Vaidic Kranti

Call Website Contact the school

Vaidic Kranti जय माँ वेदभारती!

क्या वैदिक विज्ञान से दूर भागकर मुक्ति सम्भव है?कारणरूप मूल प्रकृति से परम चेतन सत्ता परमेश्वर ने अपने असीम ज्ञान और बुद...
20/09/2026

क्या वैदिक विज्ञान से दूर भागकर मुक्ति सम्भव है?

कारणरूप मूल प्रकृति से परम चेतन सत्ता परमेश्वर ने अपने असीम ज्ञान और बुद्धिपूर्वक संयोग के द्वारा जिस समग्र व्यवस्था की रचना की है, वह 'सृष्टि' कहलाती है। इस दृश्य-अदृश्य ब्रह्माण्ड के भीतर अथवा इसके परे जो भी जड़-चेतन तत्त्व कभी भी आविर्भूत या उत्पन्न हुआ है, वह अनिवार्य रूप से इसी विशाल सृष्टि का अभिन्न अङ्ग है। वर्तमान में प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता है कि भौतिक सृष्टि के विज्ञान को समझना एक आध्यात्मिक साधक के लिए क्यों आवश्यक है? इसका उत्तर अत्यन्त व्यावहारिक और प्रत्यक्ष है।

कल्पना कीजिए कि यदि कोई मनुष्य अपने परिवार में माता, पिता, भ्राता, भगिनी, पत्नी अथवा सन्तान जैसे मूलभूत सम्बन्धों के यथार्थ स्वरूप को न जाने, तो वह न तो सुचारु रूप से गृहस्थ धर्म का निर्वाह कर सकता है और न ही यह निर्णय कर सकता है कि किसके साथ किस मर्यादा में व्यवहार करना चाहिए। इसी भाँति जो व्यक्ति अपने स्थूल शरीर की संरचना, कार्यप्रणाली और आवश्यकताओं से सर्वथा अनभिज्ञ है, वह कभी भी निरोग, सन्तुष्ट और दीर्घायु नहीं रह सकता। प्रशासनिक स्तर पर यदि किसी जनपद के जिलाधिकारी को यह बोध ही न हो कि उसके प्रशासनिक तन्त्र में कौन-कौन से अधिकारी हैं और जनसाधारण के प्रति उसका क्या उत्तरदायित्व है, तो वह अपने पदीय कर्त्तव्यों का सम्यक् निर्वहन कदापि नहीं कर सकता। बिना मार्ग और वाहन की तकनीक को समझे यात्रा आरम्भ करने वाला अथवा नवीन भवन में विद्युत-संयंत्रों की कार्यविधि जाने बिना उनका अनियन्त्रित उपभोग करने वाला व्यक्ति सदैव प्राणघातक दुर्घटनाओं को आमन्त्रित करता है।

हम इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई पृथक् अथवा स्वतन्त्र सत्ता नहीं हैं। यद्यपि जीवात्मा तत्त्वतः स्वतन्त्र है, किन्तु भौतिक शरीर धारण करते ही वह प्रकृति और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ताने-बाने से प्रत्यक्षतः आबद्ध हो जाती है। हम अपने कक्ष में बैठकर भी केवल उस सीमित स्थान से ही प्रभावित नहीं होते, अपितु बाह्य वायुमण्डल, सौर-विकिरण, आकाशीय तरंगों तथा सम्पूर्ण समष्टि से सतत ऊर्जा का आदान-प्रदान करते हैं। यहाँ तक कि हमारे मन के सूक्ष्म विचार और तरंगें भी सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करती हैं और परिवेश की तरंगों से स्वयं प्रभावित होते हैं। अतः समष्टि के इस विशाल तन्त्र का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है।

अनेक लोगों का यह एकाङ्गी विचार होता है कि मानव-जीवन का चरम लक्ष्य केवल 'ईश्वर-प्राप्ति' है, अतः भौतिक जगत् के प्रपंच को जानने की कोई आवश्यकता नहीं। किन्तु विचारणीय तथ्य यह है कि जब तक हम कार्य-रूप सृष्टि को नहीं समझेंगे, तब तक कारण-रूप परमेश्वर के अस्तित्व और उसकी महिमा का अनुमान कैसे सम्भव होगा? किसी मृत अथवा जीवित व्यक्ति की पहचान करने के लिए हम सीधे आत्मा का साक्षात्कार नहीं करते, अपितु शरीर की गति, श्वास-प्रश्वास, नाड़ी-स्पन्दन, हृदय की धड़कन और मस्तिष्क की सक्रियता रूपी जड़ लक्षणों को देखकर ही चेतन आत्मा की उपस्थिति का निश्चय करते हैं। ठीक इसी प्रकार, कार्य-सृष्टि को देखकर ही उसके रचयिता की सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता का बोध होता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी द्वारा 'सत्यार्थ प्रकाश' में वर्णित पञ्चकोश-विवेक भी वस्तुतः स्थूल से सूक्ष्म सृष्टि को क्रमिक रूप से जानने की ही एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जो वस्तु विकृत अथवा रचित होती है, वह कभी नित्य नहीं हो सकती। यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति सूर्य का आकार केवल कुछ मीटर अथवा किसी भवन जितना माने, तो वह इस विराट् सृष्टि के पीछे कार्य कर रही अनन्त शक्ति की कल्पना भी नहीं कर सकता। जब आधुनिक खगोल-विज्ञान और वैदिक ज्ञान यह स्पष्ट करते हैं कि हमारा सूर्य पृथ्वी से ३,३०,००० गुना भारी है, अन्तरिक्ष में उससे भी करोड़ों गुना विशाल तारे विद्यमान हैं और ऐसी ही अनन्त आकाशगङ्गाओं (गैलेक्सियों) का विस्तार फैला हुआ है, तब जाकर साधक के अन्तःकरण में उस परमेश्वर की असीम सामर्थ्य का वास्तविक विस्मय और श्रद्धाभाव जागृत होता है।

आज अध्यात्म और विज्ञान के मध्य जो कृत्रिम खाई उत्पन्न कर दी गई है, उसका निवारण अनिवार्य है। जब कोई जिज्ञासु 'वैदिक रश्मि सिद्धान्त' के आलोक में सूर्य के आन्तरिक मण्डल की प्रक्रियाओं, परमाणु संरचना तथा इलेक्ट्रॉन एवं सूक्ष्मातिसूक्ष्म मूलकणों के मूल उद्गम का अनुशीलन करता है, तब उसका अध्यात्म कोरे अन्धविश्वास अथवा अहंकार से मुक्त होकर यथार्थ बोध में परिणत हो जाता है। सृष्टि के नियमों को समझे बिना किया गया आध्यात्मिक पाखण्ड व्यक्ति में केवल दम्भ भरता है, जबकि यथार्थ ज्ञान मनुष्य को मर्यादावान् और ईश्वर-भीरु बनाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम और योगेश्वर श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन इसका ज्वलन्त उदाहरण है, जहाँ वे जीव, ईश्वर और प्रकृति इन तीनों अनादि सत्ताओं (त्रैतवाद) के यथार्थ भेद को समझकर प्रत्येक कर्म को समाधि की भाँति पवित्रता से सम्पन्न करते थे।

महर्षि दयानन्द के अनुसार सम्पूर्ण भौतिक और आध्यात्मिक विद्याओं का मूल स्रोत ईश्वरीय ज्ञान 'वेद' है। यदि कोई कहे कि वेदों का उद्देश्य केवल ओंकार-जप और मोक्ष तक सीमित है, तो उसे यह समझना होगा कि मुख्य साध्य की सिद्धि सदैव गौण साधनों के माध्यम से ही होती है। जिस प्रकार भोजन के मुख्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु कृषि-कर्म, जल-सिंचन, फसल काटना, अनाज पीसना और पाक आदि क्रियाओं से होकर गुजरना अनिवार्य है अथवा किसी सुदूर गन्तव्य तक पहुँचने के लिए वाहन रूपी साधन का आश्रय लेना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति रूपी साधन के विज्ञान को जाने बिना साध्य-स्वरूप ईश्वर का साक्षात्कार असम्भव है।

महर्षि व्यास ने लगभग ५००० वर्ष पूर्व 'ब्रह्मसूत्र' के समन्वय-सिद्धान्त में यह स्पष्ट प्रतिपादित किया था कि जैसा नियम सृष्टि में दृष्टिगोचर होता है, वैसा ही सत्य वेदों में वर्णित है, क्योंकि दोनों का कर्त्ता एक ही सर्वज्ञ ईश्वर है। सृष्टि को जाने बिना वेद के मन्त्रों का और वेद को जाने बिना सृष्टि के गूढ़ रहस्यों का यथार्थ उद्घाटन नहीं हो सकता। प्राचीन काल में हमारे ऋषियों और तत्कालीन समाज के पास जो उन्नत प्रौद्योगिकी थी, वह पर्यावरण और प्रकृति के साथ पूर्णतः अनुकूल थी। इसके विपरीत, आज सृष्टि के आधे-अधूरे भौतिक ज्ञान पर आधारित अनियन्त्रित आधुनिक तकनीक ने सम्पूर्ण धरा को विनाश और प्रदूषण के कगार पर ला खड़ा किया है। यदि आध्यात्मिक समाज लौकिक विज्ञान से सर्वथा विमुख होकर केवल पलायनवादी बन जाएगा, तो वह भौतिक आवश्यकताओं के लिए सदैव इन्हीं विनाशकारी तकनीकों पर पराश्रित रहेगा। प्राचीन व्यवस्था में कृषि और वाणिज्य करने वाले वैश्य भी वेदों के प्रकाण्ड ज्ञाता होते थे, जिससे उनका उत्पादन पर्यावरण के सन्तुलन को नष्ट किए बिना सम्पूर्ण समाज का पोषण करता था।

ईशावास्योपनिषद् का अमर उद्घोष— "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्" स्पष्ट करता है कि इस गतिमान् ब्रह्माण्ड का कण-कण परमेश्वर की सर्वव्यापक सत्ता से ओतप्रोत है। प्रकृति, मन, प्राण, इन्द्रियाँ और पञ्चमहाभूत उसी की व्यवस्था के अंग हैं। 'वैशेषिक दर्शन' भी धर्म की व्याख्या करते हुए अभ्युदय (लौकिक उन्नति/भौतिक विज्ञान) और निःश्रेयस (आध्यात्मिक मुक्ति) दोनों को मोक्ष की अनिवार्य सीढ़ियाँ स्वीकार करता है। 'ब्रह्मसूत्र' का प्रथम सूत्र "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" के अनन्तर ही दूसरा सूत्र "जन्माद्यस्य यतः" आता है, जो यह घोषणा करता है कि ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा रखने वाले को सर्वप्रथम इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के विज्ञान को समझना होगा।

यही कारण है कि जब महर्षि ब्रह्मा के निर्देश पर महर्षियों ने भगवान् मनु से वर्णाश्रम-धर्म और मानव-कर्त्तव्यों का उपदेश देने की प्रार्थना की, तब भगवान् मनु ने उपदेश का आरम्भ सीधे नियमों से न करके, सृष्टि की उस मूल अव्यक्त, 'अतर्क्यम्' और महाप्रलय की अवस्था से किया जहाँ सम्पूर्ण प्रकृति सुषुप्तावस्था में थी। उन्होंने भवन की छत देखने से पूर्व उसकी नींव (मूल प्रकृति) को उद्घाटित किया। चारों वेदों में समाहित मन्त्र "विष्णोः कर्माणि पश्यत" मानव-जाति को यही सन्देश देता है कि उस सर्वव्यापक परमात्मा के सृष्टि-रूपी विराट् कर्मों को देखो, समझो और अनुभव करो कि वह किस प्रकार गैलेक्सियों को धारण किए हुए है और किस प्रकार वनस्पतियों की एक-एक कोशिका में रस का संचरण कर रहा है। उस परम शिल्पी की रचना को देखकर ही मनुष्य को अपने कर्मों को श्रेष्ठता और दक्षता से करने की प्रेरणा प्राप्त होती है।

ईश्वर के 'सर्वशक्तिमान्', 'सर्वज्ञ', 'सर्वव्यापक' और 'निर्लेप' जैसे अनन्त विशेषणों की यथार्थ व्याख्या सृष्टि के सन्दर्भ के बिना असम्भव है। जिस प्रकार किसी यन्त्र (जैसे मोबाइल) की व्यवस्थित कार्यप्रणाली को देखकर उसके निर्माता की बुद्धिमत्ता अकाट्य रूप से सिद्ध होती है, उसी प्रकार इस सुव्यवस्थित ब्रह्माण्ड को देखकर ही किसी नास्तिक को भी सृष्टिकर्त्ता के अस्तित्व का बोध कराया जा सकता है। जब एक साधक ध्यान की गहन अवस्था में उतरकर अपने शरीर के प्रत्येक परमाणु, तन्मात्राओं और वैदिक रश्मियों में 'ओ३म्' की अनुगूँज और परमात्मा की सर्वव्यापकता का साक्षात् अनुभव करता है, तब उसका सम्पूर्ण अंहकार समाप्त हो जाता है और जीवन में सत्य, अहिंसा तथा करुणा का वास्तविक प्रादुर्भाव होता है।

जैसे केवल एक पहिये पर कोई रथ अथवा बैलगाड़ी अग्रसर नहीं हो सकती, उसी प्रकार केवल भौतिकवादी विज्ञान अथवा केवल पलायनवादी अध्यात्म के एकाङ्गी मार्ग पर चलकर मानव-सभ्यता सुरक्षित नहीं रह सकती। दोनों ही स्थितियाँ विनाशकारी अन्धकार की ओर ले जाती हैं। सन्तुलित और सार्थक जीवन का एकमात्र मार्ग यही है कि हमारे एक हाथ में 'अपरा विद्या' (सृष्टि का भौतिक विज्ञान) हो और दूसरे हाथ में 'परा विद्या' (परमात्मा का आध्यात्मिक ज्ञान)। सृष्टि के समस्त जड़-चेतन संसाधनों का दोहन अथवा शोषण न करके, उनका यज्ञीय भावना से सदुपयोग करना और सम्पूर्ण प्राणिमात्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए समष्टि को एक परिवार के रूप में देखना ही मनुष्य का शाश्वत धर्म है।

–आचार्य अग्निव्रत
🌐 https://vaidicphysics.org

যে রোগী চিকিৎসকের কথা মেনে পথ্য অনুসরণ করে এবং নিয়মমাফিক ঔষধ সেবন করে, তার চিকিৎসা করা সহজ। যে পথ্য পালনে শিথিলতা করে, ...
20/09/2026

যে রোগী চিকিৎসকের কথা মেনে পথ্য অনুসরণ করে এবং নিয়মমাফিক ঔষধ সেবন করে, তার চিকিৎসা করা সহজ। যে পথ্য পালনে শিথিলতা করে, কিন্তু রোগকে রোগ বলেই বোঝে, তারও চিকিৎসা হওয়ার কিছু সম্ভাবনা থাকে। কিন্তু যে রোগকেই ঔষধ মনে করে নেয়, তাকে পরমাত্মাও সুস্থ করতে পারেন না।

🔥 नियोग का असली रहस्य क्या है? सत्यार्थ प्रकाश पर इतना आक्रमण क्यों?क्या आपने कभी इसके मूल सत्य को जानने का प्रयास किया?...
19/09/2026

🔥 नियोग का असली रहस्य क्या है? सत्यार्थ प्रकाश पर इतना आक्रमण क्यों?

क्या आपने कभी इसके मूल सत्य को जानने का प्रयास किया? 🤔

▶️ पूरी चर्चा देखिए और स्वयं निर्णय कीजिए।

वेदार्थ विज्ञानम् अध्याय २ । खंड १आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक ‎'निर्वचन' पद का क्या अर्थ होता है? ‎‎पण्डित भगवद्दत्त रिसर्च...
19/09/2026

वेदार्थ विज्ञानम्
अध्याय २ । खंड १
आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

‎'निर्वचन' पद का क्या अर्थ होता है?
‎
‎पण्डित भगवद्दत्त रिसर्च स्कॉलर ने अपने निरुक्त भाष्य में आचार्य दुर्ग को उद्धृत करते हुए लिखा है—
‎
‎​"अपिहितस्य अर्थस्य परोक्षवृत्तौ अतिपरोक्षवृत्तौ वा शब्दे निष्कृष्य विगृह्य वचनं निर्वचनम् "

अर्थात् शब्द में छिपे हुए अर्थ के परोक्षवृत्ति अथवा अतिपरोक्षवृत्ति होने पर खींचकर अथवा तोड़कर जो वचन हो, वह 'निर्वचन' होता है।
‎
‎​यहाँ 'अर्थ' शब्द से पदार्थ के ग्रहण के हेतु प्रमाण रूप में पण्डित भगवद्दत्त ने न्यायदर्शन के सूत्र 'इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नम्...' को उद्धृत किया है। हम पण्डित भगवद्दत्त के मत से पूर्णतः सहमत हैं।
‎
‎ इस सृष्टि में जो-जो पदार्थ जब-जब उत्पन्न हो रहा होता है, उस-उस समय उस-उस पदार्थ का वाचक शब्द भी कम्पन के रूप में उत्पन्न होता है। यह कम्पन मनस्तत्त्व में भी हो सकता है और आकाश महाभूत (स्पेस) में भी। वेद मन्त्रों के सृष्टि प्रक्रिया पर होने वाले प्रभावों के विषय में हम अपने ग्रन्थ 'वेदविज्ञान-आलोकः' में प्रकाश डाल चुके हैं, जहाँ शब्द और अर्थ किंवा उसके वाचक पदार्थ के नित्य सम्बन्ध को स्पष्ट किया गया है।
‎
‎ किसी पद का निर्वचन अर्थ अर्थात् उस शब्द के वाच्य रूप के स्वरूप की व्याख्या करता है, उसकी उत्पत्ति व क्रियाविज्ञान की व्याख्या करता है, उसके गुणों को भी प्रकाशित करता है। पदार्थ की उत्पत्ति के समय की वह प्रक्रिया, जिसमें उस पदार्थ का निर्माण विशेष छान्दस तरंगों से होता है, जिनके अन्दर उस पदार्थ के वाचकरूप पद विद्यमान होते हैं, निर्वचन कहाती है। पण्डित भगवद्दत्त का यह उपर्युक्त मत उचित है और हमारा वैदिक रश्मि सिद्धान्त (वास्तव में ऋषियों का) इस विज्ञान की व्यापक व पूर्ण ​व्याख्या करता है।
‎
‎ हमारी दृष्टि में किसी पदार्थ में उस पदार्थ के वाचकरूप पद अति सूक्ष्म रश्मियों के रूप में न केवल विद्यमान रहते हैं, अपितु उस पदार्थ में से सदैव निर्गत भी होते रहते हैं और उत्पन्न भी होते रहते हैं।
‎
‎​जहाँ तक आचार्य दुर्ग के मत का प्रश्न है, तो उस विषय में हमारा मत है कि वैदिक पदों के अन्दर उनके अर्थ अर्थात् वाच्यरूप पदार्थ का स्वरूप परोक्ष वा अतिपरोक्ष रूप में ही विद्यमान रहता है, प्रत्यक्ष नहीं। जब प्रतिभाशाली निर्वचनकर्त्ता उस पद का निर्वचन करता है, तब वह अपनी दिव्य ऊहा व तर्क की विलक्षण क्षमता के द्वारा उस पद के अर्थ, जो उस पद के अन्दर ही छुपा रहता है, को बाहर निकालकर उस वाच्यरूप पदार्थ के स्वरूप का यथोचित उद्घाटन करता है। इसी प्रक्रिया को निर्वचन कहा जाता है।
‎
‎विभिन्न पदों के परोक्ष वा अतिपरोक्ष होने के कारण ही निर्वचन प्रक्रिया के छः मौलिक सिद्धान्त हैं, जिनका प्रत्येक निर्वचनकर्त्ता विद्वान् को ध्यान रखना होता है। ये सिद्धान्त इस शास्त्र के प्राणभूत हैं, इस कारण प्रत्येक पाठक को चाहिए कि इन सिद्धान्तों को गम्भीरता से समझ ले, अन्यथा निरुक्त शास्त्र का प्रयोजन समझ नहीं आयेगा।

Support us:
‎1. PhonePe - 9829148400
‎2. UPI - 9829148400@upi
‎3. https://donate.vaidicphysics.org/
‎(Your contribution are eligible for upto 50% tax benefit under section 80G as SHRI VAIDIC SWASTI PANTHA NYAS is registered as NON PROFIT ORGANIZATION. )
‎
‎📚 आचार्य जी द्वारा लिखित पुस्तकें खरीदें–
‎https://shop.thevedscience.com/
‎
‎☎️ Ph. 9829148400
‎📥 E-mail: [email protected]
‎🌐 Website: https://vaidicphysics.org/
‎
‎

“বৈদিক সংস্কৃতি ছাড়া বিশ্বের আর কোন সভ্যতা ও ধর্ম আছে, যা সমগ্র মানবজাতিকে একটি পরিবারের মতো বসবাস করার শিক্ষা দেয়?”  ...
18/09/2026

“বৈদিক সংস্কৃতি ছাড়া বিশ্বের আর কোন সভ্যতা ও ধর্ম আছে, যা সমগ্র মানবজাতিকে একটি পরিবারের মতো বসবাস করার শিক্ষা দেয়?”

দুর্বল, অযোগ্য ও অস্থির নেতৃত্ব রাষ্ট্রের জন্য একইভাবে ক্ষতিকর, যেভাবে প্লাস্টিকের পাত্র এবং তার বর্জ্য স্বাস্থ্য ও পরিব...
17/09/2026

দুর্বল, অযোগ্য ও অস্থির নেতৃত্ব রাষ্ট্রের জন্য একইভাবে ক্ষতিকর, যেভাবে প্লাস্টিকের পাত্র এবং তার বর্জ্য স্বাস্থ্য ও পরিবেশের জন্য ক্ষতিকর।

বেদার্থ বিজ্ঞানম্ অধ্যায় -১। খন্ড -৪আচার্য অগ্নিব্রত নৈষ্ঠিক আচার্য কাকে বলে?‎‎​এই বিষয়ে মহর্ষি যাস্ক নিরুক্তে বলেছেন:-...
16/09/2026

বেদার্থ বিজ্ঞানম্
অধ্যায় -১। খন্ড -৪
আচার্য অগ্নিব্রত নৈষ্ঠিক

আচার্য কাকে বলে?
‎
‎​এই বিষয়ে মহর্ষি যাস্ক নিরুক্তে বলেছেন:- "আচার্যঃ কস্মাৎ। আচার্য আচারম্ গ্রাহয়তি। আচিনোত্যর্থান্। আচিনোতি বুদ্ধিমিতি বা।"
‎
‎​এই বিষয়ে বলা হয়েছে, যে ব্যক্তি নিজের শিষ্যকে সদাচারণ করতে শেখান, বিভিন্ন শাস্ত্র থেকে নানা প্রকার অর্থ গ্রহণ বা সঞ্চয় করেন এবং নিজের শিষ্যের মস্তিষ্কে সেই নানা অর্থ বোধগম্য করিয়ে দেন। এর সাথে সাথে তিনি বুদ্ধির সঞ্চয় করেন, অর্থাৎ মেধার বিকাশ ঘটান। নিজের শিষ্যকে নিরন্তর বুদ্ধিমান করে তোলেন। এমন যোগ্য ও মহান ব্যক্তিকেই আচার্য বলা হয়।
‎
‎​প্রায় একই প্রকার আলোচনা অন্যান্য আর্ষ (ঋষিপ্রণীত) গ্রন্থেও করা হয়েছে—
‎"আচার্যো ব্রহ্মচারিণঃ প্রজাপতিঃ" (কাঠ.সংক.৫১.৬, ১৩৮.২৩) অর্থাৎ, আচার্য তাঁর প্রজারূপ ব্রহ্মচারীদের পালক এবং সংরক্ষক হন।
‎
‎​এই কারণেই অন্যত্র বলা হয়েছে—
‎"আচার্যদেবো ভব।" (তৈ.আ.৭.১১.২; তৈ.উ.১.১১.২) অর্থাৎ, আচার্য নিজের শিষ্যদের মস্তিষ্কে শাস্ত্রের নানা অর্থ আলোকিত বা প্রকাশিত করে থাকেন।

Support us:
‎1. PhonePe - 9829148400
‎2. UPI - 9829148400@upi
‎3. https://donate.vaidicphysics.org/
‎(Your contribution are eligible for upto 50% tax benefit under section 80G as SHRI VAIDIC SWASTI PANTHA NYAS is registered as NON PROFIT ORGANIZATION. )
‎
‎📚 आचार्य जी द्वारा लिखित पुस्तकें खरीदें–
‎https://shop.thevedscience.com/
‎
‎☎️ Ph. 9829148400
‎📥 E-mail: [email protected]
‎🌐 Website: https://vaidicphysics.org/

প্রযুক্তি ওষুধের মতো, এটি ব্যবহার না করলে হয়তো জীবনযাপন সম্ভব; কিন্তু এর অপব্যবহার হলে ধ্বংস নিশ্চিত।​তাই বিজ্ঞান ও প্রয...
15/09/2026

প্রযুক্তি ওষুধের মতো, এটি ব্যবহার না করলে হয়তো জীবনযাপন সম্ভব; কিন্তু এর অপব্যবহার হলে ধ্বংস নিশ্চিত।
​তাই বিজ্ঞান ও প্রযুক্তির মধ্যেকার পার্থক্যের জ্ঞান থাকা প্রয়োজন।

वेदार्थ-विज्ञानम्अध्याय ३। खण्ड ९आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक १२२ नाम गत्यर्थक (गति वाचक) धातुओं :-​वर्त्तते। अयते। लोटते। ल...
14/09/2026

वेदार्थ-विज्ञानम्
अध्याय ३। खण्ड ९
आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

१२२ नाम गत्यर्थक (गति वाचक) धातुओं :-

​वर्त्तते। अयते। लोटते। लोठते। स्यन्दते। कसति। सर्पति। स्यमति। स्रवति। स्रंसति। अवति। श्चौतति। ध्वंसति। वेनति। मार्ष्टि। भुरण्यति। शवति। कालयति। पेलयति। कण्टति। पिस्यति। विस्यति। मिस्यति। प्रवते। प्लवते। च्यवते। कवते। गवते। नवते। क्षोदति। नक्षति। सक्षति। म्यक्षति। सचति। ऋच्छति। तुरीयति। चतति। अतति। गाति। इयक्षति। सश्चति। त्सरति। रंहति। यतते। भ्रमति। ध्रजति। रजति। लजति। क्षियति। धमति। मिनाति। ऋण्वति। ऋणोति। स्वरति। सिसर्त्ति। विषिष्टि। योषिष्टि। रिणाति। रीयते। रेजति। दध्यति। दभ्रोति। युध्यति। धन्वति। अरुषति। आर्याति। सीयते। तकति। दीयति। ईषति। फणति। हनति। अर्दति। मर्दति। सर्सृते। नसते। हर्यति। इयर्त्ति। ईर्त्ते। ईङ्खति। ज्रयति। श्वात्रति। गन्ति। आगनीगन्ति। जगन्ति। जिन्वति। जसति। गमति। ध्रति। ध्राति। ध्रयति। वहते। रथर्यति। जेहते। ष्व:कति। क्षुम्पति। प्साति। वाति। याति। इषति। द्राति। द्रूळति। एजति। जमति। जवति। वञ्चति। अनिति। पवते। हन्ति। सेधति। अगन्। अजगन्। जिगाति। पतति। इन्वति। द्रमति। द्रवति। वेति। हयन्तात्। एति। जगायात्। अयथुः।

​गति किसी भी पदार्थ का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कर्म है। इसके अभाव में सृष्टि उत्पत्ति, संचालन और प्रलय कुछ भी सम्भव नहीं है। हम अपने दैनिक जीवन में जड़ एवं चेतन पदार्थों की नाना प्रकार की गतियाँ देखते हैं। हम यह भी अनुभव करते हैं कि सभी प्रकार के पदार्थों की गतियाँ समान प्रकार की नहीं होतीं। वेद में सृष्टि के विभिन्न पदार्थों और उनकी गतियों का वर्णन है और वे गतियाँ भिन्न-२ प्रकार की होती हैं। इस कारण वेद में गति अर्थ वाली अनेक धातुओं का वर्णन है। उन्हीं धातुओं का ग्रन्थकार ने निघण्टु में ​संग्रह किया है, जिनकी संख्या १२२ है। अगर ये गतियाँ समान प्रकार की होतीं, तो सर्वत्र एक ही धातु का प्रयोग मिलता, परन्तु ऐसा नहीं है। इन सभी धातुओं के अर्थों में अर्थात् १२२ प्रकार की गतियों के स्वरूप में परस्पर भेद दर्शाना अति दुष्कर कार्य है। गति के भिन्न-२ स्वरूपों को आँखों से देखकर अनुभव करना तो सहज है, परन्तु उनको वाणी अथवा लेखनी के द्वारा व्यक्त करना उसी प्रकार कठिन है, जैसे मधु एवं शक्कर की मिठास के भेद को लेखनी अथवा वाणी से व्यक्त करना दुष्कर वा असम्भव है, परन्तु चखकर उनके भेद को बता देना अन्धे व्यक्ति के लिए भी सर्वथा सहज है। इन गतियों के स्वरूप को स्पष्ट जानना तभी सम्भव है, जब हम इन गतियों के कर्त्ता को जानते हों। इसके लिए हमें वेदों में इस बात का अन्वेषण करना होगा कि गत्यर्थक किसी धातु का प्रयोग किस कर्त्ता के साथ हुआ है और उस कर्त्ता के स्वरूप को जानकर ही हम उस गति के स्वरूप को जान सकते हैं। इसके साथ यह भी विचारणीय विषय है कि वेद में वर्णित सभी पदार्थों और उनकी गतियों को हम इस ब्रह्माण्ड में कैसे देख वा अनुभव कर सकते हैं?

​हम लोक में अनेक प्रकार की गतियों जैसे- कदम बढ़ाकर मनुष्य की भाँति चलना, पक्षियों की भाँति उड़ना, साँप की भाँति सरकना, रेंगने वाले जन्तुओं की भाँति रेंगना, किसी पात्र से पानी का रिसना, नदियों के जल या हवा की भाँति बहना, आकाश में लोकों की भाँति चक्रण एवं परिक्रमण करना, विद्युत् तरंगों की भाँति संचरित होना, हिंसक रश्मियों की भाँति विध्वंसकारी गमन करना, मधुमक्खियों की भाँति भिनभिनाना, लेट कर चलना, फिसलना, किसी बल की ओर आकृष्ट होकर गमन करना, बाधक पदार्थों को नष्ट करते हुए आगे बढ़ना, एक ही स्थान पर घूर्णन करना, पानी में तैरना, मेंढक की भाँति कूद-कूद कर चलना, वानर की भाँति उछलना, धीरे-धीरे हिलना, एक-दूसरे से संसर्ग करना, किसी पदार्थ के अन्दर व्याप्त हो जाना, इधर-उधर भटकना, कम्पन करते हुए चलना, अकस्मात् विस्फोटक गति से चलना, सब ओर फैलना, टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलना, तेजी से अकस्मात् भाग जाना। इसी प्रकार अनेक प्रकार की गतियाँ इस ब्रह्माण्ड में विद्यमान हैं।

‎Support us:
‎1. PhonePe - 9829148400
‎2. UPI - 9829148400@upi
‎3. https://donate.vaidicphysics.org/
‎(Your contribution are eligible for upto 50% tax benefit under section 80G as SHRI VAIDIC SWASTI PANTHA NYAS is registered as NON PROFIT ORGANIZATION. )
‎
‎📚 आचार्य जी द्वारा लिखित पुस्तकें खरीदें–
‎https://shop.thevedscience.com/
‎
‎☎️ Ph. 9829148400
‎📥 E-mail: [email protected]
‎🌐 Website: https://vaidicphysics.org/
‎

Address

Vaidic Physics
Bhinmal
343029

Opening Hours

Monday 9am - 5pm
Tuesday 9am - 5pm
Wednesday 9am - 5pm
Thursday 9am - 5pm
Friday 9am - 5pm
Saturday 9am - 5pm

Telephone

+918003756240

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Vaidic Kranti posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The School

Send a message to Vaidic Kranti:

Shortcuts

Share

Category