11/06/2025
प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव स्वभाविक हैं। मग़र इतना अधिक दबाव भी न होना चाहिए कि अत्यधिक हतोत्साहित होकर एग्जाम नहीं देंगे तक का फ़ैसला करना पड़े... ये जो आप फॉर्म की संख्या देखकर डर रहे हो न.. उसका दूसरा पक्ष यह है कि इसमें गम्भीर अभ्यर्थियों की संख्या दहाई में है.. बाक़ी बस "ट्राय" करने के लिए फॉर्म भरते है... दहाई के अभ्यर्थी होंगे जिन्होंने अपना पाठ्यक्रम ढंग से 4/5 बार पढा होगा... तो आपको कभी भी लाखों में फॉर्म संख्या देख कर डरना नहीं चाहिए...
आप सोशल मीडिया पर जो निरर्थक बहस देखते हो, ये लोग एग्जाम से पहले कट ऑफ बता देते है... ये लोग पेपर में इतने करेंगे तो ही आपका चयन होगा,जैसा मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते है. कृपया इन चीज़ों से दूर रहे... कोई टारगेट लेके एग्जाम में न जाए... पेपर की प्रकृति और हमारी तैयारी स्वतः तय करती है कि हमें कितने अंक आएंगे... अपना शत प्रतिशत देते जाएं.. अंतिम दिनों में महत्वपूर्ण चीज़ों का रिवीजन कर लो.. और दुनियादारी से दूर रहे तो ही बेहतर...
उलूलजुलुल प्रश्न देखकर,अपनी तैयारी पर संदेह न करें..ऐसे प्रश्न पूरे पेपर में 5 % भी नहीं होंगे.. और कट ऑफ 65%-70% से ऊपर जाती नहीं... तो उस 5% के कारण क्यों दबाव ले रहे, बेहतर है जो बाक़ी भाग है उसको अच्छा कीजिए... पेपर का एक मनोविज्ञान होता है जिसमें 50-60% आसान सवाल होते है... जो आपको हर किताब में मिल जाएंगे... 30-35% मध्यम प्रकार के होते है... ये भी आसानी से मिल जाते है... 5-10% टफ होते है.. हम 5-10% की तैयारी पर जोर देते है, उसको देखकर हतोत्साहित होते है, और उस चक्कर में वो 90% को कहीं न कहीं इग्नोर कर देते है, यही हमारी असफलता का कारण बनता है।
शुभकामनाएं☺️💐