23/09/2026
स्वर्ग में लाखों वर्ष भोगने के बाद जीव धरती पर कैसे गिरता है? क्या हमारा यह सांसारिक जीवन ही वास्तव में 'भौम नरक' है? और मृत्यु के बाद जब शरीर जलकर राख हो जाता है, तो जीव नए गर्भ में कैसे प्रवेश करता है? जानिए महाभारत का वह गूढ़ संवाद, जिसमें राजा ययाति ने खोले जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के सबसे बड़े रहस्य.
अष्टकने पूछा — सत्ययुग के निष्पाप राजाओं में प्रधान नरेश! जब आप इच्छानुसार रूप धारण करके दस लाख वर्षों तक नन्दनवन में निवास कर चुके हैं, तब क्या कारण है कि आप उसे छोड़कर भूतल पर चले आये?
ययाति बोले — जैसे इस लोक में जाति-भाई, सुहृद् अथवा स्वजन कोई भी क्यों न हो, धन नष्ट हो जाने पर उसे सब मनुष्य त्याग देते हैं, उसी प्रकार स्वर्गलोक में जिसका पुण्य समाप्त हो जाता है, उस मनुष्य को देवराज इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता तुरंत त्याग देते हैं।
अष्टक ने पूछा — देवलोक में मनुष्यों के पुण्य कैसे क्षीण होते हैं? इस विषयमें मेरा मन अत्यन्त मोहित हो रहा है। प्रजापतिका वह कौन-सा धाम है, जिसमें विशिष्ट अपुनरावृत्तिकी योग्यतावाले पुरुष जाते हैं? यह बताइये; क्योंकि आप मुझे ज्ञानी जान पड़ते हैं।
ययाति बोले — नरदेव! जो अपने मुख से अपने पुण्य कर्मों का बखान करते हैं, वे सभी इस भौम नरक में आ गिरते हैं। यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदि के खाने योग्य इस शरीर के लिये पृथ्वी पर पुत्र-पौत्रादिरूप से बहुधा विस्तार को प्राप्त होते हैं। इसलिये नरेन्द्र! इस लोक में जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो, उसे सर्वथा त्याग देना चाहिये। भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया; बोलो, अब तुम्हें क्या बताऊँ।
अष्टकने पूछा — जब मनुष्यों को मृत्युके पश्चात् पक्षी, गीध, मयूर और पतङ्ग — ये नोच-नोचकर खा लेते हैं तब वे कैसे और किस रूप में उत्पन्न होते हैं? आज मैं आपके ही मुख से प्रथम बार भौम नरकका जिसे कभी नहीं सुना था नाम सुन रहा हूँ।
ययाति बोले — कर्म से उत्पन्न होने और बढ़ने वाले शरीर को पाकर गर्भसे निकलने के पश्चात् जीव सबके समक्ष इस पृथ्वी पर विषयों में विचरते हैं। उनका यह विचरण ही भौम नरक कहा गया है। इसी में वे पड़ते हैं। इसमें पड़ने पर वे व्यर्थ बीतने वाले अनेक वर्ष समूहों की ओर दृष्टिपात नहीं करते। कितने ही प्राणी स्वर्गादि लोकों में साठ हजार वर्ष रहते हैं। कुछ अस्सी हजार वर्षों तक वहाँ निवास करते हैं। इसके बाद वे भूमि पर गिरते हैं। यहाँ उन गिरने वाले जीवों को तीखी दाढ़ों वाले पृथ्वी के भयानक राक्षस दुष्ट प्राणी अत्यन्त पीड़ा देते हैं।
अष्टक ने पूछा — तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वी के भयंकर राक्षस पापवश आकाश से गिरते हुए जिन जीवों को सताते हैं, वे गिरकर कैसे जीवित रहते हैं? किस प्रकार इन्द्रिय आदि से युक्त होते हैं? और गर्भ में कैसे आते हैं?
ययाति बोले — अन्तरिक्ष से गिरा हुआ प्राणी असृक् यानी रक्त होता है। फिर वही क्रमशः नूतन शरीर का बीजभूत वीर्य बन जाता है। फिर वह पुष्प के रस से संयुक्त होकर कर्मानुरूप योनि का अनुसरण करता है। गर्भाधान करने वाले पुरुष के द्वारा स्त्रीसंसर्ग होने पर वीर्य में आविष्ट हुआ वह जीव उस स्त्री के रज से मिल जाता है। तदनन्तर वही गर्भरूप में परिणत हो जाता है। जीव जलरूप से गिरकर वनस्पतियों और ओषधियों में प्रवेश करते हैं तथा जल, वायु, पृथ्वी और अन्तरिक्ष आदि में प्रवेश करते हुए कर्मानुसार पशु अथवा मनुष्य सब कुछ होते हैं। इस प्रकार वे भूमि पर आकर फिर पूर्वोक्त क्रम के अनुसार गर्भभाव को प्राप्त होते हैं।
अष्टकने पूछा — राजन्! इस मनुष्य योनि में आने वाला जीव अपने इसी शरीर से गर्भ में आता है या दूसरा शरीर धारण करता है? आप यह रहस्य मुझे बताइये। मैं संशय होने के कारण पूछता हूँ। गर्भ में आने पर वह भिन्न-भिन्न शरीर रूपी आश्रय को, आँख और कान आदि इन्द्रियों को तथा चेतना को भी कैसे उपलब्ध करता है? मेरे पूछने पर ये सब बातें आप बताइये। तात! हम सब लोग आपको क्षेत्रज्ञ यानी आत्मज्ञानी मानते हैं।
ययाति बोले — ऋतुकाल में पुष्परस से संयुक्त वीर्य को वायु गर्भाशय में खींच लेता है और वह वहाँ उस पर अधिकार जमाकर क्रमशः गर्भ की वृद्धि करता रहता है। वह गर्भ बढ़कर जब सम्पूर्ण अवयवों से सम्पन्न हो जाता है तब चेतना का आश्रय ले योनि से बाहर निकलकर मनुष्य कहलाता है। वह कानों से शब्द सुनता है, आँखों से रूप देखता है, नासिका से गन्ध लेता है, जिह्वा से रस का आस्वादन करता है, त्वचा से स्पर्श और मन से आन्तरिक भावों का अनुभव करता है। अष्टक! इस प्रकार महान् आत्मबल से सम्पन्न प्राणधारियों के शरीर में जीव की स्थापना होती है।
अष्टक ने पूछा — जो मनुष्य मर जाता है, वह जलाया जाता है या गाड़ दिया जाता है अथवा जल में बहा दिया जाता है। इस प्रकार विनाश होकर स्थूल शरीर का अभाव हो जाता है। फिर वह चेतन जीवात्मा किस शरीर के आधा रपर रहकर चैतन्ययुक्त व्यवहार करता है?
ययाति बोले — राजसिंह! जैसे मनुष्य श्वास लेते हुए प्राणयुक्त स्थूल शरीरको छोड़कर स्वप्नमें विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन जीवात्मा अस्फुट शब्दोच्चारणके साथ इस मृतक स्थूल शरीर को त्यागकर सूक्ष्म शरीर से संयुक्त होता है और फिर पुण्य अथवा पाप को आगे रखकर उसी पुण्य-पाप के अनुसार अन्य योनि को प्राप्त होता है। पुण्य करने वाले मनुष्य पुण्य-योनि में और पाप करने वाले मनुष्य पाप-योनि में जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव कीट-पतङ्ग आदि होते हैं। महानुभाव! इन सब विषयों को विस्तार के साथ कहने की इच्छा नहीं होती।
नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जीव गर्भ में आकर चार पैरवाले चतुष्पाद, दो पैरवाले मनुष्यादि और पक्षियों के रूपमें उत्पन्न होते हैं। यह सब मैंने पूरा-पूरा बतला दिया। अब और क्या पूछना चाहते हो?
अष्टक ने पूछा — तात! मनुष्य कौन-सा कर्म करके उत्तम यश प्राप्त करता है? वह यश तपसे प्राप्त होता है या विद्या से? मैं यही पूछता हूँ। जिस कर्म के द्वारा क्रमशः श्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति हो सके, वह सब यथार्थरूप से बताइये।
ययाति बोले — राजन्! साधु पुरुष स्वर्गलोक के सात महान् दरवाजे बतलाते हैं, जिनसे प्राणी उसमें प्रवेश करते हैं। उनके नाम ये हैं — तप, दान, शम, दम, लज्जा, सरलता और समस्त प्राणियों के प्रति दया। वे तप आदि द्वार सदा ही पुरुषके अभिमानरूप तम से आच्छादित होने पर नष्ट हो जाते हैं, यह संत पुरुषों का कथन है। जो वेदोंका अध्ययन करके अपने को सबसे बड़ा पण्डित मानता और अपनी विद्याद्वारा दूसरों के यश का नाश करता है, उसके पुण्यलोक अन्तवान् यानी विनाशशील होते हैं और उसका पढ़ा हुआ वेद भी उसे फल नहीं देता।
अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ — ये चार कर्म मनुष्य को भय से मुक्त करने वाले हैं; परंतु वे ही ठीक से न किये जायँ, दूषित भाव से अनुष्ठित हों तो वे उलटे भय प्रदान करते हैं। विद्वान् पुरुष सम्मानित होनेपर अधिक आनन्दित न हो, अपमानित होनेपर संतप्त न हो। इस लोकमें संत पुरुष ही सत्पुरुषोंका आदर करते हैं। दुष्ट पुरुषों को 'यह सत्पुरुष है' ऐसी बुद्धि प्राप्त ही नहीं होती।
ऐसा दान देना चाहिये, इस प्रकार यजन करना चाहिये, इस तरह स्वाध्याय में लगा रहना चाहिये — ये सभी वचन अभयदायक हैं, अतः नित्य पालनीय हैं — ऐसा मैंने सुना है। जो सबका आश्रय है, पुराण यानी कूटस्थ है तथा जहाँ मनकी गति भी रुक जाती है, वह परब्रह्म परमात्मा तुम सब लोगोंके लिये कल्याणकारी हो। जो विद्वान् उसे जानते हैं वे उस परब्रह्म परमात्मा से संयुक्त होकर इहलोक और परलोक में परम शान्ति को प्राप्त होते हैं।
ययाति ने कहा कि अपने पुण्य और दान का अपने ही मुख से बखान करने पर मनुष्य सीधे 'भौम नरक' में गिर जाता है। क्या आज के दिखावे भरे दौर में हम भी अपने पुण्यों को खुद ही नष्ट कर रहे हैं? अपनी राय ज़रूर साझा करें!