27/04/2024
Published yesterday!
अमरोहा का चुनाव में बढ़ी राष्ट्रीय मीडिया की दिलचस्पी।
सभी दावेदारों ने झोंकी पूरी ताक़त।
सीनियर पत्रकार खान सलाहउददीन की रिपोर्ट।
अमरोहा लोकसभा चुनाव कई मायने में विशेष और राष्ट्रीय महत्व का रूप ले चुका है। इलेक्ट्रनिक से लेकर अंग्रेज़ी और हिंदी प्रिंट मीडिया में अमरोहा लोकसभा चुनाव की चर्चा लगातार चल रही है। चुनाव के केंद्र में वर्तमान सांसद दानिश अली हैं। इस चुनाव का महत्व इसलिए नहीं कि भाजपा और गठबंधन दोनों के प्रत्याशी दूसरी बार अमरोहा लोकसभा में प्रतिनिधित्व करने के लिए पूरी ताकत लगाए हैं। 2014 में कंवर सिंह तंवर मोदी लहर पर सवार होकर लोकसभा में पहुंचे थे तो 2019 में कुंवर दानिश अली सपा-बसपा कठबंधन लाभ उठाकर राशिद अली के बाद पहले मुस्लिम सांसद बने। वर्तमान में कांग्रेस नेता श्री अल्वी 1999 में बसपा के टिकट पर यहां से चुनाव जीते थे।
अमरोहा का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि गठबंधन और अन्य दोनों दलों के शीर्ष नेताओं ने यहां अपनी पूरी ताकत झोक दी। प्रधानमंत्री मोदी, प्रदेश मुखिया योगी और आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में रैलियां की तो दूसरी तरफ बसपा सुप्रीमो मायावती भी अपने प्रत्याशी डॉक्टर मुजाहिद हुसैन को वोट देने के लिए लोगों का आह्वान करती नज़रआईं और अपेक्षा की विपरीत भारी भीड़ उनकी जनसभा में पहुंची।
यह भी एक सच्चाई है की अमरोहा लोकसभा की सीट कांग्रेस को इसीलिए दी गई क्योंकि यहां से दानिश अली को चुनाव लड़ना था दानिश अली के प्रयासों के कारण ही प्रियंकाऔर राहुल ने अपनी न्याय यात्रा अमरोहा से होकर निकाली तथा गठबंधन की पहले संयुक्त रैली भी अमरोहा में ही आयोजित की गई जिसमे राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने संबोधित किया और दोनों दलों के दिग्गज नेता रैली में शामिल हुए। रैली में सदर विधायक और पूर्व मंत्री महबूब अली ने अखिलेश की मौजूदगी में दानिश अली को अपनी विधान सभा में पचास हजार मतों से जिताने का वादा भी किया है। याद रहे पिछली बार भी दानिश अली को अमरोहा विधान सभा में नव्वे हज़ार से अधिक मत मिले थे और यह अंतर उनकी जीत का मुख्य कारक बना था।
यह चुनाव इसलिए भी अहम नहीं कि आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय सिंह ने गठबंधन प्रत्याशी के पक्ष में एक सफल रैली की जिसमे मीडिया द्वारा दो दलों के कार्यकर्ताओं की आपस में धक्का-मुक्की को एक राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया गया। इसलिए भी महत्वपूर्ण नहीं कि सपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का पूरा संगठन पुरी ताक़त के साथ दानिश अली के लिए काम कर रहा है।
असल बात यह है कि अगर पिछले पांच वर्षों में संसद की कार्यवाही पर एक नज़र डालें तो बसपा संसदीय दल की ओर से दानिश अली क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अपने समाज के मुद्दों को मजबूती से सदन के पटल पर रखते नज़र आए हैं।
दानिश अली सत्ताधारी दल की आंखों में इसलिए भी खटकते हैं कि लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फ़ैज़ल को एक पुराने मामले में तीव्र कार्रवाई करके सज़ा सुना दी गई और उनकी संसद की सदस्यता भी रद्द कर दी गई। इसपर दानिश अली ने गृहमंत्री अमित शाह से कहा था कि आप मुस्लिम मुक्त विधायिका चाहते हैं। दानिश अली ने कई बार सरकार को असहज स्थिति में खड़ा किया।
दिल्ली के सांसद रमेश बिधूड़ी द्वारा दानिश अली और उनके समाज को भरे सदन में गलियां देते तो पूरे विश्व ने देखा और विधूड़ी के विरुद्ध लोकसभा अध्यक्ष ने कोई कार्रवाई भी नहीं की।
दानिश अली ने एक बातजीत में बताया कि वो प्रधानमंत्री, प्रदेश के मुख्यमंत्री, पूरी भाजपा और पूरा आरएसएस की आंखों में खटक रहे हैं और ये लोग किसी भी कीमत पर उनको संसद में नहीं पहुंचने देना चाहते हैं।
यद्यपि इस बार वोटों का अंक गणित तो कुछ और ही कह रहा है मगर उन्हें विश्वास है कि सर्व समाज का वोट उनके पक्ष में पड़ेगा और भारी मतों से जीत दर्ज करेंगे। शुक्रवार को उनका और सभी प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में क़ैद हो जाएगा।
17/10/2021