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धड़कन के धुन में रहता हूं, जीने का यू आदी हूं मैंमुर्दे  मुझको बोल रहे हैं, जीवन का अपराधी हूं मैं- दिव्यांश पाठक
21/06/2025

धड़कन के धुन में रहता हूं, जीने का यू आदी हूं मैं
मुर्दे  मुझको बोल रहे हैं, जीवन का अपराधी हूं मैं

- दिव्यांश पाठक

यही  काशी, यही गंगा, यही धारा , किनारा  थायहीं पर तेरी आँखों से, बहा आँसू हमारा थासमय की इस रवानी में बहुत बरसा बहुत सूख...
05/03/2025

यही  काशी, यही गंगा, यही धारा , किनारा  था
यहीं पर तेरी आँखों से, बहा आँसू हमारा था
समय की इस रवानी में बहुत बरसा बहुत सूखा
यहीं पर अब नहीं हूं कुछ, यहीं पर तब सितारा था

- दिव्यांश पाठक

#हिंदी #कविता #शायरी

वर्ल्ड बुक फेयर लगा है। कोशिश यही कर रहा था कि नहीं जाऊंगा। पर अपने कई जगह कोशिश कर के इतना हार चुका हूं, कि इस कोशिश ने...
04/02/2025

वर्ल्ड बुक फेयर लगा है। कोशिश यही कर रहा था कि नहीं जाऊंगा। पर अपने कई जगह कोशिश कर के इतना हार चुका हूं, कि इस कोशिश ने हार का कोई अतिरिक्त अफसोस नहीं दिया। 

अक्सर किताब खरीदते हुए, मेरी कंजूसी मुझे दगा दे जाती है। और मैं खुद को लंबे बिल और झोले के साथ खड़ा हुआ पाता हूं। कुछ देर गुस्सा होता है, कि जितनी किताबें खरीद लिया हूं क्या उतना समय है मेरे पास पढ़ने का। पर फिर खर्चे और निवेश का फर्क समझ में आता है। यह किताबें एक बौद्धिक निवेश ही तो हैं, जो कि अभी की गईं पर भविष्य को बेहतर बनाने के लिए। 

किताबें बहुत देखा, उठाया उससे कम और खरीदा बहुत ही कम, पर फिर भी ज्यादा हो गया। हालांकि सुख की जब भी कल्पना करता हूं, तो खुद को दुनिया के किसी अजनबी कोने में कोई अजनबी सी किताब पढ़ते पाता हूं। इस सुख के लिए इतना दुख तो लाज़मी है। 

ज्यादातर फिलासफी की किताबें लिया। जीवन से सत्य सूख रहा है। अपने आस पास से प्रभावित होता रहता हूं, किंतु इस प्रभाव में आत्मा का अभाव न हो, इस कारण फिलासफी बहुत अनिवार्य हो जाती है। पिछले दिनों एक शेर साथ आया - 

जग में हों कर के जोग में रहना 

महज गिनती के लोग में रहना 

इसको किरदार में सुमार करना है...

ओशो के स्टाल्स पर किताबों को छोड़ टाइटल भी मारक हैं - नाथिंग फेल्स लाइक सक्सेस, यह इतनी अद्भुत टाइटल थी कि मैं पूरी किताब खरीद लाया। 

बहुत कुछ इस बार नया भी है, और पुराना नए तरीके  से। यदि किताबों से ऊबे नहीं हैं आप, तो कृपया एक बार आ जाइए।

दशरथ के बाद धरा पर 'हे राम' कह कर गिरने वाले दूसरे व्यक्ति - महात्मा गांधी को उनके पुण्य तिथि पर नमन 🙏
30/01/2025

दशरथ के बाद धरा पर 'हे राम' कह कर गिरने वाले दूसरे व्यक्ति - महात्मा गांधी को उनके पुण्य तिथि पर नमन 🙏

मूक संसृति आज है, पर गूँजते हैं कान मेरे,बुझ गया आलोक जग में, धधकते हैं प्राण मेरे।मौन या एकांत या विच्छेद क्यों मुझको स...
24/01/2025

मूक संसृति आज है, पर गूँजते हैं कान मेरे,
बुझ गया आलोक जग में, धधकते हैं प्राण मेरे।

मौन या एकांत या विच्छेद क्यों मुझको सताए?
विश्व झंकृत हो उठे, मैं प्यार के उस गान में हूँ!

मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

- अज्ञेय

खर्चों में जो भी बचाया जा सकता है। वह बचाने की कोशिश हमेशा रहती है। ताकि कुछ ऐसा ख़रीद सकूं, जो मुझे खर्च होने से बचा ले...
18/01/2025

खर्चों में जो भी बचाया जा सकता है। वह बचाने की कोशिश हमेशा रहती है। ताकि कुछ ऐसा ख़रीद सकूं, जो मुझे खर्च होने से बचा ले।

सुबह ऑफिस के लिए एक और बैग लेकर निकला, क्योंकि ऑफिस से सीधा घर की ट्रेन पकड़नी थी। तो काम के समान के साथ आराम का समान भी...
04/01/2025

सुबह ऑफिस के लिए एक और बैग लेकर निकला, क्योंकि ऑफिस से सीधा घर की ट्रेन पकड़नी थी। तो काम के समान के साथ आराम का समान भी था।  सामन के साथ कैब का वेट कर रहा था, सामने ठेले पर चाय खौलते हुए दिख गई। मैने सोचा कि सीच लिया जाए, अपने को। चाय वाली चाची से चाय लेकर सड़क किनारे खड़ा होकर पी रहा था। 

चाची, कुछ गौर से मेरे बैग को देख रही थीं। जो कि सामान्य सा था, किंतु ट्रॉली के हैंडल के साथ। कुछ देर, बैग के ट्रॉली हैंडल को, हर तरफ से निहार के, हारने के बाद बोलीं, संदेह वाचक वाक्य में :- पंप है... नू? 

मैने उनको देखा, और फिर, वो क्या देख रही हैं, उसको देखा...। मैं - हां.... पंप है।

वो (मुझको, अविश्वास के साथ जांचते हुए)- साइकिल से हो... 

मै - नहीं.... नीचे चक्का लगा है, बैग के। उसमें हवा भरा जाता है। 

वो - अच्छा .... बहुत औज़ार  लगा है

जो सैंटा था, वो बचपन का झूठा वादा हैयह बात जानने  का दर्द  बहुत  ज्यादा है- दिव्यांश पाठक                #कविता         ...
24/12/2024

जो सैंटा था, वो बचपन का झूठा वादा है
यह बात जानने का दर्द बहुत ज्यादा है

- दिव्यांश पाठक

#कविता

सूखे आँख का आँसू सारा रह ना जाये दिल मे पीड़ाजो चाहे तुम श्राप मुझे दो पर  ऐसा  वरदान ना देनागीत ना अपना मौन हो जाएं मन न...
07/12/2024

सूखे आँख का आँसू सारा 
रह ना जाये दिल मे पीड़ा
जो चाहे तुम श्राप मुझे दो 
पर  ऐसा  वरदान ना देना
गीत ना अपना मौन हो जाएं 
मन ना बन जायें खुद बंजर
इसके खातिर है ये जरूरी 
दिल को सहलाएं कुछ खंजर
रोऊ मैं दरिया पर जा कर 
पानी पानी कह कर चीखू
देना मुझको अमर प्यास पर ,
हां! मुझको जलपान ना देना
जो चाहे तुम श्राप मुझे दो 
पर  ऐसा  वरदान ना देना

झूठे सारे गर्व छीन लो
बस दो पुरस्कार यह सच्चा
मेरे गोदी में आ कर के
हँस दें कोई रोता बच्चा
बन के देवता घुमु मद में 
होठो पर एक कुटिल हँसी हो
मुझको गाली दे देना पर  
झूठे यह सम्मान ना देना
जो चाहे तुम श्राप मुझे दो 
पर  ऐसा  वरदान ना देना

काले  काले अक्षर पीकर
सब ही बने हुएं है ज्ञानी
हम जीवन से जलकर सीखे
फिर भी नहीं गयी नादानी
बस केवल आंकड़े गिनाऊँ 
भूख प्यास को गणित बताऊं
जनम-जनम तक मूर्ख रहूंगा 
पर खोखला ये ज्ञान ना देना
जो चाहे तुम श्राप मुझे दो 
पर  ऐसा  वरदान ना देना

- दिव्यांश पाठक

#कविता

सबसे मिलना और अपने आप को बचाना भीहमको तन्हाई भी चाहिए था और जमाना भी- दिव्यांश पाठक
25/10/2024

सबसे मिलना और अपने आप को बचाना भी
हमको तन्हाई भी चाहिए था और जमाना भी

- दिव्यांश पाठक

दिल कहता है कि आंखो को तेरे तक रखेंऔर दुनिया की रवायत है बस लड़ते जानातो क्या तकाज़ा तरक्की का यही है केवलजिसको चाहा था ...
29/09/2024

दिल कहता है कि आंखो को तेरे तक रखें
और दुनिया की रवायत है बस लड़ते जाना
तो क्या तकाज़ा तरक्की का यही है केवल
जिसको चाहा था उसे छोड़ के बढ़ते जाना

- दिव्यांश पाठक

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