12/05/2024
*नया लिब्रल फ़ितना*
आज कल कुछ दानीश-वर लोग बड़े ज़ोर शोर से चिल्ला कर रहे है ……
काबा के गिर्द घूमने से पहले किसी गरीब के घर घूम लेना ।
मस्जिद को क़ालीन देने से पहले किसी भूखे को रोटी दे देना ।
हज उमराह पर जाने से फले किसी गरीब के बेटी की रूखसती का खर्चा उठा लो।
तब्लीग़ में निकलने से बेहतर है किसी लाचार को दावा फ़राहम करदो ।
मस्जिद में सीमेंट की बोरी देने से अफ़ज़ल है कि बेवा/विधवा के घर आटे की बोरी देदो ।
*लेकिन याद रखो*
* दो अच्छे कामों का इस तरह तुलना करना कोई दीनी ख़िदमत या इंसानी हमदर्दी नहीं, बल्कि सरासर ज़हालत है।
*अगर तुलना ही करना है तो दीन और दुनिया के बीच करो और ऐसा कहो!*
15, 20 लाख की गाड़ी, तब लेना जब मोहल्लें में कोई भूखा न सो रहा हो।
50, 60 हजार का मोबाइल फोन तब लें जब मोहल्लें में कोई भीख माँगने वाला न हो।
हर कमरे में AC उस वक़्त लगवाओ जब गर्मी में बग़ैर बिजली और पंखे के सोने वाला कोई ना हो ।
बरांडेड और महँगे कपड़े उस वक़्त ख़रीदो जब सड़क पर फटे कपड़े पहनने वाला कोई ना हो ।
लाखों की गाड़ियाँ, लाखों के मोबाइल फोन और हजारों के खिलौने खरीदते वक़्त इन दानीश-वरो और खुद को अकलमंद समझने वालो को, गरीब, लाचार और बेसहारे लोगों की याद क्यों नहीं आती?
आख़िर यह सब चिड़ काबा, मस्जिद, हज और उमरा और तबलीग़ के बारे में क्यों है?
इन ज़रूरियात का फ़राएज़ से तुलना करके और दीनी फराएज़ से गफ़लत का दर्स देने वाले जब अपनी शादियों पर ग़ैर ज़रूरी खर्च करते है ,गाना बजाना करते है, लंबी लंबी गाड़िया लेकर बारात पर जाते है, बिला ज़रूरत तमाम ख़र्चे करते है, तो उन्हें यह याद क्यों नहीं रहता कि वो ये फ़िज़ूल खर्ची के बजाए किसी गरीब की मदत करदे या एक इदारा बना कर हर वक़्त उस इदारे के ज़रिये ज़रूरतमंदो तक मदत पहुचाँए, गरीब बेटी की निकाह में ताऊन करे।
हजारों, लाखों की आराम दाह चीजें खरीदते वक़्त उन्हें किसी गरीब की बिन ब्याही बेटिया क्यों नहीं नज़र आती? उन्हें किसी भूखे की भूख क्यु नज़र नही आती? किसी लाचार की लाचारी क्यु नही नज़र आती?
एक बार ज़रूर सोचना चाहिए!
क्या इंसानियत के लिए ग़ैर ज़रूरी चीजों का तर्क करना बेहतर है या फ़राएज़ का तर्क करना?
इस तरह के तर्क देने वाली नसल ही Ex-Muslim बन जाते है, जो इस वक़्त उभर रहे है
अगर मुनासिब समझे तो इस पोस्ट को शेयर करे ताकि इस फितना अन्दाज़ से तमाम मुलसलमान महफ़ूज़ रहे ।
यह हमारे लिए एक दीनी और सामाजिक ज़िम्मेदारी है कि इस तरह के लोगो कि फितनी बाते दूसरो तक भी पहुँचाए ताकि वो लोग भी अपने दीन और दुनिया दोनों को महफ़ूज़ रखे।