18/11/2024
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अलंकार, अलंकार की परिभाषा एवं भेद
अलंकार – अलंकार का शाब्दिक अर्थ है- सजावट, श्रृंगार, आभूषण, आदि |साहित्यशास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग काव्य सौन्दर्य के लिए होता है |
अलंकर का सम्बन्ध इस श्लोक से है – ‘अलंकरोति इति अलंकार’
अर्थात जो अलंकृत करे वही अलंकर है | जिस प्रकार आभूषण पहनने से व्यक्ति या स्त्री की शारीरिक सुन्दरता और आकर्षण बढ़ जाता है, उसी प्रकार काव्य में अलंकारो के प्रयोग से उसके सौन्दर्य में वृध्दि होती है | अर्थात काव्य का शोभा बढ़ाने वाले धर्म को अलंकार कहते है |
अलंकार के मुख्यता दो भेद है – (1) शब्दालंकार (2) अर्थालंकार
शब्दालंकार – जहा शब्दों के माध्यम कविता में सौन्दर्य या चमत्कार उत्पन्न वहा शब्दालंकार होता है |
अर्थालंकार – जहा अर्थ के माध्यम से कविता में सौन्दर्य या चमत्कार उत्पन्न हो उसे अर्थालंकार कहते है |
नोट – जहा शब्द और अर्थ दोनों के ही माध्यम से कविता में सौन्दर्य या चमत्कार उत्पन्न हो जाये तो वहा पर उभयालंकार होता है |
शब्दालंकार
परिभाषा –
शब्दालंकार 7 प्रकार के होते है | जिनमे अनुप्रास, यमक, श्लेष, तथा वक्रोक्ति मुख्य अलंकार है |
अनुप्रास – जहा किसी पंक्ति के शब्दों में एक ही वर्ण एक से अधिक बार आता है , तो वहा पर अनुप्रास अलंकार होता है |
उदाहरण – चारुचंद्र कि चंचल किरणे खेल रही है जल थल में |
स्पष्टीकरण – यहाँ च वर्ण कि बार-बार आवृत्ति हुई है |
अनुप्रास अलंकार के पांच भेद है –
छेकानुप्रास अलंकार
वृत्यनुप्रास अलंकार
लाटानुप्रास अलंकार
श्रुत्यानुप्रास अलंकार
अन्त्यानुप्रास अलंकार
छेकानुप्रास अलंकार
जहा पर कोई वर्ण केवल दो बार आये वहा पर छेकानुप्रास अलंकार होता है |
उदाहरण – (1) इस करुणा कलित ह्रदय में अब विकल रागिनी बजती |
(2) वर दन्त की पंगति कुंद कली |
वृत्यानुप्रास अलंकार
जिस अलंकार में किसी वर्ण कि आवृत्ति वृत्तियों के अनुरूप हो वहा वृत्यानुप्रास अलंकार होता है |
वृत्तियाँ तीन प्रकार की होती है – (1) कोमला (2) परुषा (3) उपनागरिका
कोमलता – जिस रचना में य, र, ल, व, स आदि कोमल अक्षरों की प्रधानता हो वहा पर कोमला वृत्ति होती है |
उदाहरण – कूलानी में केलि में कछारण में कुंजन में
क्यारिन में कलित कालीन किलकंत है |
वीथिन में ब्रज में नाबेलिन में बेलिं में
बनन में बागन में बगरयो बसंत है |
उपरोक्त पंक्तियों में कोमल वर्णों आवृत्ति हुई है |
परुषा – जहा ओज की व्यंजना करने वाले कठोर शब्द आवे जैसे ट वर्ग के वर्ण अथवा द्वित्य वर्ण वहाँ परुषा वृत्ति होती है |
उदाहरण – चरण चोट चटकन चकोत अरि उप सिर वज्जत |
विकट कटक विद्दरत वीर वारिद जिमि गज्जत |
यहाँ ट वर्ग की आवृत्ति और संयुक्त वर्ण के कारण परुषावृत्ति है |
उपनागरिका – उपनागरिका वृत्ति में सानुनासिक वर्ण आते है, उसे उपनागरिका वृत्ति कहते है |
उदाहरण – रघुनंद आनंद कंद कोशल चंद दशरथ नंदनम |
यहाँ सानुनासिक वर्णों कि आवृति के कारण उपनागरिका वृत्यानुप्रास है |
लाटानुप्रास –
लाटानुप्रास अलंकार में ऐसे शब्द या वाक्य दुबार अआते है, जिनका सामान्य अर्थ तो एक ही होत्ता है; लेकिन अन्वय करने से पूरी उक्ति का अर्थ बदल जाता है –
उदाहरण – पूत सपूत तो क्यों धन संचिय ?
पूत कपूत तो क्यों धन संचिय ?
स्पष्टीकरण – यहाँ कई शब्द कई बार आये है – पूत, तो क्यों, धन, संचिय |पहली बार सबका अन्वय सपूत के साथ है और दूसरी बार कपूत के साथ है |
2. पराधीन जो धन, नहीं स्वर्ग, नरक ता हेतु |
पराधीन जो जन नहीं, स्वर्ग नरक ता हेतु |
उपरोक्त दोनों पंक्ति में शब्द प्रायः एक से हैं और अर्थ भी एक ही है |
यमक अलंकार
जहा पर कोई शब्द एक से अधिक बार आये लेकिन अर्थ अलग-अलग हो वहाँ पर यमक अलंकार होता है | यमक का अर्थ ही दो होता है |
उदारहण – कनक कनक तौ सौ गुनी मादकता अधिकाय |
वा खाय बौराय नर या पाये बौराय |
स्पष्टीकरण – उपरोक्त उदाहरण में कनक शब्द दो बार आया है पहले कनक शब्द का अर्थ है धतूरा दूसरे कनक शब्द का अर्थ है सोना |
श्लेष अलंकार –
जहाँ किसी शब्द का एक से अधिक अर्थ निकले वहाँ श्लेष अलंकार होता है |
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