Indian Politics and Law

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10/01/2022

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

19/07/2021
18/12/2020

देश में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कानून बनाए जाने की मांग समय-समय पर उठती रही है। इस पर, केंद्र सरकार ने शनिवार को उच्चतम न्यायालय में कहा है कि भारत में किसको कितने बच्चे पैदा करने हैं, यह खुद पति-पत्नी तय करें, इसमें सरकार को जबदरस्ती नहीं करनी चाहिए कि वो निश्चित संख्या में ही बच्चे पैदा करें।

केंद्र ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि भारत देश के लोगों पर जबरन परिवार नियोजन थोपने के साफ तौर पर विरोध में है और निश्चित संख्या में बच्चों को जन्म देने की किसी भी तरह की बाध्यता हानिकारक होगी एवं जनसांख्यिकीय विकार पैदा करेगा।
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13/12/2020

07/12/2020

All about constitution

06/12/2020

विवाह के लिए धर्म परिवर्तन से संबंधित उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में गुरुवार को दो जनहित याचिकाए दायर की गईं। पहली याचिका विशाल ठाकरे, अभय सिंह यादव और प्रणवेश ने दायर की है। इसमें इन कानूनों को असंवैधानिक घोषित करने का अनुरोध करते हुये कहा गया है कि ये संविधान के बुनियादी ढांचे को प्रभावित करते हैं।

इस याचिका में कहा गया है कि विवाह की खातिर धर्म परिवर्तन से संबंधित इन कानूनों को चुनौती देते हुए 'लव जिहाद' शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। याचिका में कहा गया है कि इन दोनों राज्यों के ये कानून लोक नीति और समाज के खिलाफ हैं। याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश-2020 विशेष विवाह कानून, 1954 के प्रावधानों के खिलाफ है।
इस याचिका में कहा गया है कि यह समाज के उस वर्ग के मन में भय पैदा करेगा जो लव जिहाद का हिस्सा नहीं है और जिन्हें आसानी से झूठे मामले में फंसाया जा सकता है। याचिका में दलील दी गई है कि यह अध्यादेश समाज के गलत तत्वों के हाथों का एक हथियार बन सकता है। याचिका में अदालत से इस अध्यादेश को प्रभावी नहीं करने व इसे वापस लेने के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

दूसरी याचिका अधिवक्ता नीरज शुक्ला ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश-2020 के खिलाफ दायर की है। यूपी सरकार ने 24 नवंबर को विवाह की खातिर जबरन या झूठ बोलने के धर्म परिवर्तन के मामलों से निपटने के लिए इसे मंजूर किया था, जिसके तहत दोषी को 10 साल तक की कैद हो सकती है। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने 28 नवंबर को इस अध्यादेश को मंजूरी दी थी।

इस अध्यादेश के तहत महिला का सिर्फ विवाह के लिए ही धर्म परिवर्तन के मामले में विवाह को शून्य घोषित कर दिया जाएगा और जो विवाह के बाद धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं उन्हें इसके लिए जिलाधिकारी के यहां आवेदन करना होगा। एक अधिवक्ता ने बताया कि उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता कानून 2018 में लागू किया गया है। इसका उद्देश्य जबरन, अनावश्यक रूप से प्रभावित करके, धमकी देकर या प्रलोभन अथवा छल से धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध लगाकर धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करना है।

बता दें कि हाल के सप्ताहों में भाजपा शासित राज्यों उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्यप्रदेश ने विवाह की आड़ में हिंदू युवतियों का धर्म परिवर्तन कराने के कथित प्रयासों पर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाने की मंशा जाहिर की थी। पार्टी नेता इस तरह की गतिविधि को अक्सर लव जिहाद बताते हैं।
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06/12/2020

अगर देश की आत्मा का निर्माण गॉंधी जी ने किया,शरीर का निर्माण सरदार पटेल ने किया तो देश की काया में प्राणों का संचार संविधान की बदौलत हुआ ! पुण्यतिथि पर समावेशी विकास के प्रबल पक्षधर, संविधान-निर्माता,सामाजिक न्याय के अग्रदूत भारत रत्न बाबासाहब भीमराव अंबेडकर जी को सादर प्रणाम🙏🏻

05/12/2020

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में उस याचिका का विरोध किया है जिसमें दोषी ठहराए गए नेताओं के आजीवन चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाने की अपील की गई है। मौजूदा नियमों के तहत आपराधिक मामलों में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होने पर सजा की अवधि पूरी होने के छह वर्ष तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी है।
कानून मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा है कि पब्लिक सर्वेंट और राजनेताओं में कोई अंतर नहीं है लेकिन जनप्रतिनिधियों के सर्विस नियम में इस तरह का कोई नियम नहीं है। मंत्रालय ने अपना जवाब भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा संशोधित आवेदन पर दिया है।
आवेदन में कहा गया था कि दोषी राजनेताओं पर भी पब्लिक सर्वेंट की तरह ही नियम लागू होने चाहिए। इसमें कहा गया था कि जिस तरह से आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद पब्लिक सर्वेंट की सेवा आजीवन खत्म कर दी जाती है, उसी तरह का नियम जनप्रतिनिधियों पर भी लागू होना चाहिए।

हलफनामे में कहा गया है कि इस बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन बनाम भारत सरकार के मामले में विचार किया जा चुका है। उस मामले में जनप्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराए जाने के आधार तय किए गए थे।
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04/12/2020

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