ज्योतिष कथन ( Institute of Cosmic Sciences )

ज्योतिष कथन  ( Institute of Cosmic Sciences ) The only institute in INDIA where you can learn all of the following sciences ASTROLOGY, VAASTU & F And thus came the idea of this institute.

अगर आप परेशान है :-

1. आपके घर में सुख समृधि नहीं है, आपके घर में पैसा नही रूकता है।
2. आपका व्यवसाय नही चल रहा है।
3. आपको नौकरी नही मिल पा रही हैं।
4. आप संतान सुख से वंचित है।
5. आपका कर्ज नही उतर पा रहा है।
6. बेटे और बेटी का विवाह नहीं हो पा रहा हैं।
7. आप प्रेम विवाह करना चाहते है।
8. आपका पैसा कहीं अटक गया है।
9. आपका भाग्य आपका साथ नही दे रहा है।
10. आपके कार्य बनते बनते अंत में बिगड जाते है।
11. घर का वातावरण सही नही है पति-पत्नी के रिश्तों में आपसी क्लेश के कारण करवाहट फैल गयी है।
12. आपके बच्चे आपकी बात नहीं मानते है।
13. आपके बच्चो का मन पढाई में नही लगता है।
14. आपके घर से बिमारी नही जा रही है।
15. आपके घर परिवार में अचानक दुर्घटनाए होती रहती है।
16. आपके घर के सदस्य अधिक शराब का सेवन करते हैं।
17. आपकी जमीन नही बिक पा रही है।
18. आपके मकान में वस्तु दोष है या आपकी कुण्डली में किसी प्रकार का दोष है।

तो परेशान न हो। इस पेज पर आपको सभी प्रकार के उपाय मिलेगे। जिन्हे आपना कर आप अपनी परेशानीयो से स्वतः निदान पा सकते है।

Get solution of your problem
by Astrology, Vastu, Numerology, Terot, Feng shui and Reki....
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Consultation Fee---

For one Kundali—

Answering queries of client (one Time) Rs. 500/-
Answering queries of client (1 Months) Rs. 3,000/-
Answering queries of client (3 Months) Rs. 8,000/-
Answering queries of client (6 Months) Rs. 14,000/-
Answering queries of client (1 Year) Rs. 25,000/-

Matchmaking – (One Time)-- Rs. 1,000/-
This will not be limited to Gun-Milan but will extend to the analysis of the compatibility. Birth Time Rectification-- Rs. 2,000 to 10,000/-

For Vastu 11,000/- ( 1000 squre feet)

For Palm Reading/ Hastrekha--2,500/-

महामृत्युंजय मंत्र सवा लाख मंत्र जाप-- Rs. 60,000/-

माँ बगलामुखी मंत्र सवा लाख बार मंत्र जाप-- Rs. 1,10,000/-
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Terms & Conditions apply.. Contact us: http://www.facebook.com/upendra.aggrawal


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The Jyotish Kathan institute was promoted by Astrolger Upendra Agarwal in the year 2006. He is the promoter and experienced astrologer, vaastu experts & Reiki grand masters. He is in this field for the last 9-10 years and have studied the subject in New Delhi & Dehradun. During the studies he felt the need of imparting their knowledge to others. The institute offers courses on variety of subjects like Astrology, Vaastu, Reiki,Tarot, Numerology, Palmistry, Face reading, Signature reading and other allied subjects. The institute provides its services of making and reading horoscope, match making Tarot reading etc. The institute also provides vaastu consultancy for construction of house, factory, shop, office or warehouse. The institute also provides its services for Reiki healing.

30/09/2025

Astrology: जीवन में ग्रहों की शांति के लिए अपने भोजन में जरूर शामिल करें ये चीजें

अच्छे स्वास्थ्य के लिए चिकित्सक भोजन में संतुलित आहार जैसे हरे रंग की सब्जी, साबुत अनाज, फल,दूध,दही आदि खाने की सलाह देते हैं। यह शरीर को पर्याप्त पोषक तत्व तो देते हैं, इनका संबंध आपके ग्रहों से भी जुड़ा होता है। माना जाता है कि आप जो खा रहे हैं, वह जीवन में सुख ला सकता है और मुश्किलें भी खड़ी कर सकता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, सफेद रंग का संबंध शुक्र से, लाल रंग का मंगल से, हरे रंग का बुध से, पीले रंग का बृहस्पति से, नीले या काले रंग का शनि से होता है। यदि आप हर रंग की फल-सब्जियों को अपने आहार में शामिल करेंगे, तो हर ग्रह का प्रभाव आपके शरीर पर पड़ेगा।

जिस ग्रह से संबंधित चीजों की शरीर में कमी होगी, शरीर अपने आप उसे ग्रहण कर लेगा और आपका स्वास्थ ठीक रहेगा, मन खुश रहेगा। आपकी राशि में जो ग्रह कमजोर है, उसके हिसाब से खानपान होगा, तो ग्रहदोष तो शांत होगा ही, सेहत भी सुधरेगी। आइए जानते हैं कौन से भोज्य पदार्थ खाकर आप सभी ग्रहों के अच्छे फल प्राप्त कर सकते हैं।

सूर्य-
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य का संबंध नारियल, खजूर, केसर, बड़ी इलायची, गेहूं, गुड़, आम आदि से है। सूर्य ग्रह की अनुकूलता प्राप्त करने के लिए जातक को अपने आहार में इनका उपयोग करना चाहिए।

चंद्र-
चंद्रमा का संबंध पानी वाले नारियल, लीची, खरबूजा, तरबूज, खीरा, नींबू, खुशबूदार बासमती चावल,गन्ना, चीनी, दूध और दूध से बने पदार्थ,आइसक्रीम और मिठाइयों से है। चन्द्रमा मन का कारक है अत: चन्द्रमा की अनुकूलता के लिए आपको अपने आहार में इन चीजों को शामिल करना चाहिए।

मंगल-
आपकी कुंडली में यदि मंगल अशुभ है तो अपने आहार में गुड़, मसूर की दाल, अनार, जौ,लाल मिर्च, काली मिर्च, जायफल, लौंग, तीखे मसाले, सरसों का साग, कटहल, सोयाबीन और शहद का उपयोग कर सकते हैं।

बुध-
बुध ग्रह हमारे व्यापार और उद्योग को संचालित करता है। यदि यह कुंडली के नीच भाव में बैठकर अशुभ फल दे रहा है तो मटर,अदरक, पालक, बथुआ, मेथी, सीताफल, बैंगन, पान,गन्ने , हरी दालें, मूंग, हरी सब्जियां आहार में लेनी चाहिए।

गुरु-
यदि गुरु या बृहस्पति ग्रह आपकी कुंडली में अशुभ फल दे रहा है तो चना, चना दाल, बेसन, मक्का, केला, हल्दी, सिंघाड़ा,सेंधा नमक, पीली दालें और फलों को अपने भोजन में शामिल करें।

शुक्र-
शुक्र का संबंध सभी फूलदार वनस्पति, जमीन के भीतर बढ़ने वाली सब्जियां, जैसे आलू, गाजर, प्याज ,त्रिफला, दाल चीनी, कमलगट्टा, मिश्री, मूली और सफेद शलजम आदि से है। शुक्र ग्रह की प्रसन्नता के लिए इनका प्रयोग करना चाहिए।

शनि-
शनि ग्रह का अशुभ फल जातक को पीड़ा देता है। इसकी अनुकुलता के लिए भोजन में तिल, उड़द, कालीमिर्च, मूंगफली का तेल, अचार, लौंग, तेजपत्ता तथा काले नमक का उपयोग करना चाहिए।

राहु-केतु
राहु और केतु के कष्ट से बचने के लिए उड़द, तिल और सरसों का प्रयोग करना लाभदायक रहता है।

30/09/2025

9 ग्रहों के 9 भोजन, उचित समय पर खाएं और बुरे प्रभाव से बचें ।

➡️आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आप ग्रह-नक्षत्रों के अशुभ फल को कुछ खाकर शुभ फल में बदल सकते हैं। कहते हैं कि अन्न ही जहर है और अन्न ही अमृत है। अत: ‍उचित तिथि और समय पर निम्निलिखित भोज्य पदार्थ खाकर आप सभी ग्रहों के अच्छे फल प्राप्त कर सकते हैं।

➡️1. सूर्य ग्रह :– सूर्य की अनुकूलता प्राप्त करने के लिए जातक को अपने आहार में गेहूं, आम, गुड़ आदि का उपयोग करना चाहिए।

➡️2. चन्द्र ग्रह :– चन्द्रमा मन का कारक है अत: चन्द्रमा की अनुकूलता के लिए गन्ना, शकर, दूध और दूध से बने पदार्थ, आइसक्रीम और मिठाइयों को अपने आहार में शामिल करना चाहिए।

➡️3. मंगल ग्रह :– आपकी कुंडली में यदि मंगल अशुभ है तो अपने आहार में गुड़, मसूर की दाल, अनार, जौ और शहद का उपयोग कर सकते हैं।

➡️4. बुध ग्रह :– बुध ग्रह हमारे व्यापार और उद्योग को संचालित करता है। यदि यह कुंडली के नीच भाव में बैठकर अशुभ फल दे रहा है तो मटर, जुवार, कुलपी, हरी दालें, मूंग, हरी सब्जियां आहार लेना है।

➡️5. गुरु ग्रह :– यदि गुरु या बृहस्पति ग्रह आपकी कुंडली में अशुभ फल दे रहा है तो चना, चना दाल, बेसन, मक्का, केला, हल्दी, सेंधा नमक, पीली दालें और फलों को अपने भोजन में शामिल करें।

➡️6. शुक्र ग्रह :– शुक्र ग्रह जब नीच का होकर अशुभ फल देने लगे तो त्रिफला, दाल चीनी, कमलगट्टा, मिश्री, मूली और सफेद शलजम का प्रयोग करना चाहिए।

➡️7. शनि ग्रह :– शनि ग्रह का अशुभ फल जातक को पीड़ा देता है। इसकी अनुकुलता के लिए भोजन में तिल, उड़द, कालीमिर्च, मूंगफली का तेल, अचार, लौंग, तेजपत्ता तथा काले नमक का उपयोग करना चाहिए।

➡️8. और 9. वां छाया ग्रह राहु और केतु :– राहु और केतु की पीड़ा से बचने के लिए उड़द, तिल और सरसों का प्रयोग लाभदायक रहता है।

👉अन्य उपाय :– रविवार को चना, सोमवार को खीर अथवा दूध, मंगलवार को चूरमा तथा हलवा, बुधवार को हरी सब्जी, गुरुवार को चने की दाल अथवा बेसन का प्रयोग, शुक्रवार को मीठा दही और शनिवार को उड़द का सेवन करने से सभी ग्रह प्रसन्न रहते है

19/02/2024

ग्रहो की अवस्थाऐ PLANETS STATES
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अवस्था संस्कृत शब्द है। अवस्था यानि हैसियत या स्थिति है। हिंदू ज्योतिष (भारतीय ज्योतिष) ने किसी भी समय ग्रहो द्वारा प्राप्त अवस्थाओ को प्राप्त करने के तरीको का विकास किया है। महर्षि पाराशर ने अपने बृहतपाराशर होराशास्त्र मे छह प्रकार के अवस्थाओ को संदर्भित किया है। अवस्था मूल रूप से ताकत या शक्ति के माध्यमिक स्रोत होते हैं।


मानव जीवन की शारीरिक अवस्था अनुसार ग्रहो की विभिन्न राशियो के अलग अलग अंशो पर भिन्न - भिन्न पांच अवस्थाऐ बाल्य, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत मानी गई है।
बाल्यावस्था मे ग्रह की शक्ति ¼ होती है, कुमारावस्था मे ग्रह की शक्ति ½ होती है, युवावस्था मे पूर्ण शक्ति, वृद्धावस्था मे न्यूनतम शक्ति होती है। मृतावस्था मे कोई परिणाम नही मिलता है।


➧ बहुत विद्जन राशि के द्रेष्काण अनुसार ग्रहो की शारीरिक अवस्था मानते है। तीन द्रेष्काण अनुसार तीन बाल्य, मध्य, वृद्धावस्था मानते है। सम राशियो में विपरीत क्रम से गणना करते है यानि प्रथम द्रेष्काण वृद्धावस्था, द्वितीय द्रेष्काण मध्यावस्था और तृतीय द्रेष्काण बाल्यावस्था होती है।
सूर्य और मंगल बाल्यावस्था मे श्रेष्ठ परिणाम देते है। गुरु शुक्र मध्यावस्था में श्रेष्ठ परिणाम देते है। चन्द्र और शनि वृद्धावस्था मे श्रेष्ठ परिणाम देते है। बुध तीनो अवस्थाओ में श्रेष्ट परिणाम देता है।

मानसिक स्वभाव या प्रकृति अनुसार ग्रहो की दीप्तादि दस अवस्था बताई गई है और इनका कारण भी बताया गया है। कई विद्जन इन दस अवस्थाओ मे से नौ को ही व्यवहार मे लाते है, तो अन्य ने परिभाषा को और सरल कर लिया है।
(प्रश्न तन्त्र मे नीलकंठ ने कहा है कि दीप्तादि दस अवस्था द्वारा भविष्यवाणी करनी चाहिए ऐसी भविष्यवाणी कभी भी गलत नही होगी)
01 दीप्त - अपनी उच्च राशि या मूल त्रिकोण मे स्थित ग्रह दीप्त कहलाता है।
02 मुदित - मित्र की राशि मे स्थित ग्रह मुदित कहलाता है।
03 स्वस्थ - अपनी राशि (स्वग्रह) मे स्थित ग्रह स्वस्थ कहलाता है।
04 शांत - शुभ ग्रह की राशि मे स्थित ग्रह शान्त कहलाता है।
05 शक्त - स्फुट रश्मि के जालो से अत्यंत शुद्ध ग्रह शक्त कहलाता है।
06 प्रपीड़ित - ग्रहो से पराजित होने पर ग्रह प्रपीड़ित कहलाता है।
07 दीन - शत्रु की राशि या शत्रु नवांश मे होने पर ग्रह दीन कहलाता है।
08 खल - पाप ग्रहो की राशि के मध्य या युत होने पर ग्रह खल कहलाता है।
09 भीत - नीच ग्रहो के साथ पड़ा ग्रह भीत कहलाता है।
10 विकल - जो ग्रह अस्त होकर स्थित हो वह विकल कहलाता है।

सुप्त, जाग्रत आदि अवस्थानुसार ग्रह विषम राशि के प्रथम भाग (10 अंश तक) पूर्ण जाग्रत, मध्य भाग (10 से 20 अंश तक) तन्द्रा (जाग्रत और सुप्त के मध्य की अवस्था) और राशि के अंतिम भाग (20 से 30 अंश) सुप्त अवस्था मे होते है। इससे विपरीत सम राशियो मे प्रथम भाग सुप्त, द्वितीय भाग तन्द्रा, तृतीय भाग मे जाग्रत अवस्था मे होता है।
➧ अन्यमत से उच्चांश और तथा स्वनवांश मे ग्रह जाग्रत अवस्था, मित्र के नवांश मे स्वप्नावस्था, शत्रु के नवांश मे सुप्तावस्था मे कहलाते है।

अन्य प्रकार की अवस्था मे मनुष्य मानसिक अवस्था अनुसार लज्जित, गर्वित, क्षुदित, तृषित, मुदित और क्षोभित ये छह है।
1 लज्जित - पंचम (पुत्र) भाव मे ग्रह राहु-केतु या सूर्य, शनि या मंगल से जुड़ा है तो वह लज्जित कहलाता है।
2 गर्वित - यदि ग्रह उच्चस्थ या मूलत्रिकोणस्थ हो तो वह गर्वित अवस्था मे होता है।
3 क्षुदित - यदि ग्रह शत्रु राशि मे है या शत्रु से दृष्ट या युत है या ग्रह शनि से युत है तो वह क्षुदित कहलाता है।
4 तृषित - यदि ग्रह जल तत्व की राशि मे है और अशुभ ग्रहो से दृष्ट है शुभ ग्रहो की दृष्टि नही है तो वह तृषित है।
5 मुदित - यदि ग्रह मित्र राशि मे शुभ ग्रह से युत या दृष्ट है तो वह मुदित कहलाता है।
6 क्षोभित - यदि ग्रह सूर्य के साथ है और अशुभ ग्रह से युत या दृष्ट है तो वह क्षोभित कहलाता है।

फलित :- विद्जन बलवान (मजबूत) और निर्बल (कमजोर) ग्रह का पता लगाकर उपरोक्त तरीको से एक ग्रह के कारण प्रभावो का अनुमान लगावे क्योकि कमजोर ग्रह अच्छे प्रभावो मे कमी का कारण बनते है और मजबूत ग्रह अच्छे प्रभावो में वृद्धि करते है।

क्षुदित या क्षोभित ग्रह जिस भाव मे हो उस भाव का नाश करता है। यदि दशम (कर्म) भाव मे ग्रह लज्जित, क्षुदित या क्षोभित अवस्था मे हो तो जातक हमेशा दुःखो का शिकार होगा। यदि पंचम (पुत्र) भाव मे ग्रह लज्जित अवस्था मे है तो संतान का विनाश होगा या केवल एक बच्चा जीवित रहेगा। यदि क्षोभित या तृषित अवस्था मे ग्रह सप्तम (युवती) भाव मे है तो जातक की पत्नी निश्चित मर जायगी।

गर्वित ग्रह नवीन मकान, उद्यान, राजकीय सम्बन्ध, कला निपुणता, हमेशा वित्तीय लाभ और व्यापार मे तरक्की से ख़ुशी का कारण होता है। मुदित ग्रह अनेक रहवास, वत्राभूषण, भूमि व पत्नी से सुख, रिश्तेदारो से सुख, शाही स्थानो मे रहने का आनन्द, शत्रुओ का नाश, ज्ञान और विद्या की प्राप्ति देता है। लज्जित ग्रह ईश्वर से विमुखता, बुद्धिमत्ता की हानि, संतान हानि, बुरे भाषणो मे रूचि और अच्छी बातो से उदासीनता देता है। क्षोभित ग्रह तीव्र क्रोध, दुष्ट स्वभाव, दुःख, आर्थिक दुर्बलता, पैरो मे पीड़ा, शाही क्रोध का कारण, आय मे बाधा का कारण होता है।
क्षुदित ग्रह के कारण पतन, दुःख, आवेश, रिश्तेदारो के कारण दुःख, शत्रुओ से परेशानी, वित्तीय संकट, शारीरिक शक्ति की हानि और दुःख के कारण मानसिक ग्रहण होता है। तृषित अवस्था मे ग्रह हो तो महिलाओ से दुष्ट कर्मो के सम्बन्ध के कारण रोग, धन नुकसान, शारीरिक कमजोरी, ख़राब लोगो द्वारा दुःख सम्मान की क्षति होती है।

 ग्रहो की विशिष्टावस्था : महर्षि पराशर व अन्य ऋषियो ने नक्षत्र मे स्थति अनुसार ग्रहो की अवस्था निश्चित करके फलादेश की विधि बताई है। इन अवस्थाओ का अन्य प्रकार की अवस्थाओ से सर्वोच्च महत्व है। मानव जीवन की दैनिक चर्या पर गणितागत बारह अवस्थाऐ मानी गई है। इनका फलित में बहुत महत्व है तथा फलकथन भी सरल व सटीक हो जाता है। इन्हे मनोदशा अवस्था भी कहते है। ये अवस्थाऍ है :-


(1) ग्रह अवस्था ज्ञान - जो गृह जिस नक्षत्र पर हो उसकी संख्या ज्ञात करे, ग्रह की संख्या मे नक्षत्र की संख्या का गुना करे। गुणनफल को ग्रह के अंशो (गृह जितने अंश पर हो) से गुना करे। गुणनफल मे जन्म इष्ट घटी, जन्म नक्षत्र की संख्या और जन्म लग्न की संख्या जोड़ दे। योगांक (योगफल) को 12 से भाग देने पर जो शेष बचे उसी अंक के उपरोक्त अनुसार अवस्था होगी। ग्रहो की संख्या इस प्रकार है :-
सूर्य = 1, चंद्र = 2, मंगल = 3, बुध = 4, गुरु = 5, शुक्र = 6, शनि = 7, राहु = 8, केतु = 9.
नक्षत्रो की संख्या इस प्रकार है :- 1 अशवनी, 2 भरणी, 3 कृतिका, 4 रोहिणी, 5 मृगशीर्ष* 6 आर्द्रा, 7 पुनर्वसु, 8 पुष्य, 9 आश्लेषा 10 मघा, 11 पूर्वा फाल्गुनी, 12 उत्तरा फाल्गुनी, 13 हस्त, 14 चित्रा, 15 स्वाति, 16 विशाखा, 17 अनुराधा, 18 ज्येष्ठा, 19 मूल, 20 पूर्वाषाढ़ा, 21 उत्तराषाढ़ा, 22 श्रवण, 23 घनिष्ठा* 24 शतभिषा* 25 पूर्वा भाद्रपद, 26 उत्तरा भाद्रपद, 27 रेवती।
उदहारण :-सूर्य उत्तराषाढ़ा नक्षत्र की संख्या 21, ग्रह सूर्य की संख्या 1 से गुना किया तो गुणनफल 21 हुआ। अब गुणनफल मे ग्रह अंश 26 का गुणा किया तो गुणनफल 546 हुआ। गुणनफल में जन्म इष्ट घटी 26 तथा जन्म नक्षत्र अनुराधा की संख्या 17 और जन्म लग्न की संख्या 3 जोड़ा तो योग 592 हुआ। इस योगफल को 12 से भाग करने पर शेष 4 बचे यानि सूर्य प्रकाश अवस्था में हुआ। इसी प्रकार अन्य ग्रहो की अवस्था ज्ञात करे।

(2) ग्रह अवस्था का ज्ञान - ग्रह जिस नक्षत्र मे हो उसकी संख्या से ग्रह की संख्या का गुणा करे। गुणनफल को ग्रह जिस नवांश मे हो उस नवांश क्रम की संख्या से गुना करे। गुणनफल मे इष्ट घटी, जन्म नक्षत्र की संख्या, और जन्म लग्न की संख्या जोड़े। योगांक को 12 से भाग दे, जो शेष बचे उसी अंक के अनुसार अवस्था होगी।
उदहारण - सूर्य उत्तराषाढ़ा नक्षत्र की संख्या 21 मे ग्रह की संख्या 1 का गुना किया तो गुणनफल 21 हुआ। इसमे ग्रह के नवांश क्रम आठ का गुना किया तो गुणनफल 168 हुआ। गुणनफल में जन्म इष्ट घटी 26 तथा जन्म नक्षत्र अनुराधा की संख्या 17 व जन्म लग्न की संख्या 3 को जोड़ा तो योग 214 हुआ। योगफल को 12 से भाग देने पर शेष 10 बचे, यानि सूर्य नृत्यलिप्सा अवस्था में हुआ।

➤ टिप्पणी :- महर्षि पराशर ने बृहत्पाराशर होराशास्त्र के 45 वे अध्याय मे ग्रहो की विभिन्न प्रकार की अवस्थाओ का वर्णन करते विशिष्टावस्था के स्पष्ट करने की इसी दूसरी विधि का उल्लेख किया है। और इसीमे इन अवस्थाओ की उपअवस्था को स्पष्ट करने की विधि बताई है।
➤ टिप्पणी :- ग्रह की विशिष्ट अवस्था स्पष्ट करने की विधि मे नवांश क्रम की संख्या लेने के बजाय ग्रह के अंश लेने के पक्ष मे है किन्तु यह धारणा गलत है। बलभद्र होराशात्र के अध्याय 3 मे स्वयं आचार्य बलभद्र ने उदहारण देते हुए सूर्य को सिंह के सप्तम नवांश का उल्लेख किया है। अतः नवांश क्रम संख्या ही लेवे।
➤ टिप्पणी :- उपरोक्त विधियो से सूर्य की अवस्था में अंतर है। किस विधि को ग्राह्य किया जाय ? यह ज्योतिर्विद के स्वविवेक पर निर्भर है। उदहारण मे सूर्य का फल दोनो अवस्था मे आंशिक ठीक है।

उपविशिष्टावस्था - विशिष्ट अवस्थाओ की प्रत्येक की तीन उप अवस्थाए भी आचार्यो ने बताई है। ये चेष्टा, दृष्टि और विचेष्टा है। चेष्टा उप अवस्था मे गृह का प्रभाव पूर्ण, दृष्टि अवस्था मे मध्यम और विचेष्टा अवस्था मे नगण्य होता है।
ग्रह उप अवस्था ज्ञान - ग्रह की विशिष्ट अवस्था अंक से उसी अंक का परस्पर गुना करे। गुणनफल को जातक के नाम के पहले शब्द के अंक मान को जोड़े। योगफल को 12 से भाग दे। शेष को ग्रह योजक (सूर्य = 05, चंद्र = 02, मंगल = 02, बुध = 03, गुरु = 05, शुक्र = 03, शनि = 03, राहु (केतु) = 04) से योग करे। योगांक को 3 से भाग दे यदि शेष 1 बचे तो दृष्टि अवस्था, 2 बचे तो चेष्टा अवस्था और 0 बचे तो विचेष्टा अवस्था होगी।
अंक मान - 1 = ध्वनि अ, क, च, ए, ध, भ और व। 2 = इ, ख, ज, न, म और श। 3 = उ, ग, झ, त, प, य, और ष। 4 = ऐ, घ, ट, थ, फ, र और स। 5 = ओ, के, द, ब, ल और ह।

प्रश्न ज्योतिष -
प्रश्न मार्ग ज्योतिष ग्रन्थ अनुसार प्रश्न ज्योतिष मे दो प्रकार की ग्रहो की अवस्थाओ का उपयोग होता है।
(1) स्थान अवस्थाए - तटस्थ, मित्रवत, स्वराशि, मूलत्रिकोण, उच्च, शत्रु, नीच राशि मे ग्रह हो।
(2) काल या लौकिक अवस्थाए - अतिबाल (शिशु) अस्त होने के दूसरे दिन, बाल्य अवस्था (बच्चा) अस्त होने सात दिन बाद, कुमारावस्था (वयस्क) जब तक कि ग्रह स्थिर नहीं हो जाता, युवा अवस्था (जवान) जब तक कि ग्रह वक्री न हो, भूप अवस्था (शाही) ग्रह के वक्री रहने तक, वृद्धावस्था अस्त होने के कुछ दिन पूर्व तक, मृत अवस्था ग्रह के अस्त मे या ग्रहण मे मृत होता है।

मनोदशा अवस्थाए -
हिन्दू ज्योतिष मे मनोदशा के आधार पर ग्रहो की ग्यारह अवस्थाओ का उल्लेख किया है। (01) प्रदीप्त जब ग्रह उच्च राशि मे हो। (02) सुखित जब ग्रह मूलत्रिकोण राशि मे हो। (03) स्वस्थ जब ग्रह स्वराशि मे हो। (04) मुदित जब ग्रह मित्र की राशि मे हो। (05) शांत जब ग्रह शुभ वर्ग मे हो। (06) शक्त जब ग्रह शानदार किरणो से युक्त हो। (07) निपदित जब ग्रह गृह युद्ध मे पराजित हो। (08) खल जब ग्रह अशुभ वर्ग मे हो। (09 ) सुदुःखित जब ग्रह शत्रु की राशि मे हो। (10) अतिभीत जब ग्रह नीच राशि मे हो। (11) विकल जब ग्रह ग्रहण मे हो।
विशिष्ट अवस्था फलादेश
सूर्यावस्था फल
(1) शयनावस्था मे हो तो अपच, पित्तशूल, मोटे पैर, अनेक रोग, गुदा मे व्रण, हृदयाघात होता है।
(2) उपवेशनावस्था मे हो तो श्रमिक, गरीब, मुकदमो मे लिप्त, कठोर व दुष्ट, दायित्वहीन होता है।
(3) नेत्रपाणि मे सूर्य 5, 7, 9, 10 भावो मे हो तो सुखी, धनी, विद्वान् होता है। यदि अन्य भावो मे हो तो क्रूर स्वभाव, नेत्ररोगी, क्रोधी, द्वेषशील व पानी के रोगो से पीड़ित होता है।
(4) प्रकाशनावस्था मे हो तो धार्मिक, दानी, सुखी, राजसी ठाट वाला होता है।
(5) गमनावस्था मे हो तो बाहर रहने वाला, पैरो में कष्ट, निद्रा भय युक्त होता है।
(6) आगमनावस्था मे हो तो क्रूर, दुर्बुद्धि, परस्त्रीरत, कंजूश होता है। यदि सूर्य 7, 12 स्थान मे हो तो पत्नी या पुत्र नष्ट होते है अर्थात मृत्यु होती है।
(7) सभावास मे हो तो जातक हुनरमंद विद्वान्, सदाचारी वक्ता होता है।
(8) आगमावस्था मे हो तो मनुष्य दुखी, कुरूप किन्तु धनाढ्य होता है।
(9) भोजनावस्थामे हो तो स्त्री पुत्र धन से हीन, जोड़ो मे दर्द से पीड़ित, सिर में पीड़ा, असदाचारी होता है।
(10) नृत्यलिप्सा में हो तो सुन्दर, चतुर लेकिन सिर, पेट, हृदय पीड़ा से पीड़ित, धनी होता है।
(11) कौतुक अवस्था - प्रसिद्ध पुत्र वाला, सुखी, पत्नी सुखी, अधिक बोलने वाला होता है लेकिन त्वचा रोगी व क्रोधी होता है। यह सूर्य 5 7 भाव में हो तो स्त्री व पहली संतान की हानि होती है, सभा मे संकोच करता है। षष्ट भाव मे हो तो शत्रुओ का नाश होता है।
(12) निद्रावस्था मे हो तो प्रवासी, गुदा व लिंग रोगी, दरिद्र, विकलांग, सुख से वंचित होता है।

चन्द्रावस्था फल
1 शयनावथा मे जातक स्वाभिमानी, सर्दी से पीड़ित, कामुक व धन नाशक होता है। यदि चंद्र लग्न मे हो तो गुप्त रोगी होता है। कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा हो तो मनुष्य बहुत दिखावा करने वाला बहुभक्षी अर्थात भुक्कड़, लोभी व पर निंदक होता है।
2 उपवेशनावस्था मे जातक रोगी, निर्धन, चालक, मंदबुद्धि, बेकार के कामो मे लगा रहता है।
3 नेत्रपाणि अवस्था में जातक दीर्घ रोग वाला, दुष्ट, अधिक बोलने वाला कुकर्मी होता है।
4 प्रकाशनावस्था मे शुक्ल पक्ष में अष्टमी के बाद का जन्म हो तो धनी, मजबूत शरीर वाला, तीर्थ यात्री होता है। कृष्णपक्ष में जन्म हो तो अपेक्षाकृत कम फल होता है।
5 गमनावस्था मे कृष्णपक्ष का जन्म हो तो प्रवासी, निर्धन, क्रूर कार्य करने वाला, नेत्ररोगी होता है। शुक्लपक्ष मे विपरीत फल होता है लेकिन भयभीत रहता है।
6 आगमनावस्था जातक स्वाभिमानी, पैरो मे कष्ट वाला, गुप्त पापी, अपने मे मग्न रहने वाला, मायावी होता है।
7 सभावास अवस्था मे चंद्र हो तो जातक दानी, धार्मिक, प्रतिष्ठित होता है।
8 आगमावस्था मे जातक वाचाल, धार्मिक होता है। कृष्णपक्ष का चन्द्रमा हो तो दो पत्नियों वाला व अधिक पुत्रियो वाला होता है।
9 भोजनावस्था मे पुष्ट चंद्र हो तो धनी, सुखी, स्त्री सुख, वाहन युक्त होता है और क्षीण चंद्र हो तो जल व सर्प से भय होता है।
10 नृत्यलिप्सा मे दीर्घ (पूनम की ओर) चंद्र हो तो शक्तिशाली, दानी, भोगी व सम्मानित, गीत-संगीत मे रुचिवान होता है। क्षीण चंद्र हो तो रोगी, निर्बल, प्रवाशी होता है।
11 कौतुकावस्था मे धनी, दानी, पुत्रवान, राजा या राजातुल्य, अनेक विषयो का ज्ञाता होता है।
12 निद्रावस्था मे पापी, रोगी, पुत्र शोक से दुःखी, मारा-मारा फिरता है। दशम में चन्द्रमा हो तो उक्त फल विशेषतया मिलता है अन्यथा कम होता है और वह प्रवाशी और शूल रोगी होता है। 5 7 वे भाव में इस अवस्था में चंद्र सदा शुभ होता है। राहु युक्त हो तो जातक में बहुत दोष होते है।

मंगल अवस्था का फल
१ शयनावस्था मे हो तो जातक चोट खाने वाला होता है। लग्न में हो तो त्वचा रोगी होता है पंचम में हो तो पहली संतान की हानि और सप्तम मे हो तो पत्नी की हानि होती है। 5 7 भाव मे शत्रु दृष्ट या शनि राहु युक्त हो तो हाथ कान या सिर काटने के योग होते है।
२ उपवेशन मे हो तो मनुष्य निकृष्ट, धनी, पापी होता है। लग्न मे हो तो यह फल विशेषतया होता है। 9 या 10 वे भाव हो तो स्त्री-पुत्र का नाश होता है।
३ नेत्रपाणि अवस्था मे मंगल लग्न मे हो तो कुल द्वारा त्यक्त पीड़ित, दरिद्री होता है। 2, 7 भाव मे हो तो पत्नी की मृत्यु होती है। अन्य भावो मे सब सुख होता है।
४ प्रकाशनावस्था मे धनी, तुनुक मिजाज, बुद्धिमान, बायीं आंख मे चोट खाने वाला, भयंकर ढंग से गिरता है। यदि मंगल पापयुक्त हो तो दारुण पाप करने वाला और मंगल 5 7 भाव में हो तो स्त्री पुत्र नष्ट होते है।
५ गमनावस्था मे स्त्री से कलह, निर्धनता, गुदा रोग, शरीर पर चोट खाने वाला होता है।
६ आगमनावस्था मे लग्न मे हो तो दुःखी, प्रवासी, साधारण नौकरी करने वाला, अधिक बोलने वाला, जनाने वस्त्र पहिनने वाला, त्वचा व नेत्र रोगी, दांत व सिर पीड़ा से ग्रसित होता है। अन्य स्थानो पर शुभ फल होता है लेकिन स्वास्थ्य ख़राब रहता है।
७ सभावास मे सम्पत्तिवान, धार्मिक, धैर्यशाली, मनोबल से युक्त, धर्म कार्यो में अग्रणी होता है। यदि मंगल उच्च का हो तो ये फल विशेषतया होते है। यही मंगल 9 या 5 वे भाव मे हो तो क्रमशः भाग्य हीन व विद्या हीन होता है। अन्य स्थनो मे मंगल निर्बल हो तो सभा में सम्मान पाने वाला, वृद्धावस्था मे पुत्र से दूर रहने वाला होता है। यदि मंगल बलि हो तो सब मंगल होता है।
८ आगमावस्था मे जातक कार्यकुशल, धनी, ढीला स्वास्थ्य , दानी, भोगी, यशस्वी होता है।
९ भोजनावस्था मे बलवान मंगल हो तो मिष्ठान प्रिय, अपमानित व तिरष्कृत सा जीवन व्यतीत करने वाला, महाक्रोधी, धनी होता है। पंचम या अष्टम भाव मे यही मंगल हो तो जानवर से मृत्यु होती है।
१० नृत्यलिप्सा मे हो तो राजपक्ष से लाभ, दानी, भोगी व सुखी होता है। मंगल 12 वे भाव में हो तो पुत्र नष्ट हो जाते है। 8 या 9 वे भाव मे हो तो अनेक दुःख वाला, अपमृत्यु के भय से युक्त होता है। 1, 2, 7, 10 भावो मे यही मंगल सब सुख देता है।
११ कौतुकावस्था मे जातक मित्रो, पुत्रो, स्त्रियो से युक्त, सम्पत्तिशाली, कन्या संतति की अधिकता वाला, दो पत्नियो वाला होता है।
१२ निद्रा अवस्था मे जातक धनहीन, मूर्ख, गुस्सैल, भ्रष्ट होता है। यदि 5, 7 स्थान मे हो तो बहुत संतान व बहुत दुःख होता है। राहु व मंगल की युति प्रथम संतान को नष्ट करती है।

बुध अवस्था फल
⦰ शयन अवस्था मे बुध मिथुन या कन्या मे हो तो अधिक भूख वाला यानि भुक्कड़, विकलांग, बटन जैसी छोटी आँख वाला, होता है। अन्य राशियो मे धूर्त और लम्पट होता है।
⦰ उपवेशन अवस्था मे मनुष्य बोलने मे चतुर, गुणी, कविता शक्ति युक्त, गोरा, सदाचारी होता है। यही बुध पाप युक्त या शत्रु दृष्ट हो तो महा पापी होता है। यही बुध मित्र युक्त या स्वग्रही हो तो सब सुख देता है।
⦰ नेत्रपाणि अवस्था मे बुध हो तो जातक के पैरो मे रोग, विद्या विनय से हीन, याचकवत जीवन व्यतीत होता है। उसका पुत्र भी नष्ट होता है। यदि यही बुध पंचम मे हो तो स्त्री-पुत्र सुख से रहित, बहु कन्याओ वाला होता है।
⦰ प्रकाशनावस्था मे बुध हो तो जातक दानी, विद्वान्, वेदार्थ का ज्ञाता होता है।
⦰ गमनावस्था में कार्य कुशल, लालची, स्त्री के वशीभूत, दुष्ट पत्नी वाला, या योग साधक होता है। ऐसा जातक दांतो की खराबी वाला, कामुक, बहुभाषी व दुःखी होता है।
⦰ आगमनावस्था मे जल विकारी, व्यापारी, स्त्री व बंधुओ रहित, सर्प भय युक्त, बेहाल होता है।
⦰ सभावास अवस्था मे जातक धनी, धार्मिक, पुण्यशील, जनसमर्थन प्राप्त करने वाला होता है। 5. 12 भाव में हो तो कन्या संतान अधिक होती है। सप्तम मे हो तो सब कुछ पाने वाला, दबंग, कुछ सांवला या त्वचा मे झुलसने जैसे निशान वाला होता है।
⦰ आगमावस्था मे पापी, नीच संगति से धन कमाने वाला, दो पुत्रो वाला, मूत्र रोगी होता है।
⦰ भोजनावस्था मे बुध हो तो जातक वाद-विवाद के कारण धन हानि उठाने वाला, राजमद, सिर के रोग, द्वेषयुक्त, चंचल बुद्धि वाला होता है।
⦰ नृत्यलिप्सा अवस्था मे धनी, विद्वान, कवि, सम्मानित, वाहनो वाला, प्रसन्नचित्त व सुखी होता है। यदि पाप क्षेत्र मे हो तो वेश्या प्रेमी होता है।
⦰ कौतुकावस्था मे बुध हो तो जातक सर्वप्रिय, संगीतज्ञ, त्वचा विकारी होता है। ऐसा बुध 8 या 10 भाव मे हो तो पुत्रहीन और अनेक कन्याओ वाला होता है। 7 या 9 भाव में हो तो वैश्या प्रेमी होता है। 9 या 10 भाव में हो तो ऐसा बुध बहुत शुभ होता है।
⦰ निद्रा अवस्था मे दीर्घ अवधि का रोग होता है। जातक अल्पायु, धनहानि उठाने वाला, दुखी होता है। 1 या 10 भाव मे हो तो उक्त फल अशुभ होते है। अन्य स्थानो पर शुभ फल होता है।

गुरु अवस्था फल
⇴ शयनावस्था मे कमजोर आवाज वाला, दुःखी, अत्यधिक गोरा, लम्बी ठुड्डी वाला, शत्रुओ से भयभीत रहता है। 1, 5, 9, 10 भाव हो तो जातक धनी, विद्वान् व सदाचारी होता है।
⇴ उपवेशन अवस्था मे दु:खी, वाचाल, राजा के शत्रु से भयभीत, मुख, हस्त, पद मे व्रण होता है। 2, 3, 11, 12 भाव मे गुरु जातक गुणवान, अनेक विषयो मे रुचिवान होता है।
⇴ नेत्रपाणि अवस्था मे सिर रोग, धनी, नीच वर्ग से प्रेम करने वाला, पग-पग पर काम मे रूकावट झेलने वाला होता है। संगीत व नृत्य प्रेमी, श्रेष्ठ लक्ष्मी विहीन होता है। ऐसा गुरु 6, 8, 9 स्थानो मे हो तो शत्रुओ को नाश होता है और तीर्थ स्थान मे मृत्यु होती है।
⇴ प्रकाशनावस्था मे गुणी धनी होता है। 1, 10 भाव मे ऐसा गुरु जातक को जगत गुरु या सम्राट बनता है। अन्य स्थानो मे उच्चादि हो बहुत शुभ होता है। यदि नीचादिगत हो तो गुप्त यानि यौन रोग होता है।
⇴ गमनावस्था मे हो तो जातक लोभी, पापी, नौकरी करने वाला, प्रवासी, धनाढ्य होता है। उक्त फल यदि 1, 3, 4, 6, 8, 9, 11, 12 भाव में हो तो विपरीत फल होता है।
⇴ आगमनावस्था मे हो तो जातक अच्छी पत्नी वाला, धनी गुणी एवम लोकप्रिय होता है।
⇴ सभावास अवस्था मे गुरु हो तो जातक राजा का सेवक या सहयोगी, या शासकीय कर्मचारी, विद्वान्, कुशल वक्ता, अच्छी आमदानी वाला होता है। यदि ऐसा गुरु केंद्र मे बलवान हो तो उक्त फल अवश्य होता है। यदि ऐसा गुरु 12 भाव मे हो जातक दु:खी व सर्वश्व हानि वाला होता है।
⇴ आगमावस्था मे हो तो जातक अच्छी पत्नी वाला, धनी, गुणी, एवं लोकप्रिय होता है।
⇴ भोजनावस्था मे मांस भक्षण में रूचि रखने वाला, बहुत महत्वाकांक्षी, धनी, कामुक होता है। 5, 9 वे भाव में हो तो उक्त फल के साथ संतान सुख भी होता है। अन्य भाव में हो तो अनेक रोग होते है।
⇴ नृत्यलिप्सा अवस्था मे हो तो राजमान्य, धनवान, धर्मतत्व को जानने वाला, विद्वान्, कुशल वक्ता, पुत्रवान होता है। ऐसा गुरु 1, 5, 9, 10 वे भाव मे हो तो उक्त फल अवश्य होते है। अन्यथा साधारण फल होते है।
⇴ कौतुकावस्था मे गुरु हो तो जातक धनी, अपने कुल मे अग्रगण्य, ऐश्वर्यशाली, कुशल वक्ता, पुत्रवान होता है। लेकिन गुरु 6, 9, 12 भाव मे हो तो उक्त फल नही होते है।
⇴ निद्रा अवस्था मे गुरु हो तो जातक निर्धन, मूर्ख, बढ़ोतरी रहित होता है। लेकिन गुरु 1, 2, 8 वे भाव मे हो तो जातक धनवान होता है।

शुक्र अवस्था फल
[1] शयनावस्था मे शुक्र हो तो क्रोधी, दन्त विकारो से पीड़ित, निर्धन, दुष्टाचारी होता है। 7 या 11 भाव मे ऐसा शुक्र सब सुख प्रदाता होता है। अन्य स्थानो मे राजमान्य, धनी, सुखी, लेकिन पुत्र शोक वाला होता है।
[2] उपवेशनावस्था मे बलवान, धार्मिक, धनाढ्य, दाये भाग मे चोट, जोड़ो में दर्द वाला होता है। यह शुक्र उच्चवत या मित्रगत या स्वगृही हो तो सदा अच्छे फल मिलते है।
[3] नेत्रपाणी अवस्था मे 1, 7, 10 वे भाव मे हो तो जातक दृष्टि हीन हो जाता है। ऐसा शुक्र दशम में हो तो नेत्र के साथ सर्वनाश होता है। अन्य स्थान मे जातक साहसी, स्वाभिमानी, राजकर्मचारी, बड़े भवन का स्वामी होता है।
[4] प्रकाशनावस्था में काव्यशास्त्री, संगीत का पारखी, धनी, धार्मिक, वाहन युक्त होता है। 1, 2, 7, 9 वे भाव मे हो उच्च का हो तो राजसत्ता का कारक होता है।
[5] गमनावस्था में शुक्र हो तो जातक की माता जीवित नही रहती है। उसे मानसिक पीड़ा, बचपन मे रोग व वियोग होता है।
[6] आगमनावस्था मे शुक्र हो तो जातक के पैरो मे रोग लेकिन धनी व प्रसिद्ध होता है।
[7] सभावास अवस्था में जातक राजा का विश्वासपात्र, धनी, सब कामो मे कुशल, दर्द से पीड़ित होता है। यदि शत्रु युक्त या शत्रु क्षेत्री हो तो अनेक मुसीबते आती है।
[8] आगमावस्था मे बड़ी धन हानि, भयभीत, पुत्र शोक, स्त्री सुख मे कमी होती है। यदि 2, 4, 8, 10 भाव मे हो तो शुभ फल होते है।
[9] भोजनावस्था मे शुक्र हो तो कमजोर पाचन, पराई नौकरी, बहुत धन कमाने वाला होता है।
[10] नृत्यलिप्सा अवस्था मे जातक कुशल वक्ता, विद्वान्, कवि, धनी, कामुक, अनेक स्त्रियो प्यारा होता है। लेकिन ऐसा शुक्र नीचगत हो तो महामूर्ख होता है।
[11] कौतुकावस्था में जातक अनेक सुखो युक्त, सदा प्रसन्न रहने वाला, कुशल वक्ता, कई पुत्रो वाला, स्त्री सुखी, लोक से हटकर कार्य करने वाला. मनोबल युक्त होता है।
[12] निद्रा अवस्था मे शुक्र हो तो जातक पराया नौकर, परनिंदक, वाचाल, बैचेन रहने वाला होता है। ऐसा शुक्र 5, 7 वे भाव मे हो तो जातक अपना नाश स्वयं कर लेता है।

शनि अवस्था फल
शयनावस्था मे जातक भूख प्यास से पीड़ित, जवानी तक रोगी बाद मे सुखी होता है।
उपवेशनावस्था मे जातक मोटे और सूजन पैरो वाला, त्वचा विकारी और राजपीड़ित होता है।
नेत्रपाणि अवस्था मे शनि हो तो जातक मूर्ख होते हुए भी विद्वान् समझा जाने वाला, सम्पत्तिशाली, पित्तरोगी, अग्नि व जल के भय से युक्त, सिर, गुदा, जोड़ो के दर्द से पीड़ित होता है। 1, 10 भाव में ऐसा शनि हो तो कम धन अर्थ अल्प अर्थ होता है।
प्रकाशनावस्था मे जातक राजा का विश्वास पात्र, धार्मिक, सदाचारी होता है। लेकिन ऐसा शनि 1, 7 भाव मे हो तो सारे परिवार का नाश हो जाता है।
गमनावस्था, मे शनि हो तो जातक महा धनी, पुत्रवान, गुणी, दानी, श्रेष्ठ होता है।
आगमनावस्था मे शनि हो तो जातक पाद रोगी, क्रोधी, कंजूस, दांत पीसने वाला होता है।
सभावस्था मे जातक पुत्र व धन से युक्त, सदा सीखने को तत्पर, रत्नो से युक्त होता है। ऐसा शनि षष्ठ मे शत्रु दृष्ट हो तो सर्वनाश होता है।
आगमावस्था मे जातक क्रोधी और रोगी होता है। यदि ऐसा शनि लग्न मे हो तो जातक भाई की मृत्यु होती है और स्वयं सांप आदि विषय से भयभीत होता है। 2, 3, 5, 7 भावो में ऐसा शनि हो तो इन भावो की वृद्धि करता है अर्थात द्वितीय मे धन, तृतीय में भाई, पंचम में पुत्र, सप्तम मे स्त्री सुख देता है। लेकिन नवम भाव मे ऐसा शनि बाधाऐ खड़ी करता है।
भोजनावस्था मे शनि हो तो पाचन की कमजोरी नेत्र रोग, बबासीर, हृदयशूल देता है। लेकिन उच्चगत हो तो सब सुख देता है।
नृत्यलिप्सा अवस्था मे हो तो जातक धनी, धार्मिक, सम्पत्तिशाली, सुखी होता है। लेकिन पंचम मे हो तो सब संतान या पुत्रो को नष्ट कर देता है।
कौतुकावस्था मे शनि हो तो जातक सत्ताधारी के निकट, धनी, भोगी, विद्वान् व चतुर होता है। लेकिन 5, 7, 9, 10 भाव मे हो तो सब जगह असफलता है।
निद्रा अवस्था में हो तो जातक धनी विद्वान्, सदाचारी, नेत्ररोगी, पित्तशूल वाला, कई पुत्रो और दो स्त्रियो वाला होता है। दशम में हो तो सब व्यापार चौपट हो जाता है। त्रिकोण मे उच्चगत या केंद्र में स्वगृही हो तो सब प्रकार से शुभ फल होता है।

राहु अवस्था का फल
⧫ शयनावस्था मे राहु मिथुन, वृषभ, सिंह राशियो को छोड़कर स्थित हो तो क्लेश व दुःख देता है। यदि इन राशियो मे हो तो सब सुख देता है।
⧫ उपवेशनावस्था मे हो तो त्वचा रोग, धनहानि, घमंड, पैरो मे कष्ट देता है।
⧫ नेत्रपाणि अवस्था मे हो तो जातक नेत्र रोगी होता है। इसे हमेशा धन हानि होती रहती है। व्यापार मे विघ्न, स्त्रियोचित वेशभूषा, बहुत भाषण देने वाला होता है।
⧫ प्रकाशनावस्था मे राहु हो तो जातक देशाटन करने वाला, विदेशो मे घूमने वाला, उत्साही व राजकर्मचारी होता है। यदि कर्क या सिंह राशि मे हो तो भयानक चोट लग सकती है।
⧫ गमनावस्था में जातक बहुत संतान वाला, विद्वान्, धनी, राजमान्य लेकिन रोग पीड़ित होता है।
⧫ आगमनावस्था मे जातक क्रोधी, धनहानि उठाने वाला, बुद्धिहीन, कंजूस, चालाक होता है।
⧫ सभावास अवस्था मे विद्वान्, कंजूस, गुणवान, धार्मिक होता है। लेकिन 1, 5, 10 भाव मे ऐसा राहु हो तो स्त्री पुत्र और धन का नाश करता है।
⧫ आगमावस्था मे राहु हो तो जातक दुःखी व कलह पीड़ित होता है।
⧫ भोजनावस्था मे हो तो भोजन से परेशानी होती है। जातक विकलांग, मंदबुद्धि, स्त्री पुत्र सुख से वंचित होता है। 1, या 2 भाव में हो तो अच्छा कुलीन जातक भी पतित होता है। 7, 10 भाव मे हो तो स्त्रीहन्ता होता है।
⧫ नृत्यलिप्सा अवस्था मे लग्नगत राहु हो तो बड़ी बीमारी, धन व धर्म की हानि, नेत्रों मे बाधा होती है। अन्य भाव मे धन. स्त्री और पुत्र सुख प्राप्त होता है।
⧫ कौतुकावस्था में राहु 5, 7, 10 वे भाव में हो तो जातक गुणवान, धनी, पित्तरोगी होता है। अन्य भावो मे हो तो दुःख भोगता है।
⧫ निद्रा अवस्था मे शोकाकुल, धनी, स्त्री-पुत्र युक्त होता है।

केतु अवस्था फल
शयनावस्था मे मेष, वृषभ, मिथुन, कन्या राशि मे धन वर्धक. अन्य राशि मे रोग वर्धक होता है।
उपवेशनावस्था में केतु हो तो जातक त्वचा रोगी शत्रु व राजा से पीड़ित होता है।
नेत्रपाणि अवस्था मे केतु हो तो जातक रोगी, दुःखी, राजा से पीड़ित होता है।
प्रकाशनावस्था मे केतु हो तो जातक धार्मिक धनाढ़्य, प्रवासी होता है।
गमनावस्था मे केतु हो तो जातक पुत्रवान, गुणवान, धनवान होता है।
आगमनावस्था मे जातक रोगी, धनहानि उठाने वाला, दांतो मे पीड़ा वाला होता है।
सभावास अवस्था मे वचाल, घमंडी, धूर्त, निर्दयी , लालची होता है।
आगम अवस्था में जातक पापकर्म करने वाला, बंधुओ से विवादी, शत्रु व रोग पीड़ित होता है।
भोजनावस्था मे जातक भूख से पीड़ित, दरिद्री, रोगी, यत्र-तत्र भटकने वाला, होता है।
नृत्यलिप्सा अवस्था मे रोग से विकलांग, चिपचिपी आँखों वाला, धूर्त स्वाभाव होता है।
कौतुकावस्था मे अभिनेत्री या नर्तकी का प्रेमी, स्तरहीन, दुराचारी होता है।
निद्रा अवस्था मे केतु हो तो धन-धान्य से पूर्ण, कलाविद होता है।

शुभ व पाप (हानिकर) ग्रह सामान्य फल :
🔄 शुभ ग्रह शयनावस्था मे जहा बैठे हो उस भाव की वृद्धि करते है।
🔄 पाप ग्रह भोजनावस्था मे जहा स्थित हो उस भाव का नाश करते है।
🔄 निद्रा अवस्था मे पापग्रह सप्तम मे शुभ है लेकिन अन्यत्र शुभ युत या दृष्ट या पाप युत या दृष्ट हो तो भी पत्नी नाशक होते है।
🔄 पंचम भाव में निद्रा या शयन अवस्था मे पाप ग्रह शुभ है। लेकिन वह पाप ग्रह स्वोच्च या स्वक्षेत्री हो तो संतान नाशक होता है। शुभ दृष्ट होने पर भी एक संतान का नाशक होता है।
🔄 अष्टम मे पापग्रह निद्रा या शयन अवस्था मे अकाल मृत्यु देते है।
🔄 दशम मे पापग्रह, शयन या भोजन अवस्था मे हो तो जातक परम् दरिद्री, भाग्यहीन होता है।
🔄 दशम मे शुभग्रह निद्रा या गमन अवस्था में हो तो भी दुःख दायक होता है।
🔄 दशम मे चन्द्रमा कौतुक या प्रकाश अवस्था मे राजयोग कारक होता है।

19/02/2024

नारद संहिता में ज्योतिष विज्ञान के सूत्र, भाग-1
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मेष आदि राशियाँ कालपुरुष के क्रमश : मस्तक , मुख , बाहु , ह्रदय , उदर , कटि , वस्ति ( पेंडू ), लिङ्ग , ऊरु , जानु , जङ्घा और दोनों चरण हैं।
राशी स्वामी : मङ्गल , शुक्र , बुध , चन्द्रमा , सूर्य , बुध , शुक्र , मङ्गल , गुरु , शनि, शनि तथा ग्रुरु – ये क्रमश : मेष आदि राशियोंके अधीश्वर ( स्वामी ) हैं।
वृष , मेष , धनु , कर्क , मिथुन, और मकर – ये रात्रिसंज्ञक हैं अर्थात्‌ रात में बली माने गये हैं- ये पृष्ठभाग से उदय लेने के कारण पृष्ठोदय कहलते हैं (किंतु मिथुन पृष्ठोदय नहीं है)। शेष राशियों की दिन संज्ञा है (वे दिन में बली और शीर्षोदय माने गये हैं); मीन राशि को उभयोदय कहा गया है।
मेष आदि राशियाँ क्रम से क्रूर और सौम्य (अर्थात्‌ मेष आदि विषम राशियाँ क्रूर और वृष आदि सम राशियाँ सौम्य) हैं।
मेष आदि राशिय़ाँ क्रम से पुरुष, स्त्री और नपुंसक होती हैं (नवीन मतमें दो विभाग हैं , मेष आदि विषम राशियाँ पुरुष और वृष आदि सम राशियाँ स्त्री हैं)।
इसी प्रकार मेष आदि राशियाँ क्रमश: चर , स्थिर और द्विस्वभाव में विभाजित हैं ( अर्थात्‌ मेष चर , वृष स्थिर और मिथुन द्वि स्वभाव हैं, कर्क चर, सिंह स्थिर और कन्या द्विस्वभाव है । इसी क्रमसे शेष राशियोंको भी समझे)। मेष आदि राशियाँ पूर्व आदि दिशाओं में स्थित हैं ( यथा – मेष , सिंह , धनु पूर्वमें ; वृष कन्या , मकर दक्षिण में ; मिथुन , तुला , कुम्भ पश्चिममें और कर्क , वृश्चिक , मीन उत्तरमें स्थित, हैं )। ये सब अपनी – अपनी दिशामें रहती हैं।
सूर्य का उच्च मेष, चन्द्रमा का वृष , मङ्गल का मकर, बुध का कन्या, गुरु का कर्क, शुक्र का मीन तथा शनि का उच्च तुला है। सूर्य का मेष में १० अंश, चन्द्रमा का वृष में ३ अंश , मङ्गल का मकरमें २८ अंश , बुध का कन्या में १५ अंश , गुरु का कर्क में ५ अंश में शुक्र का मीन में २७ अंश तथा शनि का तुला में २० अंश उच्चांश परमोच्च है।
सूर्यादि ग्रहों की जो उच्च राशियाँ कही गयी हैं, उनसे सातवीं राशि उन ग्रहों का नीच स्थान है ।
चर में पूर्व नवमांश वर्गोत्तम है। स्थिर में मध्य (पाँचवाँ) नवमांश और द्विस्वभाव में अन्तिम (नवाँ) नवमांश वर्गोत्तम है।
तनु (लग्न) आदि बारह भाव हैं। सूर्य का सिंह , चन्द्रमा का वृष , मङ्गल का मेष, बुध का कन्या , गुरु का धन , शुक्र का तुला और शनि का कुम्भ यह मूल त्रिकोण कहा गया है। चतुर्थ और अष्टभाव का नाम चतुरस्त्र है । नवम और पञ्चम का नाम त्रिकोण है। द्वादश , अष्टम और षष्ठ का नाम त्रिक है। लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम का नाम केन्द्र है। द्विपद, जलचर, कीट और पशु – ये राशियाँ क्रमश : केन्द्रमें बली होती हैं (अर्थात्‌ द्विपद लग्न में, जलचर चतुर्थ में, कीट सातवें में और पशु दसवें में बलवान्‌ माने गये हैं।
केन्द्र के बाद के स्थान (२, ५,८, ११) ये ‘पणफर’ कहे गये हैं। उसके बादके ३ , ६ , ९, १२ – ये आपोक्लिम कहलाते हैं। मेषका स्वरूप रक्तवर्ण , वृष का श्वेत , मिथुन का तोते के समान हरित, कर्क का पाटल ( गुलाबी ), सिंह का धूम्र, कन्या का पाण्डु ( गौर), तुला का चितकबरा , वृश्चिक का कृष्ण वर्ण, धनु का पीत, मकर का पिङ्ग, कुम्भ का बभ्रु (नेवले) के सदृश और मीन का स्वच्छ वर्ण है। इस प्रकार मेष से लेकर सब राशियों की कान्ति का वर्णन किया गया है।
सब राशियाँ स्वामी की दिशा की ओर झुकी रहती हैं। सूर्याश्रित राशि से दूसरे का नाम ‘ वेशि ’ है ॥१२ – १३॥

( ग्रहोंके शील , गुण आदिका निरूपण — ) सूर्यदेव कालपुरुष के आत्मा , चन्द्रमा मन , मङ्गल पराक्रम , बधु वाणी , गुरु ज्ञान एवं सुख , शुक्र काम और शनैश्वर दुःख हैं।
सूर्य – चन्द्रमा राजा रानी, मङ्गल सेनापति, बुध राजकुमार, बृहस्पति तथा शुक्र मन्त्री और शनैश्वर सेवक या दूत हैं, यह ज्यौतिष शास्त्र के श्रेष्ठ विद्वानों का मत है।
सूर्यादि ग्रहों के वर्ण इस प्रकार हैं। सूर्यका ताम्र , चन्द्रमा का शुक्ल , मङ्गल का रक्त , बुध का हरित , बृहस्पति का पीत , शुक्र का चित्र ( चितकबरा ) तथा शनैश्वर का काला है। अग्नि, जल, कार्तिंकेय, हरि, इन्द्र, इन्द्राणी और ब्रह्मा – ये सूर्यादि ग्रहोंके स्वामी हैं
सूर्य , शुक्र , मङ्गल , राहु, शनि, चन्द्रमा, बुध तथा बृहस्पति – ये क्रमश : पूर्व, अग्निकोण, दक्षिण, नैऋत्यकोण, पश्चिम, वायव्यकोण, उत्तर तथा ईशान कोण के स्वामी हैं।
क्षीण चन्द्रमा , सूर्य , मङ्गल और शनि – ये पापग्रह हैं – इनसे युक्त होने पर बुध भी पापग्रह हो जाता है।
बुध और शनि नपुंसक ग्रह हैं। शुक्र और चन्द्रमा स्त्री ग्रह हैं। शेष सभी (रवि, मङ्गल, गुरु) ग्रह पुरुष हैं। मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शानि – ये क्रमश : अग्नि, भूमि, आकाश, जल तथा वायु – इन तत्त्वोंके स्वामी हैं।
शुक्र और गुरु ब्राह्मण वर्ण के स्वामी हैं। भौम तथा रवि क्षत्रिय वर्ण के अधिपति हैं। शनि अन्त्यजों के तथा राहु म्लेर्च्छे के स्वामी हैं।
चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति सत्त्वगुण के, बुध और शुक्र रजोगुण के तथा मङ्गल और शनैश्वर तमोगुण के स्वामी हैं। सूर्य देवताओं के, चन्द्रमा जल के , मङ्गल अग्नि के , बुध क्रीडाविहार के, बृहस्पति भूमि के, शुक्र कोष के, शनैश्वर शयन के तथा राहु ऊसर के स्वामी हैं।
स्थूल (मोटे सूतसे बना हुआ), नवीन, अग्नि से जला हुआ, जल से भीगा हुआ, मध्यम (न नया न पुराना), सुदृढ (मजबूत) तथा फटा हुआ, इस प्रकार क्रम से सूर्य़ आदि ग्रहों का वस्त्र है। ताम्र ( ताँबा ), मणि, सुवर्ण, काँसा, चाँदी, मोती और लोहा – ये क्रमश : सूर्य आदि ग्रहों के धातु हैं। शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्‌ और हेमन्त – ये क्रम से शनि, शुक्र, मङ्गल, चन्द्र, बुध तथा गुरु की ऋतु हैं। लग्न में जिस ग्रह का द्रेष्काण हो , उस ग्रह की ऋतु समझी जाती है।
ग्रहों की दृष्टि- सभी ग्रह अपने – अपने आश्रित स्थान से ३ , १० , स्थान को एक चरण से ; ५, ९, स्थान को दो चरण से; ४, ८, स्थान को तीन चरण से और सप्तम स्थान को चार चरण से देखते हैं। किंतु ३ , १० , स्थान को शनि, ५, ९, को गुरु तथा ४, ८, को मङ्गल पूर्ण दृष्टि से ही देखते हैं। अन्य ग्रह केवल सप्तम स्थान को ही पूर्ण दृष्ट चारों चरणों से देखते हैं।
षड वर्ग : विषम राशियों में पहले सूर्य की, फिर चन्द्रमा की होरा बीतती है तथा सम राशियों में पहले चन्द्रमा की, फिर सूर्य की होरा बीतती है।
राशि के दश अंश तक उसी राशि का द्रेष्काण होता है और उस राशि के स्वामी ही उस द्रेष्काण के स्वामी होते हैं। ग्यारह से बीसवें अंश तक उस राशि से पाँचर्वी राशि का द्रेष्काण होता है और उसके स्वामी ही उस द्रेष्काण के स्वामी होते हैं। इसी प्रकार अन्तिम दश अंश ( अर्थात्‌ २१ से ३० वें अंश तक) उस राशि से नवम राशि का द्रेष्काण होता है और उसी के स्वामी उस द्रेष्काण के स्वामी कहे गये हैं।
विषम राशियों में पहले पाँच अंश तक मङ्गल , फिर पाँच अंश तक शनि, फिर आठ अंश तक बृहस्पति, फिर सात अंश तक बुध और अन्तिम पाँच अंश तक शुक्र त्रिंशांशेश कहे गये हैं। सम राशियों में इसके विपरीत क्रम से पहले पाँच अंश तक शुक्र, फिर सात अंश तक बुध, फिर आठ अंश तक बृहस्पति , फिर पाँच अंश तक शनि और अन्तिम पाँच अंश तक मङ्गल त्रिंशांशेश बताये गये हैं।
मेष आदि राशियों के नवमांश मेष, मकर, तुला और कर्क से प्रारम्भ होते हैं ( यथा – मेष, सिंह, धनु के मेष से; वृष, कन्या, मकर के मकर से; मिथुन, तुला और कुम्भ के तुला से तथा कर्क, वृश्चिक और मीन के नवमांश कर्क से चलते हैं ।
ढाई अंश के द्वादशांश होते हैं, जो अपनी राशि से प्रारम्भ होकर अन्तिम राशि पर पूरे होते हैं और उन-उन राशियों के स्वामी ही उन द्वादशांशों के स्वामी कहे गये हैं। इस प्रकार ये राशि, होरा आदि षड्‌वर्ग कहलाते हैं।

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