24/04/2026
*تقریبِ تکمیلِ قرآن مجید*
`دارالعلوم اہلسنت رضویہ مفتاح العلوم پچموہنی بلوہا بازار سدھارتھ نگر`
_از قلم: علم الہدیٰ رضوی مصباحی_
الحمد للہ رب العالمین! یہ نہایت مسرت و شادمانی کا مقام ہے کہ آج ایک کم سن طالب علم: *محمد ارشد ابن ایوب خان متعلم رضویہ مفتاح العلوم* نے اپنی محنتِ شاقہ، لگن اور اساتذۂ کرام کی محنت و دعا سے قرآنِ مجید کو مکمل حفظ کرنے کی عظیم سعادت حاصل کرلی۔
اس مبارک موقع پر منعقد ہونے والی تقریبِ ختمِ قرآن میں علاقائی علماے کرام، معززینِ قوم اور اہلِ گاؤں کی شرکت اس امر کی روشن دلیل ہے کہ قرآنِ کریم سے وابستگی آج بھی اہلِ ایمان کے دلوں میں زندہ ہے۔
قرآنِ مجید اللہ تعالیٰ کا وہ مقدس کلام ہے جس کے بارے میں خود ارشادِ باری تعالیٰ ہے: *“بے شک ہم نے اس قرآن کو نازل کیا اور ہم ہی اس کے محافظ ہیں”* یہی وجہ ہے کہ ہر دور میں اللہ تعالیٰ نے اپنے بندوں میں سے کچھ خوش نصیب افراد کو اس کلامِ پاک کے حفظ کے لیے منتخب فرمایا۔
حافظِ قرآن نہ صرف اپنے لیے بلکہ اپنے والدین کے لیے بھی باعثِ نجات بنتا ہے، جیسا کہ احادیثِ مبارکہ میں آیا ہے کہ `قیامت کے دن حافظِ قرآن کے والدین کو نور کا تاج پہنایا جائے گا۔`
محمد ارشد سلمہ کی یہ کامیابی اس بات کا واضح ثبوت ہے کہ اگر کم عمری میں بچوں کی صحیح رہنمائی کی جائے تو وہ بڑے سے بڑا دینی مقام حاصل کرسکتے ہیں۔ اس کامیابی میں ان کے استاذِ محترم قاری عبد الرشید علیمی صاحب کی شبانہ روز محنت، اخلاص اور تربیت کا بڑا دخل ہے، جنہوں نے نہایت محبت اور توجہ کے ساتھ اس بچے کو قرآنِ کریم کا حافظ بنایا۔ اسی طرح ادارے کے پرنسپل حضرت قاری عبد القیوم صاحب اور ناظمِ اعلیٰ ڈاکٹر سفیر صاحب کی سرپرستی و نگرانی بھی اس کارِ خیر میں بنیادی ستون کی حیثیت رکھتی ہے۔
علم الہدیٰ رضوی مصباحی نے اپنے منفرد انداز میں دعائے ختم قرآن پڑھایا
متعلم نے کلام پاک کی چند آیتیں پیش کیں، حضرت مولانا رمضان صاحب قبلہ نے نعروں سے ادارہ کو جلا بخشی، قاری عبد القیوم صاحب کے خطاب سے نئی جہت اور نئی فکر میں اضافہ ہوا،
قاری عبدالرشید صاحب کی شاعری نے دلوں کو زندہ کیا،،
حضرت مولانا یعقوب حضرت حافظ و قاری افتاب عالم علیمی حضرت ماسٹر کلیم قاری افضل علی رضوی صاحبان
بقیہ گاؤں کے شریک رہے،،،،،
محمد ارشد سلمہ کی گل پوشی مصافحہ و معانقہ کرنے کے بعد
لوگ ناشتے کی میز پر بیٹھے اعلیٰ درجے کی ڈش اور ناشتہ کا انتظام تھا،، علما و عوام خوب شکم سیر ہوئے،،،
آخر میں علم الہدیٰ رضوی و مولانا رمضان علی قبلہ صاحبان کی دعا پر پروگرام کا اختتام ہوا دوران پروگرام روحانیت غالب تھی،،، اللہ تعالیٰ محمد ارشد اور ان کے اہل خانہ کو سلامت رکھے،،،
تقریبِ ختمِ قرآن دراصل قرآن سے محبت، اس کی عظمت کے اعتراف اور حفاظِ کرام کی حوصلہ افزائی کا ایک خوبصورت ذریعہ ہے، ایسی تقاریب نہ صرف طلبہ کے لیے باعثِ تحریک بنتی ہیں بلکہ معاشرے میں دینی شعور کو بھی بیدار کرتی ہیں، آج کے اس پُرمسرت موقع پر ہم سب کی یہ ذمہ داری بنتی ہے کہ ہم نہ صرف اپنے بچوں کو قرآنِ کریم کی تعلیم دیں بلکہ اس کے معانی و احکام پر عمل کرنے کی بھی ترغیب دیں۔
اللہ تعالیٰ سے دعا ہے کہ وہ محمد ارشد کو قرآنِ کریم کا سچا خادم بنائے، اس کے سینے میں اس نور کو ہمیشہ محفوظ رکھے، اور اسے دنیا و آخرت کی کامیابیوں سے سرفراز فرمائے۔ نیز اس کے اساتذہ، والدین اور تمام معاونین کو اس عظیم خدمتِ قرآن کا بہترین اجر عطا فرمائے۔
اور رضویہ مفتاح العلوم کہ دن دگنی رات چوگنی ترقی عطا فرمائے اور غیب سے مدد نازل فرمائے۔۔۔
أمین یارب العالمین
*तक़रीब ए तकमील ए खत्मे कुरआने मजीद*
_दारुल उलूम अहले सुन्नत रज़विया मिफ़्ताहुल उलूम पचमोहनी, बेलौहा बाज़ार, सिद्धार्थनगर_
`अज़ क़लम: इलमुल हुदा रज़वी मिस्बाही`
अलहम्दुलिल्लाह रब्बिल आलमीन! ये निहायत मस्ररत व शादमानी का मक़ाम है कि आज एक कम उम्र तालिब-ए-इल्म *मोहम्मद अरशद इब्न अय्यूब ख़ान, मुतअल्लिम रज़विया मिफ़्ताहुल उलूम* ने अपनी मेहनत-ए-शाक़ा, लगन और असातिज़ा-ए किराम की मेहनत व दुआ से कुरआन मजीद को मुकम्मल हिफ़्ज़ करने की अज़ीम सआदत हासिल कर ली।
इस मुबारक मौक़े पर मुनअक़िद होने वाली तक़रीब-ए ख़त्म-ए कुरआन में इलाक़ाई उलमा-ए किराम, मुअज़्ज़िज़ीन-ए क़ौम और अहल-ए गाँव की शिरकत इस अम्र की रौशन दलील है कि कुरआन करीम से वाबस्तगी आज भी अहल-ए ईमान के दिलों में ज़िंदा है।
कुरआन मजीद अल्लाह तआला का वो मुक़द्दस कलाम है जिसके बारे में खुद इरशाद-ए बारी तआला है: *बेशक हमने इस कुरआन को नाज़िल किया और हम ही इसके मुहाफ़िज़ हैं।”* यही वजह है कि हर दौर में अल्लाह तआला अपने बंदों में से कुछ खुश-नसीब अफ़राद को इस कलाम-ए पाक के हिफ़्ज़ के लिए मुन्तख़िब फरमाता है।
हाफ़िज़-ए कुरआन न सिर्फ अपने लिए बल्कि अपने वालिदैन के लिए भी बाइस-ए निजात बनता है, जैसा कि अहादीस-ए मुबारका में आया है कि क़यामत के दिन हाफ़िज़-ए कुरआन के वालिदैन को नूर का ताज पहनाया जाएगा।
मुहम्मद अरशद सलमहु की ये कामयाबी इस बात का वाज़ेह सुबूत है कि अगर कम उम्री में बच्चों की सही रहनुमाई की जाए तो वो बड़े से बड़ा दीनी मक़ाम हासिल कर सकते हैं। इस कामयाबी में उनके उस्ताद-ए मुहतरम क़ारी अब्दुर रशीद अलीमी साहब की शबाना-रोज़ मेहनत, इख़्लास और तरबियत का बड़ा दख़्ल है, जिन्होंने निहायत मोहब्बत और तवज्जोह के साथ इस बच्चे को कुरआन करीम का हाफ़िज़ बनाया। इसी तरह इदारे के प्रिंसिपल हज़रत क़ारी अब्दुल क़य्यूम साहब और नाज़िम-ए आला डॉक्टर सफ़ीर साहब की सरपरस्ती व निगरानी भी इस कार-ए ख़ैर में बुनियादी सुतून की हैसियत रखती है।
इलमुल हुदा रज़वी मिस्बाही ने अपने मुनफ़रिद अंदाज़ में दुआ-ए ख़त्म-ए कुरआन पढ़ाया। मुतअल्लिम ने कलाम-ए पाक की चंद आयतें पेश कीं। हज़रत मौलाना रमज़ान साहब क़िबला ने नारों से इदारे को जला बख़्शी। क़ारी अब्दुल क़य्यूम साहब के ख़िताब से नई जहत और नई फ़िक्र में इज़ाफ़ा हुआ,
जबकि क़ारी अब्दुर रशीद साहब की शायरी ने दिलों को ज़िंदा कर दिया।
हज़रत मौलाना याक़ूब साहब, हाफ़िज़ व क़ारी आफ़ताब आलम अलीमी, मास्टर कलीम, क़ारी अफ़ज़ल अली रज़वी साहबान और दीगर अहल-ए गाँव भी शरीक रहे। मोहम्मद अरशद सलमहु की गुलपोशी, मुसाफ़हा व मुआनक़ा के बाद लोगों ने नाश्ते की मेज़ पर बैठकर आला दर्जे के इंतिज़ाम से लुत्फ़ उठाया और उलमा व अवाम ने भरपूर शिरकत की।
आख़िर में इल्मुल हुदा रज़वी और मौलाना रमज़ान अली क़िबला साहबान की दुआ पर प्रोग्राम का इख़्तिताम हुआ। दौरान-ए प्रोग्राम रूहानियत ग़ालिब रही।
अल्लाह तआला मुहम्मद अरशद और उनके अहल-ए ख़ाना को सलामत रखे।
तक़रीब-ए ख़त्म-ए कुरआन दरअसल कुरआन से मुहब्बत, उसकी अज़मत के एतिराफ़ और हफ़्फ़ाज़-ए किराम की हौसला-अफ़ज़ाई का एक खूबसूरत ज़रिया है। ऐसी तक़रीबें न सिर्फ़ तलबा के लिए बाइस-ए तहरीक बनती हैं बल्कि मुआशरे में दीनी शऊर को भी बेदार करती हैं।
आज के इस पुरमसर्रत मौक़े पर हम सब की ये ज़िम्मेदारी बनती है कि हम न सिर्फ अपने बच्चों को कुरआन करीम की तालीम दें बल्कि उसके मआनी व अहकाम पर अमल करने की भी तरगीब दें।
अल्लाह तआला से दुआ है कि वो मुहम्मद अरशद को कुरआन करीम का सच्चा ख़ादिम बनाए, उसके सीने में इस नूर को हमेशा महफ़ूज़ रखे और उसे दुनिया व आख़िरत की कामयाबियों से सरफ़राज़ फरमाए। नीज़ उसके असातिज़ा, वालिदैन और तमाम मुआविनीन को इस अज़ीम ख़िदमत-ए कुरआन का बेहतरीन अज्र अता फरमाए।
और रज़विया मिफ़्ताहुल उलूम को दिन-दुगनी रात-चौगुनी तरक़्क़ी अता फरमाए और ग़ैब से मदद नाज़िल फरमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन॥