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20/04/2020

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 #राष्ट्रीय  #सुरक्षा  #अधिनियम- #1980, देश की सुरक्षा के लिए सरकार को अधिक शक्ति देने से संबंधित एक कानून है। यह कानून ...
16/04/2020

#राष्ट्रीय #सुरक्षा #अधिनियम- #1980, देश की सुरक्षा के लिए सरकार को अधिक शक्ति देने से संबंधित एक कानून है। यह कानून केंद्र और राज्य सरकार को गिरफ्तारी का आदेश देता है।

#शक्तियां
यह कानून सरकार को संदिग्घ व्यक्ति की गिरफ्तारी की शक्ति देता है।

नागरिकों की गिरफ्तारी

अगर सरकार को लगता कि कोई व्यक्ति उसे देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले कार्यों को करने से रोक रहा है तो वह उसे गिरफ्तार करने की शक्ति दे सकती है। सरकार को ये लगे कि कोई व्यक्ति कानून-व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में उसके सामने बाधा खड़ा कर रहा है तो वह उसे गिरफ्तार करने का आदेश दे सकती है। साथ ही, अगर उसे लगे कि वह व्यक्ति आवश्यक सेवा की आपूर्ति में बाधा बन रहा है तो वह उसे गिरफ्तार करवा सकती है। इस कानून के तहत जमाखोरों की भी गिरफ्तारी की जा सकती है। इस कानून का उपयोग जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त, राज्य सरकार अपने सीमित दायरे में भी कर सकती है।

विदेशियों की गिरफ्तारी

अगर सरकार को ये लगे कि कोई व्यक्ति अनावश्यक रूप से देश में रह रहा है और उसे गिरफ्तारी की नौबत आ रही है तो वह उसे गिरफ्तार करवा सकती है।

गिरफ्तारी की सीमा
कानून के तहत किसी व्यक्ति को पहले तीन महीने के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है। फिर, आवश्यकतानुसार, तीन-तीन महीने के लिए गिरफ्तारी की अवधि बढ़ाई जा सकती है। एकबार में तीन महीने से अधिक की अवधि नहीं बढ़ाई जा सकती है। अगर, किसी अधिकारी ने ये गिरफ्तारी की हो तो उसे राज्य सरकार को बताना होता है कि उसने किस आधार पर ये गिरफ्तारी की है। जब तक राज्य सरकार इस गिरफ्तारी का अनुमोदन नहीं कर दे, तब तक यह गिरफ्तारी बारह दिन से ज्यादा समय तक नहीं हो सकती है। अगर यह अधिकारी पांच से दस दिन में जवाब दाखिल करता है तो इस अवधि को बारह की जगह पंद्रह दिन की जा सकती है। अगर रिपोर्ट को राज्य सरकार स्वीकृत कर देती है तो इसे सात दिनों के भीतर केंद्र सरकार को भेजना होता है। इसमें इस बात का जिक्र करना आवश्यक है कि किस आधार पर यह आदेश जारी किया गया और राज्य सरकार का इसपर क्या विचार है और यह आदेश क्यों जरूरी है।

गिरफ्तारी के आदेश का क्रियान्वय
सीसीपी, 1973 के तहत जिस व्यक्ति के खिलाफ आदेश जारी किया जाता है, उसकी गिरफ्तारी भारत में कहीं भी हो सकती है।

गिरफ्तारी के नियमन की शक्ति
गिरफ्तारी के आदेश का नियमन किसी भी व्यक्ति पर किया जा सकता है। उसे एक जगह से दूसरी जगह पर भेजा जा सकता है। हां, संबंधित राज्य सरकार के संज्ञान के बगैर व्यक्ति को उस राज्य में नहीं भेजा जा सकता है।

गिरफ्तारी की वैधता

गिरफ्तारी के आदेश को सिर्फ इस आधार पर अवैध नहीं माना जा सकता है कि इसमें से एक या दो कारण (1) अस्पष्ट हो (2) उसका अस्तित्व नहीं हो (3) अप्रसांगिक हो (4) उस व्यक्ति से संबंधित नहीं हो
इसलिए किसी अधिकारी को उपरोक्त आधार पर गिरफ्तारी का आदेश पालन करने से नहीं रोका जा सकता है। गिरफ्तारी के आदेश को इसलिए अवैध करार नहीं दिया जा सकता है कि वह व्यक्ति उस क्षेत्र से बाहर हो जहां से उसके खिलाफ आदेश जारी किया गया है।

फरार होने की स्थिति में शक्तियां
अगर वह व्यक्ति फरार हो तो सरकार या अधिकारी, 1) वह व्यक्ति के निवास क्षेत्र के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट को लिखित रूप से रिपोर्ट दे सकता है। 2) अधिसूचना जारी कर व्यक्ति को तय समय सीमा के अंदर बताई गई जगह पर उपस्थित करने के लिए कह सकता है। 3) अगर, वह व्यक्ति उपरोक्त अधिसूचना का पालन नहीं करता है तो उसकी सजा एक साल और जुर्माना, या दोनों बढ़ाई जा सकती है।

सलाहकार समिति का गठन
1. इस अधिनियम के उद्देश्य से केंद्र सरकार और राज्य सरकारें आवश्यकता के अनुसार एक या एक से अधिक सलाहकार समितियां बना सकती हैं। 2. इस समिति में तीन सदस्य होंगे, जिसमें प्रत्येक एक उच्च न्यायालय के सदस्य रहे हों या हो या होने के योग्य हों. समिति के सदस्य सरकार नियुक्त करती हैं। 3. संघ शासित प्रदेश में सलाहकार समिति के सदस्य किसी राज्य के न्यायधीश या उसकी क्षमता वाले व्यक्ति को ही नियुक्त किया जा सकेगा, नियुक्ति से पहले इस विषय में संबंधित राज्य से अनुमति लेना आवश्यक है।

सलाहकार समिति का महत्वस
1. इस कानून के तहत गिरफ्तार किसी व्यक्ति को तीन सप्ताह के अंदर सलाहकार समिति के सामने उपस्थित करना होता है। साथ ही सरकार या गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को यह भी बताना पड़ता है कि उसे क्यों गिरफ्तार किया गया। सलाहकार समिति उपलब्ध कराए गए तथ्यों के आधार पर विचार करता है या वह नए तथ्य पेश करने के लिए कह सकता है। सुनवाई के बाद समिति को सात सप्ताह के भीतर सरकार के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत करना होता है। 2. सलाह बोर्ड को अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ लिखना होता है कि गिरफ्तारी के जो कारण बताए गए हैं वो पर्याप्त हैं या नहीं। 3. अगर सलाहकार समिति के सदस्यों के बीच मतभेद है तो बहुलता के आधार निर्णय माना जाता है। 4. सलाहकार बोर्ड से जुड़े किसी मामले में गिरफ्तार व्यक्ति की ओर से कोई वकील उसका पक्ष नहीं रख सकता है और सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट गोपनीय रखने का प्रावधान है।

सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट पर कार्रवाई
1. अगर सलाहकार बोर्ड व्यक्ति की गिरफ्तार के कारणों को सही मानता है तो सरकार उसकी गिरफ्तारी को उपयुक्त समय, जितना पर्याप्त वह समझती है, तक बढ़ा सकती है। 2. अगर समिति गिरफ्तारी के कारणों को पर्याप्त नहीं मानती है तो गिरफ्तारी का आदेश रद्द हो जाता है और व्यक्ति को रिहा करना पड़ता है।

गिरफ्तारी की अधिकतम अवधि
अगर, गिरफ्तारी के कारण पर्याप्त साबित हो जाते हैं तो व्यक्ति को गिरफ्तारी की अवधि से एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है। समया अवधि पूरा होने से पहले न तो सजा समाप्त की जा सकती है और ना ही उसमें फेरबदल हो सकता है।

गिरफ्तारी के आदेश की समाप्त
1. गिरफ्तारी के आदेश को रद्द किया जा सकता है या बदला जा सकता है (अ) इसके बावजूद, कि गिरफ्तारी केंद्र या राज्य सरकार के आदेश के उसके अधीनस्थ अधिकारी ने की है। (आ) इसके बावजूद कि ये गिरफ्तारी केंद्र या राज्य सरकार के आदेश के हुई हो।

     was the person who developed   vaccineटीका (vaccine) एक जीवों के शरीर का उपयोग करके बनाया गया द्रब्य है जिसके प्रयो...
16/04/2020

was the person who developed vaccine

टीका (vaccine) एक जीवों के शरीर का उपयोग करके बनाया गया द्रब्य है जिसके प्रयोग से शरीर की किसी रोग विशेष से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है।
वैक्सीन क्या है और कैसे बनाई जाती है
वैक्सीन बनाने के लिए पदार्थों से युक्त अनुकूल वातावरण में जीवाणु का संजनन (cultivation) किया जाता है। और फिर लवण विलयन में उनका विलयन बनाया जाता है। यदि जीवाणु को मारना आवश्यक हुआ, तो गरम जल द्वारा 60 डिग्री सें. के ताप से अथवा फ़िनोल से निर्जीव कर दिया जाता है। विलयन में जीवाणु की संख्या का पता लगाते हैं और फिर आवश्यक मात्रा में लवण विलयन मिलाकर विलयन में जीवाणुओं की संख्या पूर्वनिर्धारित संख्या के अनुसार कर दी जाती है। आवश्यक परीक्षा द्वारा वैक्सीन की शुद्धता, निर्दोषिता और प्रतिरक्षण शक्ति का पता लगाते हैं और यदि वैक्सन औषधि निर्माण अधिनियम (Act) द्वारा निर्धारित विशिष्ट गुणों से युक्त है, तो इसे प्रयोग में ला सकते हैं।
रोगनिरोधन के लिए जो वैक्सीन मुख्यत: काम में लाए जाते हैं उनका सूक्ष्म परिचय इस प्रकार है :
विषाणुजन्य वैक्सीन

(1) चेचक निरोधी वैक्सीन
चेचक (smallpox) के विषाणु को वैरियोला (Variola) कहते हैं। टीके के लिए इस विषाणु का उपयोग प्राचीन काल से होता आया है। यह विषाणु चेचक उत्पन्न कर सकता है, इस कारण निर्दोष नहीं है। अत: गत 150 वर्षों से वैरियोला के स्थान पर गोमसूरी (cowpox) के वैक्सीनिया (Vaccnia) नामक विषाणु का उपयोग किया जा रहा है। वैरियोला का उपयोग सभी देशों में वर्जित है। गोमसूरी का वैक्सीनिया नामक विषाणु मनुष्य में चेचक रोग उत्पन्न नहीं कर पाता परंतु उसे प्रतिरक्षी चेचक निरोधक होते हैं। गोमसूरी के विषाणु बछड़े, पड़वे या भेड़ की त्वचा में संवर्धन करते हैं। त्वचा का जल और साबुन से धो पोंछकर उसमें हलका सा खरोंच कर दिया जाता है जिसपर वैक्सीनिया का विलयन रगड़ दिया जाता है। लगभग 120 घंटे में पशु की त्वचा पर मसूरिका (pox) के दाने उठ आते हैं। अधिकतर दाने पिटका के रूप में होते हैं जिनमें से कुछ जल अथवा पूययुक्त होते हैं जिन्हें क्रमश: जलस्फोटिका और पूयस्फोटिका कहते हैं। इन दानों को खरोंचकर खुरचन एकत्र कर लेते हैं। खरोंचने का कार्य हलके हलके किया जाता है जिससे केवल त्वचा की खुरचन ही प्राप्त हो, उसके साथ रुधिर न आ पाए। इस खुरचन को ग्लिसरीन के विलयन के साथ यंत्रों द्वारा पीस लेते हैं। ग्लिसरीन में गोमसरी के विषाणु के इस विलयन को ही टीके के लिए प्रयुक्त करते हैं। उपयोग में लाने से पूर्व इस विलयन को ईथर या क्लोफार्म के वाष्प से शोधित किया जाता है और शुद्धता, निर्दोषिता तथा प्रतिरक्षक शक्ति की परीक्षा की जाती है। चेचक निरोधक टीका अत्यंत लाभकारी है और इसके परिणामस्वरूप कई देशों में इस भयंकर रोग का उन्मूलन कर दिया गया है। प्रत्येक बालक को तीन से छह मास की अवस्था में टीका लग जाए और फिर पाँच-पाँच वर्षों के अंतर से बराबर लगता रहे, तो चेचक रोग की संभावना नहीं रहती। प्राय: सभी उन्नत देशों में यह टीका अनिवार्य रूप से लगाया जाता है। यह टीका सर्वथा निर्दोष है। इससे जो उत्पात संभव हैं, वे नगण्य हैं। यह टीका सभी को नि:शुल्क लगाया जाता है। बिना टीका लगवाए कोई यात्री विदेश नहीं जा पाता। टीका लगाने के आठ दिन बाद रोगनिरोधी शक्ति उत्पन्न हो जाती है जो कई वर्षों तक बनी रहती है। किंतु विदेशयात्रा के लिए तीन वर्ष से अधिक पुराना टीका मान्य नहीं होता।
(2) पीतज्वर निरोधी वैक्सीन
पीतज्वर (yellow fever) के निस्तेजित विषाणु को कुक्कुट के अंडों की अपरापोषिका कला (allantoic membrane) में संजनन कर निर्वात स्थान में सुखा लिया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर निसंक्रमित जल में विषाणु के शुष्क चूर्ण को घोलकर तत्काल काम में लाते हैं। टीका लगने के 10-14 दिन के अंदर ही रोगनिरोधी शक्ति उत्पन्न हो जाती है जो प्राय: छह वर्ष तक बनी रहती है। पीतज्वर के क्षेत्र से या उस मार्ग से भारत में आनेवाले प्रत्येक यात्री को यह टीका अनिवार्य रूप से लगवाना पड़ता है।
(3) पोलियो निरोधी वैक्सीन
पोलियो अथवा पोलियो माइएलाइटिस (poliomyelitis) बालरोग है। इसके विषाणु को बंदर के वृक्क से उत्पन्न कर साल्क की विधि से वैक्सीन बनाया जाता है। संयुक्त राज्य अमरीका में साल्क का वैक्सीन बहुत लाभदायक सिद्ध हुआ है और कई देशों में इसका चलन बढ़ रहा है। पोलियो रोग की रोकथाम के लिए बालक को दो टीके दो से लेकर छह सप्ताह तक के अंतर से लगाए जाते हैं। यदि तीसरा टीका सात मास पश्चात् और लगवा लिया जाए, तो उसका गुण और भी अधिक प्रभावकारी होता है।
(4) इंफ्लुएंजा निरोधी वैक्सीन
ए तथा बी जाति के इंफ्लुएंजा के विषाणु को मुर्गी के अंडे की अपरापोषिका में उत्पन्न कर वैक्सीन बनाया जाता है। टीका लगाने के एक सप्ताह पश्चात् रोगनिरोधी शक्ति उत्पन्न हो जाती है किंतु वह बहुत थोड़े काल तक बनी रहती है। इस वैक्सीन का अभी अधिक चलन नहीं हुआ।
(5) आलर्क (Rabies) निरोधी वैक्सीन - पागल कुत्ते, गीदड़, भेड़िए आदि के काटने पर रेबीज़ रोग से बचने के लिए यह टीका बहुत लाभकर है। रोग रेबीज के वीथिका विषाणु (street virus) से होता है किंतु इसी विषाणु का निस्तेजित रूपवाला स्थिर विषाणु (fixed virus) रोगकारी नहीं है किंतु रोगनिरोधी प्रतिरक्षी का उत्पादक है। रेबीज के स्थिर विषाणु को भेड़ या खरगोश के मस्तिष्क में उत्पन्न करते हैं और फिर मस्तिष्क को पीसकर फ़िनोलयुक्त लवण विलयन में विलयन बना लेते हैं। पागल कुत्ते के काटने पर आवश्यकतानुसार 14 दिन तक नित्य एक टीका लगाते हैं। इस वैक्सीन की शक्ति बढ़ाकर कुत्तों को टीका लगाकर उन्हें भी आलर्क रोग से बचाया जा सकता है। पागल कुत्ते, गीदड़, भेड़िए के काटने पर ७२ घंटे के अंदर एंटी रेबीज वैक्सीन का इंजेक्शन लगवाना आवश्यक है आलर्क (Rabies) निरोधी वैक्सीन न लगवाने पर मरीज रेबीज रोग से ग्रसित हो सकता है।

जीवाणुजन्य (Bacterial

(1) विपूचिका निरोधी वैक्सीन
क्षारीय पोषक तत्वयुक्त आगर पर विषुचिका के लोलाणु (Vibrio) उत्पन्न कर इनका लवण विलयन में विलयन बना लेते हैं। फिर फ़िनोल द्वारा सभी लोलाणुओं को निर्जीव कर वैक्सीन बनाते हैं। विषूचिकाकारी इनाबा (Inaba) तथा ओगावा (Ogawa) दोनों जाति के लोलाणु वैक्सीन में होते हैं और प्रति मिली लिटर में इनकी संख्या आठ अरब होती है। इसका टीका एक सप्ताह के अंतर से दो बार लगना अधिक अच्छा है परंतु एक बार का टीका भी विषूचिका निरोध में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। रोगनिरोधी शक्ति आठ दिवस में उत्पन्न होती है। और छह मास तक बनी रहती है। टीका लगने से कोई विशेष असुविधा नहीं होती। विदेशयात्रा के पर्व इस टीके का लगवाना आवश्यक है।
(2) टाइफाइड या आंत्र ज्वर निरोधी वैक्सीन
टाइफाइड तथा पैरा टाइफाइड ए तथा बी जाति के जीवाणु को पोषक तत्वयुक्त आगर अथवा संश्लेषित पदार्थों में उत्पन्न कर ऊष्मा द्वारा निर्जीव कर दिया जाता है और इन निर्जीव जीवाणुओं का लवण जल में विलयन बनाते हैं तथा फिनोल में सुरक्षित रखते हैं। इस वैक्सीन में टाइफाइड के एक अरब और पैराटाइफाइड ए तथा बी के 75-75 करोड़ जीवाणु प्रति मिलीलिटर में होते हैं। एक सप्ताह के अंतर से दो बार टीका लेने से निरोध शक्ति एक बार के टीके की अपेक्षा अधिक बलवती होती है। प्रति वर्ष नियमित रूप से टीका लेते रहने से इस रोग की आशंका नहीं रहती।
(3) प्लेग निरोधी वैक्सीन
प्लेग के कटाणुओं को जल विश्लेषित केसीन (केसीन हाइड्रोलाइसेट) में उत्पन्न करके फार्मेलिन से निर्विष करते हैं, तब वैक्सीन बनाते हैं जिस फिनील मरक्यूरिक नाइट्रेट में सुरक्षित रखते हैं। एक सप्ताह के अंतर से दो बार टीका दिया जाता है और निरोधशक्ति छह मास तक बनी रहती है।
(4) क्षयरोधी वैक्सीन
इसे बी.सी.जी. वैक्सीन कहते हैं। संश्लेषित पोषक पदार्थ में गोक्षय के निस्तेजित कीटाणुओं को उत्पन्न कर उनसे वैक्सीन बनाते हैं। इस वैक्सीन का टीका केवल उन्हीं को जो मैंटो (Mantoux) की ट्यूबरकुलीन परीक्षा द्वारा क्षयसंक्रमण रहित व्यक्तियों को लगाना आवश्यक है। जनता में इस टीके का प्रसार व्यापक रूप से होना चाहिए। इस टीके की उपयोगिता क्षयग्रस्त निर्धन देशों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी सफलता पूर्णत: प्रमाणित हो चुकी है। टीका निर्दोष, निरापद और प्रभावशाली है इसमें संदेह करने का कोई कारण नहीं है। कल्पित अथवा नगण्य दोषों का बढ़ावा देकर टीके का विरोध करना अनुचित है। लाखों करोड़ों प्राणियों को यह टीका लग चुका है और शैशव कालीन प्राथमिक क्षयसंक्रमण की रोकथाम में यह बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है।
(5) टाइफस निरोधी वैक्सीन
अंडे की अपरापोषिका कला पर टाइफस के रिकेट्रसिया को उत्पन्न कर इसके फ़िनोलयुक्त विलयन को टीके के काम में लाते हैं। एक एक सप्ताह के अंतर से तीन टीके लगाए जाते हैं।
(6) कुक्कुरखाँसी निरोधी वैक्सीन
यह वैक्सीन कुक्कुर खाँसी के हीमोफाइलस पर्ट्यूसिस नामक कीटाणु के विलयन को फ़ार्मेलिन से निर्जीव कर फिटकिरी से अवक्षेपित कर बनाया जाता है। एक एक मास के अंतर से तीन टीके दिए जाते हैं।
(7) डिप्थीरिया निरोधी वैक्सीन
डिप्थीरिया के कीटाणु से उसका जीवविष (toxin) पृथक् कर फ़ार्मेलिन के संयोग से जीवविषाभ (toxoid) बनाते हैं जिसे फिटकिरी से अवक्षेपित कर ए.पी.टी. (Alum Precipetated Toxoid) नामक टीका बनाते हैं। एक मास के अंतर से इसके दो टीके बालकों को दिए जाते हैं। हाल ही में जीवविषाभ को और भी शोधित कर पी.टी.ए.पी. (प्योरीफाइड टॉक्साइड ऐलम फ़ॉस्फ़ेट प्रेसिपिटेटेड) बनाया गया है जो अधिक गुणकारी कहा जाता है। वयस्क व्यक्तियों को ए.पी.टी. सहन नहीं होता, इस कारण उन्हें टी.ए.एफ. (टॉक्साइड ऐंटीटॉक्सीन फ्लोक्यूल) दिया जाता है जिसमें जीवविषाभ की तीव्रता को प्रतिजीवविष (antitoxin) द्वारा कम कर दिया जाता है।
(8) टेटनस अथवा धनुरतंभ निरोधी वैक्सीन
यह भी डिप्थीरिया के ए.पी.टी. की तरह बनाया जाता है। एक मास के अंतर से दो टीके दिए जाते हैं। डिप्थीरिया तथा टिटेनस के टीके वस्तुत: वैक्सीन नहीं, प्रत्युत जीवविषाभ हैं।
उपर्युक्त रोगनिरोधी टीकों द्वारा सक्रिय रोग प्रतिरक्षा उत्पन्न की जाती है जिसमें रोगकारी जीवाणुओं के प्रतिजन से रोगनिरोधी प्रतिरक्षी टीका लेनेवाले व्यक्ति के शरीर में ही बनते हैं। इस प्रकार की सक्रिय प्रतिरक्षी उत्पन्न करने में कुछ समय लगता है कितु रोगनिरोधी क्षमता दीर्घकालीन होती है। यदि सक्रिय प्रतिरक्षादायी वैक्सीन को किसी पशु में प्रयुक्त किया जाए और उसके रक्त में उत्पन्न प्रतिरक्षी किसी मनुष्य को टीके द्वारा दिया जाए, तो जो प्रतिरक्षा प्राप्त होगी वह निष्क्रिय (Passive) कहलाएगी। निष्क्रिय प्रतिरक्षा के लिए वैक्सीन के स्थान पर किसी सक्रिय प्रतिरक्षित पशु के रुधिर का प्रतिरक्षीयुक्त सीरम काल में लाते हैं। निष्क्रिय प्रतिरक्षी तुरंत ही प्रभावकर होता है किंतु उसकी व्याप्ति अल्पकालिक होती है। इस कारण रोगनिरोध की अपेक्षा वह रोग की चिकित्सा में अधिक उपयोगी होता है। कुछ सक्रिय प्रतिरक्षादायी वैक्सीन चिरकालिक रोगों की चिकित्सा के लिए भी प्रयुक्त किए जाते हैं। किंतु नवीन संश्लेषित और ऐंटीबायोटिक ओषधियों के प्रसार से चिकित्सा में वैक्सीनों का प्रयोग बहुत कम हो गया है।
रुधिर में पाया जानेवाला गामा ग्लोब्यूलिन रोगनिरोध में बहुत सहायक होता है। रोमांतक अथवा मसूरिका (measles) की रोकथाम में गामा ग्लोब्यूलिन देना लाभदायक है। जिन संक्रामक रोगों की रोकथाम या चिकित्सा के लिए कोई विशेष औषधि ज्ञात नहीं है उसमें किसी ऐसे व्यक्ति के रुधिर का सीरम काम मे लाते हैं जो हाल ही में उस रोग से मुक्त हुआ हो। रोगमुक्त व्यक्ति के रुधिर के सीरम में प्रतिरक्षी होते हैं, जो रोग शमन के लिए रोगियों को दिए जाते हैं। इस प्रकार के प्रतिरक्षीयुक्त रुधिर का सीरम प्राप्त करने के लिए रुधिर बैंक खोलने की आवश्यकता है जिसमें रोगमुक्त व्यक्ति, रोगियों के लाभ के लिए अपना रुधिर दान दे सकें। रुधिराधान (blood transfusion) द्वारा भी दाता के रुधिर के विशेष प्रतिरक्षी रुधिर ग्रहण करनेवाले को प्राप्त हो जाते हैं।
बालरोगों में डिप्थीरिया, टेटनस और कुक्कुरखाँसी के प्रतिषेध के लिए सक्रिय प्रतिरक्षाकारी जीवविषाभों तथा वैक्सीनों को मिलाकर त्रिधर्मी वैक्सीन बना लेते हैं जिससे उपर्युक्त तीनों रोगों के लिए एक ही टीका दिया जा सके। अब त्रिधर्मी वैक्सीन में पोलियो वैक्सीन भी मिलाकर चारों रोगों का प्रतिषेध एक साथ किया जा सकता है।

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