रेन रुक गई।
दरवाज़ा खुला।
बाहर घना अँधेरा था। दूर एक छोटा-सा घर दिखाई दे रहा था।
जैसे ही रवि उस घर के पास पहुँचा, उसने देखा कि अंदर उसकी माँ बैठी रो रही थीं। पिता चुपचाप दीवार की ओर देख रहे थे। कमरे के बीचों-बीच सफ़ेद चादर से ढका एक शरीर रखा था।
रवि का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा...
और जैसे ही उसने चादर हटाई...
उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वह चेहरा... उसी का था।
"ये... ये कैसे हो सकता है?" उसकी चीख निकल गई।
तभी पीछे से वही बूढ़ा बोला,
"ये भविष्य नहीं... वो ज़िंदगी है जो तुम जी रहे हो। तुम साँस तो ले रहे हो, लेकिन अपने सपनों को बहुत पहले दफ़ना चुके हो।"
रवि की आँखों से आँसू बह निकले।
"क्या मुझे एक और मौका मिलेगा?"
बूढ़े ने मुस्कुराकर कहा,
"हर इंसान को एक आख़िरी मौका मिलता है। फ़र्क बस इतना है कि कुछ लोग उसे पहचान लेते हैं... और कुछ लोग पूरी ज़िंदगी उसी आख़िरी ट्रेन में सफ़र करते रहते हैं।"
अचानक तेज़ रोशनी हुई।
रवि की आँख खुली।
वह उसी स्टेशन की बेंच पर बैठा था। सुबह हो चुकी थी। कोई ट्रेन नहीं थी। कोई बूढ़ा नहीं था।
लेकिन उसकी जेब में वही पुरानी डायरी रखी थी।
उसने काँपते हाथों से डायरी खोली।
अब उसमें सिर्फ़ एक खाली पन्ना था।
ऊपर लिखा था—
"अब आगे की कहानी तुम्हें लिखनी है।"