01/08/2021
भारत जैसा विशाल देश जिसकी जनसंख्या 130 करोड़ के लगभग हो गई है वहां हम ओलंपिक के एक या दो मेडल के लिए तरस रहे हैं वही दूसरी ओर सबसे बड़ी जनसंख्या वाला चीन या फिर उत्तर प्रदेश की आधी आबादी वाला देश जापान हो, हर रोज उसके खिलाड़ी मेडल ला रहे हैं। भारत को जनता भी अब दो चार या पांच ओलंपिक मेडल में संतुष्ट दिखती है। सरकारें भी दो चार करोड़ रुपये और कुछ नौकरियां बांट कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है। मगर ऐसा क्या है कि भारत जैसे देश में खेल की प्रतिभाएं आगे नही आ पा रही हैं? हमारे यहां से विश्वस्तरीय खिलाड़ी नही निकल पा रहे..
इसका कारण देखें तो इसके मूल में खिलाड़ी की क्षमता न होकर फेडरेशनों की अयोग्यता है। छोटे स्तर से खिलाड़ी तैयार करने का कोई मैकेनिज्म सरकार के अजेंडे में नही है, जो है वो कागजी खानापूर्ति तक है। सालों से नेता और अधिकारियों की फौज ने फेडरेशन के मुखिया और मलाईदार पदों पर कब्जा जमा कर पूरे सिस्टम को दीमक की तरह चाट लिया है । सरकार के एजेंडे में खेल कभी भी नही रहे हैं। चार पांच साल में कुछ खिलाड़ी अपने संसाधनों या विलक्षण प्रतिभा के बल पर एक दो मेडल ले आते हैं उन्हीं के साथ फोटोबाज़ी करके उन्हें पुरस्कार देते हुए फ़ोटो खिंचवाकर कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है। खिलाड़ियों की नर्सरी कैसे तैयार हो और उसे बेहतर प्रशिक्षण कैसे मिले इस पर व्यापक विमर्श की जरूरत है जिससे सरकारें अब तक भागती रही हैं क्योंकि सभी पार्टियां खेलों के नाम पर मलाई खाने में बराबर की हिस्सेदार हैं।
खैर फिलहाल इतनी विपरीत परिस्थितियों में जो खिलाड़ी देश के लिए मेडल ला रहे हैं देश का नाम रोशन कर रहे हैं वो बधाई के पात्र है। आशा है खेल फेडरेशनों को भी देर सबेर इस मकड़जाल आजादी मिलेगी और भारत का विश्वस्तरीय प्रदर्शन सामने आएगा....