J Krishnamurti Hindi जे कृष्णमूर्ति हिंदी

J Krishnamurti Hindi जे कृष्णमूर्ति हिंदी

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जे कृष्णमूर्ति जी के कोट्स का राजेशा "राजकुमार शर्मा" द्वारा आसान हिन्दी में अनुवाद?

क्या आपको नहीं लगता कि जे कृष्णमूर्ति जी का कहा 'ये सब', हम सब को, हमारी दुनियां को बदल सकता है... तो आपके आसपास,,,, और आपके माध्यम से अन्य सब तक तो यह बातें पता चलनी ही चाहिएं...नहीं?

07/01/2026

शक्ति—ताकत.. आपको वह अहसास देती है, जिसका आपके लिए बहुत ही महत्व है। "शक्ति आपको यह एहसास दिलाती है कि — आप महत्वपूर्ण हैं।"

यह अहसास बड़ा ही मधुर होता है और इसकी मिठास आपको नींद में ले जाती है, सुलाती है। जब आप सुनना बंद कर देते हैं, नहीं सुनते... तो आप आदेश देने लगते हैं। हां खुद को ही।

और जब आप आदेश देते हैं, तो आपको लगता है कि व्यवस्था स्थापित हो गई है,
जबकि वास्तव में "भय ही कार्य कर रहा होता है।"
- जे कृष्णमूर्ति
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“Power gives you the feeling that you matter.
That feeling is sweet, and it is this sweetness that puts you to sleep.
When you no longer listen, you begin to command.
And when you command, you imagine that order has been established,
whereas in fact it is fear that is operating.”
- Jiddu Krishnamurti

29/12/2025

असली मुक्ति
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"यदि मस्तिष्क अपनी सर्वोच्च क्षमता से कार्य नहीं करता, तो वह स्वतंत्र होने में सक्षम नहीं है।
क्योंकि एक सुस्त, सतही, सीमित, संकीर्ण, छोटा मन केवल अपने वातावरण पर प्रतिक्रिया करता है, और उसी प्रतिक्रिया के माध्यम से वह उस वातावरण का दास बन जाता है।
और यहीं से यह पूरा प्रश्न उठता है — स्वयं को वातावरण से मुक्त करने का, और हर प्रकार के प्रभाव, निर्देशन और आग्रह का दास न बनने का।

इसलिए जो बात महत्वपूर्ण है, वह है – पूर्ण रूप से स्वतंत्र होने की भावना की गुणवत्ता।

स्वतंत्रता के दो प्रकार हैं:
पहला – किसी चीज़ से मुक्ति, जो एक प्रतिक्रिया है;
और दूसरा – जो प्रतिक्रिया नहीं है, वह मात्र स्वतंत्र होना है।

किसी चीज़ से मुक्ति एक ऐसा उत्तर है जो हमारी पसंद, स्वभाव, प्रवृत्ति और विभिन्‍न प्रकार की शर्तों (conditioning) पर निर्भर करता है।
जैसे कोई लड़का समाज के विरुद्ध विद्रोह करता है क्योंकि वह स्वतंत्र होना चाहता है;
या कोई पति अपनी पत्नी से स्वतंत्र होना चाहता है, पत्नी पति से;
या क्रोध, ईर्ष्या, जलन, निराशा से मुक्ति चाहता है —
ये सब प्रतिक्रियाएँ हैं।
दी हुई परिस्थितियों पर प्रतिक्रियाएँ — जो आपको स्वतंत्र रूप से, सहजता से कार्य करने से रोकती हैं।

हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता चाहते हैं।
और जहाँ समाज में रीति-रिवाज़, परंपराएँ, आदतें, सामाजिक मूल्य अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं — वहाँ यह स्वतंत्रता नकार दी जाती है; तब विद्रोह होता है।
या अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह होता है।
इस प्रकार, अनगिनत प्रकार के विद्रोह हैं — जो तत्कालीन आवश्यकताओं की प्रतिक्रियाएँ मात्र हैं।
परंतु वास्तव में यह कोई स्वतंत्रता नहीं है, क्योंकि हर प्रतिक्रिया आगे और प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करती है,
जो एक नया वातावरण बनाती हैं, जिनके कारण मन फिर से उस वातावरण का गुलाम बन जाता है।
इस प्रकार बंधनों और विद्रोहों का यह चक्र अनंत रूप से चलता रहता है।

हम उस स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं जो प्रतिक्रिया नहीं है।
जो मन स्वतंत्र है, वह किसी चीज़ का, किसी परिस्थिति का, किसी विशेष रूटीन का दास नहीं है।

यद्यपि वह किसी विशेष कार्य में निपुण हो सकता है, फिर भी उससे बंधा नहीं है।
वह समाज में रहते हुए भी समाज का नहीं है।
और जो मन प्रतिक्षण अपने सारे संचयों, दैनिक प्रतिक्रियाओं से स्वयं को खाली करता रहता है —
केवल वही मन वास्तव में स्वतंत्र होता है।"

— जे. कृष्णमूर्ति
पब्लिक टॉक 3, बॉम्बे (मुंबई), भारत — 16 फ़रवरी 1964
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"If the brain does not function at its highest capacity, it is not capable of being free. Because a dull, shallow, limited, narrow, petty mind merely reacts to its environment, and through that reaction it becomes a slave to that environment. And from this arises the whole problem of extricating oneself from the environment, and not being a slave to every form of influence, direction, urge. So what is important is the quality of feeling to be utterly free.
There are two kinds of freedom: one is the freedom from something, which is a reaction; and the other is not a reaction, it is 'being free'. The freedom from something is a response, depending on our choice, on our character, on our temperament, on various forms of conditioning. Like a boy who is in revolt against society - he wants to be free. Or like a husband who wants to be free from his wife, or a wife from the husband; or free from anger, jealousy, envy, despair. Those are all reactions, responses to given circumstances, which prevent you from functioning freely, easily.
We want personal liberty. And that liberty is denied in a society where the mores, the customs, the habits, the traditions are tremendously important; then there is a revolt. Or there is a revolt against tyranny. So there are various forms of revolt, responses to immediate demands. Really that is not freedom at all, because every reaction breeds further reactions, which create further environment through which the mind becomes a slave again, so there is a constant repetition of revolt, being caught by circumstances, revolt against those circumstances and so on, endlessly.
We are talking of a freedom which is not a reaction. The mind that is free, is not a slave to anything, to any circumstances, to any particular routine; though it is specialized to do a certain functional job, it is not a slave to that, it is not held in that groove; though it lives in society, it is not of society. And a mind that is emptying itself of all the accumulations, of every day reactions, all the time - it is only such a mind that is free.
J. Krishnamurti
Public Talk 3 Bombay (Mumbai), India - 16 February 1964"

20/12/2025

याददाश्त का विज्ञान

संज्ञानात्मक यानि इन्द्रियों से पहचानने वाले विज्ञान में सोचना, तर्क और कल्पना इत्यादि सब स्मृति पर आधारित हैं। याददाश्त ही न हो, संगठित सोच लगभग असंभव मानी जाती है।
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'कल क्या होगा' भी अक्सर अतीत के धाराप्रवाह को याद करके उनके आधार पर नया मानसिक परिदृश्य बनाना है; शोध इसे धारावाहिहक स्मृति से गहरा जुड़ा दिखाते हैं।
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क्या सोचना याद करना ही है?
व्यावहारिक स्तर पर: मन का ज़्यादातर सोचना स्मृतियों की ही गति​विधियां है – यानी स्मृति का ही चलना, तुलना, निर्णय, कल्पना के रूप में बर्ताव, सोचना—विचारना है।
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लेकिन “साधारण याद करना” (जैसे सिर्फ नाम याद आना) और “जटिल सोचना” (तार्किक या सृजनात्मक विचार) दोनों में याददाश्त ही आधार है, पर जटिल सोच में कई स्मृतियाँ मिलकर नया संयोजन बनाती हैं।
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इसलिए संक्षेप में: जो मनोवैज्ञानिक सोच है, वह मुख्य रूप से स्मृति की ही प्रतिक्रिया है; जब स्मृति नहीं है, तो वही कोई पुराना 'विचार' भी काम नहीं आता।

14/12/2025

हममें से अधिकांश की नज़र मरी मृत चीजों पर ही जाती (या अटकी रहती) है- वो चीजें जो चली गई, वो बातें जो गुजर गई। हम उन चीजों को नहीं देख पाते-जो जीवंत जिंदा हैं, सांस ले रहीं, जिनमें हलचल है, जो सक्रिय हैं।

मानव जीवन की असल मूल समस्या The real fundamental problem of human life #krajeysha #rajeysha #change 10/12/2025

असली समस्या यह नहीं है कि समाज को कैसे बदला जाये? हम हमेशा ही 'समाज को बदलने के पीछे ही पड़े रहते हैं'। समाज को बदलने, अच्छा सभ्य, महान समाज बनाने की बातें करते हैं।
असली समस्या या, प्रश्न यह है कि क्या इंसान के (दिल+दिमाग) मन को पूरी तरह बदला जा सकता है? यह असली प्रश्न है। और तब 'समाज' अपने आप ही बदलेगा। ।
प्रकृति या क्रमागत रूप से तो मानव इ​तनी कठिनाईयों के बावजूद विकसित नहीं हुआ
असली प्रश्न या समस्या यही है कि — क्या मनोवैज्ञानिक रूप से इंसान का मन बदल सकता है? क्या मन का विकास हो सकता है? ऊपर ऊपर से ही नहीं, बल्कि भीतर अंदर से, क्या मनौवैज्ञानिक रूप से इंसान पूरी तरह बदल सकता है?

मानव जीवन की असल मूल समस्या The real fundamental problem of human life #krajeysha #rajeysha #change इंसानी जिंदगी की असल समस्याअसली समस्या यह नहीं है कि समाज को कैसे बदला जाये? हम हमेशा ही 'समाज को बदलने के पीछे ही पड....

अंधविश्वासों के परे यथार्थ में जीना Living in reality, free from beliefs. #krajeysha #krishnamurti 06/12/2025

विश्वासों-अंधविश्वासों के परे जीना - यथार्थ में जीना
विश्वासों के जाल—जंजाल बेड़ियों से मुक्त जीवन, क्या विश्वास और अन्धविश्वास में अंतर है? जो यथार्थ जानता है - उसे विश्वास अविश्वास की क्या आवश्यकता ?

अंधविश्वासों के परे यथार्थ में जीना Living in reality, free from beliefs. #krajeysha #krishnamurti अंधविश्वासों के परे जीना.. यथार्थ में जीना , विश्वासों के जाल—जंजाल बेड़ियों से मुक्त जीवन, क्या विश्वास और अन्धवि.....

एक दूसरे की नजर में हमारी इमेज, सच्चे रिश्तों का अभाव #rajeysha #krajeysha 01/12/2025

मित्रों, मैंने जे कृष्णमूर्ति जी को जितना पढ़ा, सुना, देखा मुझे ऐसा लगा कि काश... जो जे कृष्णमूर्ति जी ने कहा, अक्षरक्ष: वही का वही भाव संप्रेषण हिन्दी में मिल पाता। जो उन्होंने कहना चाहा वही स्पष्ट शुद्ध रूप से उनके हिन्दी अनुवाद, हिन्दी आडियो—वीडियो में मिल पाता।
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ऐसा जो रोजाना की आम जिंदगी से संबंधित होकर समझा जा सके, इसी उद्देश्य से ये यूट्यूब चैनल शुरू किया था। अंग्रेजी वीडियो इसलिए साथ रखे कि प्रमाण रहे कि यही कहा गया। क्या इस तरह के वीडियो बनाना जारी रखें,आप देखना पढ़ना सुनना चाहेंगे?
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या यदि वो जे कृष्णमूर्ति को समझना चाहते हैं तो हिन्दी भाषियों को अंग्रेजी सीख लेनी चाहिए? ...
कमेंट कर अपनी राय दें।

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