04/02/2026
बकरी दो गाँव खा गई......
"हाय, बकरी दो गाँव खा गई!" एक आदमी आगरा की सड़कों पर रोता-चिल्लाता घूम रहा था। लोग आश्चर्य में थे कि भला बकरी गाँव कैसे खा सकती है? आखिर यह ख़बर बादशाह अकबर तक भी पहुँची। बादशाह ने उसे दरबार में बुलाया। उस आदमी को उन्होंने देखते ही पहचान लिया।
बादशाह को याद आया कि वे कुछ समय पहले आगरा के पास किसी गाँव में गए थे। वे बहुत थक गए थे। यह आदमी उन्हें वहाँ गन्ने के एक खेत में मिला था। उन्होंने उससे कहा था, "भाई, थोड़ा गन्ने का रस पिला सकते हो?"
"हाँ, हाँ, आप बैठिए। मैं अभी लाया।"
अकबर एक पेड़ की छाया में बैठ गए। वह किसान खेत में गया। एक गन्ना तोड़ा और एक बड़े लोटे में रस निकालकर ले आया। अकबर ने गन्ने का रस पिया तो वह बहुत खुश हुए।
"अरे वाह! ऐसा रस तो हमने पहले कभी नहीं पिया।"
"जी, और यह सिर्फ एक ही गन्ने का रस है।"
"क्या?" एक गन्ने में इतना सारा रस! अकबर को आश्चर्य हुआ।
"मैं बिलकुल सही कह रहा हूँ, हुज़ूर!"
"कमाल की बात है!"
"ये हमारे बादशाह की नीयत का कमाल है जनाब। अगर उनकी नीयत ठीक न हो, तो गन्नों में रस ही न निकले।"
"अच्छा कितना लगान देते हो?"
"जी, लगान तो सिर्फ पच्चीस पैसे ही देने पड़ते हैं।"
"सिर्फ पच्चीस पैसे!" बादशाह ने हैरान होकर पूछा। फिर वे सोचने लगे कि ऐसे रसवाले गन्ने के खेत पर तो काफ़ी रुपये लगान लगाना चाहिए। ठीक है, आगरा पहुँचते ही इसका लगान बढ़ा दूँगा।
कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद अकबर ने कहा— "अच्छा भाई, चलने से पहले ज़रा एक लोटा रस और पिला दो।" किसान लोटा लेकर चला गया। उसने एक गन्ना तोड़ा लेकिन इस बार लोटा न भरा।
फिर एक के बाद एक तीन-चार गन्ने तोड़े और उसका रस निकाला, फिर भी लोटा न भरा। अकबर उसका इंतज़ार कर रहे थे। सोच रहे थे— इस बार तो इसने देर कर दी। तभी किसान मुँह लटकाए हुए आया और लोटा बादशाह की तरफ़ बढ़ा दिया। लोटे में थोड़ा-सा रस था।
"अरे! क्या बात है?" इतना कम रस लेकर क्यों आए?
"कुछ नहीं हुज़ूर। अकबर बादशाह की नीयत बिगड़ गई है। उसी का असर है।"
अकबर को लगा जैसे किसी ने उन्हें आसमान से ज़मीन पर पटक दिया हो। आदमी की नीयत में फ़र्क आने से क्या पेड़-पौधों पर भी असर पड़ता है? उन्हें लगा जैसे वह मामूली किसान एक बादशाह को इंसानियत का पाठ पढ़ा रहा है। जहाँ नीयत अच्छी होती है वहाँ बरकत होती है और भंडार भरा रहता है। लालच और छोटापन आदमी को कभी सुखी नहीं बनाते।
अकबर ने कहा— "भाई! तुम जानते हो, मैं कौन हूँ?" किसान संशयपूर्वक बादशाह की ओर देखने लगा। "मैं बादशाह अकबर हूँ।"
किसान ने घबराकर पूछा— "मैंने कोई गलत बात तो नहीं कह दी?"
"नहीं! तुमने मुझे वह बात सिखाई है जो बड़े-बड़े विद्वान गुरु भी अपने शासकों को नहीं सिखा पाते। आज से तुम्हारे खेत का लगान बिलकुल माफ़ किया। जाओ, इस बार लोटा भरकर रस ले आओ।"
किसान फिर से खेत में गया। इस बार फिर से एक ही गन्ने के रस से लोटा भर गया। वह खुश होकर दौड़ा आया। उसने लोटा आगे बढ़ा दिया। अकबर ने रस पिया। फिर पीपल का एक पत्ता उठाकर बोले— "हम इस पर तुम्हें दो गाँव देने का हुक्म लिख रहे हैं। कल आगरा आना और पक्का काग़ज़ लिखवा लेना। तुम्हारे खाने-पीने का इंतज़ाम गाँवों की आमदनी से हो जाएगा।"
किसान ने पीपल का पत्ता रख लिया। अकबर चले गए। किसान काम में लग गया। कुछ देर बाद वह पत्ते की बात भूल ही गया। किसान की बकरी आई और उस पत्ते को खा गई।
जब किसान को उस पत्ते की याद आई तो उसने देखा कि पत्ता अपनी जगह पर नहीं है। वह रोने-चिल्लाने लगा। अब उसे बादशाह कैसे पहचानेंगे? उस पत्ते को देखे बिना गाँव कैसे देंगे? वह ज़ोर-ज़ोर से रोता-चिल्लाता आगरा पहुँचा— "हाय! बकरी दो गाँव खा गई!"
बकरी द्वारा दो गाँव खाने का किस्सा सुनकर अकबर बादशाह किसान के भोलेपन पर बहुत हँसे। उन्होंने फिर से उसे दो गाँव देने का हुक्म लिख कर दिया और जाते-जाते सावधान किया— "इस बार इन गाँवों को बकरी से बचाना।"
सारा दरबार कहकहों से गूँज उठा।