28/06/2015
नमस्ते जी
बलात्कार के कारण व निवारण
(ध्यान से पढिए सोचिए डिलिट न करें)
वैसे दे जाय तो पुरुष का स्त्री के प्रति और
स्त्री पुरुष के प्रति स्वभाविक रूप से आकर्षण
हो ता है, इस प्रकार की घटनाएं होती रही हैं ,
आज भी हो रही है। यहां तक की स्त्री के लिये
बडे बडे युद्ध भी हो रहें हैं । रेडियो,टेलिवीजन,
सामाचार पत्र भी इस प्रकार की घटनाओं को
बढावा दे रहें हैं, दूरदर्शन में नग्न चित्र व
चलचित्रों में दिखाये जाये वाले दृश्य कामुकता
को निमंत्रण देते हैं। हर मनुष्य के दिमाग में यदि
स्वभाविक रूप से ही कामवासना है तो नग्न
चित्र निश्चित रूप से अग्नि में पेट्रोल का काम
कर रहें हैं । हर मनुष्य के दिमाग में काम की
अग्नि विघमान है, जिस अग्नि को फिल्म
अभिनेता व अभिनेत्री हवा दे रहें हैं और वह
अग्नि सामूहिक बलात्कार के रूप में धधक कर
सामने आ रही हैं।
जहॉ गुड होगा वहां मक्खियॉ तो आयेंगी ही।
स्त्री का शरीर गुड सदृश है , यदि शरीर को
ठीक ढंग से ढका नहीं गया तो मक्खी रुपी युवक
गुड रुपी युवती को खाने को दौड पडते हैं।
आज पाश्चात्य संस्कृति में फैशन के कारण
कपडे शरीर को ढकते नहीं बल्कि,शरीर को और
आकर्षित बनाते हैं जो युवकों के लिये आपत्ति
का कारण बन जाता है।
बालात्कार का निवारण विचार ही मनुष्य को
महान बनाते हैं तथा विचार मनुष्य को पतित
बनाते हैं जो कोई भी गलत कार्य होते हैं,वे पहले
मन में आते हैं मनमें सदैव अच्छे विचार ही हों
ऐसी स्थिति बनाना बहुत मुश्किल है। अच्छे
लोगों की संगति ,अच्छे खान पान ,अच्छे कपडे ,
अच्छे साहित्य ,अच्छे चित्र , व्यायाम, आसन
व प्राणायाम का अभ्यास विचारों को अच्छे
बनाते हैं। सहशिक्षा , स्त्रीयों के सम्पर्क में
रहना , उनसे हँसी मजाक करना कामुकता के
विचार को बढावा देते हैं ।
जब कोई युवक किसी युवती को देखता
है तब क्या सोचता है?वह लडकी बहुत ही
सुन्दर है , मेरे योग्य है, चन्द्रमा को
फाडकर निकली है , इसके शरीर के अंग मधु से
बने हैं , इसका स्पर्श करने से स्वर्ग
जैसा सुख मिलेगा । इन्हीं विचारों को बार बार
सोचता है और काम (सेक्स) की अग्नि में जलने
लगता है, जिसके कारण लोग युवती न मिलने पर
आत्महत्या करते हैं कै लोग बलात्कार करते हैं
परन्तु वही युवक यदि मनुष्य शरीर के
वास्तविक स्वरुप पर विचार करें तो निश्चित से
घृणा उत्पन्न हो जाती जैसा की योगशास्त्र के
अन्दर महर्षि व्यास जी मानव शरीर के विषय
में लिखते हैं
स्थानाद्बीजादुपष्टम्भान्निस्यन्दान्निधनादपि ।
कायमाधेयशौचत्वात् पण्डिता ह्रयशुचिं विदुः ।।
१.स्थानात् यह शरीर गर्भाशय तथा योनि से
उत्पन्न हुआ है ,इस लिए शरीर पवित्र नहीं हैं
और न ही इनसे सम्पर्क करने योग्य है जैसा
कि एक बोरी में सारी गंदगी को भरकर एक ऊपर
से सुन्दर पाँलिथीन में लपेट दी जाये यह शरीर
भी वैसा है ।
२. उपष्टम्भात् यह शरीर हड्डी,मांस
,त्वचा , मेद वीर्य ,रक्तादि से बना है । इनमें
से कोई पदार्थ देखने छूने योग्य नहीं हैं ।
४.निःस्यन्दात् आँख ,कान
,नाक,मुंह,मुत्रेन्दिय , और गुदा इन्द्रिय के
द्वारा निरन्तर मल मूत्र ,पसीना निकलते रहते
हैं ।जिससे शरीर अत्यंत दुर्गंधमय हो जाता है ।
यदि इन सबको सोचा जाये तो मनुष्य के शरीर
के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है।
५.निधनादपि यह मनुष्य का शरीर बूढा
और नष्ट भी हो जाता है । कोई इसे छूना नहीं
चाहता मृत्यु के बाद तुरन्त घर से श्मशान ले
जाते हैं। अत:शरीर के प्रति आकर्षित होने की
आवश्कता नहीं।
कायमाधेयशौचत्वात् साफ सफाई ही इस
शरीर का आधार है, यदि धोते पोंछते रहें तो
शरीर की गंदगी ओझल रहती है। साफ सफाई न
करने से गंन्दा व अने रोग उत्पन्न होते हैं।
आयुर्वेद में कहा गया है कि शरीरं
व्याधिमन्दिरम् अर्थात् यह शरीर रोगों का घर है
।
" शौचात्स्वाग्डजुदुप्सा परैरसंसर्गः " जब
मनुष्य होने वाले विकारों को देखकर
बाह्य,आन्तरिक शुद्धि कर लेता है तब मनुष्य
आपने शरीर के प्रति तथा दूसरे के शरीर के
प्रति आकर्षण तथा सम्पर्क समाप्त होजाता
है।
अत:ऋषि मुनियों ने इस शरीर को अपवित्र
कहाहै यदि मनुष्य के वास्तविक स्वरुप पर
विचार करें तो काम (सेक्स) के विचार शिथिल
हो जायेंगे । जिससे लोग बलात्कार आदि जैसे
जघन्य अपराधों से बचा जा सकता है ।
आईए हम सब मिलकर हमारे आस पास होने वाले
बलात्कार जैसे जघन्य कुकृत्यों को रोकें इनके
खिलफ आवाज उठायें तथा अपनी मॉ बहनों को
सुरक्षा प्रदान करें " मातृवश परदारेषु
परद्रव्येषु लोष्ठवत् "अपनी माँ बहनों के समान
दूसरों का समझें और दूसरों के वस्तुओं को
मिट्टी के ढेले के समान समझें तभी बलात्कार
जैसे जघन्य पापों से बचा जा सकता है ।
(ईस लेख को पढकर सभी हिन्दू भाई जरूर प्रति
क्रिया करेंगे ईस मेसेज को आगे भेजिये )