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27/07/2021
क्यों मनाया जाता है कारगिल विजय दिवस? जानिए युद्ध के कारणों से लेकर ‘ऑपरेशन विजय’ की सफलता तक हर जानकारी
Kargil Vijay Diwas: कारगिल विजय दिवस हर साल 26 जुलाई को मनाया जाता है. ये वही दिन है जब भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल युद्ध में जीत का परचम लगराया था.
Kargil War Between India and Pakistan: कारगिल युद्ध में भारत को मिली जीत के 22 साल पूरे होने की खुशी में देशभर में जश्न का आगाज हो गया है. ‘करगिल विजय दिवस’ इस युद्ध में शहीद हुए जवानों के बलिदान को याद करने के लिए हर साल मनाया जाता है. ये लड़ाई भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर हुई थी. जिसकी शुरुआत पाकिस्तानी सैनिकों ने की. इन्होंने भारतीय हिस्से में घुसपैठ कर अपने ठिकाने बना लिए थे, लेकिन आखिर में भारत ने इन्हें खदेड़ दिया था.
कारगिल विजय दिवस (Kargil Vijay Diwas) का आयोजन हर साल 26 जुलाई को किया जाता है. ये वही दिन है, जब भारतीय सेना ने कारगिल में अपनी सभी चौकियों को वापस पा लिया था, जिनपर पाकिस्तान की सेना ने कब्जा किया था. जिसके बाद से हर साल लड़ाई में शहीद हुए जवानों को इस दिन याद किया जाता है (Kargil Vijay Diwas About). ये लड़ाई जम्मू कश्मीर के कारगिल जिले में साल 1999 में मई से जुलाई के बीच हुई थी. पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जानकारी दिए बिना तत्कालीन पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने कारगिल में घुसपैठ करवाई थी.
‘ऑपरेशन विजय’ की शुरुआत
लड़ाई की शुरुआत उस समय हुई जब पाकिस्तानी सैनिकों और आतंकवादियों ने भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की. घुसपैठियों ने खुद को प्रमुख स्थानों पर तैनात किया, जिससे उन्हें संघर्ष की शुरुआत के दौरान रणनीतिक तौर पर लाभ भी मिला (Kargil Vijay Diwas Background). स्थानीय चरवाहों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर भारतीय सेना ने घुसपैठ वाले सभी स्थानों का पता लगाया और फिर ‘ऑपरेशन विजय’ की शुरुआत की गई.
शुरुआत में बेशक अधिक ऊंचाई पर होने के कारण पाकिस्तान की सेना को फायदा मिल रहा था लेकिन इससे भी भारतीय सैनिकों का मनोबल कम नहीं हुआ और आखिर में उन्होंने जीत का परचम लहरा दिया. सेना ने फिर 26 जुलाई, 1999 को घोषणा करते हुए बताया कि मिशन सफलतापूर्वक पूरा हो गया है (Operation Vijay). उसी दिन के बाद से हर साल कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है. हालांकि भारत के लिए ये जीत काफी महंगी भी साबित हुई. आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि भारत के 527 सैनिक शहीद हुए थे, जबकि पाकिस्तान के 357-453 सैनिक मारे गए.
क्या थी लड़ाई की वजह?
पाकिस्तान के सैनिकों और आतंकवादियों ने कारगिल के ऊंचे पहाड़ों पर घुसपैठ करके अपने ठिकाने बना लिए थे. चूंकी वह ऊंचाई पर थे, तो उन्होंने इसका खूब फायदा भी उठाया (Reasons Behind Kargil War). इससे वह निचले हिस्से में मौजूद भारतीय सैनिकों पर आराम से गोलीबारी कर पा रहे थे. पाकिस्तान ने युद्ध के दौरान दो भारतीय लड़ाकू विमानों को मार गिराया था. जबकि एक अन्य लड़ाकू विमान ऑपरेशन के दौरान क्रैश हो गया. लेकिन बाद में खुद को फंसता देख पाकिस्तान ने अमेरिका से हस्तक्षेप करने को कहा लेकिन वहां उसे मुंह की खानी पड़ी.
पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ (Nawaz Sharif Kargil War) ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से बात की थी. लेकिन क्लिंटन ने साफ कहा कि वह ऐसा तब तक नहीं करेंगे, जब तक पाकिस्तानी सैनिकों को नियंत्रण रेखा से पीछे नहीं हटा लिया जाता. फिर जैसे ही पाकिस्तानी सैनिक पीछे हटे, भारतीय सैनिकों ने बाकी चौकियों पर हमला कर दिया और 26 जुलाई तक उनमें से आखिरी चौकी को भी वापस पाने में कामयाब रहे.
लड़ाई के बाद क्या हुआ?
कारगिल युद्ध के खत्म होने के बाद पाकिस्तान ने इसमें किसी भी तरह की भूमिका होने से इनकार कर दिया और कहा कि भारत ‘कश्मीरी स्वतंत्रता सेनानियों’ से लड़ रहा था (After Kargil War). हालांकि युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों को बाद में पाकिस्तान ने सम्मानित किया. इन्हें हार मिलने के बाद मेडल से नवाजा गया, जिससे पाकिस्तान का दावा दुनिया का सबसे बड़ा झूठ साबित हुआ. वहीं भारत ने कारगिल युद्ध के बाद रक्षा क्षेत्र में बजट का बड़ा हिस्सा खर्च करने का फैसला लिया.
वीरता पुरस्कार से सम्मानित हुए जवान
अठारहवीं बटालियन, द ग्रेनेडियर्स के सैनिक ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव (Grenadier Yogendra Singh Yadav) को परमवीर चक्र से नवाजा गया.
प्रथम बटालियन, 11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टीनेंट मनोज कुमार पांडे (Lieutenant Manoj Kumar Pandey) को मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया.
तेरहवीं बटालियन, जम्मू कश्मीर राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा (Captain Vikram Batra) को मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया.
तेरहवीं बटालियन, जम्मू कश्मीर राइफल्स के राइफलमैन संजय कुमार (Rifleman Sanjay Kumar) को परमवीर चक्र दिया गया.
17 जाट रेजीमेंट के कैप्टन अनुज नायर (Captain Anuj Nayyar) को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.
18 ग्रेनेडियर्स के मेजर राजेश सिंह अधिकारी (Major Rajesh Singh Adhikari) को मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया.
11 राजपुताना राइफल्स के कैप्टन हनीफ उद्दीन (Captain Haneef-u-ddin) को मरणोपरांत वीर चक्र से नवाजा गया.
वन बिहार रेजिमेंट के मरियप्पन सरवन (Major Mariappan Saravanan) को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया.
भारतीय वायु सेना के स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा ( Squadron Leader Ajay Ahuja) को मरणोपरांत वीर चक्र दिया गया.
जम्मू कश्मीर पैदल सेना की 8वीं बटालियन के सैनिक हवलदार चुन्नी लाल (Hawaldar Chuni Lal) को वीर चक्र और सेना पदक दिया गया. वह 2007 में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए थे. जिसके बाद उन्हें नायब सूबेदार के रूप में मरणोपरांत अशोक चक्र भी नवाजा गया.
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01/12/2020
शैतान सिंह: वो परमवीर मेजर, जो मरने तक अपने पैर से मशीन-गन चलाता रहा
लद्दाख की ठंड और कलेजा जमा देने वाली हवाएं, ना गर्म कपड़े, ना पर्याप्त हथियार, ऐसे में मेजर शैतान सिंह की अगुवाई में भारत की सेना ने चीनी सेना से किया था मुकाबला... पढ़ें भारत के जांबाज की कहानी.
आज ही रोज ऐसे व्यक्ति का जन्म हुआ था जिनके नाम पर चीनी सेना आज भी कांपती है. ये व्यक्ति थे मेजर शैतान सिंह. जिन्होंने साल 1962 में भारत-चीन के युद्ध के दौरान चीनी सेना से जंग लड़ी थी. आपको बता दें. उस वक्त सेना के बाद पर्याप्त संसाधन नहीं थे. आइए जानते हैं मेजर शैतान सिंह के बारे में.
मेजर शैतान सिंह का जन्म जोधपुर, राजस्थान में 1 दिसंबर, 1924 को हुआ था. शैतान सिंह का पूरा नाम शैतान सिंह भाटी था. उन्हें 1962 में हुई भारत-चीन की जंग के लिए जाना जाता है. जिसके लिए उन्हें साल 1963 में मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया था.
जानें- कैसे भारतीय सेना चीनी सेना पर पड़ी भारी
अक्टूबर 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया. जब 13वीं कुमाऊंनी बटालियन की C कंपनी लद्दाख में तैनात थी. बटालियन में 120 जवान थे. 1962 की जंग में भारतीय जवानों ने रेजांग ला में चीनी सैनिकों का सामना किया, जिसकी अगुआई शैतान सिंह कर रहे थे. बता दें, जब चीन ने भारत में हमला किया उस वक्त न तो जवानों के पास ऐसे हथियार थे जो चीन के सामने टिक सकते, न भीषण ठंड से बचने के लिए कपड़े नहीं थे. सैनिकों को पतले कपड़ों में माइनस के टेंपरेचर में युद्ध लड़ रहे थे.
18 नवंबर 1962 का ही वो दिन था जब चीन ने भारतीयों सेना के साथ भारत पर हमला बोल दिया था. बता दें भारत के पास 120 सैनिक थे वही चीन के पास करीब 2000 हजार सैनिक थे.
जब शैतान सिंह को युद्ध का एहसास
जब शैतान सिंह को आभास हुआ चीन की ओर से बड़ा हमला होने वाला है तो उन्होंने अपने अधिकारियों को रेडियो संदेश भेजा और मदद मांगी. वहीं दुख की बात ये है कि उन्हें कहा गया कि अभी कोई मदद मुमकीन नहीं है. इसी के साथ उनसे कहा गया कि सभी सैनिकों को लेकर चौकी छोड़कर पीछे हट जाओ (बता दें, चौकी छोड़ने का मतलब हार मानना होता है)
नहीं मानी हार
मेजर शैतान सिंह ने पीछे न हटने का फैसला लिया. वह ये बात बखूबी जानते थे कि वक्त कम और चीन के सैनिक कभी भी हमला बोल सकते हैं. ऐसे में तुरंत उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाया और कहा-
"हम 120 है दुश्मनों की संख्या हमसे ज्यादा हो सकती है. पीछे से हमें कोई मदद नहीं मिल रही है. हो सकता है हमारे पास मौजूद हथियार कम पड़ जाए. हो सकता है हम से कोई न बचे और हम सब शहीद हो जाए. जो भी अपनी जान बचाना चाहते हैं वह पीछे हटने के लिए आजाद हैं, लेकिन मैं मरते दम तक मुकाबला करूंगा. शैतान सिंह का मानना था "प्राण जाए पर वचन ना जाए".
इस मीटिंग के बाद एक रणनीति तैयार की गई. शैतान सिंह ने कहा कि हमारे पास संसाधन कम है और दुश्मनों की संख्या ज्यादा है. ऐसे में कोशिश करें कि एक भी गोली बर्बाद न जाए. हर गोली निशाने पर लगे. इसी के साथ दुश्मनों के मारे जाने पर उनसे बंदूक छीन ली जाए.
जब चीनी सेना का सामना हुआ शैतान सिंह के वीरों से
चीनी सेना ये मान चुकी थी कि भारतीय सेना ने चौकी छोड़ दी है. लेकिन वह ये नहीं जानती थी उसका सामना जाबांज शैतान सिंह और उनके वीरों से है. सबह के करीब 5 बजे भारतीय सैनिकों ने चीनी सेना पर गोली बरसानी शुरू कर दी. कुछ ही देर में हर तरफ दुश्मन की लाशें पड़ी थी. जब कुछ चीनी मारे गए थे उस वक्त मेजर शैतान सिंह ने कहा था कि ये मत समझना युद्ध का अंत हो गया है. ये तो शुरुआत है. जिसके बाद चीन ने दोबारा आक्रमण किया. जब तक भारतीय सैनिकों के पास गोलियां लगभग खत्म हो गई थी. उस वक्त 5 से 7 गोलियां बची थी.
चीनियों ने रेजांग ला पर मोर्टार तथा रॉकेटों से बंकरों पर गोलीबारी शुरू कर दी. भारतीय सैनिकों को केवल अपने जोश का सहारा था, क्योंकि रेजांग ला पर बंकर भी नहीं थे और दुश्मन रॉकेट दागे जा रहा था. इस बीच शैतान सिंह के हाथ में गोली भी लग चुकी थी.
भारतीयों की हार थी संभव
शैतान सिंह ये बात अच्छे से जानते थे कि 2000 चीनी सैनिकों के सामने 120 भारतीय हार जाएंगे. इसके साथ ही वह जानते थे कि यदि सभी जवान शहीद हो गए थे भारत के लोग और सरकार ये बात कभी नहीं जान पाएगी कि आखिर रेजांग ला में क्या हुआ था. जिसके बाद उन्होंने दो घायल सैनिकों से कहा कि वह यहां से तुरंत चले जाए. इन दोनों का नाम था रामचंद्र और निहाल सिंह. बता दें, निहाल सिंह को चीनी कैदी अपने साथ ले गए थे.
13वीं कुमाऊं के इस पराक्रमी पलटन में केवल 14 जवान जिंदा बचे थे. इनमें भी 9 गंभीर रूप से घायल थे. बता दें, भारत के 120 जवानों ने 1,300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था. वहीं चीन ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में ये कबूल कर लिया कर लिया था कि 1962 के युद्ध में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था.
जब बर्फ में दबे मिले शव
युद्ध को खत्म हुए 3 महीने हो गए थे. ऐसे में शैतान सिंह के शव के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी. रेजांग ला की बर्फ पिघली और रेड क्रॉस सोसायटी और सेना के जवानों ने उन्हें खोजना शुरू किया. तब एक गड़रिये अपनी भेड़ चराने के लिए रेजांग की ओर जा रहा था वहीं बड़ी सी चट्टान में वर्दी में कुछ नजर आया. जिसके बाद उसने ये सूचना वहां मौजूद अधिकारियों को दी.
गड़रिये की खबर के बाद जब सेना वहां पहुंची तो उन्होंने जो देखा उसे देखकर सबके होश उड़ गए. एक-एक सैनिक उस दिन भी अपनी-अपनी बंदूकें थामे ऐसे बैठे थे जैसे मानो अभी भी लड़ाई चल रही हो. उनमें शैतान सिंह भी अपनी बंदूक थामे बैठे थे. वो ऐसे लग रहे थे जैसे मानो अभी भी युद्ध के लिए तैयार है.
उनमें अभी भी जोश बाकी है. ये तो नहीं मालूम चल पाया कि युद्ध कितनी दे तक चला पर भारत के जवान अपनी अंतिम सांस तक देश के लिए लड़ते रहे और लड़ते लड़ते बर्फ की आगोश में आ गए. मेजर शैतान सिंह का उनके होमटाउन जोधपुर में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया. इसके बाद उन्हें देश का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था.
आपको बता दें, आज रेजांग ला आज शूरवीरों का तीर्थ है. मेजर शैतान सिंह भी एक ऐसे शख्स के तौर पर इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए हैं. जो साल 1962 में महज 37 वर्ष की उम्र में देश पर कुर्बान हो गए थे. उनकी शहादत को हमारा सलाम...
14/11/2020
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